Wednesday, 14 December 2016

'दलित ईसाई'(वो हिन्दू दलित जो ईसाई बने हैं) भी छूआछूत के शिकार है!

महान हिन्दू धर्म के आध्यात्मिक पुस्तकों में यह स्पष्ट रूप से लिख दिया गया है कि दूसरों का धर्म डरावना होता है तो फिर क्यों आज के दलित अपने मूल हिन्दू धर्म को छोड़कर बौद्ध या ईसाई या इस्लाम कबूल कर रहे हैं?
इनका वास्तविक अधिकार इसी हिन्दू धर्म में ही मिल सकता है। किसी और धर्म में नहीं। इंडियन एक्सप्रेस नामक अंग्रेजी के समाचार पत्र में छपी एक खबर के मुताबिक "उच्च स्तर पर नेतृत्व में उनकी (दलित ईसाइयों की) सहभागिता न के बराबर है।"
बीबीसी पर छपी एक खबर में कहा गया है कि इस अख़बार के मुताबिक़ ये दस्तावेज़ कैथोलिक बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ़ इंडिया में जारी किए गए। ये समुदाय की सर्वोच्च निर्णायक संस्था है। ये सामाजिक तौर पर पिछड़े लोगों से हर तरह का भेदभाव ख़त्म करने और उनके उत्थान के लिए प्रयास करती है। लेकिन अब भारत की कैथोलिक चर्च ने पहली बार आधिकारिक तौर पर मान लिया है कि दलित ईसाइयों को छूआछूत और भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
कुछ दिन पहले मैंने वामपंथी इतिहासकारों के कपटजाल पर कई सारे ब्लॉग लिखे थे,जिसमें रामशरण शर्मा नाम के एक प्राचीन भारत के इतिहासकार 'हिन्दू धर्म और परंपरा' को केवल ब्राह्मणवाद मानकर नकार देते हैं।
उसमें मैंने लिखा था.....
       रामशरण शर्मा 'मौर्य शासन के महत्त्व' वाले अध्याय में लिखते हैं,"ब्राह्मणों की ओर से प्रतिक्रिया की शुरुआत अशोक की नीति के परिणामस्वरुप हुई।"
       यहाँ इन सारी पंक्तियों को लिखना तो संभव नहीं,लेकिन इसका सार है -ब्राह्मणों का अशोक के प्रति विद्वेष हो गया क्योंकि इन्होंने बलि पर रोक लगा दी,स्पष्ट है कि ब्राह्मणों की आमदनी पर असर पड़ा होगा और गुजर-बसर प्रभावित हुआ होगा।
       पर सवाल यह है कि
        "बलियों का कितना हिस्सा ब्राह्मणों को दक्षिणा स्वरूप प्राप्त होता होगा ?" इस पर कुछ नहीं कहा गया है।
       अगर वास्तव में सभी लोग बालियाँ चढ़ाया करते थे तो अशोक के समय(2300 वर्ष पूर्व) संचार व्यवस्था इतनी मजबूत तो नहीं थी कि अचानक सब बंद करा दिया गया होगा। लोग आसानी से अपनी परंपराओं को छोड़ा नहीं करते जबतक कि उसका स्थान लेने कोई आधुनिकता का प्रतीक या दूसरा न आ जाए। उस समय इस तरह का कोई संकेत नहीं मिलता। अगर दबाव डालकर ऐसा कराया गया होता तो विद्रोह के संकेत जरूर मिलते जो स्पष्ट करने के लिए काफी है कि ब्राह्मणों में कोई विद्वेष नहीं हुआ था।
         खैर..... ये बात तो आपको भी मालूम होगा कि इतिहास अटकलबाजियों पर नहीं चलती,कुछ भी कहने से पहले प्रमाण पेश करना होता है,लेकिन शर्मा जी द्वारा किताब में कोई भी साक्ष्य इस मामले में दिया ही नहीं गया है।
         प्रमाण की बात तो अलग रही,लेकिन ज़रा गौर कीजिये कि किन-किन जुमलों को जोड़कर दोषारोपण किया गया है -
        "हिन्दू धर्म का अर्थ है - ब्राह्मणवाद।"
        "ब्राह्मण का लक्ष्य है - आमदनी कमाना।"
        जो कि सरासर गलत है,ऐतिहासिक स्त्रोत तो कभी इस तरह का वर्णन नहीं करते। लेकिन सभी जानते हैं कि ब्राह्मणवाद नाम का कोई चीज ही नहीं है।
       ईसाई धर्म को लेकर कई तर्क देते हुए ये कहते हैं कि इसमें जाति नामक भेदभाव का कोई निशान नहीं,लेकिन जब यह दृष्टिगोचर हो गया कि चर्चों में 'दलित ईसाईयों' को अलग बैठने की व्यवस्था की जा रही है तो इतिहासकार महोदय को 'दलित ईसाईयों' के लिए भी आरक्षण की मांग कर देना चाहिए,लेकिन फिर भी ये आजतक यह बात दोहराने में लगे हुए हैं कि परिभाषा के अनुसार इस वर्ग(दलित) का ईसाई धर्म में कोई अस्तित्व नहीं है। (सितंबर,2016 का ब्लॉग)
अब तो खुद ईसाई धर्म यह मान चुका है कि दलित ईसाईयों के साथ छूआछूत और भेदभाव है तो क्या ये इतिहासकार जो झूठ के बदौलत अपनी दुकानदारी चलाते रहे हैं,वे आज माफी मांगेंगे या वहीं राग अलापते रहेंगे कि परिभाषा के अनुसार इस वर्ग(दलित) का ईसाई धर्म में कोई अस्तित्व नहीं है?