Tuesday, 13 December 2016

मोदी और भक्त : मोदी आलोचना (अवलोकन-3)

2014 लोकसभा चुनाव प्रचार के समय से ही शब्द 'भक्त' काफी लोकप्रिय हुआ है। वास्तव में इस 'भक्त' का मतलब 'आध्यात्मिक भक्त' से बिल्कुल अलग है,आमतौर पर भारतीय जनता पार्टी के नेता नरेंद्र मोदी जो इनदिनों प्रधानमंत्री भी हैं के समर्थकों के लिए इस 'भक्त' का इस्तेमाल किया जाता है। मैंने इस बात का पता लगाने की काफी कोशिश की कि आखिर यह शब्द प्रचलित किसके द्वारा हुआ और इसका विकास-क्रम क्या है,पर दुर्भाग्य कि संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाया।
भारतीय राजनीति के इतिहास में मोदी जैसा लोकप्रियता सभी राजनीतिज्ञों को तो नहीं लेकिन कुछ को ही मिल पाया है,पर यह लोकप्रियता बाकी से इस मायने में अलग हो जाता है कि भक्त का संकल्पना का जो विकास स्थापित हुआ है,कहीं भविष्य में एक नए किस्म का भगवान ही अस्तित्व में न आ जाएं,जिसकी प्रबल संभावना नजर आ रही है।
कुछ दिन पहले मैंने 'समाज के आइना' के रूप में 'भक्त' पर विस्तृत वार्त्ता की ओर इशारा किया था जिसका कुछ अंश इसप्रकार है -
"भक्त हो?"
"सभी होते हैं,मैं हो गया तो क्या हुआ?"
"नहीं,मेरा मतलब है - मोदी भक्त।"
"नहीं तो।"
"मोदी का आलोचना क्यों नहीं करते हो?"
"अब जो अच्छा करेगा,उसका प्रशंशा ही तो करेंगे।"
"ओह्.... तो तुम परम भक्त हो?"
"क्या बात कर रहे हो भाई?"
"वहीं जो लोग कह रहे हैं।"
"तब तुम तो 'गैर-भक्त' हो?"
"नहीं,मैं निष्पक्ष आलोचक हूँ,गैर-भक्त तो नहीं।"
"मैं भी तो निष्पक्ष समर्थक हूँ।"
"नहीं तुम भक्त तो हो और साथ में कुतर्की भी।"
"एक समर्थक भक्त कैसे हो सकता है? तब तो अन्यों के समर्थक भी दूसरे प्रकार के भक्त होंगे?"
"नहीं,वे सत्ता के खिलाफ हैं और स्वतंत्र आलोचक हैं।"
"फिर वहीं बात! स्वतंत्र और निष्पक्ष आलोचक। तो समर्थक स्वतंत्र और निष्पक्ष क्यों नहीं हो सकता?"
"तुमने तो कुतर्क की सारी हदें पार कर दी। मैं भक्तों से बात नहीं करता।"
आजकल यहीं देखने को मिल रहा है,अगर किसी ने भी कुछ भी सरकार के समर्थन में लिखा तो ऐसे ही द्वेषपूर्ण और कम आंक कर देखा जाने लगता है। आम लोगों में तो ये वहीं लोग हैं जिनको अपना परिचय भी ठीक से देने नहीं आता और पत्रकारों,बुद्धिजीवियों आदि तो एक सड़-गल चुकी विचारधारा जिसको अपने ही देश में गहरे दफन कर दिया गया को भारत में अपनाने के लिए,जो संभव ही नहीं है,ताकि अपनी हित-पूर्ति होता रहे,चापलूसी करके जिंदगी गुजार देते हैं और निष्पक्ष आलोचक होने का दावा कर रहे हैं।
यह भक्त(मोदी समर्थक) इतना लोकप्रिय हो गया है कि कई तो इसके व्यापक आयाम देने लगे हैं और कहते नजर आते हैं कि बाकी पार्टियों और नेताओं आदि के भी भक्त हैं लेकिन मोदी भक्त जितने आक्रामक नहीं हैं। पर जो कोई भी ये बात कह रहे हैं वे यह बताना जरूरी नहीं समझते कि आखिर इसका पैमाना क्या है?
वरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव बीबीसी हिंदी के लिए लिखते हैं,"यह कोई दैवीय अभिशाप नहीं है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की उग्र मुसलमान विरोधी विचारधारा और प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिपूजा की केमिस्ट्री से पैदा हुए इन दबंग भक्तों को जवाब देने वाला कोई नहीं है लिहाजा उनकी मनमानी के लिए मैदान खाली है।"(22 नवंबर,2016)
भक्त के बारे में इनके विचारों को पहले ही नजर में पढ़ने पर किसी को भी एकतरफा और पूर्वाग्रह पीड़ित लगेगा,क्योंकि इनके विचार बदले जमाने की बात हो गयी है,ये उसी पुरानी बात को दोहरा रहे हैं जो वामपंथी,उदारवादी और छद्म सेकुलर संघ और भाजपा का बढ़ता कद देखकर सांप्रदायिक होने का झूठा प्रचार करने लगे थे। 'उग्र मुसलमान विरोधी विचारधारा' ये उतना ही बकवास है जितना कि वामपंथियों को देशभक्ति का प्रमाणपत्र देना। इनके जैसे कई पत्रकार हैं जो यह भूल जाते हैं संघ अपने एक 'राष्ट्रीय मुस्लिम मंच' के माध्यम से 'मुसलमान सशक्तिकरण' और 'समाज निर्माण' का बखूबी काम कर रहा है। संघ का अनुषंगी संगठन 'राष्ट्रीय मुस्लिम मंच' का नाम ही इनको वास्तविकता बताने के लिए काफी है।
ये आगे लिखते हैं,जिसपर मेरा अर्द्ध सहमति भी है," लालू प्रसाद यादव, ममता बनर्जी, प्रकाश सिंह बादल समेत सभी प्रमुख पार्टियों के नेता या तो व्यक्तिपूजा या वंशवाद के शिकार हुए हैं जिसके कारण उनकी पार्टियां भक्तों की नर्सरी में बदल गई हैं और प्रमुख काम चुनाव जिताने के शार्टकट तरीकों का अनुसंधान करना रह गया है। सभी पुरानी पार्टियों में कार्यकर्ताओं के राजनीतिक प्रशिक्षण की परंपरा थी जो जानबूझकर खत्म की जा चुकी है. यही कारण है कि मोदी के भक्तों को रोकने वाला कोई नहीं दिखाई दे रहा है।"(मेरे लिए यहीं वाक्य काम का है जिसपर किसी अन्य आलेख में चर्चा करेंगे।)
इसी तरह कमर वहीद नकवी बीबीसी हिंदी के लिए लिखते हैं,"मंदिर की बात को मोदी-भक्तों का एक वर्ग यह कहकर प्रचारित कर रहा है कि यह नरेंद्र मोदी का ही प्रताप है कि वहाँ की सरकार मंदिर के लिए ज़मीन देने को तैयार हो गई। ऐसे लोगों को यह जान कर थोड़ी निराशा होगी कि दुबई में शिव और कृष्ण मंदिर के अलावा अक्षरधाम की स्वामीनारायण संस्था का सत्संग भवन, गुरुद्वारा और गिरजाघर भी हैं।"(18 अगस्त,2015)
यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि इनके जैसा पत्रकार भी मोदी भक्त का इस्तेमाल कर रहा है,अब इसे क्या कहा जाए?
आप भक्त के बारे में कैसा भी छवि बना लें लेकिन आप आलोचना तभी कर सकते हैं जब आप खुद निष्पक्ष हों। अपनी व्यक्तिगत हित-पूर्ति के लिए आप अपनी आकाओं को खुश रखने के लिए इस बनावटी आलोचना का प्रयोग करेंगे तो समझते देर नहीं लगेगी।
जबकि मेरा विचार इनसब से काफी अलग है,जिस रूप में भक्त की प्रतिकृति को पेश किया जा रहा है,वो बिल्कुल ही गैर-जिम्मेवाराना है क्योंकि एक समर्थक को भक्त कहेंगे तो एकतरफा आलोचक भी तो भक्त होगा,अगर इसे नकारा जाएगा तो वहीं आप 'अंधा में काना राजा' को प्रकट कर रहे हैं कि जो हम कह दिए सही हैं।