Tuesday, 13 December 2016

मोदी और हिंदुत्व का एजेंडा : मोदी आलोचना (अवलोकन-2)

एक ऐसा विचारधारा जो पूरी दूनिया में सिमटता जा रहा है और भारत में कुछेक जगहों को छोड़कर इसका कोई वजूद नहीं,वो बार-बार इस बनावटी आवाज को बुलंद करता रहा है कि भाजपा-नीत केंद्र सरकार संघ के हिंदुत्व के एजेंडे को लागू कर रहा है। सभी संगठन को अपनी राजनीतिक मजबूरी होती है ताकि हित को साधा जा सके,कई स्वतंत्र आलोचकों के जैसा मैं भी इस तथ्य से इत्तेफाक रखता हूँ कि संप्रादायिकता से सबसे जुझारू लड़ाई वामपंथियों ने ही लड़ी है,इस विश्वास का यहीं कारण था कि धर्म-जाति जैसे राजनीति साधने के यंत्र का इस्तेमाल ये नहीं करते लेकिन मौजूदा रुझान ने करवटें बदली और इनके 'वर्ग' का स्थान 'जाति-धर्म' ने ले लिया।
वामपंथ वहीं विचारधारा है जो भौतिकवादी है, धर्म पर अपना राजनीतिक उद्देश्य कैसे पूरा कर सकता है? भले ही ऐसे विचारधाराओं को यह 'समकालीन यथार्थ' लगे लेकिन इसके लिए तो 'शाश्वत सत्य' नहीं हो सकता। धर्म उनके लिए ही शाश्वत हो सकता है जो इसमें विश्वास करते हैं और इस मर्म को दक्षिणपंथियों से बेहतर कौन जान सकता है!
एक ओर यह विचारधारा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को धर्म की आड़ में पूरा करने का प्रयास कर रहा है तो वहीं दूसरी ओर विचारधारात्मक विरोध कर रहा है कि संघ,वर्तमान केंद्र सरकार के माध्यम से हिंदुत्व के एजेंडे को लागू करने का प्रयास कर रहा है,साथ ही संघ को संप्रदायिकऔर फासीवादी कहने का कोई मौका नहीं गँवा रहा है। एक ओर हिंदुओं को ब्राह्मणवाद जैसे मनगढंत शब्द में बाँधना चाहता है तो दूसरी ओर अन्य धर्मों मुसलमान आदि पर चुप्पी साध लेता है;इन आधारों को देखते हुए इनका आलोचना पहली ही नजर में विश्वसनीय दिखाई नहीं देता।
माननीय सुप्रीम कोर्ट भी यह मान चुका है कि हिंदुत्व कोई धर्म नहीं बल्कि जीने का कला है तो फिर अगर संघ इसे वर्तमान केंद्र सरकार की सहायता से लागू करवाने का प्रयास भी कर रहा है तो बुराई क्या है इसमें? जब यह धर्म है ही नहीं तो सांप्रदायिक कैसे हो गया?
आपसभी को याद होगा जब स्मृति ईरानी केंद्रीय शिक्षा मंत्री थी तो रोजाना मीडिया में यह देखने-पढ़ने को मिल ही जाता था कि ईरानी हिंदुत्व को विश्वविद्यालयों और अन्य जगहों पर लागू कर रही है। इन वामपंथियों की हमेशा से यहीं फितरत रही है कि देशविरोधी हरकतें करके संतुलन बनाने का प्रयास करें(हैदराबाद में एक दलित आत्महत्या और JNU के 9 फरवरी की घटना के संदर्भ में देखें)।
बिहार चुनाव के बाद जिस तरह असहिष्णुता गायब हुआ,ठीक उसी तरह स्मृति ईरानी को कपड़ा मंत्रालय में भेजने से हिंदुत्व का एजेंडा भी मुख्य पर्दे से धूमिल हो गया। तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि लोकतंत्र में एक मामूली टीवी एक्टर जब मंत्री पद के विशिष्ट ओहदे तक पहुँच गयी तो इस बात को ये लोग पचा नहीं पाए कि यह सब कैसे हो गया? ईरानी के लिए जिन आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया गया,वह न केवल गैर-जरूरी था बल्कि माफी के योग्य भी नहीं था।
अब सवाल आता है कि हिंदुत्व तो कोई धर्म है नहीं,यह जीने का कला है,अगर केंद्र सरकार इसे लागू भी कर रही है तो दिक्कत क्या है?
जरा सोचिए - "अगर कोई राज्य केवल सेकुलर बनकर रह जाता है तो उसके आधार में किसी किस्म का आध्यात्मिक आवेश नहीं रहता,इस स्थिति में उसकी(राज्य) अमानवीय प्रवृतियाँ उभरने लगती है। आपसभी को याद होगा कि कितने दंगे राज्य प्रायोजित रहे हैं,हम सब जानते हैं कि राज्य झूठ बोलने में उस्ताद होती है,इसलिए दंगों के साजिश को छुपा लिया जाता है।
रजनी कोठारी के शब्दों में भारतीय राज्य न समाज को मुक्ति देने की दिशा में ले जा पाया और न ही सेकुलर रह पाया। कुल मिलाकर गंभीर संकट का शिकार हो गया है।"
इस संकट के स्थिति में अगर सरकारें और संगठन हिंदुत्व रुपी आध्यात्मिक आवेश को राज्य के केंद्र में देने का प्रयास कर रही है तो विरोध का कोई बात तो नहीं बनता?
पर वास्तव में ऐसा नहीं हो रहा है,मुझे लग रहा है कि मोदी में प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर का चरितार्थ हो गया है और इनके आत्मा में ईश्वर का निवास हो गया है। यह अपने गरिमा के साथ प्रधानमंत्री के पद का सदुपयोग करते हुए सभी धर्मों,जातियों आदि के उत्थान का प्रयास कर रहे हैं।
हिंदुत्व इतना अच्छा होने के बाद भी सरकार द्वारा इसे लागू करने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है,इसीकारण कई दक्षिणपंथी पत्रकारों के लिए यह दुःख की बात बन गयी है।
नया इंडिया में हरि शंकर व्यास भी अपने दुःख प्रकट करते हुए लिखते हैं,"मैं हिंदू राष्ट्रवादी हूँ और दिल्ली की उस बौद्विक, सेकुलर-वामपंथी जमात का विरोधी रहा हूँ जिसने अपनी दादागिरी में हिंदू विचार नहीं पनपने दिया। इस जमात ने नेहरू के आईडिया ऑफ इंडिया की सत्ताखोरी में भारत में न स्वतंत्रचेता धारा बनने दी और न राष्ट्रवादी, दक्षिणपंथी, हिंदू हितवादी विमर्श होने दिया। संदेह नहीं कि उस जमात के प्रतिनिधी प्रणय राय और एनडीटीवी भी हैं। इन्होंने सत्ताखोरी में जैसे जो किया वह छुपा हुआ नहीं है।"
ये आगे लिखते हैं,"एक बात और जाने, नरेंद्र मोदी और अमित शाह या संघ परिवार यानी हिंदू विचार इसी लौकतंत्र की बदौलत फला-फूला है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह को ले कर मेरी थीसिस रही है कि इनसे गुजरात में हिंदूओं का सशक्तिकरण हुआ, खौफ से, डर-डर कर जीने के चक्र से वह वहां से बाहर निकला। गुजरात ने ही शेष देश के हिंदूओं में मर्द हिंदू लीडरशीप की चाह पैदा की। एक रोल मॉडल उभरा। कांग्रेस और सेकुलर जमात की मूर्खताएं थी जो हिंदू मुक्ततता के प्रतीक बने मोदी-शाह को सूली पर चढ़ाने की कोशिश की।"
लेकिन ये व्यापक स्तर यानी पूरे भारत में गुजरात का कारनामा नहीं दोहरा रहे हैं,इसीकारण ऐसे दक्षिणपंथी पत्रकारों का भी कलम मोदी के खिलाफ आग उगल रहा है तो फिर कैसे हिंदुत्व को लागू करने का आरोप कोई वर्तमान केंद्र सरकार पर लगा सकता है?