Tuesday, 13 December 2016

मोदी और राब्स्पियर : मोदी आलोचना (अवलोकन -1)

इसबार उन तमाम भ्रष्टाचार विरोधी लोगों और अपने फैसलों पर कायम रहने की मोदी की प्रवृति के कारण इनका मन खुशियों से भर गया है। एक निजी चैनल पर सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाने के बाद अपने फैसले से पलटना समर्थकों में सदमा जैसा माहौल उत्पन्न कर दिया था। पर मोदी अपने रंग में आते हुए स्पष्ट कर दिए कि वे फैसलों पर अमल करते हैं और कानून का कड़ाई से पालन करते हैं और शासक के रूप में करवाते भी हैं।
नोटबंदी पर विपक्ष के तमाम हमलों और कुछ बुद्धिजीवियों के आम आदमी की आड़ में आलोचना से बेपरवाह अपने भाषण में स्पष्ट करते हुए कहे,"मैं समझता हूं कि मुद्दा ये नहीं है कि सरकार ने पूरी तैयारी नहीं की। ऐसे लोगों की पीड़ा इस बात की है कि सरकार ने किसी को तैयारी करने का समय नहीं दिया। दुख इस बात का है अगर उनको एक 72 घंटे भी तैयारी के मिल जाते तो वाह-वाह मोदी जैसा कोई नहीं, कितना बड़ा अहम कदम उठाया है और इसलिए फिर भी इतना बड़ा देश है निर्णय बहुत बड़ा है देश का उज्‍जवल भविष्‍य देखने वालों से इतनी अपेक्षा है कि आइए हम सब मिलकर के सामान्‍य मानवीय की कठिनाइयों को दूर करें।"(स्त्रोत - pib)
तो क्या अब इस भाषण से यह समझा जाए कि मोदी में फ्रांस के राब्स्पियर की तरह चरित्र पनपने लगा है जैसा आरोप लगाया जाने लगा है? लेकिन शायद थोड़ी जल्दबाजी होगी क्योंकि गहराई और हम अधिकांश भारतीयों के खून तक घूँस चूका भ्रष्टाचार पर निर्णायक अंकुश लगाने के लिए ऐसे ही कदम और शासक की जरूरत है। 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' का हाल तो हम देख ही चुके हैं कि उसके संयोजक और अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्त्ता इसका इस्तेमाल कर अपने राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरा कर चुके हैं और कई तो भ्रष्टाचार के खिलाफ इस सरकारी मुहीम का भी आलोचना कर रहे हैं।
"यह बात अपने दिलो-दिमाग में गहरे बैठा लीजिये कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सामाजिक प्रयास(इण्डिया अगेंस्ट करप्शन) असफल हो गया और ये खुद भ्रष्टाचारी बनने के कतार में खड़ा हो गया है। व्यक्तिगत हित अंततः सामाजिक हित पर हावी हो ही जाता है इसलिए सरकारी प्रयास और कानूनी माध्यमों से ही भ्रष्टाचार जैसे बुराइयों को दूर किया जा सकता है।"
कुछ दिन पहले इसी राब्स्पियर से तुलना करते हुए मैंने केजरीवाल के संबंध में लिखा था कि "अब यह लगने लगा है कि केजरिवाल में राब्स्पियर जैसा चरित्र पनप गया है,जिसने फ्रांस की क्रांति (1789) के ओट में इतना कहर बरपाया था कि उसने सबसे पहले अपने साथियों को निशाना बनाया,फिर खुद बर्बाद हुआ और मारा गया। महान सपनों की क्रांति पहले आतंक और फ़िर तानाशाही में बदली। आज भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। केजरीवाल का हश्र क्या होगा इसका फैसला तो दिल्ली में 2020 में ही होगा।"
केवल कानून के कठोरता के पालन से लोगों द्वारा मोदी का तुलना राब्स्पियर,हिटलर आदि जैसे लोगों से करना अधकचरे ज्ञान की ओर ही इशारा करता है। भारत के कुछ लोग जो आज अंधे विरोध के चलते बौद्धिक दिवालियापन के कगार पर पहुँच गये हैं वे मोदी को तानाशाह और संघ को फासीवादी साबित करने का कोई कसर छोड़ना नहीं चाहते।