Monday, 14 November 2016

जन चर्चा में आज बातें गलियों से - भक्त का दुरुपयोग और विमर्श का गिरता स्तर! - 3/3

"भक्त हो?"
"सभी होते हैं,मैं हो गया तो क्या हुआ?"
"नहीं,मेरा मतलब है - मोदी भक्त।"
"नहीं तो।"
"मोदी का आलोचना क्यों नहीं करते हो?"
"अब जो अच्छा करेगा,उसका प्रशंशा ही तो करेंगे।"
"ओह्.... तो तुम परम भक्त हो?"
"क्या बात कर रहे हो भाई?"
"वहीं जो लोग कह रहे हैं।"
"अच्छा तो जो किसी निजी चैनल के प्रतिबंधित किये जाने पर एक मामूली पत्रकार का समर्थन करते हैं, वे क्या हैं?"
"मुझे लग गया तुम तो सर्टिफाइड भक्त हो।"
"तब तुम तो 'गैर-भक्त' हो?"
"मैंने धूप में बाल नहीं पकाएं हैं,सरकारों को आते जाते देखा है,मैं निष्पक्ष आलोचक हूँ,गैर-भक्त तो नहीं।"
"मैं भी तो निष्पक्ष समर्थक हूँ।"
"नहीं तुम भक्त तो हो और साथ में कुतर्की भी।"
"एक समर्थक भक्त कैसे हो सकता है? तब तो अन्यों के समर्थक भी दूसरे प्रकार के भक्त होंगे?"
"नहीं,वे सत्ता के खिलाफ हैं और स्वतंत्र आलोचक हैं।"
"फिर वहीं बात! स्वतंत्र और निष्पक्ष आलोचक। तो समर्थक स्वतंत्र और निष्पक्ष क्यों नहीं हो सकता?"
"तुमने तो कुतर्क की सारी हदें पार कर दी। मैं भक्तों से बात नहीं करता।"
"गुस्सा क्यों हो रहे हैं? कभी सोचा है आपने मोदी एक विशिष्ट संगठन से संस्कारित हुए हैं।"
"कहीं आरएसएस का बात तो नहीं कर रहे हो?"
"हाँ,मेरा ईशारा उधर ही हैं।"
"वो तो सांप्रदायिक,मनुवादी और चढ़ीधारी है।"
"और कम्युनिस्ट पार्टियों का संगठन और मुस्लिम लीग?"
"कम्युनिस्टों के पास तो एक आदर्श है,जो गरीबी और भूखमरी के खिलाफ आवाज उठाते हैं।"
"संघ भी तो सामजिक सरोकार का काम करता है।"
"ओह्... आई सी, मुझे अभी समझ आया कि तुम संघी भी हो।"
"अरे भाई पहले खुद तो तय कर लो क्या हूँ मैं - भक्त,परम भक्त या संघी?"
"मैं सावरकरवादी ही कहना पसंद कहूँगा जो अंग्रेजी हुकूमत से माफी माँगे थे,जब सारा देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था,तुम सब माफी माँगते हो आज देशभक्ति की बात करते हो।"
"तो आप अब कहेंगे कि मैं वामपंथी नहीं हूँ?"
"हाँ,बिल्कुल!"
"फिर भी आप कम्युनिस्टों को संघ की तुलना में अच्छा मानते हैं?"
"मैं भक्त संघी और कुतर्की से बात नहीं करता।"
"अरे भाई मेरे,मुझे कितना उपमा देंगे? एकाध और ढूंढ के लाइए।"
"अब एक गोडसेवादी मुझे सिखाएंगे।"
"इसमें गोडसे कहाँ से आ गया मेरे अनुभवशील विद्वान? लगता है बाल अंधेरे में ही पकाएं हैं,अनुभव से नहीं।"
"मैंने कहा न मैं भक्तों से तर्क नहीं करता।"
"बुद्धि रहेगी तब तो करेंगे। जाइये देशविरोधी नारा लगाने वालों का असहमति का हक करार कर मजे करिए और झूठी गर्व कीजिये कि हम सत्ता के खिलाफ हैं।"
"एक मिनट सुनो!"
"मैं तो कब से सुन रहा हूँ।"
"अब मुझसे राष्ट्रवाद पर बहस करोगे?"
"मैं तो हर मुद्दे पर कर सकता हूँ,ध्यान रहे संघी और जिसे भक्त कह रहे हैं,वे देशभक्ति और राष्ट्रवाद पर देशद्रोहियों का बखिया उधेड़ देंगे।"
"मेरे लिए तो राष्ट्रवाद वो है जिसमें सभी को खाना मिले और गरीबी-भूखमरी दूर हो।"
"और मेरे लिए क्या है? मेरा भी यहीं मानना है।"
"तुम सच में भक्त हो और कुतर्की हो।"
"अरे भाई मुझे ताज्जूब हो रहा है कि संघी क्यों नहीं कहे?"
"हाँ,संघी भी हो,मैं संघियों से बहस नहीं करता।"
"तो मैं कहाँ आपके अनुसार 'गैर-भक्तों' अर्थात एक दूसरे प्रकार के भक्ति में लीन पूर्वाग्रह-ग्रस्त लोगों से बहस कर रहा हूँ।"
"मैंने कई सरकारों को आते जाते देखा है।"
"इसमें वामपंथी सरकार भी थी क्या?"
"बहुत जल्द होगी जब कॉमरेड सत्ता में होंगे और 'लाल सलाम' का नारा सड़कों पर गूँजेगा।"
"अभी तो बोल रहे थे हम निष्पक्ष और स्वतंत्र आलोचक हैं।"
"हम भावना में बह गए।"
"इतने दिनों से तो ढोंग ही रचा रहे हो,झूठे और फरेबी वामपंथी,कहते हो निष्पक्ष हैं।"
"तो इसमें बुराई क्या है?"
"तो खुल के कहो कि हम निष्पक्ष नहीं बल्कि विचारधारा से प्रेरित हैं और वर्तमान सरकार का आलोचना और समर्थकों को भक्त,संघी,गोडसेवादी और सांप्रदायिक कहके दुष्प्रचार करना ही मकसद है।"
"इसपर बहस कर सकता हूँ,ऐसे मैं भक्तों से तो नहीं करता।"
"क्या भक्त-भक्त लगा रखे हो यार,अभी तक मुझे भी मालूम चल गया है आप कितने निष्पक्ष हैं!"
"बहस नहीं करना है क्या?"
"मैं मूढ़ गैर-भक्तों से बहस नहीं करता जो दूसरे प्रकार के भक्ति में लीन हैं।"