Wednesday, 9 November 2016

ट्रंप का जीत और मीडिया का नंगापन! (मोदी-ट्रंप तुलना)


पूरी दुनिया की मीडिया डॉनल्ड ट्रंप की खिलाफत कर रही थी,खासकर उनके बयानों को लेकर। शायद यह थोड़ी बचकानी बात लगे कि पूरी मीडिया?
बिल्कुल ऐसी मीडिया जिनकी तदात शायद ज्यादा है,जो स्थापित हैं और अपने साख के लिए जाने जाते हैं वो तो जरूर। यह बात तो जगजाहिर है कि डेमोक्रेटिक दल का रुझान लेफ्ट ही रहा है और रिपब्लिकन अपने आप में राइट सेंट्रिक है। बिल्कुल भारत के भारतीय जनता पार्टी की तरह।

ऐसे लिबरल,लेफ्ट और स्वघोषित प्रगतिशील संस्थानों तो भारत में उसी दिन नंगा हो गए थे जब 2014 में नरेंद्र मोदी ने भारी बहुमत से जीत हासिल की थी और अब बारी थी दुनिया के स्थापित मीडिया संस्थानों का।

मोदी को लेकर भी अखबारों में आलोचनात्मक लेख छापे जाते थे,बुराई तो हर एक वाक्य में शामिल रहता था,यहीं हाल अमेरिकी चुनाव में भी देखने को मिला,वाशिंगटन पोस्ट तो कई दफा ट्रंप को नकार दिया था।

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में मीडिया अपने आप को न जाने कितना शक्तिशाली समझने लगी है कि उसे लगने लगा है, वह जनता के फैसले को प्रभावित कर सकती है। पर ऐसा नहीं है,भारत में मोदी का जीत और अमेरिका में ट्रंप का जीत यह बताने के लिए काफी है कि जनता की आवाज मीडिया के एक छोटे तबके का आवाज नहीं हो सकती,मीडिया अपने रिपोर्टिंग से जनता के मन को प्रभावित नहीं कर सकती और ये जरूरी नहीं कि मीडिया का कयास सही ही हो जाए।

जब एकतरफा रिपोर्टिंग और किसी संगठन,पार्टी और व्यक्तिखास का विरोध और आलोचना अपने निजी हित और स्वार्थ को लेकर तथा विचारधारा के कारण होने लगे तो मीडिया की विश्वसनीयता को लेकर समाज में सवाल उठना जरूरी हो जाता है,ये वहीं मीडिया है जो अपने गिरेबान में तो नहीं झाँकती लेकिन सवाल के नाम पर देशविरोधी रिपोर्टिंग करके जनता के एक तबके को गुमराह करने का प्रयास करती है। कमोवेश स्थिति हरजगह एक सी ही है।

हालाँकि अमेरिका में स्थिति तो बिल्कुल ही चिंता स्तर तक पहुँच गया है,जहाँ आधी मीडिया डेमोक्रेट का और आधी रिपब्लिकन का खुलकर समर्थन और प्रोपोगेट करती है। भारत में भी कुछ मीडिया संस्थानों पर इसतरह का धब्बा लग चुका है।

ट्रंप के जीत से तो यूरोप के मीडिया संस्थानों में निराशा का माहौल छा गया है,बीबीसी के एक खबर के मुताबिक एक जर्मन न्यूज़ वेबसाइट 'डाई वेल्ट' ने ट्रंप की जीत पर हेडिंग लगाई है,"ऐसा कैसे हो सकता है?"

वहीं एक फ्रांसीसी अख़बार ले फिगारो ने पहले पन्ने पर अपने संपादकीय में लिखा है, "अमरीका ऐसा देश है जिसे फिर से एक होने की ज़रूरत है और नए राष्ट्रपति के सामने अमरीका में बंटवारे की भावना को कम करना बड़ी चुनौती होगी।"

ये सब तो नरेंद्र मोदी के जीत को लेकर भी भारत में कई मीडिया संस्थानों में देखने को मिला था और आज तक मिल रहा है लेकिन पिछले ढाई वर्षों में मुझे ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला जैसा उस समय कुछेक द्वारा कयास लगाए गए थे।

ट्रंप ने घर-घर जाने के बजाय विशाल रैलियों पर ज्यादा ध्यान लगाया,इस तरकीब को भारत में प्रधानमंत्री मोदी ने भी बखूबी इस्तेमाल किया था,इसपर हो रहे खर्च को मीडिया निशाना बनाते रहा लेकिन भारत में विशाल रैलियों का मोदी का रणनीति सफल रहा और अमेरिका में ट्रंप का।

इसी रणनीति के कारण भारत में मोदी को इनाम स्वरुप प्रधानमंत्री का पद मिला तो अमेरिका में ट्रंप को व्हाइट हाउस!

जिसतरह नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान चर्चित नारा 'अबकी बार मोदी सरकार' दिया था उसीतरह ट्रंप ने भी कहा था 'अबकी बार ट्रंप सरकार।' इस नारा ने लोगों के दिलों दिमाग को प्रभावित किया और दक्षिणपंथी पार्टी की सत्ता भारत की तरह अमेरिका में काबिज हुयी।