Monday, 21 November 2016

भारत में जे. के. रोलिंग जैसे लेखक/लेखिका क्यों नहीं हो पाते?

रोलिंग का नाम तो अधिकांश से अजूबा नहीं है,ये वहीं लेखिका हैं जो पूरे विश्व में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली लेखकों में शुमार हैं,जिनको यह ख्याति अपने 'हैरी पॉटर' नाम के फिक्शन(काल्पनिक) पहचान रखने वाले नॉवेल से मिली है।
यह आलेख इसी सवाल का जवाब खोजने का आज प्रयास करता है।
इनकी 400 मिलियन नॉवेल आज के दिनों में पूरी दूनिया में बिक चुकी है। क्या आपको लगता है कि अगर ब्रिटेन के लोग इनके किताबों को नहीं खरीदते,जिनका जहाँ जन्म हुआ था तो पूरी दूनिया में इन्हें लोग पहचान पाते?
नहीं!
इनके किताबों की मुख्य खासियत रही है कि यह काल्पनिक(fiction) है,मैंने पढ़ते समय एक विशेष बात महसूस किया कि इसमें का लगभग अधिकांश चरित्र भारतीय कथा-कहानियों से प्रेरित रहा है। चाहे death eater(प्राणभक्षी) का संकल्पना हो या creatures(मानव का जानवर का मिश्रित रूप) या आत्म शक्ति या जादू का,सभी भारतीय दर्शनों,उपनिषदों आदि में वर्णित कहानियों से प्रेरित लगता है।
लेकिन एक विशेष बात जो इसे आधुनिक भारतीय लेखकों से अलग करती है,वो इनकी फिक्शन कहानी कहने का तरीका। जिसे लेकर आलोचक भी प्रशंशा कर चुके हैं।
भारतीय समाज आजादी के बाद के दिनों से ही एक अवसाद से गुजर रहा है - एक वामपंथी अवसाद,जिसका संचार के साधनों और प्रमुख संस्थाओं के प्रमुख के रूप में नाजायज कब्जा बना हुआ है।
इसके दुष्परिणामों को इंगित कराने के लिए मैं अंग्रेजी के विख्यात लेखक असीम त्रिवेदी का उदाहरण से स्पष्ट करता हूँ कि जिनके लेखन का विषय वस्तु भारतीय संस्कृति और परंपरा के प्रमुख किरदार भगवान शिव रहे हैं। फिर भी भारत और पूरी दुनिया में इनके किताबों को पढ़ा गया। अभी हाल में ही इनकी किताब भगवान राम पर आयी है जिसका नाम इक्ष्वाकु के वंशज है,मुझे उम्मीद है कि इसे भी पढ़ा जाएगा क्योंकि इस लेखक की लेखन परंपरा अंग्रेजी है। जहाँ लगभग हिंदी लेखन जैसा कोई पैर खींचने की प्रवृति विकसित नहीं हो पाई है।
अगर त्रिवेदी और अन्य लेखकों द्वारा यहीं सब किसी भगवान को केंद्र मानकर हिंदी में लिखा गया होता तो इन छद्म वामपंथी लेखकों द्वारा जो अपने को आज हिंदी के उद्धारक मानने लगे हैं,विचारधारा के नाम पर आलोचना करने से पीछे नहीं हटते और दक्षिणपंथी,संघी जैसे तमगों को लेखकों के पहचान के साथ लटका देते। हिंदी के पिछड़ापन का तो एक मुख्य वजह यह भी है और साथ ही रोलिंग जैसे लेखक न बन पाने का मुख्य कारण।
दूसरी बात जिस ओर हमारी ध्यान बरबस ही आकर्षित हो जाती है,वह है - भारत में पाठकीय अभ्यास की भारी कमी। हम आज पढ़ने को उतने आदी नहीं हैं जितना की होना चाहिए।
लुग्दी साहित्य(केशव पंडित,सरस सलिल,वेद प्रकाश शर्मा आदि) का फैलाव कम दामों और अश्लीलता के कारण लगभग इतना तो हो ही गया है कि आज यह अभिभावकों के मन पर बुरा प्रभाव डाल दिया है। अगर घर में हम कोई अच्छे उपन्यास भी पढ़ना चाह रहे हों तो सुनने को मिल जाता है कि तुम उपन्यास पढ़ रहे हो? और रोक दिया जाता है।
अच्छे लेखनों से बचपन में ही हमारा मन उचट जाता है,बचपन के दिनों में ही उपन्यास को बुरा मानकर हम दूर हो जाते हैं,इस कारण लंबे लेखन पढ़ने का जो अभ्यास होना चाहिए उससे हम महरूम हो जाते हैं। इसे देखते हुए मेरा मानना है कि सबसे पहले लुग्दी साहित्यों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा देना चाहिए ताकि अभिभावकों के विश्वास को जीता जा सके।
इन दिनों रही सही कसर को चेतन भगत,शोभा डे और कुछ दिनों पहले तक खुशवंत सिंह जैसे लेखकों ने पूरा कर दिया। जिसमें महिलाओं को इस रूप में पेश किया गया ताकि लोगों में सेक्सुअल उत्तेजना उतपन्न हो सके और इसे खरीदा जा सके। इन जैसे लेखकों का बेस्ट सेलर बनना तो समाज के सोच को ही दिखाता है कि हम महिलाओं को किस नजर से देखते हैं और क्या पढ़ना पसंद करते हैं।
यह सब इन्हीं वामपंथी लेखकों के बदौलत संभव हुआ है जो स्वघोषित हिंदी भाषा के रक्षक हैं,भारतीय पौराणिक कथाओं पर लिखे उपन्यास का विरोध तो करते हैं लेकिन इस तरह के अश्लील उपन्यासों का नहीं क्योंकि आप सभी जानते हैं कि इसी विचारधारा से ताल्लुक रखने वाली एक नेत्री फ्री सेक्स का बात स्वीकार चुकी है।
तीसरा कारण जिस ओर ध्यान देना बहुत ही जरूरी है,वह कि हममें 'चीटर' यानी कॉपी-पेस्ट करने की प्रवृति काफी हद तक विकसित हो गयी है। मौलिकता और रचनात्मकता का तो भारी अभाव है। कॉपी-पेस्ट करने की हम उस ताकीर को भी विकसित नहीं कर पाए हैं कि भारतीय संस्कृति और परंपरा में फैले ज्ञान को संजोकर एक जगह इकट्ठा कर सके और एक मजबूत संकल्पनात्मक आधार देकर रोलिंग जैसा बेस्ट सेलर उपन्यास लिख सकें। यह तो सभी को मालूम होगा कि इसी काम को कार्ल मार्क्स ने बखूबी किया और फैले हुए समाजवादी ज्ञान को संग्रह कर वैश्विक समाज को एक विशिष्ट विचारधारा दे डाला।
यह सौभाग्य ही रहा कि भारत में बाहुबली फिल्म हिट कर गयी जिसका विषयवस्तु धार्मिक था। लेकिन उसके सफल होने का एक वजह उसकी रचनात्मकता भी है जिसे नकारा नहीं जा सकता।
यहीं रचनात्मकता तो किसी लेखन खासकर फिक्शन(काल्पनिक) में जान डालता है। अभी तक मैंने जितने भी भारतीय लेखकों के उपन्यासों विशेषकर नए को पढ़ा है,उसमें इस रचनात्मकता का कमी ही दिखी। जबतक यह गुण विकसित नहीं हो जाता तबतक तो रोलिंग जैसे बनने की हिंदी लेखकों का सपना बेमानी ही होगी।
अभी तक के लेखन से यह बात तो स्पष्ट ही हो गयी है कि हिंदी फिक्शन लेखकों के खिलाफ कितना दबाव है। पहला,छद्म वामपंथियों का विरोध;दूसरा,कॉपी-पेस्ट का भी अच्छे गुण का न हो पाना;तीसरा,फैले ज्ञान को संग्रह न कर पाने की कमी और अंतिम रचनात्मकता का अभाव और कहानी कहने की उचित तरीका का न हो पाना।