Friday, 11 November 2016

क्या आपको लगता है कि हिटलर उतना बुरा था जितना कि इतिहास ने उसके साथ अन्याय करके पेश किया है?

             इनदिनों तर्क देते समय लिबरल,लेफ्ट,छद्म सेकुलर और कठमुल्ला जमात हिटलर को लाये बिना नहीं रहता और दक्षिणपंथ को बदनाम करने का सतही प्रमाणों को पेश करता रहता है।

             मुझे इस बात को स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है कि इतिहास विजेताओं का विजयगाथा है। यह काफी सही भी है। विश्व इतिहास का लेखन तो अधिकाँश मामलों में निष्पक्ष हो ही नहीं सकता। एक सामान्य सी बात है - कोई इतिहासकार विश्व मामलों में अपने ही देश के खिलाफ कैसे लिख सकता है?

             यहीं वह कड़ी है जिसे समझना बहुत जरूरी है। अपने ब्लॉग के माध्यम से मैं भारत के वामपंथी इतिहासकारों का कपटजाल तो उजागर कर ही चूका हूँ कि वे किसतरह एक खास विचारधारा के प्रभाव-वश पूरे हिंदू संस्कृति को ब्राह्मणवाद की तराजू से तौलते हैं जबकि ब्राह्मणवाद नाम का कोई चीज है ही नहीं।

              कुछ दिन पहले मैंने समाज में पनपी एक बीमारी की ओर इशारा किया था कि वह किसतरह लाइलाज होती जा रही है,यह हाल केवल भारत के समाज का नहीं बल्कि पूरी दुनिया के समाजों का है। वह बीमारी है - घटनाओं के तह में जाए बिना ही तात्कालिक परिणाम पर जोरदार चर्चा और आरोप-प्रत्यारोप।

              1924 में हिटलर को पाँच साल की सजा सुनाई गयी,पर मात्र 9 महीने बाद ही रिहा कर दिया गया। जेल में रहते हुए इसने 'मीन कैम्पफ' यानी मेरा संघर्ष नामक पुस्तक की रचना कर डाली। इस किताब को मैंने तब पढ़ा था जब केवल मात्र सत्रह साल का था और इंटरमीडियट में साइंस का पढ़ाई कर रहा था,मतलब आज से पाँच साल पहले और दूबारा राजनीति विज्ञान से बीए करते हुए,पार्ट-2 में पढ़ा।

               जिस समय यह किताब प्रकाशित हुई थी उसे निम्न श्रेणी के साहित्य के रूप में देखा गया था। एल्ब्रेट कैरी नाम के एक लेखक ने टिप्पणी करते हुए लिखा था कि "यह तो एक हताश व्यक्ति के जहरीले उदगारों से भरी हुई पुस्तक है। आश्चर्य इस बात का था कि ऐसे कट्टरपंथी विचारों ने कुछ समय के लिए,लोगों के विचारों को कैसे प्रभावित किया,विशेषकर ऐसे लोग जो कि एक महान सभ्य राष्ट्र के निवासी थे।"

              यहीं से आलोचना की शुरुआत हो जाती है। कैरी के आलोचना का आधार देखकर तो यहीं लगता है कि या तो वे जर्मन जनता को दोषी ठहरा रहे हैं या हिटलर को या दोनों को।

              इस पुस्तक में हिटलर ने वास्तव में अपने राजनीतिक उद्देश्यों को बताया है और बाद में हिटलर ने धीरे-धीरे अपने सभी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कार्य भी किया।

              मुझे वहाँ तक जाना ही नहीं है कि द्वितीय विश्वयुद्ध क्यों हुआ,उसकी पृष्टभूमि क्या थी,जर्मनी कितना दोषी था और अन्य राष्ट्र कितने?

              मैं अपने बातों की शुरुआत वर्साय की संधि से करता हूँ।

               इस बात को मानने में किसी भी विद्वान और इतिहासकार को कोई दिक्कत नहीं है कि प्रथम विश्व युद्ध साम्राज्यवाद और गुप्त सैन्य संधियों का नतीजा था। चाहे इंग्लैंड हो या फ्रांस या इटली सभी ने किसी-न-किसी से गुप्त सैन्य संधियाँ करके अपने स्थिति को मजबूत किये हुए थे।

               तो फिर कैसे प्रथम विश्व युद्ध की जिम्मेवारी अकेले जर्मनी पर डाला जा सकता था/है?

               द्वितीय विश्व युद्ध की पूर्वपीठिका यहीं है,यहीं वह कड़ी है जिसे आलोचक नजरअंदाज कर देते हैं। अब एक राष्ट्रावादी वर्साय के संधि के फलस्वरूप अपने राष्ट्र पर लगे कलंक को दूर करने का प्रयास नहीं करेगा तो क्या करेगा? अगर हिटलर ने इस शर्म के प्रतीक को हमेशा के लिए मिटा देने का कोशिश किया तो मेरे नजर में कोई गलत काम नहीं किया।

               जर्मनी को जिस अपमानजनक संधि पर हस्ताक्षर करने को बाध्य किया गया,वह यहीं वर्साय का संधी था। इस संधि के द्वारा जर्मनी को पंगू बना दिया गया। चारों तरफ से जर्मन भूभाग को पड़ोसी देशों को देकर जर्मन राष्ट्र को संकुचित कर दिया गया। क्षतिपूर्ति आयोग ने एक अरब पाउंड की राशि की सिफारिश कर अन्याय को कई गुना बढ़ा दिया। क्षतिपूर्ति आयोग का व्यवस्था कर एक तरह से खाली चेक पर जर्मनी से हस्ताक्षर ले लेना था और क्षतिपूर्ति आयोग ने वहीं किया। जर्मनी को पूरी तरह से निरस्त्रीकरण कर दिया गया। ऐसा प्रावधान किया गया कि जर्मनी एक लाख से ज्यादा सैनिक और 15000 से ज्यादा नौसैनिक नहीं रख सकता। जंगी जहाजों को भी सीमित कर दिया गया।

                इतना अपमान तो कोई देश नहीं सहन कर सकता। जर्मनी तो श्रेष्ठ जनों का देश था जो अपने को जर्मन-आर्य कहा करते थे।

                 जर्मन जनता इस बात को कभी स्वीकार नहीं कर पायी कि केवल उनका देश ही युद्ध के लिए उत्तरदायी था। मित्र राष्ट्रों द्वारा घोषित अपराधियों में से एक हिंडनबर्ग तो 1925 में जर्मनी का राष्ट्रपति निर्वाचित हुआ।

                  एक तरह से इस संधि को 'युद्ध समाप्त करने वाला युद्ध'(war to end wars) कहा गया तो फिर कैसे इतिहास हिटलर से इतना अन्याय कर सकता है!

                  इस संधि के बारे में पंडित नेहरू ने भी कहा क़ि मित्र राष्ट्र घृणा एवं बदले की भावना से कार्य कर रहे थे। वे तो जर्मनी के रक्त की अंतिम बूंद तक उसके निर्जीव शरीर से निचोड़ लेना चाहते थे।

                 अमेरिकन राष्ट्रपति विल्सन यूरोपियन राजनीति के उतने मंझे हुए खिलाड़ी नहीं थे,ब्रिटेन और फ्रांस के प्रमुखों ने इनको अपने जाल में उलझा दिया और इनका आदर्शवाद राष्ट्र-राज्यों के विकास में सहायता तो की लेकिन युद्ध को रोक नहीं सका।

                  "कुल मिलाकर इतिहास हिटलर और जर्मनी को जिस अपमानजनक तरीके से पेश करता है,वह किसी भी तरीके से सही नहीं कहा जा सकता। हिटलर के प्रति इतिहास का अन्याय ही है। ऐसे कई उदाहरण दबे पड़े हैं जिसको निष्पक्ष तरीके से बाहर आना चाहिए था,लेकिन नहीं हुआ और ये विजेताओं के विजयगाथा में अपने आदर्शों को तिलांजलि दे दिए।

                वास्तव में गलती तो मित्र राष्ट्रों की थी। हिटलर तो एक प्रतिक्रिया था,फासीवाद उग्र दक्षिणपंथ था जिसकी जरुरत लंबे समय से जर्मनी को थी ताकि भविष्य में फिर से श्रेष्ठ-आर्य-जर्मन का अपमान करने का दुः साहस मित्र राष्ट्र जैसे देश नहीं कर सके।"