Sunday, 13 November 2016

प्रभात पटनायक के आलेख के मायने

प्रभात पटनायक,जिनका आलेख आजकल काफी साझा किया जा रहा है,खासकर केंद्र सरकार द्वारा 500 और 1000 रूपये के नोट बंद करने के बाद से।
सभी के जेहन में ये सवाल आ रहा होगा कि आखिर ये 'प्रभात पटनायक' कौन है?
मैंने इनके बारे में खोजबीन किया तो मालूम चला कि ये एक भारतीय अर्थशास्त्री और राजनीतिक विश्लेषक हैं जिनपर मार्क्सवाद का गहरा प्रभाव है। विकिपीडिया पर इनके बारे में भारतीय मार्क्सवादी अर्थशास्त्री लिखा गया है। ये JNU में प्रोफेसर रह चुके हैं और 2010 में रिटायर हुए। साथ ही 2006 से 2011 तक केरल के योजना बोर्ड के वाईस प्रेसिडेंट रह चुके हैं।
(ध्यान देने वाली बात है कि केरल और JNU दोनों जगह वामपंथ का गढ़ समझा जाता है,इनका अतीत तो इन्हीं जगहों से जुड़ा है,लाजिमी है,वर्तमान सरकार का आलोचना करना इनका मजबूरी हो गया है।)
हाल ही में इनका एक इंटरव्यू वायर नाम के रक न्यूज पोर्टल पर प्रकाशित हुआ है,जिसे आप लिंक में पढ़ सकते हैं( http://thewire.in/79419/demonitesation-interview-prabhat-patnaik/),जो अंग्रेजी में है,मैं केवल कुछ खास पहलू का ही हिंदी में अनुवाद और विश्लेषण करूँगा।
इस इंटरव्यू का प्रकाशन 'विमुद्रीकरण का निर्णय दिखाता है कि वे पूँजीवाद का मतलब नहीं समझते : प्रभात पटनायक' नाम से हुआ है।
प्रधानमंत्री ने 8 नवंबर को कहा,"500 और 1000 के नोटों की बंदी जरूरी है,यह कदम काले धन के बीमारी के इलाज के लिए जरूरी था।"
जब पटनायक से काले धन के बारे में पूछा गया तो वो जवाब में वहीं सतही तर्क रखते हैं कि टैक्स चोरी के जरिये जो पैसों का भंडार किया गया है उसे बिज़नस मैन अपने एजेंट या अन्य तरीकों से सफेद कर सकते हैं,इसलिए यह विमुद्रीकरण काले धन को लेकर कोई समाधान नहीं देगा।"
(लेकिन इस बात को इनके द्वारा नजरअंदाज किया है कि सरकार इसके लिए भी प्रावधान कर चुकी है,2.5 लाख से ज्यादा के लिए जाँच का व्यवस्था किया गया है तो कैसे और कितने एजेंट के बदौलत करोड़ों रूपये का काला धन रखने वाला व्यक्ति इसे सफेद कर सकता है? सोचने वाली बात है।)
ये आगे कहते हैं,"मार्क्स ने कंजूस और पूँजीवादियों में अंतर बताया है। एक कंजूस का मानना है कि वह पैसों को जमा करके अमीर होगा,जबकि एक पूँजीवादी इस बात में यकीन करता है कि वह पैसों के उपयोग से अमीर होगा। ब्लैक मनी रखने वाले कंजूस नहीं है,वे पूँजीवादी हैं। वे अपने व्यापार को फैलाने का कोशिश कर रहे हैं। अपने सभी ट्रांजेक्शन को टुकड़ों में करके सफ़ेद करेंगे।"
आगे के सवाल के जवाब में ये सरकार पर आरोप लगाते हैं कि वह पूँजीवाद का मतलब नहीं समझती है। पटनायक काले धन को सफेद बनाने की बात को काले व्यापारियों का उदाहरण देकर दोहराते रहते हैं कि वे इसे कई ट्रांजेक्शन के माध्यम से कर लेंगे और कोई भी टैक्स अथॉरिटी इतना योग्य नहीं है कि इसे पकड़ सके। कुल मिलाकर इनका इशारा व्यापारियों की तरफ है जिसका तुलना ये पूंजीपतियों से करते हैं। पर मुझे यह मालूम नहीं चल रहा है कि अगर किसी के पास करोड़ों रूपये का काला धन है तो वो 2.5 लाख के कितने टुकड़े और एजेंट के माध्यम से सफेद करेगा?
आगे वहीं 1946 और 1978 में बंदी का निर्णय को पेश करके असफलता को गर्व से वर्णित करते हैं।
आगे इनसे सवाल किया जाता है कि आप कैसे कहना चाहते हैं कि बंदी का यह कदम असंगठित अर्थव्यवस्था(informal economy - कृषि, ठेले वाले,दिहाड़ी मजदूर आदि) और ऐसे लोग जिनके पास बैंक एकाउंट नहीं है,प्रभावित करेगा?
इसे वे एक उदाहरण देकर समझाते हैं कि अगर आपके क्षेत्र में एक क्राइम हो जाता है तो पुलिस स्टेशन कोई नहीं जाता है कि उसे पकड़ा जाए। यहीं बात काले धन पर भी लागू होती है।
अगर आप किसी बैंक में खाता खुलवाना चाहते हैं,SBI में भी तो आपको SBI के 16 प्रश्नों के प्रश्नावली को भरना होगा।
आप किसी के सर पर बंदूक रखकर कैशलेस अर्थव्यवस्था नहीं बना सकते। यह धीरे-धीरे होता है। लेकिन भाई सरकार अचानक कहाँ कर रही है?
(ये सभी आलोचना में इतने अंधे हो जाते हैं कि कुछ सूझता ही नहीं है। सरकार पहले ही सभी के लिए जीरो बैलेंस खाता(जनधन योजना) ला चुकी है,इसके लिए काफी समय भी दिया गया है,अगर कोई व्यक्ति इन योजनाओं का लाभ नहीं उठाता तो सरकार के आगामी कदमों(नोटों की बंदी) का आलोचना कैसे कर सकता है,जबकि सरकार पहले ही इन समस्याओं को भांपते हुए व्यवस्था कर चुकी है।)
मेरा मानना बिल्कुल ही अलग है!
अगर कोई अचानक फैसला लिया जाता है तो उसकी परेशानी तो आम जनता को कुछ दिनों के लिए उठानी ही पड़ती है,लेकिन इसका इतिहास गवाह है,ऐसे फैसलों का व्यापक परिणाम देखने को मिलता है,जो काफी सार्थक होता है। आपसभी तत्कालिक समस्याओं पर नहीं जाएँ। आनेवाले दिनों में जब इसके व्यापक परिणाम सामने आएंगे,भ्रष्टाचार,काले धन आदि पर अंकुश लगेगा और सरकारी खजाने पर पहुँचने के बाद जब इस धन का इस्तेमाल आधारभूत ढाँचा और अन्य जनता को अन्य सुविधाएँ देने में होगी तो आप सभी को अच्छे दिन के अनुभव से कोई नहीं रोक सकता।