Friday, 11 November 2016

ट्रंप और मोदी का जीत पर व्यावहारिकता से हटकर सैद्धांतिकता पर

           व्यवहार में तो कहा ही जाएगा कि इनदोनों के जीत का मतलब है कि वहाँ बाकियों की अपेक्षा सबसे ज्यादा लोगों ने पसंद किया। मेरे लिए ये परिणाम कई मायनों में अलग है।

           पहला कि उधर अमेरिका में एक दक्षिणपंथी खेमा सत्ता में आयी और इधर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में भी पहले से ही दक्षिणपंथी खेमा सत्ता में आ चुकी है।

           जैसा कि उदारवादियों,लेफ्ट और कुछ छद्म सेकुलर जमातों द्वारा आरोप लगाया जाता रहा है कि ऐसी ताकतों का उदय लोकतंत्र के लिए खतरा है। संप्रादायिकता को बढ़ावा देने जैसा है। वगैरह-वगैरह।

            तो क्या सचमुच लोकतंत्र खतरे में है?

            पूरी दुनिया के विद्वान पश्चिमी लोकतंत्र को काफी प्रौढ़ मानते हैं और अपने भाषणों-आलेखों के माध्यम से कहते नजर आते है कि पश्चिम का लोकतंत्र कोई गलत फैसला नहीं ले सकता। यहीं कारण है कि वहाँ की सरकार 'जनमत-संग्रह' जैसे माध्यमों का बखूबी इस्तेमाल करती है,इसका चलन आज तेजी से बढ़ा है। चाहे ब्रेक्जिट को लेकर जनमत संग्रह हो या स्पेन-ब्रिटेन के बीच का एक द्वीप को लेकर विवाद पर लोगों की राय। कुछ मिलाकर वहाँ का लोकतंत्र अप्रत्यक्ष होते हुए भी प्रत्यक्ष लोकतंत्र के उपायों को आजमाता नजर आता है।

            लेकिन फिर भी एक डर बना हुआ है कि कहीं लोकतंत्र अपने विकृत रूप भीड़तंत्र में तो नहीं बदल जाएगा।                जर्मनी,फ्रांस,इटली आदि देशों में वामपंथी पार्टियों का इसी उदारवादी लोकतंत्र में फलना-फूलना तो इसी ओर ईशारा करता है। हर देश के वामपंथी पार्टियों का कमोवेश एक ही मकसद है - साम्यवादी सरकार की स्थापना,और उद्देश्य तो रट्टू तोते जैसा ही एक सा है - गरीबी और भुखमरी की समाप्ति।

           इसी उद्देश्य के पूर्ति का सब्जबाग लोगों को दिखाकर ये सोवियत संघ में लाखों उदारवादियों और आलोचकों को मौत के घाट उतार दिए। अपनी जमीन हिलती देख भारत के केरल में भी इनके द्वारा संघ कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्या का क्रम जारी है।
           तो क्या अब लोकतंत्र जैसी व्यवस्था में अपनी साख को हत्या से बचाया जाएगा?

           ऐसी स्थिति और ऐसे संगठनों का लोकतंत्र में उदय का मतलब तो यहीं है कि लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदलता जा रहा है। त्रिपुरा,पश्चिम बंगाल और केरल में तो काफी हद तक लोकतंत्र में लोक(सचेत नागरिक) का स्थान भीड़ ने ले लिया था/है। पर बंगाल में तो परिदृश्य तेजी से बदला और भीड़ को सचेतता आने लगी।

            वामपंथी पार्टियों का लोकतांत्रिक माध्यमों का इस्तेमाल करके आने से लोकतंत्र को खतरा है,ध्यान रहे दक्षिणपंथी पार्टी के आने से नहीं। 'क्यों' का जवाब नीचे मिल जाएगा।

            भारत में 10 सालों तक एक ऐसे दल का प्रधानमंत्री रहे जिनको मालूम ही नहीं था कि करना क्या है,वास्तव में उससमय ही लोकतंत्र को खतरा था। किसतरह दक्षिणपंथी खेमा को निशाना बनाया गया,जगजाहिर है,इससे लोकतंत्र को खतरा था।

             पर अभी भारत में मोदी और अमेरिका में ट्रंप के उदय से लोकतंत्र मजबूत हुआ है। दक्षिणपंथियों की एक खास पहचान होती है कि वे मान्यता,बनी हुई व्यवस्था और रिवाज को कभी नकारते नहीं,अगर जरुरत पड़े तो धीरे-धीरे बदलाव की गुंजाइश रखते हैं। इनकी दूसरी सबसे बड़ी पहचान होती है - राष्ट्रवाद। इसकारण लोकतंत्र जैसी व्यवस्था में कोई अचानक बदलाव नहीं होने वाला है,जैसा कि वामपंथियों की मंशा होती है।

              जब आप सभी मोदी का भाषण सुनते होंगे तो कई दफा आपको मिलेगा की हम भारत के गौरव को फिर से हासिल करना चाहते हैं,विश्वशक्ति बन के दिखाएँगे। वहीं ट्रंप भी अपने विजयी भाषण में कमोवेश इसी तरह जा बात कहते नजर आते हैं,"No dream is too big, no challenge is too great.Nothing we want for our future is beyond our reach. America will no longer settle for anything less than the best."
(कोई भी सपना इतना बड़ा नहीं है,कोई भी चुनौती महान नहीं है। ऐसा कुछ नहीं है जिसे हम अपनी भविष्य के लिए चाहते हैं और उसतक पहुँचने से पीछे रह जाएँगे। अमेरिका महान बने,इससे कम कुछ भी तय नहीं करेंगे।)

              भारत में भाजपा-नीत केंद्र सरकार के कार्यों को देखकर मुझे तो इस बात का जबरजस्त आभास हुआ है कि लोकतंत्र पिछले वर्षों की तुलना में काफी मजबूत हुआ है। सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया जैसे मंचों पर मुहीम चलाना अभिव्यक्ति की आजादी की पराकाष्टा है।

              यहाँ मेरा रुझान बिल्कुल ही अलग हो जाता है - मैं इसी लोकतंत्र के माध्यम से भविष्य में एक संवैधानिक हिंदू राष्ट्र की संकल्पना को साकार करना चाहता हूँ,जिससे जो राज्य सेकुलरिज्म के चलते आध्यात्मिक आवेश को खो देता है और दमनकारी नीतियाँ अपनाने लगता है,उसे पाकर राज्य को सरोकारी बनाया जा सके।

              शायद आपको जानकार ताज्जूब हो कि भारत में संघ का एक अनुषंगी संगठन 'राष्ट्रीय मुस्लिम मंच' भी है जो 'राष्ट्रावादी मुसलामानों' का एक संगठन है जो अपनी परंपरा और धर्म को गर्व से मानते हैं और शाखाओं में जाकर समाज-निर्माण तथा देश-निर्माण में बखूबी योगदान देते हैं।

               समाज को बाँधने का संघ ने क्या नयाब तरीका ढूँढा है,इससे अच्छा उदाहरण कुछ हो ही नहीं सकता। यहीं दक्षिणपंथी सोच है जो राष्ट्रनिर्माण की बातों को सबसे पहले रखता है। धर्म के महत्व को स्वीकार करता है जिसके बदौलत समाज संचालित होता है।

                तो फिर आप कैसे कह सकते हैं कि लोकतंत्र को खतरा दक्षिणपंथ से है?