Monday, 21 November 2016

भारत में जे. के. रोलिंग जैसे लेखक/लेखिका क्यों नहीं हो पाते?

रोलिंग का नाम तो अधिकांश से अजूबा नहीं है,ये वहीं लेखिका हैं जो पूरे विश्व में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली लेखकों में शुमार हैं,जिनको यह ख्याति अपने 'हैरी पॉटर' नाम के फिक्शन(काल्पनिक) पहचान रखने वाले नॉवेल से मिली है।
यह आलेख इसी सवाल का जवाब खोजने का आज प्रयास करता है।
इनकी 400 मिलियन नॉवेल आज के दिनों में पूरी दूनिया में बिक चुकी है। क्या आपको लगता है कि अगर ब्रिटेन के लोग इनके किताबों को नहीं खरीदते,जिनका जहाँ जन्म हुआ था तो पूरी दूनिया में इन्हें लोग पहचान पाते?
नहीं!
इनके किताबों की मुख्य खासियत रही है कि यह काल्पनिक(fiction) है,मैंने पढ़ते समय एक विशेष बात महसूस किया कि इसमें का लगभग अधिकांश चरित्र भारतीय कथा-कहानियों से प्रेरित रहा है। चाहे death eater(प्राणभक्षी) का संकल्पना हो या creatures(मानव का जानवर का मिश्रित रूप) या आत्म शक्ति या जादू का,सभी भारतीय दर्शनों,उपनिषदों आदि में वर्णित कहानियों से प्रेरित लगता है।
लेकिन एक विशेष बात जो इसे आधुनिक भारतीय लेखकों से अलग करती है,वो इनकी फिक्शन कहानी कहने का तरीका। जिसे लेकर आलोचक भी प्रशंशा कर चुके हैं।
भारतीय समाज आजादी के बाद के दिनों से ही एक अवसाद से गुजर रहा है - एक वामपंथी अवसाद,जिसका संचार के साधनों और प्रमुख संस्थाओं के प्रमुख के रूप में नाजायज कब्जा बना हुआ है।
इसके दुष्परिणामों को इंगित कराने के लिए मैं अंग्रेजी के विख्यात लेखक असीम त्रिवेदी का उदाहरण से स्पष्ट करता हूँ कि जिनके लेखन का विषय वस्तु भारतीय संस्कृति और परंपरा के प्रमुख किरदार भगवान शिव रहे हैं। फिर भी भारत और पूरी दुनिया में इनके किताबों को पढ़ा गया। अभी हाल में ही इनकी किताब भगवान राम पर आयी है जिसका नाम इक्ष्वाकु के वंशज है,मुझे उम्मीद है कि इसे भी पढ़ा जाएगा क्योंकि इस लेखक की लेखन परंपरा अंग्रेजी है। जहाँ लगभग हिंदी लेखन जैसा कोई पैर खींचने की प्रवृति विकसित नहीं हो पाई है।
अगर त्रिवेदी और अन्य लेखकों द्वारा यहीं सब किसी भगवान को केंद्र मानकर हिंदी में लिखा गया होता तो इन छद्म वामपंथी लेखकों द्वारा जो अपने को आज हिंदी के उद्धारक मानने लगे हैं,विचारधारा के नाम पर आलोचना करने से पीछे नहीं हटते और दक्षिणपंथी,संघी जैसे तमगों को लेखकों के पहचान के साथ लटका देते। हिंदी के पिछड़ापन का तो एक मुख्य वजह यह भी है और साथ ही रोलिंग जैसे लेखक न बन पाने का मुख्य कारण।
दूसरी बात जिस ओर हमारी ध्यान बरबस ही आकर्षित हो जाती है,वह है - भारत में पाठकीय अभ्यास की भारी कमी। हम आज पढ़ने को उतने आदी नहीं हैं जितना की होना चाहिए।
लुग्दी साहित्य(केशव पंडित,सरस सलिल,वेद प्रकाश शर्मा आदि) का फैलाव कम दामों और अश्लीलता के कारण लगभग इतना तो हो ही गया है कि आज यह अभिभावकों के मन पर बुरा प्रभाव डाल दिया है। अगर घर में हम कोई अच्छे उपन्यास भी पढ़ना चाह रहे हों तो सुनने को मिल जाता है कि तुम उपन्यास पढ़ रहे हो? और रोक दिया जाता है।
अच्छे लेखनों से बचपन में ही हमारा मन उचट जाता है,बचपन के दिनों में ही उपन्यास को बुरा मानकर हम दूर हो जाते हैं,इस कारण लंबे लेखन पढ़ने का जो अभ्यास होना चाहिए उससे हम महरूम हो जाते हैं। इसे देखते हुए मेरा मानना है कि सबसे पहले लुग्दी साहित्यों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा देना चाहिए ताकि अभिभावकों के विश्वास को जीता जा सके।
इन दिनों रही सही कसर को चेतन भगत,शोभा डे और कुछ दिनों पहले तक खुशवंत सिंह जैसे लेखकों ने पूरा कर दिया। जिसमें महिलाओं को इस रूप में पेश किया गया ताकि लोगों में सेक्सुअल उत्तेजना उतपन्न हो सके और इसे खरीदा जा सके। इन जैसे लेखकों का बेस्ट सेलर बनना तो समाज के सोच को ही दिखाता है कि हम महिलाओं को किस नजर से देखते हैं और क्या पढ़ना पसंद करते हैं।
यह सब इन्हीं वामपंथी लेखकों के बदौलत संभव हुआ है जो स्वघोषित हिंदी भाषा के रक्षक हैं,भारतीय पौराणिक कथाओं पर लिखे उपन्यास का विरोध तो करते हैं लेकिन इस तरह के अश्लील उपन्यासों का नहीं क्योंकि आप सभी जानते हैं कि इसी विचारधारा से ताल्लुक रखने वाली एक नेत्री फ्री सेक्स का बात स्वीकार चुकी है।
तीसरा कारण जिस ओर ध्यान देना बहुत ही जरूरी है,वह कि हममें 'चीटर' यानी कॉपी-पेस्ट करने की प्रवृति काफी हद तक विकसित हो गयी है। मौलिकता और रचनात्मकता का तो भारी अभाव है। कॉपी-पेस्ट करने की हम उस ताकीर को भी विकसित नहीं कर पाए हैं कि भारतीय संस्कृति और परंपरा में फैले ज्ञान को संजोकर एक जगह इकट्ठा कर सके और एक मजबूत संकल्पनात्मक आधार देकर रोलिंग जैसा बेस्ट सेलर उपन्यास लिख सकें। यह तो सभी को मालूम होगा कि इसी काम को कार्ल मार्क्स ने बखूबी किया और फैले हुए समाजवादी ज्ञान को संग्रह कर वैश्विक समाज को एक विशिष्ट विचारधारा दे डाला।
यह सौभाग्य ही रहा कि भारत में बाहुबली फिल्म हिट कर गयी जिसका विषयवस्तु धार्मिक था। लेकिन उसके सफल होने का एक वजह उसकी रचनात्मकता भी है जिसे नकारा नहीं जा सकता।
यहीं रचनात्मकता तो किसी लेखन खासकर फिक्शन(काल्पनिक) में जान डालता है। अभी तक मैंने जितने भी भारतीय लेखकों के उपन्यासों विशेषकर नए को पढ़ा है,उसमें इस रचनात्मकता का कमी ही दिखी। जबतक यह गुण विकसित नहीं हो जाता तबतक तो रोलिंग जैसे बनने की हिंदी लेखकों का सपना बेमानी ही होगी।
अभी तक के लेखन से यह बात तो स्पष्ट ही हो गयी है कि हिंदी फिक्शन लेखकों के खिलाफ कितना दबाव है। पहला,छद्म वामपंथियों का विरोध;दूसरा,कॉपी-पेस्ट का भी अच्छे गुण का न हो पाना;तीसरा,फैले ज्ञान को संग्रह न कर पाने की कमी और अंतिम रचनात्मकता का अभाव और कहानी कहने की उचित तरीका का न हो पाना।

Tuesday, 15 November 2016

जन चर्चा में आज बातें गलियों से - एक चित्रण!- 2/2

"नोटबंदी एक ऐतिहासिक कदम है,भ्रष्टाचार और काला धन पर अंकुश लगेगा - सरकार।"
"इससे काले धन पर कोई अंकुश नहीं लगेगा बल्कि सफेद होगा - वामपंथी अर्थशास्त्री।"
"ऐसा क्यों कह रहे हैं?"
"सरकार को पूँजीवाद का मतलब ही नहीं मालूम है।"
"जनता को काफी परेशानी हो रही है - विपक्ष।"
"लगता है काला धन इसके पास भी है,इसलिए इसको खुजली हो रही है।"
"बाई,ड्राइवर,खाना वाली,होटल आदि में किस-किस को चेक से भुगतान करूँ? - एक परेशान आत्मा।"
"लगता है ये रोज ही होटल जाते हैं।"
"उतना अमीरी है,मैं जाता हूँ।"
"हद है।"
"इतना परेशानी मैं क्यों उठाऊँ? ड्राइवर अजीब तरह से बोल रहा है।"
"आप रोज बाई, ड्राइवर और खाना वाली को पैसा देते हैं क्या? ये काम तो 1-5 तारीख के बीच हो जाता है। जिनको महीने में एक बार दाल नसीब होती होगी वो आज चेक से भुगतान का बात रहे हैं,जबकि वास्तविकता यह है कि कभी चेक का इस्तेमाल किये नहीं और बघार रहे हैं। आखिर इनके लिए यहीं तो वो वक्त है,फिर ये वक्त आये या न आये,झूठी ही सही इज्जत तो बना लें।"

जन चर्चा में आज बातें गलियों से - पत्रकारिता का गिरता साख! - 1/1

"जो अपने बीबी का नहीं हुआ,देश का क्या होगा! सुन रहे हो भक्तों?"
"यहीं त्याग तो मोदी को महान बनाता है।"
"अपने बीबी को लात मारकर भगा दो और कहो कि त्याग है।"
"बुद्ध और महावीर का महानता तो जानते होगे गैर-भक्त?"
"कहाँ बुद्ध और कहाँ फेकू?"
"दोनों में क्या अंतर है?"
"उससे मुझे क्या? बीबी को लात मारना त्याग है क्या?"
"नमक सत्याग्रह के दौरान गाँधीजी अपने बीबी से क्या बोले थे,मालूम है?"
"क्या?"
"आप जैसी औरत के बदौलत ही मैं ये अहम मुकाम हासिल कर पाया,आपने जो त्याग किया है उसे मैं भूल नहीं सकता,मैं देश के खातिर आपसे बहुत दिनों से मिल नहीं पाया।"
"वो अलग बात है।"
"कैसे?"
"कुतर्की भक्त,भक्ति छोड़ोगे तभी समझ आएगा।"
"समझ का भक्ति से क्या संबंध है गैर-भक्त?"
"फेकू कहता है,मैं चाय बेचने वाला था और 10 लाख का कोर्ट पहना था।"
"किसी का निजी जीवन क्या है? उससे क्या मतलब है? अगर वो सरकारी पैसा होता तो सवाल पूछना वाजिब था।"
"ये जूमला वाली सरकार है,पर भक्त को नहीं समझ आएगा।"
"कुछ मालूम भी है या ऐसे ही बके जा रहे हो।"
"क्यों मालूम नहीं है? मैं रोज स्क्रीन काला करने वाले का चैनल देखता हूँ,मुझे दुनियादारी और राजनीति की अच्छी समझ है।"
"भाजपा का मेनिफेस्टो क्या था?"
"मुझे सब मालूम है,ये जूमला वाली सरकार है।"
"आम आदमी पार्टी का मेनिफेस्टो क्या था?"
"मुझे सब मालूम है,यह सरकार दिल्ली की तस्वीर बदल दी।"
"भाजपा के मेनिफेस्टो के बारे में कुछ तो बताइये,जिससे आप साबित कर सकें कि यह जूमला की सरकार है और मोदी फेकू है।"
"ओए भक्त,काहे माथा खा रहे हो,मुझे सब मालूम है,15 लाख खाता में नहीं आये।"
"और?"
"भक्ति छोड़ोगे तभी तो मालूम चलेगा कि यह जूमला वाली सरकार है।"
"भाजपा के मेनिफेस्टो में और क्या था जिसे सरकार पूरा नहीं कर रही है?"
"मुझे सब मालूम है।"
"क्या था वहीं तो पूछ रहे हैं?"
"मुझे सब मालूम है भक्त मेरा टेस्ट मत करो।"
"आप कौन हैं?"
"भक्त तुमको यह भी नहीं पता मैं कौन हूँ।"
"नहीं,आप बता तो दीजिये।"
"हम नासमझ कुमार हैं।"
"वो तो उस जोकर वाले चैनल का प्रभाव पड़ गया है?"
"उसी के चलते तो हम मोदी विरोध में तर्क कर रहे हैं।"
"मतलब इसमें आपका कुछ नहीं है?"
"उससे अच्छा चैनल नहीं है भारत में,आपको मालूम है पठानकोट हमले का लाइव रिपोर्टिंग कर हमारे ज्ञान में बढ़ोतरी किया था इस चैनल ने,और तो और मेरा एक मुसलमान दोस्त खुश नजर आ रहा था।"
"वाकई।"
"भक्त तुमको मालूम भी है कि मैं बिना कुछ पढ़े ही इसी चैनल के बदौलत तर्क करने लगा हूँ।"
"अगर इन खबरिया चैनलों को बंद कर दिया जाए तो?"
"हम कुछ बोल भी नहीं पाएंगे,तर्क तो दूर की बात है,फिर मोदी का आलोचना कैसे होगा,मुझे जो पैसा मिला है उसे वापस करना पड़ेगा।"
"मतलब फंडेड लोग हैं आपलोग?"
"नहीं,मेरा मतलब यह नहीं था।"
"ठीक है,मैं तो समझ ही गया,भाजपा-नीत केंद्र सरकार जितना लोकप्रिय सरकार कोई नहीं है,आप सभी आलोचना कर नमक का कर्ज अदा कर रहे हैं।"

Monday, 14 November 2016

जन चर्चा में आज बातें गलियों से - भक्त का दुरुपयोग और विमर्श का गिरता स्तर! - 3/3

"भक्त हो?"
"सभी होते हैं,मैं हो गया तो क्या हुआ?"
"नहीं,मेरा मतलब है - मोदी भक्त।"
"नहीं तो।"
"मोदी का आलोचना क्यों नहीं करते हो?"
"अब जो अच्छा करेगा,उसका प्रशंशा ही तो करेंगे।"
"ओह्.... तो तुम परम भक्त हो?"
"क्या बात कर रहे हो भाई?"
"वहीं जो लोग कह रहे हैं।"
"अच्छा तो जो किसी निजी चैनल के प्रतिबंधित किये जाने पर एक मामूली पत्रकार का समर्थन करते हैं, वे क्या हैं?"
"मुझे लग गया तुम तो सर्टिफाइड भक्त हो।"
"तब तुम तो 'गैर-भक्त' हो?"
"मैंने धूप में बाल नहीं पकाएं हैं,सरकारों को आते जाते देखा है,मैं निष्पक्ष आलोचक हूँ,गैर-भक्त तो नहीं।"
"मैं भी तो निष्पक्ष समर्थक हूँ।"
"नहीं तुम भक्त तो हो और साथ में कुतर्की भी।"
"एक समर्थक भक्त कैसे हो सकता है? तब तो अन्यों के समर्थक भी दूसरे प्रकार के भक्त होंगे?"
"नहीं,वे सत्ता के खिलाफ हैं और स्वतंत्र आलोचक हैं।"
"फिर वहीं बात! स्वतंत्र और निष्पक्ष आलोचक। तो समर्थक स्वतंत्र और निष्पक्ष क्यों नहीं हो सकता?"
"तुमने तो कुतर्क की सारी हदें पार कर दी। मैं भक्तों से बात नहीं करता।"
"गुस्सा क्यों हो रहे हैं? कभी सोचा है आपने मोदी एक विशिष्ट संगठन से संस्कारित हुए हैं।"
"कहीं आरएसएस का बात तो नहीं कर रहे हो?"
"हाँ,मेरा ईशारा उधर ही हैं।"
"वो तो सांप्रदायिक,मनुवादी और चढ़ीधारी है।"
"और कम्युनिस्ट पार्टियों का संगठन और मुस्लिम लीग?"
"कम्युनिस्टों के पास तो एक आदर्श है,जो गरीबी और भूखमरी के खिलाफ आवाज उठाते हैं।"
"संघ भी तो सामजिक सरोकार का काम करता है।"
"ओह्... आई सी, मुझे अभी समझ आया कि तुम संघी भी हो।"
"अरे भाई पहले खुद तो तय कर लो क्या हूँ मैं - भक्त,परम भक्त या संघी?"
"मैं सावरकरवादी ही कहना पसंद कहूँगा जो अंग्रेजी हुकूमत से माफी माँगे थे,जब सारा देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था,तुम सब माफी माँगते हो आज देशभक्ति की बात करते हो।"
"तो आप अब कहेंगे कि मैं वामपंथी नहीं हूँ?"
"हाँ,बिल्कुल!"
"फिर भी आप कम्युनिस्टों को संघ की तुलना में अच्छा मानते हैं?"
"मैं भक्त संघी और कुतर्की से बात नहीं करता।"
"अरे भाई मेरे,मुझे कितना उपमा देंगे? एकाध और ढूंढ के लाइए।"
"अब एक गोडसेवादी मुझे सिखाएंगे।"
"इसमें गोडसे कहाँ से आ गया मेरे अनुभवशील विद्वान? लगता है बाल अंधेरे में ही पकाएं हैं,अनुभव से नहीं।"
"मैंने कहा न मैं भक्तों से तर्क नहीं करता।"
"बुद्धि रहेगी तब तो करेंगे। जाइये देशविरोधी नारा लगाने वालों का असहमति का हक करार कर मजे करिए और झूठी गर्व कीजिये कि हम सत्ता के खिलाफ हैं।"
"एक मिनट सुनो!"
"मैं तो कब से सुन रहा हूँ।"
"अब मुझसे राष्ट्रवाद पर बहस करोगे?"
"मैं तो हर मुद्दे पर कर सकता हूँ,ध्यान रहे संघी और जिसे भक्त कह रहे हैं,वे देशभक्ति और राष्ट्रवाद पर देशद्रोहियों का बखिया उधेड़ देंगे।"
"मेरे लिए तो राष्ट्रवाद वो है जिसमें सभी को खाना मिले और गरीबी-भूखमरी दूर हो।"
"और मेरे लिए क्या है? मेरा भी यहीं मानना है।"
"तुम सच में भक्त हो और कुतर्की हो।"
"अरे भाई मुझे ताज्जूब हो रहा है कि संघी क्यों नहीं कहे?"
"हाँ,संघी भी हो,मैं संघियों से बहस नहीं करता।"
"तो मैं कहाँ आपके अनुसार 'गैर-भक्तों' अर्थात एक दूसरे प्रकार के भक्ति में लीन पूर्वाग्रह-ग्रस्त लोगों से बहस कर रहा हूँ।"
"मैंने कई सरकारों को आते जाते देखा है।"
"इसमें वामपंथी सरकार भी थी क्या?"
"बहुत जल्द होगी जब कॉमरेड सत्ता में होंगे और 'लाल सलाम' का नारा सड़कों पर गूँजेगा।"
"अभी तो बोल रहे थे हम निष्पक्ष और स्वतंत्र आलोचक हैं।"
"हम भावना में बह गए।"
"इतने दिनों से तो ढोंग ही रचा रहे हो,झूठे और फरेबी वामपंथी,कहते हो निष्पक्ष हैं।"
"तो इसमें बुराई क्या है?"
"तो खुल के कहो कि हम निष्पक्ष नहीं बल्कि विचारधारा से प्रेरित हैं और वर्तमान सरकार का आलोचना और समर्थकों को भक्त,संघी,गोडसेवादी और सांप्रदायिक कहके दुष्प्रचार करना ही मकसद है।"
"इसपर बहस कर सकता हूँ,ऐसे मैं भक्तों से तो नहीं करता।"
"क्या भक्त-भक्त लगा रखे हो यार,अभी तक मुझे भी मालूम चल गया है आप कितने निष्पक्ष हैं!"
"बहस नहीं करना है क्या?"
"मैं मूढ़ गैर-भक्तों से बहस नहीं करता जो दूसरे प्रकार के भक्ति में लीन हैं।"

जन चर्चा में आज बातें गलियों से - मोदी आलोचना का सही चित्रण! - 4/4

"मोदी बहुत नाइंसाफी कर रहा है सर!"
"क्या कह रहे हो?"
"मेरे पास खाने को कुछ ही बचा है,लंबी-लंबी लाइन है और छूटे भी नहीं है।"
"2-4 दिन में ठीक हो जाएगा सब,अगर देश से भ्रष्टाचार मिटाना है तो कुछ लकलीफ तो सहना ही पड़ेगा।"
"भ्रष्टाचार से मुझे क्या? मोदी के आते ही दिल्ली में डेंगू,चिकनगुनिया का प्रकोप बढ़ गया,असहिष्णुता बढ़ गयी।"
"कौन बता दिया?"
"न्यूज वाले और कुछ नेता कह रहे थे,यहीं नहीं और भी बहुत कुछ बता रहे हैं।"
"क्या?"
"कुछ दिन पहले चर्च पर हमला हो गया था,विश्वविद्यालयों में संघ अपना पैठ जमा रहा।"
"तुमको क्या लग रहा है?"
"मैं तो एक मजदूर हूँ साहब,मुझे क्या लगेगा? जो न्यूज वाले बताते हैं वहीं सुन लेता हूँ।"
"कौन सा चैनल देखते हो?"
"वहीं बिहार वाले हैं न जो एक बार स्क्रीन काला कर दिए थे और एक दिन तो गजब हो गया था दो जोकर लाकर बैठा दिए थे,मालूम नहीं क्या कह रहे थे कि सवाल करेंगे तो नोटिस भेज देंगे तो। अच्छा मनोरंजन हुआ।"
"मतलब तुमको अच्छा लगा?"
"वो भी कोई न्यूज है साहब! इनको बताना चाहिए था कि अभी जो नोटबंदी की गयी है उससे कैसे निपटा जाए।"
"हाँ ये तो है।"
"लेकिन एक बात है साहब कि बिहार में नीतीश कुमार ने शराब बंद कर दिया।"
"मारेंगे एक थप्पड़ तुमको। कौन कह दिया कि नीतीश कुमार ने शराब बंद कर दिया,ये मोदी ने किया है।"
"नहीं सर,मोदी नहीं नीतीश कुमार ने किया है,मोदी तो बिहार का नहीं है।"
"ये तुमको कैसे समझ आ गया कि शराबबंदी को नीतीश ने किया है,मोदी नहीं।"
"सर,इतना तो समझता ही हूँ।"
"लेकिन यह नहीं समझ रहे हो कि असहिष्णुता,चर्च पर हमला,डेंगू का प्रकोप आदि मोदी ने नहीं कराया है।"
"बात तो आप सही कह रहे हैं,ये सब तो राजनीति है,इसे मोदी कैसे कर सकता है।"

Sunday, 13 November 2016

प्रभात पटनायक के आलेख के मायने

प्रभात पटनायक,जिनका आलेख आजकल काफी साझा किया जा रहा है,खासकर केंद्र सरकार द्वारा 500 और 1000 रूपये के नोट बंद करने के बाद से।
सभी के जेहन में ये सवाल आ रहा होगा कि आखिर ये 'प्रभात पटनायक' कौन है?
मैंने इनके बारे में खोजबीन किया तो मालूम चला कि ये एक भारतीय अर्थशास्त्री और राजनीतिक विश्लेषक हैं जिनपर मार्क्सवाद का गहरा प्रभाव है। विकिपीडिया पर इनके बारे में भारतीय मार्क्सवादी अर्थशास्त्री लिखा गया है। ये JNU में प्रोफेसर रह चुके हैं और 2010 में रिटायर हुए। साथ ही 2006 से 2011 तक केरल के योजना बोर्ड के वाईस प्रेसिडेंट रह चुके हैं।
(ध्यान देने वाली बात है कि केरल और JNU दोनों जगह वामपंथ का गढ़ समझा जाता है,इनका अतीत तो इन्हीं जगहों से जुड़ा है,लाजिमी है,वर्तमान सरकार का आलोचना करना इनका मजबूरी हो गया है।)
हाल ही में इनका एक इंटरव्यू वायर नाम के रक न्यूज पोर्टल पर प्रकाशित हुआ है,जिसे आप लिंक में पढ़ सकते हैं( http://thewire.in/79419/demonitesation-interview-prabhat-patnaik/),जो अंग्रेजी में है,मैं केवल कुछ खास पहलू का ही हिंदी में अनुवाद और विश्लेषण करूँगा।
इस इंटरव्यू का प्रकाशन 'विमुद्रीकरण का निर्णय दिखाता है कि वे पूँजीवाद का मतलब नहीं समझते : प्रभात पटनायक' नाम से हुआ है।
प्रधानमंत्री ने 8 नवंबर को कहा,"500 और 1000 के नोटों की बंदी जरूरी है,यह कदम काले धन के बीमारी के इलाज के लिए जरूरी था।"
जब पटनायक से काले धन के बारे में पूछा गया तो वो जवाब में वहीं सतही तर्क रखते हैं कि टैक्स चोरी के जरिये जो पैसों का भंडार किया गया है उसे बिज़नस मैन अपने एजेंट या अन्य तरीकों से सफेद कर सकते हैं,इसलिए यह विमुद्रीकरण काले धन को लेकर कोई समाधान नहीं देगा।"
(लेकिन इस बात को इनके द्वारा नजरअंदाज किया है कि सरकार इसके लिए भी प्रावधान कर चुकी है,2.5 लाख से ज्यादा के लिए जाँच का व्यवस्था किया गया है तो कैसे और कितने एजेंट के बदौलत करोड़ों रूपये का काला धन रखने वाला व्यक्ति इसे सफेद कर सकता है? सोचने वाली बात है।)
ये आगे कहते हैं,"मार्क्स ने कंजूस और पूँजीवादियों में अंतर बताया है। एक कंजूस का मानना है कि वह पैसों को जमा करके अमीर होगा,जबकि एक पूँजीवादी इस बात में यकीन करता है कि वह पैसों के उपयोग से अमीर होगा। ब्लैक मनी रखने वाले कंजूस नहीं है,वे पूँजीवादी हैं। वे अपने व्यापार को फैलाने का कोशिश कर रहे हैं। अपने सभी ट्रांजेक्शन को टुकड़ों में करके सफ़ेद करेंगे।"
आगे के सवाल के जवाब में ये सरकार पर आरोप लगाते हैं कि वह पूँजीवाद का मतलब नहीं समझती है। पटनायक काले धन को सफेद बनाने की बात को काले व्यापारियों का उदाहरण देकर दोहराते रहते हैं कि वे इसे कई ट्रांजेक्शन के माध्यम से कर लेंगे और कोई भी टैक्स अथॉरिटी इतना योग्य नहीं है कि इसे पकड़ सके। कुल मिलाकर इनका इशारा व्यापारियों की तरफ है जिसका तुलना ये पूंजीपतियों से करते हैं। पर मुझे यह मालूम नहीं चल रहा है कि अगर किसी के पास करोड़ों रूपये का काला धन है तो वो 2.5 लाख के कितने टुकड़े और एजेंट के माध्यम से सफेद करेगा?
आगे वहीं 1946 और 1978 में बंदी का निर्णय को पेश करके असफलता को गर्व से वर्णित करते हैं।
आगे इनसे सवाल किया जाता है कि आप कैसे कहना चाहते हैं कि बंदी का यह कदम असंगठित अर्थव्यवस्था(informal economy - कृषि, ठेले वाले,दिहाड़ी मजदूर आदि) और ऐसे लोग जिनके पास बैंक एकाउंट नहीं है,प्रभावित करेगा?
इसे वे एक उदाहरण देकर समझाते हैं कि अगर आपके क्षेत्र में एक क्राइम हो जाता है तो पुलिस स्टेशन कोई नहीं जाता है कि उसे पकड़ा जाए। यहीं बात काले धन पर भी लागू होती है।
अगर आप किसी बैंक में खाता खुलवाना चाहते हैं,SBI में भी तो आपको SBI के 16 प्रश्नों के प्रश्नावली को भरना होगा।
आप किसी के सर पर बंदूक रखकर कैशलेस अर्थव्यवस्था नहीं बना सकते। यह धीरे-धीरे होता है। लेकिन भाई सरकार अचानक कहाँ कर रही है?
(ये सभी आलोचना में इतने अंधे हो जाते हैं कि कुछ सूझता ही नहीं है। सरकार पहले ही सभी के लिए जीरो बैलेंस खाता(जनधन योजना) ला चुकी है,इसके लिए काफी समय भी दिया गया है,अगर कोई व्यक्ति इन योजनाओं का लाभ नहीं उठाता तो सरकार के आगामी कदमों(नोटों की बंदी) का आलोचना कैसे कर सकता है,जबकि सरकार पहले ही इन समस्याओं को भांपते हुए व्यवस्था कर चुकी है।)
मेरा मानना बिल्कुल ही अलग है!
अगर कोई अचानक फैसला लिया जाता है तो उसकी परेशानी तो आम जनता को कुछ दिनों के लिए उठानी ही पड़ती है,लेकिन इसका इतिहास गवाह है,ऐसे फैसलों का व्यापक परिणाम देखने को मिलता है,जो काफी सार्थक होता है। आपसभी तत्कालिक समस्याओं पर नहीं जाएँ। आनेवाले दिनों में जब इसके व्यापक परिणाम सामने आएंगे,भ्रष्टाचार,काले धन आदि पर अंकुश लगेगा और सरकारी खजाने पर पहुँचने के बाद जब इस धन का इस्तेमाल आधारभूत ढाँचा और अन्य जनता को अन्य सुविधाएँ देने में होगी तो आप सभी को अच्छे दिन के अनुभव से कोई नहीं रोक सकता।

Friday, 11 November 2016

क्या आपको लगता है कि हिटलर उतना बुरा था जितना कि इतिहास ने उसके साथ अन्याय करके पेश किया है?

             इनदिनों तर्क देते समय लिबरल,लेफ्ट,छद्म सेकुलर और कठमुल्ला जमात हिटलर को लाये बिना नहीं रहता और दक्षिणपंथ को बदनाम करने का सतही प्रमाणों को पेश करता रहता है।

             मुझे इस बात को स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है कि इतिहास विजेताओं का विजयगाथा है। यह काफी सही भी है। विश्व इतिहास का लेखन तो अधिकाँश मामलों में निष्पक्ष हो ही नहीं सकता। एक सामान्य सी बात है - कोई इतिहासकार विश्व मामलों में अपने ही देश के खिलाफ कैसे लिख सकता है?

             यहीं वह कड़ी है जिसे समझना बहुत जरूरी है। अपने ब्लॉग के माध्यम से मैं भारत के वामपंथी इतिहासकारों का कपटजाल तो उजागर कर ही चूका हूँ कि वे किसतरह एक खास विचारधारा के प्रभाव-वश पूरे हिंदू संस्कृति को ब्राह्मणवाद की तराजू से तौलते हैं जबकि ब्राह्मणवाद नाम का कोई चीज है ही नहीं।

              कुछ दिन पहले मैंने समाज में पनपी एक बीमारी की ओर इशारा किया था कि वह किसतरह लाइलाज होती जा रही है,यह हाल केवल भारत के समाज का नहीं बल्कि पूरी दुनिया के समाजों का है। वह बीमारी है - घटनाओं के तह में जाए बिना ही तात्कालिक परिणाम पर जोरदार चर्चा और आरोप-प्रत्यारोप।

              1924 में हिटलर को पाँच साल की सजा सुनाई गयी,पर मात्र 9 महीने बाद ही रिहा कर दिया गया। जेल में रहते हुए इसने 'मीन कैम्पफ' यानी मेरा संघर्ष नामक पुस्तक की रचना कर डाली। इस किताब को मैंने तब पढ़ा था जब केवल मात्र सत्रह साल का था और इंटरमीडियट में साइंस का पढ़ाई कर रहा था,मतलब आज से पाँच साल पहले और दूबारा राजनीति विज्ञान से बीए करते हुए,पार्ट-2 में पढ़ा।

               जिस समय यह किताब प्रकाशित हुई थी उसे निम्न श्रेणी के साहित्य के रूप में देखा गया था। एल्ब्रेट कैरी नाम के एक लेखक ने टिप्पणी करते हुए लिखा था कि "यह तो एक हताश व्यक्ति के जहरीले उदगारों से भरी हुई पुस्तक है। आश्चर्य इस बात का था कि ऐसे कट्टरपंथी विचारों ने कुछ समय के लिए,लोगों के विचारों को कैसे प्रभावित किया,विशेषकर ऐसे लोग जो कि एक महान सभ्य राष्ट्र के निवासी थे।"

              यहीं से आलोचना की शुरुआत हो जाती है। कैरी के आलोचना का आधार देखकर तो यहीं लगता है कि या तो वे जर्मन जनता को दोषी ठहरा रहे हैं या हिटलर को या दोनों को।

              इस पुस्तक में हिटलर ने वास्तव में अपने राजनीतिक उद्देश्यों को बताया है और बाद में हिटलर ने धीरे-धीरे अपने सभी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कार्य भी किया।

              मुझे वहाँ तक जाना ही नहीं है कि द्वितीय विश्वयुद्ध क्यों हुआ,उसकी पृष्टभूमि क्या थी,जर्मनी कितना दोषी था और अन्य राष्ट्र कितने?

              मैं अपने बातों की शुरुआत वर्साय की संधि से करता हूँ।

               इस बात को मानने में किसी भी विद्वान और इतिहासकार को कोई दिक्कत नहीं है कि प्रथम विश्व युद्ध साम्राज्यवाद और गुप्त सैन्य संधियों का नतीजा था। चाहे इंग्लैंड हो या फ्रांस या इटली सभी ने किसी-न-किसी से गुप्त सैन्य संधियाँ करके अपने स्थिति को मजबूत किये हुए थे।

               तो फिर कैसे प्रथम विश्व युद्ध की जिम्मेवारी अकेले जर्मनी पर डाला जा सकता था/है?

               द्वितीय विश्व युद्ध की पूर्वपीठिका यहीं है,यहीं वह कड़ी है जिसे आलोचक नजरअंदाज कर देते हैं। अब एक राष्ट्रावादी वर्साय के संधि के फलस्वरूप अपने राष्ट्र पर लगे कलंक को दूर करने का प्रयास नहीं करेगा तो क्या करेगा? अगर हिटलर ने इस शर्म के प्रतीक को हमेशा के लिए मिटा देने का कोशिश किया तो मेरे नजर में कोई गलत काम नहीं किया।

               जर्मनी को जिस अपमानजनक संधि पर हस्ताक्षर करने को बाध्य किया गया,वह यहीं वर्साय का संधी था। इस संधि के द्वारा जर्मनी को पंगू बना दिया गया। चारों तरफ से जर्मन भूभाग को पड़ोसी देशों को देकर जर्मन राष्ट्र को संकुचित कर दिया गया। क्षतिपूर्ति आयोग ने एक अरब पाउंड की राशि की सिफारिश कर अन्याय को कई गुना बढ़ा दिया। क्षतिपूर्ति आयोग का व्यवस्था कर एक तरह से खाली चेक पर जर्मनी से हस्ताक्षर ले लेना था और क्षतिपूर्ति आयोग ने वहीं किया। जर्मनी को पूरी तरह से निरस्त्रीकरण कर दिया गया। ऐसा प्रावधान किया गया कि जर्मनी एक लाख से ज्यादा सैनिक और 15000 से ज्यादा नौसैनिक नहीं रख सकता। जंगी जहाजों को भी सीमित कर दिया गया।

                इतना अपमान तो कोई देश नहीं सहन कर सकता। जर्मनी तो श्रेष्ठ जनों का देश था जो अपने को जर्मन-आर्य कहा करते थे।

                 जर्मन जनता इस बात को कभी स्वीकार नहीं कर पायी कि केवल उनका देश ही युद्ध के लिए उत्तरदायी था। मित्र राष्ट्रों द्वारा घोषित अपराधियों में से एक हिंडनबर्ग तो 1925 में जर्मनी का राष्ट्रपति निर्वाचित हुआ।

                  एक तरह से इस संधि को 'युद्ध समाप्त करने वाला युद्ध'(war to end wars) कहा गया तो फिर कैसे इतिहास हिटलर से इतना अन्याय कर सकता है!

                  इस संधि के बारे में पंडित नेहरू ने भी कहा क़ि मित्र राष्ट्र घृणा एवं बदले की भावना से कार्य कर रहे थे। वे तो जर्मनी के रक्त की अंतिम बूंद तक उसके निर्जीव शरीर से निचोड़ लेना चाहते थे।

                 अमेरिकन राष्ट्रपति विल्सन यूरोपियन राजनीति के उतने मंझे हुए खिलाड़ी नहीं थे,ब्रिटेन और फ्रांस के प्रमुखों ने इनको अपने जाल में उलझा दिया और इनका आदर्शवाद राष्ट्र-राज्यों के विकास में सहायता तो की लेकिन युद्ध को रोक नहीं सका।

                  "कुल मिलाकर इतिहास हिटलर और जर्मनी को जिस अपमानजनक तरीके से पेश करता है,वह किसी भी तरीके से सही नहीं कहा जा सकता। हिटलर के प्रति इतिहास का अन्याय ही है। ऐसे कई उदाहरण दबे पड़े हैं जिसको निष्पक्ष तरीके से बाहर आना चाहिए था,लेकिन नहीं हुआ और ये विजेताओं के विजयगाथा में अपने आदर्शों को तिलांजलि दे दिए।

                वास्तव में गलती तो मित्र राष्ट्रों की थी। हिटलर तो एक प्रतिक्रिया था,फासीवाद उग्र दक्षिणपंथ था जिसकी जरुरत लंबे समय से जर्मनी को थी ताकि भविष्य में फिर से श्रेष्ठ-आर्य-जर्मन का अपमान करने का दुः साहस मित्र राष्ट्र जैसे देश नहीं कर सके।"

ट्रंप और मोदी का जीत पर व्यावहारिकता से हटकर सैद्धांतिकता पर

           व्यवहार में तो कहा ही जाएगा कि इनदोनों के जीत का मतलब है कि वहाँ बाकियों की अपेक्षा सबसे ज्यादा लोगों ने पसंद किया। मेरे लिए ये परिणाम कई मायनों में अलग है।

           पहला कि उधर अमेरिका में एक दक्षिणपंथी खेमा सत्ता में आयी और इधर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में भी पहले से ही दक्षिणपंथी खेमा सत्ता में आ चुकी है।

           जैसा कि उदारवादियों,लेफ्ट और कुछ छद्म सेकुलर जमातों द्वारा आरोप लगाया जाता रहा है कि ऐसी ताकतों का उदय लोकतंत्र के लिए खतरा है। संप्रादायिकता को बढ़ावा देने जैसा है। वगैरह-वगैरह।

            तो क्या सचमुच लोकतंत्र खतरे में है?

            पूरी दुनिया के विद्वान पश्चिमी लोकतंत्र को काफी प्रौढ़ मानते हैं और अपने भाषणों-आलेखों के माध्यम से कहते नजर आते है कि पश्चिम का लोकतंत्र कोई गलत फैसला नहीं ले सकता। यहीं कारण है कि वहाँ की सरकार 'जनमत-संग्रह' जैसे माध्यमों का बखूबी इस्तेमाल करती है,इसका चलन आज तेजी से बढ़ा है। चाहे ब्रेक्जिट को लेकर जनमत संग्रह हो या स्पेन-ब्रिटेन के बीच का एक द्वीप को लेकर विवाद पर लोगों की राय। कुछ मिलाकर वहाँ का लोकतंत्र अप्रत्यक्ष होते हुए भी प्रत्यक्ष लोकतंत्र के उपायों को आजमाता नजर आता है।

            लेकिन फिर भी एक डर बना हुआ है कि कहीं लोकतंत्र अपने विकृत रूप भीड़तंत्र में तो नहीं बदल जाएगा।                जर्मनी,फ्रांस,इटली आदि देशों में वामपंथी पार्टियों का इसी उदारवादी लोकतंत्र में फलना-फूलना तो इसी ओर ईशारा करता है। हर देश के वामपंथी पार्टियों का कमोवेश एक ही मकसद है - साम्यवादी सरकार की स्थापना,और उद्देश्य तो रट्टू तोते जैसा ही एक सा है - गरीबी और भुखमरी की समाप्ति।

           इसी उद्देश्य के पूर्ति का सब्जबाग लोगों को दिखाकर ये सोवियत संघ में लाखों उदारवादियों और आलोचकों को मौत के घाट उतार दिए। अपनी जमीन हिलती देख भारत के केरल में भी इनके द्वारा संघ कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्या का क्रम जारी है।
           तो क्या अब लोकतंत्र जैसी व्यवस्था में अपनी साख को हत्या से बचाया जाएगा?

           ऐसी स्थिति और ऐसे संगठनों का लोकतंत्र में उदय का मतलब तो यहीं है कि लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदलता जा रहा है। त्रिपुरा,पश्चिम बंगाल और केरल में तो काफी हद तक लोकतंत्र में लोक(सचेत नागरिक) का स्थान भीड़ ने ले लिया था/है। पर बंगाल में तो परिदृश्य तेजी से बदला और भीड़ को सचेतता आने लगी।

            वामपंथी पार्टियों का लोकतांत्रिक माध्यमों का इस्तेमाल करके आने से लोकतंत्र को खतरा है,ध्यान रहे दक्षिणपंथी पार्टी के आने से नहीं। 'क्यों' का जवाब नीचे मिल जाएगा।

            भारत में 10 सालों तक एक ऐसे दल का प्रधानमंत्री रहे जिनको मालूम ही नहीं था कि करना क्या है,वास्तव में उससमय ही लोकतंत्र को खतरा था। किसतरह दक्षिणपंथी खेमा को निशाना बनाया गया,जगजाहिर है,इससे लोकतंत्र को खतरा था।

             पर अभी भारत में मोदी और अमेरिका में ट्रंप के उदय से लोकतंत्र मजबूत हुआ है। दक्षिणपंथियों की एक खास पहचान होती है कि वे मान्यता,बनी हुई व्यवस्था और रिवाज को कभी नकारते नहीं,अगर जरुरत पड़े तो धीरे-धीरे बदलाव की गुंजाइश रखते हैं। इनकी दूसरी सबसे बड़ी पहचान होती है - राष्ट्रवाद। इसकारण लोकतंत्र जैसी व्यवस्था में कोई अचानक बदलाव नहीं होने वाला है,जैसा कि वामपंथियों की मंशा होती है।

              जब आप सभी मोदी का भाषण सुनते होंगे तो कई दफा आपको मिलेगा की हम भारत के गौरव को फिर से हासिल करना चाहते हैं,विश्वशक्ति बन के दिखाएँगे। वहीं ट्रंप भी अपने विजयी भाषण में कमोवेश इसी तरह जा बात कहते नजर आते हैं,"No dream is too big, no challenge is too great.Nothing we want for our future is beyond our reach. America will no longer settle for anything less than the best."
(कोई भी सपना इतना बड़ा नहीं है,कोई भी चुनौती महान नहीं है। ऐसा कुछ नहीं है जिसे हम अपनी भविष्य के लिए चाहते हैं और उसतक पहुँचने से पीछे रह जाएँगे। अमेरिका महान बने,इससे कम कुछ भी तय नहीं करेंगे।)

              भारत में भाजपा-नीत केंद्र सरकार के कार्यों को देखकर मुझे तो इस बात का जबरजस्त आभास हुआ है कि लोकतंत्र पिछले वर्षों की तुलना में काफी मजबूत हुआ है। सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया जैसे मंचों पर मुहीम चलाना अभिव्यक्ति की आजादी की पराकाष्टा है।

              यहाँ मेरा रुझान बिल्कुल ही अलग हो जाता है - मैं इसी लोकतंत्र के माध्यम से भविष्य में एक संवैधानिक हिंदू राष्ट्र की संकल्पना को साकार करना चाहता हूँ,जिससे जो राज्य सेकुलरिज्म के चलते आध्यात्मिक आवेश को खो देता है और दमनकारी नीतियाँ अपनाने लगता है,उसे पाकर राज्य को सरोकारी बनाया जा सके।

              शायद आपको जानकार ताज्जूब हो कि भारत में संघ का एक अनुषंगी संगठन 'राष्ट्रीय मुस्लिम मंच' भी है जो 'राष्ट्रावादी मुसलामानों' का एक संगठन है जो अपनी परंपरा और धर्म को गर्व से मानते हैं और शाखाओं में जाकर समाज-निर्माण तथा देश-निर्माण में बखूबी योगदान देते हैं।

               समाज को बाँधने का संघ ने क्या नयाब तरीका ढूँढा है,इससे अच्छा उदाहरण कुछ हो ही नहीं सकता। यहीं दक्षिणपंथी सोच है जो राष्ट्रनिर्माण की बातों को सबसे पहले रखता है। धर्म के महत्व को स्वीकार करता है जिसके बदौलत समाज संचालित होता है।

                तो फिर आप कैसे कह सकते हैं कि लोकतंत्र को खतरा दक्षिणपंथ से है?

Wednesday, 9 November 2016

डॉनाल्ड ट्रंप का विजयी भाषण का हिंदी अनुवाद(Hindi translation of donald trump's victory speech.)

भाषण का प्रतिलिपि न्यूयार्क टाइम्स से लिया गया है और अनुवाद सुरेश कुमार पाण्डेय द्वारा किया गया है।
(The transcript of speech is taken from the new York times and translated by mr suresh kumar pandey.)
"Sorry to keep you waiting. Complicated business."
(इंतजार कराने के लिए माफ़ कीजिये। बहुत जटिल और उलझा हुआ काम था।)
"I’ve just received a call from Secretary Clinton. She congratulated us, it’s about us, on our victory and I congratulated her and her family on a very very hard fought campaign. I mean, she fought very hard."
(मुझे अभी ही क्लिंटन का फोन आया। उन्होंने हमें बधाई दिया,यह हमलोगों के बारे में है,हमारी जीत के बारे में है और मैंने उनको और उनके परिवार को चुनावी प्रचार के दौरान उनकी कड़ी लड़ाई को ध्यान में रखते हुए बधाई दिया। मेरा मतलब है,उन्होंने बहुत कड़ी टक्कर दी।)
"Now it’s time for America to bind the wounds of division"
(अब यह समय अमेरिका के विभाजन के घाव को बाँधने का है।)
"Hillary has worked very long and very hard over a long period of time and we owe her a major debt of gratitude for her service to our country. I mean that very sincerely."
(हिलेरी काफी लंबे समय से कड़ी मेहनत कर चुकी हैं और हमारे देश को उनके ऋण के लिए बहुत ही ईमानदारी से आभार व्यक्त करता हूँ।)
"Now it’s time for America to bind the wounds of division. We have to get together."
(अब यह समय अमेरिका के विभाजन के घाव को बाँधने का है। हमें एकसाथ आना होगा।)
"To all Republicans and Democrats and Independents across this nation, I say it is time for us to come together as one united people. It’s time."
(देश भर के डेमोक्रेट्स,रिपब्लिकन्स और निर्दलीय को मैं कहता हूँ,यह हमलोगों को साथ आने का समय है बिल्कुल एक संयुक्त लोग की तरह। यहीं वह समय है।)
"I pledge to every citizen of our land that I will be President for all Americans and this is so important to me."
(मैं यहाँ के प्रत्येक नागरिक और भूमि का शपथ लेता हूँ कि मैं सभी अमेरिकियों का राष्ट्रपति बनूँगा जो मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण है।)
"For those who have chosen not to support me in the past, of which there were a few people, I’m reaching out to you for your guidance and your help so we can work together and unify our great country."
(वह जो बीते समय में मेरे चुने जाने का समर्थन नहीं करते थे,जिनकी संख्या सीमित है,मैं आपके पास आपके मार्गदर्शन और सहायता के लिए आ रहा हूँ,हमलोग साथ मिलकर काम कर सकते हैं और अपने महान देश को संगठित कर सकते हैं।)
"As I’ve said from the beginning, ours was not a campaign but rather an incredible and great movement made up of millions of hard working men and women who love their country and want better brighter future for themselves and for their family."
(जैसा कि मैं प्रारंभ में ही कह चुका हूँ,हमलोगों ने चुनावा प्रचार के बजाय लाखों लोगों की सहायता से एक अतुल्य/अविश्वनीय और महान आंदोलन खड़ा किया जो अपने देश से प्यार करते हैं और अपने तथा अपने परिवार के लिए एक सुनहरा भविष्य चाहते हैं।)
"It will be a movement comprised of people from all races, religions, backgrounds and beliefs who want and expect our government to serve the people - and serve the people it will."
(यह एक आंदोलन है उनसभी लोगों का जो विभिन्न प्रजातियों,धर्मों,पृष्ठभूमियों और विश्वास से हैं जो चाहते हैं और आशा करते हैं कि हमारी सरकार लोगों का सेवा करे - और लोगों का सेवा होगा।)
"Working together we will begin the urgent task of rebuilding our nation and renewing the American dream.
(एकसाथ काम करके हमलोग राष्ट्र के पुनः निर्माण और अमेरिकन सपने का नवीनीकरण का एक अति महत्वपूर्ण काम का शुरुआत करेंगे।)
"I have spent my entire life in business looking at the untapped potential in projects and in people all over the world."
(मैंने दुनिया भर के लोगों और परियोजनाओं में क्षमता को देखकर अपनी पूरा जीवन बिताया।)
"That is now what I want to do for our country. Tremendous potential. I’ve got to know our country so well. Tremendous potential. It’s gonna be a beautiful thing."
(यहीं कारण है कि अब मैं अपने देश के लिए करना चाहता हूँ। जबरजस्त क्षमता। मैंने अपने देश को अच्छे से जाना। यह एक खूबसूरत चीज हो रहा है।)
"Every single American will have the opportunity to realise his or her fullest potential. The forgotten men and women of our country will be forgotten no longer."
(प्रत्येक अकेले अमेरिकावासी के पास अपने संपूर्ण क्षमता को जाँचने का अवसर होगा। हमारे देश के जिन महिलाओं और पुरुषों को भूला दिया गया है,अब ज्यादा दिनों तक नहीं भूला जाएगा।)
"We are going to fix our inner cities and rebuild our highways, bridges, tunnels, airports, schools, hospitals. We’re gonna rebuild our infrastructure which will become, by the way, second to none and we will put millions of our people to work as we rebuild it.
(हमलोग अपने आंतरिक शहरों को मजबूत और हाइवे,पूल,सुरंग,हवाईअड्डा,स्कूल,अस्पताल को दुबारा बनाने जा रहे हैं। हम अपनी आधारभूत ढाँचा का पुनर्निर्माण कर रहे हैं जो जिस तरह से हो जाएगा,किसी से पीछे नहीं होगा और इसके पुनर्निर्माण में लाखों लोगों को रखा जाएगा।)
"We will also finally take care of our great veterans who’ve been so loyal and I’ve got to know so many over this 18 month journey the time I’ve spent with them in this campaign has been among my greatest honours. Our veterans are incredible people."
(मैं अंततः अपने दिग्गजों(सहायताकार्त्ता)का भी ख्याल रखूँगा जो काफी वफादार रहे और मैंने इन 18 महीनों की यात्रा में बहुत कुछ जाना,इस चुनावी प्रचार के दौरान मैंने जो अपना समय व्यतीत किया वो मेरे लिए सम्मान की बात है। हमारे दिग्गज(सहायताकार्त्ता) अतुलनीय/अविश्वसनीय लोग हैं।)
"We will embark upon a project of national growth and renewal. I will harness the creative talents of our people and we will call upon the best and brightest to leverage their tremendous talent for the benefit of all. It’s gonna happen."
(हमें राष्ट्रीय विकास औए नवीनीकरण के योजना में लगना होगा। मैं अपने लोगों के क्रिएटिव प्रतिभा के लिए साज उपलब्ध कराऊंगा और हमें सभी प्रतिभाशाली लोगों का लाभ उठाना होगा। यह होने वाला है।)
"We have a great economic plan. We will double our growth and have the strongest economy anywhere in the world."
(हमारे पास एक उम्दा इकोनॉमिक प्लान है। हम अपने उत्पादन को दोगुना करेंगे और दुनिया में कहीं भी सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था होंगे।)
"At the same time we will get along with all other nations willing to get along with us."
(इसी दौरान हम अन्य सभी राष्ट्रों से मिल जाएँगे जो हमारे साथ पाने के लिए तैयार हैं।)
"We will have great relationships. We expect to have great great relationships."
(हमारे पास एक मजबूत संबंध होगा। हम मजबूत और मजबूत संबंध बनाने का आशा करते हैं।)
"No dream is too big, no challenge is too great."
(कोई भी सपना इतना बड़ा नहीं है,कोई भी चुनौती महान नहीं है।)
"Nothing we want for our future is beyond our reach. America will no longer settle for anything less than the best."
(ऐसा कुछ नहीं है जिसे हम अपनी भविष्य के लिए चाहते हैं और उसतक पहुँचने से पीछे रह जाएँगे। अमेरिका महान बने,इससे कम कुछ भी तय नहीं करेंगे।)
"We must reclaim our country’s destiny and dream big and bold and daring. We have to do that. We’re doing to dream of things for our country and beautiful things and successful things once again."
(मैं अपने देश के भाग्य और सपने पर पुनः दावा करना चाहता हूँ। हमें इसके लिए काम करना होगा। हमें अपने सपने के लिए काम करना होगा और खूबसूरत चीजें और सफलता एक साथ होंगी।)
"I want to tell the world community that while we will always put America’s interests first we will deal fairly with everyone."
(मैं पूरे विश्व विरादरी से कहना चाहता हूँ कि जबकि हम अमेरिका का हित सबसे पहले रहेंगे,हम सभी से ईमानदारी से समझौता करेंगे।)
"All people and all other nations. We will seek common ground not hostility, partnership not conflict."
(सभी लोग और सभी राष्टों से हम दुश्मनी नहीं एक साझा प्रयास,संघर्ष नहीं संबंध का प्रयास करेंगे।)
"First I want to thank my parents who I know are looking down on me right now. Great people. I’ve learned so much from them. They were wonderful in every regard. I had truly great parents. I also want to thank my sisters Maryanne and Elizabeth who are here with us tonight."
(सबसे पहले मैं अपने माता-पिता को धन्यवाद देना चाहता हूँ जो अभी मुझे नीचे देख रहे हैं,मैं जानता हूँ। महान लोग हैं। मैंने उनलोगों से बहुत कुछ सीखा। वे हर एक सम्मान में अद्भुत थे। सच में मेरे पास महान माता-पिता हैं। मैं अपने बहन मेरीआने और एलिजाबेथ को भी धन्यवाद देना चाहता हूँ जो आज की रात मेरे साथ हैं।)
"And my brother Robert, my great friend. Where is Robert? They should all be on this stage but that’s OK. And also my late brother Fred, great guy, fantastic guy. Fantastic family. I was very lucky."
(और मेरा भाई रॉबर्ट, मेरा सबसे अच्छा दोस्त है। रॉबर्ट कहाँ है? उनसभी को इस मंच पर होना चाहिए लेकिन कोई बात नहीं। और मेरा मृत भाई फ्रेड भी,अच्छा लड़का,अच्छी परिवार है। मैं बहुत भाग्यशाली हूँ।)
"To Melania and Don and Ivanka and Eric and Tiffany and Barron, I love you and I thank you and especially for putting up with all of those hours. This was tough. This was tough. This political stuff is nasty and it’s tough."
(मिलानिया, डॉन,इवांका,एरिक,टिफनी और बैरन, मैं तुमलोगों से प्यार करता हूँ और मैं धन्यवाद देता हूँ,विशेषकर उनदिनों में हमारे साथ के लिए। यह कठिन था। यह राजनीतिक काम मुश्किल हो रहा था और यह कठिन भी।)
"... We have got tremendously talented people up here and I can tell you, it's been very special. I want to give a special thanks to our former mayor Rudy Giuliani who's unbelievable. Unbelievable. He travelled with us and he went through meetings and Rudy never changes. Where’s Rudy? Where is he?"
(मैंने जबरजस्त प्रतिभाशाली लोगों को पाया है जो यहाँ खड़े हैं और मैं आपलोगों से कह सकता हूँ,मेरे लिए काफी खास बन गए हैं। मैं अपने पिछले मेयर रूडी गिलियानी को एक विशेष धन्यवाद देना चाहता हूँ जो अविश्वसनीय हैं।)
"Governor Chris Christie folks, was unbelievable. Thank you Chris."
(गवर्नर क्रिस क्रिस्टी का दोस्ती अविश्वनीय था। धन्यवाद क्रिस।)
"The first man, the first Senator, the first major major politician and let me tell you he’s as smart as you get, Senator Jeff Sessions. Great man."
(पहला व्यक्ति,पहला सीनेटर,पहला बड़ा राजनीतिज्ञ और आपलोग मुझे बताओ,आपलोग इतने स्मार्ट हैं कि उनको बता पाएंगे,सीनेटर जेफ़ सेशन्स। एक महान व्यक्ति हैं।)
"Another great man, very tough competitor, he was not easy, he was not easy, who is that? Is that the mayor? Ah, Rudy got up here."
(दूसरा महान व्यक्ति,बड़ी कड़ी टक्कर देने वाला,वह इतना आसान नहीं था,वे कौन थे? क्या वे मेयर थे? आह, रूडी यहाँ हैं।)
"Another great man who’s been a friend to me, I’ll tell you, I got to know him as a competitor because he was one of the folks that was negotiating to go against those democrats, Dr Ben Carson. Where’s Ben? Where is Ben?
(एक अन्य महान व्यक्ति जो मेरा दोस्त हो गया,मैं आपको बताऊँगा, मैंने उन्हें अपने एक कॉम्पेटिटर जैसा पाया क्योंकि वे दोस्तों में से एक थे जो उन डेमोक्रेट्स के खिलाफ खुद जाने पर सहमति जता रहे थे,डॉ. बेन कार्सन। बेन कहाँ हैं?)
"And by the way Mike Huckabee is here some place and he is fantastic. Mike and his family, Sarah, thank you so much."
(और किसी तरह माइक हकबी यहाँ हैं। वे बेहतरीन हैं। माइक और उनका परिवार सारा,बहुत-बहुत धन्यवाद।)
"General Mike Flynn and General Keller, we have over 200 generals and admirals who’ve endorsed our campaign. They’re special people and it’s a great honour."
(जनरल माइक फ्लिन और जनरल केलर,हमारे पास 200 से ज्यादा जनरल और एडमिरल हैं जो हमारे अभियान का समर्थन जता चुके हैं। वे ख़ास लोग हैं और सम्मान के पात्र हैं।)
"We’ve got 22 congressional medal of honour recipients. We have just tremendous people."
(हमलोगों ने सम्मान के 22 कांग्रेस मैडल को पाया। हमारे पास बेहतरीन लोग हैं।)
"A very special person who believed me and I’d read reports I wasn’t getting along with him - I never had a bad second with him - he’s an unbelievable star. I said Reince (Priebus), I know it, look at all those people over there, is a superstar. But I said they can’t you a superstar rites unless we win…"
(एक ख़ास व्यक्ति जिसने मेरे में विश्वास किया और मैं रिपोर्ट पढ़ चुका हूँ, मैं उनका साथ पा नहीं रहा था - मैं उनके साथ एक बूरा दूसरा कभी नहीं था - वे एक अविश्वनीय सितारा थे। मैंने कहा रिंच(प्रिबस),मैं इसे जानता हूँ,वहाँ लोगों को देखो,एक सुपरस्टार हैं। लेकिन मैंने कहा वे नहीं कर सकते हैं,जबतक हम नहीं जीतते हैं...)
"He is the hardest working guy. Come up here. Where is Reince? Get over here Reince. It’s about time you did this Reince. Come on, say a few words!"
(वे काफी मेहनती हैं। यहाँ आइये। रिंच कहाँ हैं? यह रिंच के लिए कुछ करने का समय है। आइये और कुछ शब्द कहिये।)
"Our partnership with the RNC was so important to the success of what we’ve done."
(RNC के साथ हमारा साझेदारी काफी महत्वपूर्ण है,सफलता के लिए हम क्या कर चुके हैं।)
"So I also have to say I’ve gotten to know some incredible people. The Secret Service people. They’re tough, they’re smart and they’re sharp and I don’t wanna mess around with them I can tell you and when I wanna go and wave to a big group of people and they rip me down in my seat. They are a fantastic group of people."
(इसलिए मुझे भी कुछ कहना है,मैंने कुछ अविश्वसनीय लोगों को पाया। सीक्रेट सेवा के लोग,वे कठिन हैं,स्मार्ट हैं और तेज हैं और मैं उनलोगों के आसपास अपना समय बर्बाद करना नहीं चाहता। मैं आपलोगों से कहना चाहता हूँ और जब मैं जाना चाहता हूँ और लोगों के एक बड़े समूह का प्रवाह मुझे अपने सीट पर बैठा देता है। वे एक बेहतरीन लोगों का समूह है।)
"And law enforcement in New York City, they’re here tonight. These are spectacular people, sometimes under appreciated unfortunately, but we appreciate them, we know what they’ve been through."
(और न्यूयार्क में क़ानून लागू करने को वे आज की रात यहाँ हैं। ये लोग विशिष्ट हैं,दुर्भाग्य से कभी-कभी बढ़ावा देना पड़ता है,लेकिन हम उनको देते हैं,हम जानते हैं उनके माध्यम से क्या किया गया है।)
"So it’s been what we call a historic event, but to be really historic, we have to do a great job. And I promise you I will not let you down. We will do a great job. WE will do a great job."
(इसलिए यह हो गया है,क्या हम इसे एक ऐतिहासिक घटना पुकारें,लेकिन वास्तव में ऐतिहासिक होगा,हमें एक महान कार्य करना है। और मैं आपसे वादा करता हूँ,मैं आपको नीचे नहीं गिरने देंगे। हम एक महान कार्य करेंगे। हम एक महान कार्य करेंगे।)
"I look very much forward to being your President and hopefully at the end of two years or three years or four years or maybe even EIGHT years you will say that that was something you were really very proud to do."
(मैं आपका राष्ट्रपति बनकर आशा भरी नजरों से काफी आगे देख रहा हूँ,दो वर्ष या तीन वर्ष या चार वर्ष की समाप्ति या आठ वर्ष की समाप्ति पर आपलोग कहेंगे कि वह कुछ था,आप कुछ करने पर वास्तव में गर्व करेंगे।)
"Thank you very much. I can only say that while the campaign is over our work on this movement is now really just beginning."
(बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं केवल कहना चाहता हूँ कि अब जबकि चुनावी अभियान पूरा हो गया है,इस आंदोलन पर हमारा कार्य अब वास्तव में शुरू हुआ है।)
"We’re going to get to work immediately for the American people and we’re going to be doing a job that hopefully you will be so proud of your President. You will be so proud."
(हमलोग अमेरिका के लोगों के लिए तुरंत काम करने जा रहे हैं ऑफ हमलोग एक उम्मीद से अपने काम को करने जा रहे हैं,आपलोगों को अपने राष्ट्रपति पर गर्व होगा। आपलोगों को अपने राष्ट्रपति पर गर्व होगा।)
"It’s an honour. It’s been an amazing evening, it’s been an amazing period, and I love this country. Thank you. Thank you very much. Thank you to Mike Pence. Thank you everybody."
(यह एक सम्मान की बात है। यह एक अद्भुत शाम हो गया है,यह एक अद्भुत समय है,और मैं इस देश को प्यार करता हूँ। शुक्रिया। बहुत-बहुत धन्यवाद। माइक पेंस धन्यवाद। सभी को धन्यवाद।)
अनुवाद - सुरेश कुमार पाण्डेय।

ट्रंप का जीत और मीडिया का नंगापन! (मोदी-ट्रंप तुलना)


पूरी दुनिया की मीडिया डॉनल्ड ट्रंप की खिलाफत कर रही थी,खासकर उनके बयानों को लेकर। शायद यह थोड़ी बचकानी बात लगे कि पूरी मीडिया?
बिल्कुल ऐसी मीडिया जिनकी तदात शायद ज्यादा है,जो स्थापित हैं और अपने साख के लिए जाने जाते हैं वो तो जरूर। यह बात तो जगजाहिर है कि डेमोक्रेटिक दल का रुझान लेफ्ट ही रहा है और रिपब्लिकन अपने आप में राइट सेंट्रिक है। बिल्कुल भारत के भारतीय जनता पार्टी की तरह।

ऐसे लिबरल,लेफ्ट और स्वघोषित प्रगतिशील संस्थानों तो भारत में उसी दिन नंगा हो गए थे जब 2014 में नरेंद्र मोदी ने भारी बहुमत से जीत हासिल की थी और अब बारी थी दुनिया के स्थापित मीडिया संस्थानों का।

मोदी को लेकर भी अखबारों में आलोचनात्मक लेख छापे जाते थे,बुराई तो हर एक वाक्य में शामिल रहता था,यहीं हाल अमेरिकी चुनाव में भी देखने को मिला,वाशिंगटन पोस्ट तो कई दफा ट्रंप को नकार दिया था।

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में मीडिया अपने आप को न जाने कितना शक्तिशाली समझने लगी है कि उसे लगने लगा है, वह जनता के फैसले को प्रभावित कर सकती है। पर ऐसा नहीं है,भारत में मोदी का जीत और अमेरिका में ट्रंप का जीत यह बताने के लिए काफी है कि जनता की आवाज मीडिया के एक छोटे तबके का आवाज नहीं हो सकती,मीडिया अपने रिपोर्टिंग से जनता के मन को प्रभावित नहीं कर सकती और ये जरूरी नहीं कि मीडिया का कयास सही ही हो जाए।

जब एकतरफा रिपोर्टिंग और किसी संगठन,पार्टी और व्यक्तिखास का विरोध और आलोचना अपने निजी हित और स्वार्थ को लेकर तथा विचारधारा के कारण होने लगे तो मीडिया की विश्वसनीयता को लेकर समाज में सवाल उठना जरूरी हो जाता है,ये वहीं मीडिया है जो अपने गिरेबान में तो नहीं झाँकती लेकिन सवाल के नाम पर देशविरोधी रिपोर्टिंग करके जनता के एक तबके को गुमराह करने का प्रयास करती है। कमोवेश स्थिति हरजगह एक सी ही है।

हालाँकि अमेरिका में स्थिति तो बिल्कुल ही चिंता स्तर तक पहुँच गया है,जहाँ आधी मीडिया डेमोक्रेट का और आधी रिपब्लिकन का खुलकर समर्थन और प्रोपोगेट करती है। भारत में भी कुछ मीडिया संस्थानों पर इसतरह का धब्बा लग चुका है।

ट्रंप के जीत से तो यूरोप के मीडिया संस्थानों में निराशा का माहौल छा गया है,बीबीसी के एक खबर के मुताबिक एक जर्मन न्यूज़ वेबसाइट 'डाई वेल्ट' ने ट्रंप की जीत पर हेडिंग लगाई है,"ऐसा कैसे हो सकता है?"

वहीं एक फ्रांसीसी अख़बार ले फिगारो ने पहले पन्ने पर अपने संपादकीय में लिखा है, "अमरीका ऐसा देश है जिसे फिर से एक होने की ज़रूरत है और नए राष्ट्रपति के सामने अमरीका में बंटवारे की भावना को कम करना बड़ी चुनौती होगी।"

ये सब तो नरेंद्र मोदी के जीत को लेकर भी भारत में कई मीडिया संस्थानों में देखने को मिला था और आज तक मिल रहा है लेकिन पिछले ढाई वर्षों में मुझे ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला जैसा उस समय कुछेक द्वारा कयास लगाए गए थे।

ट्रंप ने घर-घर जाने के बजाय विशाल रैलियों पर ज्यादा ध्यान लगाया,इस तरकीब को भारत में प्रधानमंत्री मोदी ने भी बखूबी इस्तेमाल किया था,इसपर हो रहे खर्च को मीडिया निशाना बनाते रहा लेकिन भारत में विशाल रैलियों का मोदी का रणनीति सफल रहा और अमेरिका में ट्रंप का।

इसी रणनीति के कारण भारत में मोदी को इनाम स्वरुप प्रधानमंत्री का पद मिला तो अमेरिका में ट्रंप को व्हाइट हाउस!

जिसतरह नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान चर्चित नारा 'अबकी बार मोदी सरकार' दिया था उसीतरह ट्रंप ने भी कहा था 'अबकी बार ट्रंप सरकार।' इस नारा ने लोगों के दिलों दिमाग को प्रभावित किया और दक्षिणपंथी पार्टी की सत्ता भारत की तरह अमेरिका में काबिज हुयी।