Saturday, 29 October 2016

संवैधानिक हिन्दू राष्ट्र

प्रारंभ में पूरे पोस्ट का सार दिया गया है,व्याख्या के लिए नीचे 'व्याख्या और विश्लेषण" से पढ़े।
         "एक ऐसा व्यक्ति जो नास्तिक है,वह धर्म के मर्म को कैसे समझ सकता है? आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वह नैतिकता के सारे उसूलों को तिलांजलि दे देता है।
         अगर समाज के पूरे लोग नास्तिक हो जाएं,उनके मन में किसी धर्म के लिए कोई इज्जत नहीं हो तो निश्चित रूप से एक नैतिकताविहीन समाज का निर्माण हो जाएगा और ऐसे समाज का भविष्य क्या होगा,इससे हमसभी अवगत हैं।
           यहीं अवधारणा राज्य के संबंध में सेकुलर संकल्पना को लेकर लागू होती है। एक धर्म-निरपेक्ष राज्य व्यापक अर्थों में एक नास्तिक व्यक्ति के तुल्य हो जाता है।
           जब कोई राज्य केवल सेकुलर बनकर रह जाता है तो उसके आधार में किसी किस्म का आध्यात्मिक आवेश नहीं रहता,इस स्थिति में उसकी(राज्य) अमानवीय प्रवृतियाँ उभरने लगती है। आजादी के बाद भारतीय राज्य अधिकाँश वर्षों तक इसी अंदेशे से गुजरा है,लेकिन शताब्दी के वर्षों में एक विशिष्ट धार्मिक पहचान लिए दल सत्ता में आयी तो इस अमानवीय प्रवृति के बढ़ोतरी को कुछ हद तक अंकुश लगा और 2014 के बाद तो पूर्ण रूप से।
           आपसभी को याद होगा कि कितने दंगे राज्य प्रायोजित रहे हैं,यह सब जानते हैं कि राज्य झूठ बोलने में उस्ताद होता है,इसलिए दंगों के साजिश को छुपा लिया जाता है। सिख दंगों के संदर्भ में अगर समझने का प्रयास करेंगे तो आसानी होगी।
           "रजनी कोठारी के शब्दों में भारतीय राज्य न समाज को मुक्ति देने की दिशा में ले जा पाया और न ही सेकुलर रह पाया। कुल मिलाकर गंभीर संकट का शिकार हो गया है।"
            इनसब प्रवृतियों को देखते हुए मेरा मानना है कि राज्य का एक धार्मिक चरित्र होना ही चाहिए। विश्व में इस्लामिक राज्यों की स्थिति को  देखते हुए भारत इस्लामिक राज्य कभी नहीं बनेगा,जिसके दुष्परिणाम हम नित्यदिन देखते रहते हैं।
             इसलिए भारत के लिए एक 'संवैधानिक हिन्दू राष्ट्र' का चरित्र ही उचित लगता है। हिंदुओं की सहिष्णुता और क्षमाशीलता को देखते हुए तथा इनकी एक ख़ास विशेषता कि केवल हिन्दू ही अपने दुश्मनों के साथ सामंजस्य बनाकर रहे हैं,इसकारण हिन्दू चरित्र देना ही उपयुक्त होगा।
             तब भारत में राज्य प्रायोजित दंगे होने की संभावना काफी कम हो जायेगी क्योंकि जब राज्य का एक हिन्दू आध्यात्मिक चरित्र होगा तो दंगे होने के बाद ये सवाल जरूर उपजेंगे कि क्या आपका धर्म यहीं सिखाता है,यहीं आपके राज्य का चरित्र है जो दमनकारी है?
              ऐसे तीखे सवाल को देखकर कोई भी हिचकेगा लेकिन सेकुलर चरित्र में ऐसा नहीं है क्योंकि राज्य के लिए कोई जवाबदेही है - धर्म को लेकर,नैतिकता को लेकर और मानवीय मूल्यों को लेकर।"
व्याख्या और विश्लेषण -
         भारतीय संस्कृति में नास्तिकता भी एक व्यापक अवधारणा है,इसी को आधार बनाकर कई दर्शन फले-फूले हैं,लेकिन अंततः वे आस्तिकता की ओर अग्रसर हो गए।
          जिस 'संवैधानिक हिन्दू राष्ट्र' के सिद्धांत का विकास करने का प्रयास मैं कर रहा हूँ,इसमें नास्तिकता का संदर्भ व्यापक अर्थों में लिया गया है।
          मैं इसबात पर सहमति जताता हूँ कि नास्तिक व्यक्ति तर्क को ज्यादा तवज्जो देता है और आस्तिकता के आधारों(धार्मिक साहित्य,ईश्वर,धर्म) को नकार देता है।
          यहीं वह मर्म है जिसे समझने की जरुरत है।
         "ईमानदारी एक अच्छी नीति है।"
          एक तार्किक व्यक्ति इसपर सवाल उठाएगा - "कैसे?"
          "झूठ बोलना पाप है।"
           फिर वहीं सवाल - "क्यों?"
          "बड़ों का आदर करना चाहिए।"
          "नहीं करूँगा तो क्या हो जाएगा।"
          "असहायों का सेवा करना चाहिए।"
          "पर क्यों?"
           उपर्युक्त बातें ऐसी है जिसका कैसे और क्यों के संदर्भ में कोई भी जवाब नहीं दिया जा सकता।
           यह वास्तव में एक कल्पित और भविष्य में मिलने वाली परिणामों पर आधारित है,जो एक ईश्वरीय सत्ता की ओर इशारा करता है,काल्पनिक ही सही,लेकिन लोगों के मन में यह भाव बना रहता है कि हमारे बुरे और अच्छे कर्मों का कोई अवलोकन कर रहा है।
           यहीं भाव विश्वास का जन्म देता है,एक अदृश्य शक्ति में;जिससे ही आस्तिकता के गुणों का विकास होता है और समाज में धार्मिक चरित्र स्थापित होता है।
           एक आस्तिक व्यक्ति ही ऊपर दिए गए सार्वभौमिक कथनों पर अदृश्य शक्ति से अवलोकित होने के कारण,आँख मूँदकर विश्वास करता है।
           जो एक नास्तिक व्यक्ति नहीं कर सकता क्योंकि सार्वभौमिक मान्यता पर उसका तर्क हावी हो जाता है और नैतिकता के सारे उसूलों का धज्जियाँ उड़ा देता है। इसे अवलोकित(observed) होने का कोई डर नहीं होता।
           यहीं वह कारण है कि एक नास्तिक व्यक्ति नैतिकताविहीन हो जाता है,जब समाज में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ने लगती है तो समाज का हश्र भी वहीं हो जाता है।
           "तो क्या तर्क करना गलत है?"
           "नहीं।"
           पर इसकी सीमा है,तर्क सार्वभौमिक बातों पर नहीं की जाती,नैतिकता के माध्यम से प्राप्त सारे उसूल सार्वभौमिक हैं। तर्क केवल स्थापित होने वाले सिद्धांतों पर ही किया जाना चाहिए क्योंकि उसे स्थापित होने में कई बुनियादी बदलाव होने बाकी है। अब इसपर क्या तर्क किया जा सकता है कि 'ईमानदारी एक अच्छी नीति है',फिर अगर कोई तर्क के नाम पर बुरी नीति बताएगा तो कुतर्क ही कहा जाएगा। जिसका कोई मतलब नहीं।
          "क्या आस्तिक व्यक्ति तार्किक नहीं होता?"
          "ऐसा किसने कह दिया? होता है।"
           पर इसके तर्क के मायने अलग होते हैं,यहीं तर्क के मूल नियमों को समझता है,यह तर्क करते समय दूसरे की भावनाओं को समझता है और सार्वभौमिक बातों पर अंगुली नहीं उठाता।
           "ये सार्वभौमिक बातें क्या है?"
           "यहीं तो नैतिकता द्वारा मंथन(गहन विमर्श) से प्राप्त होता है।"
          
           "अब ये नैतिकता क्या है भला।"
           "यह एक ऐसी सिद्धांत है जिसके आधार पर अच्छे और बुरे तथा सही और गलत में फर्क किया जाता है।"
           "जैसे?"
           "ईमानदारी और बेईमानी;आदर और अनादर;सत्य और झूठ आदि में से एक बेहतरीन को नैतिकता के सिद्धांतों पर ही अपनाया जाता है।"
           जाहिर सी बात है,एक आस्तिक व्यक्ति पहले शब्द को ज्यादा तवज्जो देगा और वहीं नास्तिक पहले शब्द पर सवाल उठाएगा और यहाँ तक कि दूसरे पर भी,लेकिन उसे जहाँ ज्यादा लाभ की प्राप्ति होगी उसे स्वीकार कर लेगा। यह माना हुआ तथ्य है कि गलत रास्ते ज्यादा लाभ अर्जित कराने वाले होते हैं,इसलिए एक नास्तिक व्यक्ति दूसरे शब्दों को अपनाएगा,जिससे नैतिकता के गलत आदर्श स्थापित होंगे और 'सार्वभौमिक बातें' दुनिया से कोसों दूर चली जायेगी।
          
            अब तक का व्याख्या यह प्रमाणित करने के लिए काफी हो गया है कि
            "एक व्यक्ति जो नास्तिक है,तर्क को ज्यादा तवज्जो देगा,जिसकारण धर्म के मर्म को समझ नहीं पाएगा और नैतिकता के सारे उसूलों(सार्वभौमिक बातों) को तिलांजलि दे देगा।"
            "धर्म और अध्यात्म"
            धार्मिक मत का स्थापना कैसे होता है? इसका वर्णन तो मैं ऊपर कर चुका हूँ,लेकिन एक सवाल कि क्या केवल धार्मिक व्यक्ति ही अध्यात्म का अनुभव कर सकता है? अगर हाँ,तो नास्तिक क्यों नहीं?
            "बिल्कुल।"
             एक धार्मिक व्यक्ति ही अध्यात्म का अनुभव कर सकता है। कइयों द्वारा इसपर सवाल उठाया जा सकता है,लेकिन आपको ध्यान रखना होगा कि मैंने इसे निरपेक्ष(absolute) नहीं माना है,बल्कि सापेक्षता(relativity, comperativly) की दृष्टि से देख रहा हूँ। आत्मा,मन,हृदय,मष्तिष्क आदि पर नियंत्रण का प्रयास कुल मिलाकर एक धार्मिक और आस्तिक अवधारणा है।
             एक आस्तिक व्यक्ति जिसका पहले से ही रुझान एक अदृश्य शक्ति में रहता है,वह 'अपने को' आसानी से थोड़े ही प्रयासों में जान लेगा। आखिर अपने को जानना ही तो अध्यात्म है। अपनी आत्मा,मष्तिष्क आदि पर नियंत्रण करना ही तो अध्यात्म है।
             इसलिए एक नास्तिक व्यक्ति बिना आत्मा(अदृश्य शक्ति,कल्पना) पर विश्वास किये अध्यात्म का अनुभव कर ही नहीं सकता,इसलिए नास्तिकता और अध्यात्मिकता का कोई संबंध नहीं हो सकता,हालाँकि कुछ अपवाद हो सकते हैं,लेकिन ये अपवाद भी बेबुनियाद हैं क्योंकि अध्यात्म का अनुभव करते हुए उसमें आस्तिक मतों का विकास हो चुके होते हैं।
             "क्या सेकुलर नास्तिक-तुल्य हैं?"
             "बिल्कुल।"
             क्योंकि सेकुलर मत किसी भी धर्म के मर्म और उसके सिद्धांतों को बढ़ावा नहीं देता,उसके लिए नैतिकता और सार्वभौमिक बातों का कोई मतलब नहीं रह जाता क्योंकि इसके केंद्र में धार्मिक मत न रहने के कारण आध्यात्मिक आवेश नहीं पनप पाता इसमें भी नास्तिकों की तरह अमानवीय प्रवृतियाँ उभरने लगती है।
             "हिंदू।"
             यह एक व्यापक अवधारणा है,यह एक जाति, प्रजाति,राष्ट्रीयता,धर्म आदि सबकुछ है।"
             यह हिंदुत्व के माध्यम से एक ऐसा व्यवस्था स्थापित करेगा जिसमें कोई भेदभाव और किसी भी तरह की असामानता नहीं होगी,कोई जाति नहीं कोई ऊंचा या नीचा नहीं।
             अगर एक 'हिन्दू राष्ट्र' स्थापित हो गया तो उसका रूप किसी के पूछने से इसप्रकार उजागर होगा।
             "आपकी जाति क्या है?"
             "हिंदू।"
             "आपकी प्रजाति क्या है?"
             "हिन्दू।"
             "आपकी राष्ट्रीयता क्या है?"
             "हिन्दू।''
             "आपका धर्म क्या है?"
             "हिन्दू।"
              इसलिए राष्ट्रीयता के अर्थों में एक नास्तिक भी हिन्दू है और धर्म के दृष्टि से मुसलमान और ईसाई भी हिन्दू है।
बशर्ते उसे 'हिंदुत्व' के सिद्धांतों को मानना होगा और इसमें अपना विश्वास जताना होगा। यहीं हिंदुत्व तो नैतिकता के उसूलों पर कसा हुआ 'सार्वभौमिक बातों' के माध्यम से हमें जीवन का रास्ता सिखाता है।
             यहीं हिन्दू लोग हैं जिसकी सहिष्णुता और क्षमाशीलता विश्व-विख्यात है,पूरी दुनिया में इकलौता यहीं वे लोग हैं जो अपने दुश्मनों के साथ भी रहे हैं/रहते हैं,इसीकारण भारत को सेकुलर चरित्र छोड़कर एक 'हिन्दू राष्ट्र' की छवि को अपनाना चाहिए। भारत राष्ट्र-राज्य को अपनी अमानवीय चरित्र से निपटारा दिलाने का 'हिन्दू राष्ट्र' का विकल्प ही अच्छा है। तभी आध्यात्मिक आवेश विकसित होगा और समरसता आयेगी।
              इस 'हिन्दू राष्ट्र' की संकल्पना को संवैधानिक बनाना जरूरी है ताकि वैधता प्राप्त हो सके,यह वैधता यहाँ के हिंदुओं(राष्ट्रीयता) से प्राप्त होगी जो अपने सहभागिता के जरिये स्थापित करेंगे।