Monday, 24 October 2016

क्या कोई ऐसा विचार नहीं हो सकता जो भारत भूमि के अनुकूल हो ?

आपको याद है कि अभी हाल में कोई ऐसा विचारधारा पूरी दुनिया में कहीं भी आया है जो तहालका मचा दिया हो ? शायद नहीं ! एक दौर था औद्योगिक क्रांति के बाद का। एक के बाद एक कई विचारधारायें और आदर्श नियमित अंतराल पर आते रहे। उदारवाद अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच ही पाया था कि इसकी कई खामियाँ उजागर हो गयी जिसकी भरपाई की पूर्ति करने की कोशिश मार्क्स ने मार्क्सवाद का सिद्धांत देकर की। लेकिन बहुत जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि समानता का जोरदार वकालत करने वाला मार्क्सवाद व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा को ही मटियामेट कर दिया। उदारवाद के साथ भी हम कुछ ऐसा ही देख चुके हैं कि कैसे स्वतंत्रता के आदर्श को लेकर चलते समय समानता बाधित होती रही।

फिर इन सब को दूर करने के पश्चिम में कई उपाय किये गये लेकिन नतीजा ज्यों का त्यों रहा चाहे वो फासीवाद हो या संघवाद या श्रेणी समाजवाद। एक समय तो संशोधनवाद काफी लोकप्रिय होने लगा था पर परिणाम बिल्कुल ही वैसा रहा।

पर भारत के लिए यह दुर्भाग्य का काल रहा कि कोई भी विचारक ऐसा न कर पाया। पूरी दुनिया तो दूर भारत के परिप्रेक्ष्य में भी किसी को सफलता न मिल पायी।

आखिर क्यों ?

एक समय में लग रहा था कि गांधीवाद इस रिक्त स्थान को भरने का कोशिश करेगा लेकिन व्यावाहारिकता में तो गांधीजी के आदर्शों को गांधी जैसा संत ही निभा सकता है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अनशन पर बैठने के दो-तीन दिन के दौरान ही लोग सोचने लगते हैं कि कोई आकार गिलास में भरे जूस को पिलाकर अनशन तोड़वाये। पर गांधीवाद के सफलता को नजरअंदाज तो नहीं कर सकते क्योंकि आज भी यह कई अच्छे परिणाम लेकर आता है।

क्यों का जवाब आप सोचिये कि कमी कहाँ है ?
हम 'समाज और व्यक्ति' तथा 'समाज और राज्य' के संबंधों जैसे गूढ़ प्रश्नों को सोचने के काबिल ही नहीं हैं या बने बनाये सिद्धांतों को ही मानकर नक़ल करने की हमारी आदत हो गयी है ?

पर अंत में एक बात जरूर कहना चाहूँगा कि भारत में एक जमात पूरे जोर-शोर से कार्लमार्क्स के सिद्धांतों को लागू करने का बात करता है लेकिन इतना जरूर सोचना चाहिए कि देश और काल दोनों ही दृष्टियों से यह इतना बदल गया है कि इन विश्लेषणों को तोते की तरह रटकर,आँख मूँदकर भारत पर लागू करें तो यह साईंटिफिक अथवा विवेकपूर्ण दृष्टि नहीं कहा जाएगा। यह रूढ़िवादिता होगी। जो अपने देश की रूढ़ियों को मिटाकर सुधार का दावा करें,वे विदेश के रूढ़ियों का गुलाम बन जाये, यह तो आश्चर्य की विषय होगी।

इसलिए हमसभी भारतवासियों को एक ऐसी विचारधारा के खोज में लग जाना चाहिए जो भारत के माहौल के अनुरूप हो और यहाँ के लोगों पर सटीक बैठे ताकि अपनी स्वतंत्रता,समानता,गरिमा आदि को बनाये रख सकें तथा अपने पारंपरिक आदर्श पर भी कायम रहे।