Monday, 24 October 2016

मराठा आंदोलन से बदलाव की उम्मीद की जा सकती है ?

कोपर्डी कांड - जब तीन दलितों ने एक 14 वर्षीय लड़की का बलात्कार और हत्या कर दिया -

यह घटना इन दिनों 'कोपर्डी कांड' के नाम से विख्यात हो गया है,ऐसे तो इसे हुए दो महीने से ज्यादा हो गए लेकिन इनदिनों महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में 'पूना मराठा मोर्चा' के तहत मराठा वर्चस्व के लिए आंदोलन खड़ा कर दिया गया है। जाहिर है,क्योंकि लड़की मराठा समुदाय की थी।

जैसे ही आंदोलन उठा, उसी दिन यानी 23 सितंबर को दलितों ने भी आंदोलन का मंसूबा बांध लिया, इसे कहते हैं चोरी और फिर ऊपर से धौंस। यह सरासर गलती निकम्मे राजनेताओं की है जो वोट बैंक के लालच में सर पर चढ़ाकर बैठे हैं। यहाँ मैं अवगत करा दूँ कि मेरी मंशा दलित विरोध की नहीं बल्कि गलती करने वाले को सजा दिलाने के संबंध में है,जब मामला नारी सम्मान की हो तो पक्ष में आंदोलन क्यों ? हालांकि खबर है कि इसे रद्द कर दिया गया है,वजह जो भी हो एक कुलबुलाहट तो है ही।

इस मराठा मोर्चा में 3 लाख से अधिक लोग जमा हुए और प्रदर्शन किए और कई मांगें रखी। उनमें से एक है - अनुसूचित जाति और जनजाति क़ानून अधिनियम,1989 का दुरुपयोग रोका जाए क्योंकि पीड़िता के परिवार के खिलाफ इस क़ानून के तहत मुकदमा करने की धमकी दी गयी थी।(इण्डिया टूडे,5 अक्टूबर,2016 के अंक में पेज 44 पर लिखे गए किरण तारे के आलेख के अनुसार)

इस क़ानून को लेकर मनसे प्रमुख राज ठाकरे का भी बयान आया कि इसे पूरी तरह निकाल फेकने की जरुरत है और मराठा नेता शरद पवार भी संशोधन का बात कह चुके हैं,जिसे देखते हुए यह लाजिमी हो गया है कि यह लड़ाई आगे तक जायेगी। इस क़ानून के दुरुपयोग के कई उदाहरण देखने-सुनने को मिलते रहे हैं,कुछ दिन पहले हरियाणा में आग वाली घटना का मामला आया था कि दबंगों ने झोपड़ी में आग लगाई है लेकिन जांच में मालूम चला कि उसने तो खुद लगाई थी, मीडिया में यह मामला इतना उछाला गया कि मुख्यमंत्री खट्टर को जाकर उस झूठे व्यक्ति को भी बिस्कुट खिलाना पड़ गया।

इन सब मामलात को देखते हुए मेरा मानना है कि इस क़ानून की प्रासंगिकता का समीक्षा करने का वक्त आ गया है,लेकिन अजीब विडंबना है कि मोदी इस क़ानून में हाल में ही संशोधन कर और कठिन बना दिए हैं।

अब वक्त आ गया है,इस जालिम क़ानून के खिलाफ मुहिम चलाने का, निर्णय आपके ऊपर है।

इस आंदोलन को लेकर बीबीसी हिंदी लिखता है,"इसमें कहीं-न-कहीं दलित विरोधी सुर है।'' अब कितना दोगलापन किया जाएगा,इन समाचार संस्थाओं द्वारा।(27 सितंबर,2016 को छपी खबर)

खैर,आपसभी अपने विवेक से निर्णय लें।

मराठा आंदोलन से बदलाव की उम्मीद की जा सकती है ?

अगर इस आंदोलन के तह में जाएं तो इसका जड़ कोपर्डी कांड में खोजा जा सकता है जो एक दुर्दांत घटना के लिए जाना जाता है - तीन दलितों द्वारा एक मराठा युवती का बलात्कार कर हत्या कर दिया गया था जिसकी उम्र मात्र चौदह साल थी।

धीरे-धीरे इस आंदोलन की मांगें बढ़ती गयी जिसमें कई जायज भी है - अनुसूचित जाति और जनजाति क़ानून में संशोधन करना,मराठा आरक्षण और बलात्कार कांड के दोषियों को सजा दिया जाए।

ऐसे तो मेरा रुख ओबीसी को मिलने वाली आरक्षण के विरोधी ही रहा है और कई मामलों में दलित आरक्षण विरोधी भी हो जाता है,कारण स्पष्ट है एक ओर समाज के कुछ वर्ग और जाति मामूली मेहनत कर सफलता की सीढ़ी चढ़ते जा रहे हैं तो दूसरी ओर अन्य समुदाय का विकास अवरोधित हो रहा है।
जिसे लेकर सामाजिक तनाव चरम पर पहुँच गया है और समाज तेजी से  बटता चला जा रहा है जिसे देखते हुए इस आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि आने वाला समय काफी चुनौतीपूर्ण रहने वाला है और हिंसा अवश्यंभावी होने वाला है ठीक उसी तरह जिसतरह हॉब्स ने लेवियाथम में बखूबी वर्णन किया है।

मराठा आंदोलन की ख़ास बात रही है कि इसका संबंध किसी सियासी दल से नहीं है और कहा जा रहा है कि यह नेतृत्वविहीन है। हालांकि वेबदुनिया अपने एक खबर में लिखा है,"  इसके लिए दो नाम सामने आ रहे हैं, एक धार्मिक नेता भय्यू महाराज और दूसरे राकांपा नेता शरद पवार।"

आरक्षण की वैशाखी के बदौलत जब ये लोग अपनी सफलता की नींव रखते हैं और गैर-आरक्षण प्राप्त समुदायों का एहसानमंद न होकर धौंस जमाने लगते हैं तो विरोध के स्वर गूंजेंगे ही।

अभी अन्य समुदाय ब्राह्मण,राजपूत,भूमिहार,लाला आदि शांत हैं,जब ये अपनी गौरवमयी आवाज को बुलंद करेंगे तो आरक्षण के पैरोकारी करने वाले किस तरह बचाव में तर्क देते हैं,देखने लायक होगा।

मराठा आंदोलन को एक शुरुआत के रूप में  देखा जाना चाहिए क्योंकि भारत में काफी अर्से बाद इसतरह के आंदोलन गरिमा को बनाये रखने तथा अपने भविष्य की चिंता को लेकर उपजा है।

अभी तो यह महाराष्ट्र में ही पैर पसार रहा है,लेकिन अब इसे अपना नाम बदलकर पूरे भारत के लोगों और संगठनो को अपने समर्थन में करने का प्रयास करना चाहिए जिसके हित एक जैसे हों,तभी हरकिस्म के बदलाव को धरातल पर उतारा जा सकेगा।

बीबीसी हिंदी के लिए जुबैर अहमद अंग्रेजी के मशहूर कवि विलियम वर्ड्सवर्थ का हवाला देकर लिखते हैं," फ्रांस की क्रांति के दौरान ज़िंदा रहना ही काफी था लेकिन यदि आप युवा हैं तो ये बहुत खुशी की बात थी।"