Monday, 24 October 2016

भागवत के विजयादशमी भाषण का समीक्षा -

1925 में नागपुर में विजयादशमी के दिन ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा किये जाने बाद यह कई मुकाम हासिल कर चुका है और अन्य कई हासिल किया जाना बाकी है।
विजयादशमी का इसीकारण संघ के लिए एक ख़ास महत्व है और प्रत्येक साल संघ द्वारा इस दिन एक विशेष कार्यक्रमों का आयोजन नागपुर में किया जाता रहा है। जाहिर है विजयादशमी का दिन संघ के उस चुनिंदा उत्सवों में भी शुमार है जो नियमित रूप से आयोजित होते रहे हैं।
इसी उपलक्ष्य में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आज के अपने भाषण में कई महत्वपूर्ण बात कहे जो काफी रोचक और ज्वलंत है। अबतक लोगों को समझ आ ही गया होगा कि हिंदुत्व ऊंचाई पर है और सामाजिक समरसता अपना पाँव तेजी से फैला रहा है जो केवल संघ के बदौलत ही संभव हो पाया है।
मोहन भागवत ने कहा, " कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है। मीरपुर, मुजफ्फ़राबाद, गिलगित और बल्तिस्तान सहित सारा कश्मीर भारत का है। ये बात जो वक्तव्यों में कही जा रही है वो क्रियान्वयन में भी वैसी ही उतरनी चाहिए।"
(अर्थात संघ आज भी अपने अखंड भारत की कल्पना पर कायम है जो आज के भाषण में उपर्युक्त कथन से झलक रहा है।)
इन्होंने आगे कहा,"कश्मीर में उपद्रवियों को उकसाने का काम सीमा पार से होता है। हमारे शासन ने उनको अच्छा जवाब दिया है। इससे उपद्रवी को संकेत मिला कि सहन करने की भी एक मर्यादा होती है।"
(इससे स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान भाजपा-नीत केंद्र सरकार के कार्य पर मुहर लग चुका है,मोदी को पूरे जोश और उत्साह के साथ अपने कामों को पूरा करने में लग जाना चाहिये।)
भागवत ने कहा कि, "भारत में संघ-राज्य व्यवस्था है. प्रांतीय दल अपने हित के लिए काम करें, लेकिन देश की एकता और विकास के काम में योगदान करें। विवादों के चलते जनता एक दूसरे के विरोध में खड़ी नहीं होनी चाहिए। देश हित को सबसे आगे रखकर राजनीतिक दलों को काम करना चाहिए। हमें ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे समाज में विभाजन पैदा हो।"
(सामाजिक समरसता लाने का इससे उम्दा सोच क्या हो सकता है ? अगर आपके पास है तो जरूर बताएं नहीं तो संघ का साथ देने में ही भलाई है।)
मोहन भागवत ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि, "शिक्षा ठीक करने की ज़रूरत है। शिक्षा का स्वरूप, उसका प्रयोजन स्पष्ट होना चाहिए। उन्होंने ये भी कहा कि समाज जागरुक हो, प्रबुद्ध हो तो शासन की नीतियां सफल होती हैं।"
(शिक्षा किसी भी समाज का मार्गदर्शक होता है अगर इसे सुदृढ़ नहीं किया गया तो भविष्य का समाज गर्त में गिर सकता है जिसतरह इतिहास लेखन का नमूना आज हमारे सामने है उसे नए सिरे से लिखकर एक समावेशी इतिहास को पेश किये जाने की जरुरत है।)
"हमारा समाज विविध प्रकार का है. युगों से भारत विविधता में एकता का संकल्प लेकर चल रहा है। विदेशी कुप्रभावों से मुक्त होते हुए अपने विचारों के आधार पर युगानुकूल नीति का निर्माण करना चाहिए। अगर हम ऐसा कर सके तो सारी दुनिया को मार्ग दिखा सकेंगे।"
(जाहिर है यह बात वामपंथियों को सदबुद्धि देने के उद्देश्य से बतायी गयी होगी।)
मोहन भागवत ने कहा कि लेह और लद्दाख जैसे कश्मीर के कई हिस्से उपद्रवों से पूरी तरह मुक्त है। उपद्रव क्षेत्र में अशांति को खत्म करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर काम करना होगा। राज्य और केंद्र की नीति में समन्वय की ज़रूरत है।
(कुछ लोग इसका मतलब यह भी निकाल सकते हैं कि भागवत का कहना है कि जहाँ मुस्लिम आबादी ज्यादा है वहाँ अशांति है,अगर ऐसा सोच भी रहे होंगे तो बुराई क्या है ? यह मुमकीन है और लगभग कई जगहों पर ऐसा ही होता है।)
कश्मीर में सेना के काम की तारीफ़ करते हुए उन्होंने कहा, "हमारी सेना ने जो काम किया है उससे भारत देश की प्रतिष्ठा ऊंची हुई है। हमारे सामरिक बल, सीमा रक्षक और सूचना तंत्र मज़बूत होने चाहिए। कोई ठिलाई नहीं होनी चाहिए। उपद्रवियों से सख्ती से निपटना चाहिए। सीमा की चौकसी मज़बूती से होनी चाहिए।"
(सेना का हमेशा ढाढस बढाकर मनोबल ऊंचा रखने का प्रयास भी किया गया है जो राष्ट्रवादी सोच का मुख्य पहचान है।)
भागवत ने कहा कि प्रजातंत्र में जो सत्ता में नहीं रहते वो विरोधी रहते हैं। उनके विरोध का एक तरीका होता है। शासन की नीतियों की एक निगरानी होती है। प्रजातांत्रिक प्रक्रिया है।
(संघ का यहीं विचार इसे महान बनाता है कि संघ किस प्रकार सलीके से किये गए विरोध का भी आदर करता है।)