Wednesday, 26 October 2016

आरक्षण को लेकर मराठा आंदोलन - कहीं अधोगति को न पा जाए!

आरक्षण को लेकर सबसे ज्यादा नुकसान किसानों और ब्राह्मणों को हुआ है। 1990 के दशक के प्रारंभिक चरण में लगभग एक ही साथ दो हैरतअंगेज कर देने वाले फैसले लिए गए थे - पहला,आर्थिक उदारीकरण और दूसरा,ओबीसी आरक्षण।

एक ओर जहाँ आर्थिक उदारीकरण ने वैश्वीकरण को बढ़ावा दिया,जिससे भारतीय समाज की कई बुनियादी चीजें बदल गयी। आधुनिकता के नाम पर हमारा पश्चिमीकरण होने लगा,फलस्वरूप ब्राह्मणों के आय का मुख्य स्त्रोत 'कर्मकांड' जो मोक्ष प्राप्ति का एक माध्यम था,इसके जगह मोक्ष प्राप्ति के एक अन्य माध्यम 'ज्ञान-अर्जन' को ज्यादा तवज्जो दिया जाने लगा।

ब्राह्मणों पर इस कठिन विपदा पर आजतक उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना ध्यान देने की जरूरत थी। इसलिए इस बात को पक्के तरह से समझ लेना है कि अगर आप अपनी आवाज नहीं उठाएंगे तो कोई नहीं उठाएगा।

आज गहरी साजिश की जा रही है - आलम यह है कि एक ओर सफाई कर्मी में नौकरी के लिए फॉर्म जब सवर्ण द्वारा भरे जाते हैं तो दलित संगठन कोर्ट में केस कर देता है कि इसपर केवल हमारा अधिकार है,हम ही सदियों से करते आये हैं। वहीं दूसरी ओर कर्मकांड पर सुनियोजित तरीके से हमले किये जाते हैं कि यह शोषण का एक जरिया है। सवर्णों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है।

इससे नुकसान किसे हुआ?
एक ओर आरक्षण-प्राप्त जातियाँ दिन-प्रतिदिन तरक्की की सीढियां चढ़ते जा रहे हैं तो दुसरी ओर गैर-आरक्षण प्राप्त वर्ग हासिये पर तेजी से जा रहे हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो सवर्णों को तेजी से वंचित करने पर कार्य किया जा रहा है।

उदारीकरण के फलस्वरूप सेवा क्षेत्रक का जितना तेजी से विकास हुआ और प्राथमिक क्षेत्र का ह्रास,उस तेजी से समाज का किसान अपने को ढाल नहीं पाया और इनकी विकास अवरोधित होती गयी। कटे पर नमक छिड़कने जैसा यह तब हो जाता है जब समान आर्थिक स्थिति और सामाजिक स्थिति वाले व्यक्ति को सरकारी नौकरी तथा अन्य सरकारी लाभों में तवज्जो दे दी जाती है।

इसलिए सरकार को किसानी सुधारने और ब्राह्मण स्थिति सुधार के लिए व्यापक काम किये जाने जानिये,जो संभव नहीं दिखता।
इसलिए एक ही रास्ता बचता है कि आरक्षण की पद्धति का समीक्षा किया जाए और जल्द से जल्द आधार को आर्थिक बनाकर अन्य समुदाय और जातियों को शामिल करने का साहसी कदम उठाया जाए।

मराठा आंदोलन भी अपने को अपनी जाति या समुदाय तक सीमित कर लिया है,अगर यह अपनी संकीर्णता से बाहर न निकल पाया तो शायद इसका हश्र भी पटेल और जाटों के आंदोलन जैसा ही होगा।

मराठा आंदोलन को लेकर मैंने पहले दो आलेख लिखें हैं,चाहे तो दोबारा पढ़ सकते हैं।