Tuesday, 25 October 2016

लोकतंत्र का कोई विकल्प है क्या ?

ये सवाल अगर कोई मुझसे पूछे तो मैं कहूँगा - हमने अभी तक इसपर काम ही नहीं किया कि लोकतंत्र के विकल्प के रूप में किसी आधार को तैयार किया जाये।

कहने को तो भारत एक लोकतांत्रिक देश है लेकिन पॉलिटिकल साइंस की भाषा में "भारत लोकतांत्रिक देश नहीं बल्कि बनने की प्रक्रिया में है।"

कई विद्वान कहते नजर आते हैं कि लाख बुराईयों के बाद भी लोकतंत्र अन्य व्यवस्था से बेहतर है। इसमें मैं भी इत्तेफाक रखता हूँ लेकिन,किस लोकतंत्र में - उदारवादी लोकतंत्र,समाजवादी लोकतंत्र या बहुलवादी लोकतंत्र ?
सभी एक-दूसरे से बेहतर होने का दावा करते हैं।

भारत,जहाँ उदारवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था है। इसे मैं पश्चिम का नक़ल भर मानता हूँ। जिस तरह पश्चिम के देशों में यह आत्मसंदेह बलवती होता जा रहा है कि इतनी सफलता और तजुर्बा  के बाद लोकतंत्र भी कहीं भीड़तंत्र में न बदल जाये।

तो भारतीय लोकतंत्र को हम किस नजरिये से देखेंगे ? जिसे अभी तो लोकतंत्र का शैशव अवस्था ही पार करना है। जिस तरह अपराधिकरण और जातिकरण जैसे विकृत आयाम अपनी दायरा बढ़ा रहे हैं वो इसी बात की ओर ईशारा करते हैं कि संकट कहीं हावी न हो जाये।

अब इन सब प्रवृतियों को देखते हुए मेरा मानना है कि लोकतंत्र के किसी अन्य विकल्प के रूप में काम करना शुरू कर देना चाहिए जब यह अपने अधोगति को प्राप्त करे तो नए रूप से व्यवस्था को बनाये रखा जा सके।
नहीं तो हम इस सवाल का जवाब ढूंढें कि लोकतंत्र के प्रति हम इतने लापरवाह और अनभिज्ञ क्यों हैं ?

नहीं तो आने वाले दिनों में भारतीय समाज को हॉब्स के लेवियाथन में वर्णित समाज में परिवर्तित होते देर नहीं लगेगी,जब ऐसा हो गया तो हम एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाएंगे तब तो जीवन का कल्पना भी बेमानी होगी।

इससे निजात पाने का सबसे आसान और सुविधायुक्त रास्ता है - "भारतीय संविधान और भारतीय इतिहास का लेखन फिर से समकालीन और दूरदर्शी परिप्रेक्ष्य में किया जाये तभी जाकर काश्मीर,मणिपुर,वामपंथी उग्रवाद जैसे समस्याओं और आतंकवाद तथा तमाम प्रकार के शोषणों से मुक्ति लोगों को मिल पायेगी।"