Monday, 24 October 2016

नारी-शक्ति ?


         (पढ़ते समय ध्यान रखें कि यह कोई बौद्धिक पोस्ट नहीं है बल्कि व्यावहारिक रूप से लिखा हुआ समाज का आइना है। बौद्धिक स्तर पर नारीवादी परिप्रेक्ष्य को लेकर गहन विमर्श हो सकता है - पितृतंत्र(patriarchy),नारीवाद का उदारवादी,समाजवादी और रेडिकल अवधारणाएँ आदि जैसे कि नारीवादी स्वयं राजनीति है या राजनीति का एक माध्यम है,एक फ्रांसीसी लेखिका सीमोन दी ब्यूवाई द्वारा लिखा गया 'द सेकेंड सेक्स' का औचित्य आदि वैगरह-वगैरह। अभी हाल में भारत की एक अंग्रेजी लेखिका(नाम नहीं ले रहा क्योंकि मैं उनके प्रचार का माध्यम नहीं बनना चाहता) ने अपने उपन्यास के माध्यम से समझाने की कोशिश कर रही है कि पुरुष नारी के बिना अधुरा है। ऐसे ही कई नारीवादी स्त्री आवाज को बुलंद किये हुए हैं। खैर.... )

          आज नारीवादियों के बीच जो चर्चित मुद्दा है - आजादी!
           सुनने में तो बहुत ही अच्छा लगता है इसे मैं जे.के. रोलिंग के किताब हैरी पॉटर(अंतिम) के माध्यम से इसके महत्व को स्पष्ट करना चाहूँगा,"आपका मंत्रालय मजबूत है और मजबूत रहेगा,उनसभी को करारा जवाब दिया जाएगा जो आपकी आजादी आपसे छिनने का जरूरत की है।"

           पर बात जब नारियों पर आती है तो ये खुलकर कहते हैं - "हमें उस हरचीज से आजादी चाहिए जो जकड़ कर रखा हुआ है।" भारत के संबंध में कहीं इनका इशारा सामाजिक बंधन पर तो नहीं?

           परंतु जरा ध्यान दीजिए!
           जब आप किसी लड़की से बात करेंगे कि उसके लिए आजादी का मतलब क्या है?
           तो उनका जवाब आएगा - "कुछ भी पहनने की आजादी।"
            फिर अगर पूछेंगे कि क्या यह भारतीय संस्कृति के अनुकूल है?
            "इससे आपको क्या मतलब? मैं जो भी पहनूँ।"

            हाँ,मुझे तो वाकई कोई मतलब नहीं है,पर इतना ध्यान रहे कि आजादी के नाम पर पहनावा,शराब,सिगरेट,पार्टी और नित्यदिन बॉयफ्रेंड का मजे लेना,जश्न मनाने के बाद जब वास्तविक दुनिया पीछे रह जाती है तो कोई पूछने वाला भी नहीं होता कि कहाँ हो? जिंदगी भर हाउसवाइफ बनकर चारदीवारी में कैद हो जाना पड़ता है।(मैं का मतलब समाज समझा जाए)

            यहाँ यह मतलब नहीं निकाल लें कि मैं नारी-सशक्तिकरण का विरोधी हूँ लेकिन मेरे लिए इसके मायने बहुत ही अलग है। आप सशक्त हों हमसभी आपके साथ हैं पर सशक्तिकरण का मतलब तो समझना होगा कि इसका संबंध अच्छे नौकरी,अच्छे व्यवसाय,समाजसेवा,शिक्षिका,नेत्री बनकर काम करना है जिससे घर,परिवार और समाज भी सशक्त हो सके।
इससे अलग तो सशक्तिकरण का मतलब हमें नहीं आता।

           'आजादी' अपने आप में जितना स्वतंत्रता का बोध कराता है उतना ही प्रतिबंधित भी करता है। प्राकृतिक बंधन सभी के लिए है चाहे वह पुरुष हो या नारी। कोई पुरुष मातृत्व संबंधी कोई काम नहीं कर सकता और महिलाओं पर भी यहीं लागू होता है। जैसे - युद्ध लड़ना।
           आप अपनी काबिलियत से जोड़कर इसे नहीं देख लें! मान लेते हैं अगर कोई महिला जवान युद्धकाल में शत्रु देश के हाथ लग जाए तो उसके साथ क्या सलूक होगा सभी जानते हैं। जो राष्ट्रीय शर्म का प्रतिक अंतर्राष्टरीय स्तर पर हो सकता है। यह व्यावहारिक बातें है जिसे सभी नारीवादियों को स्वीकार करना चाहिए और यह एक प्राकृतिक सच्चाई भी है कि महिला आक्रमण करने वाली नहीं होती बल्कि पुरुष आक्रमण करते हैं।(ओशो)

          अगर आप थोड़ा सा भी विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि महिलाओं द्वारा इस्तेमाल की गयी आजादी का जितना नाजायज इस्तेमाल इनके द्वारा किया गया है वो किसी पुरुष द्वारा नहीं किया गया। आज पूरे दिल्ली में कहीं भी कोई ऐसी लड़की नहीं मिलेगी जिसके बदन पर ओढ़नी हो। यह बदलते समाज की आहट है लेकिन मुझे यह आधुनिकता तो नहीं बल्कि पश्चमीकरण का नतीजा और प्रतिविंब दिख रहा है।

           इसलिए मैं कुछ हद व्यक्ति के ऊपर सामाजिक बंधन का समर्थन करता हूँ। यह सामजिक बंधन का ही नतीजा है कि वैवाहिक और पारिवारिक जीवन का सुख व्यक्ति भोगता रहा है। जहाँ भी यह बंधन(दबाव) कमजोर पड़ा है शादियाँ टूटते देर नहीं लगी है परिवार जैसी संस्था अपने अधोगति को प्राप्त हुई नजर आयी है।

           हाल में ही एक वामपंथी नेत्री ने 'फ्री सेक्स' का बात कर समाज में नयी बहस पैदा कर थी। क्या आप(नारी) आजादी का मतलब यहीं तो नहीं समझ रहे?

           भारतीय समाज एक ऐसा समाज का नमूना है जिसमें 'शादी' स्वतः सभी को 'सेक्स' का लाइसेंस दे देता है। यहीं तो महानता है और नैतिकता का पराकाष्ठा है। इसलिए किसी भी महिला या पुरुष को किसी के द्वारा गुमराह होने की जरुरत नहीं है क्योंकि JNU का एक मामला आपके सामने है जो वामपंथ का गढ़ समझा जाता है - हुआ यूँ कि लेफ्ट छात्रसंघ का एक नेता अपने ही कैडर के एक नेत्री से नशे का दवा खिलाकर बलात्कार करता है जब इस लड़की को यह बात मालूम चलती है तो वो पुलिस के पास चली जाती है। जाना भी चाहिए क्योंकि उसकी गरिमा को धक्का जो लगा पर अब आप तो इनकी हकीकत समझ ही गए होंगे।