Monday, 24 October 2016

हर मोर्चे पर हिंदी में पिछड़ापन -

जब हम गहन विमर्श विषयों जैसे - समाजशास्त्र,राजनीतिशास्त्र आदि के क्षेत्र में उतरते हैं तो हिंदी भाषियों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हमें मालूम पड़ता है कि हिंदी में भाषा और ज्ञान-परंपरा के लिहाज से हम उतने वैभवशाली नहीं है,मसलन इनमें पर्युक्त होने वाले सैद्धांतिक और मानकीय शब्दावली हमारे पास है ही नहीं।

CSDS जैसी संस्था हिंदी में भी समाजशास्त्रीय विकास के कई गंभीर प्रयास किये हैं,इसके द्वारा अन्य बाधाओं की ओर ध्यान जो आकृष्ट कराया गया है,वह है -

इसमें पहला है,समाजशास्त्र की रचनाएँ पढ़ने के पाठकीय अभ्यास की कमी।

अखबारी लेखन पढ़ते रहने के कारण पाठक सीधे-सरल और छोटे वाक्य पढ़ने का इस कदर अभ्यस्त हो चुका है कि लंबे और जटिल वाक्य सामने आते ही उसकी शिकायत होती है कि भारी लेखन है।

यह मुझे सही भी लगता है क्योंकि हमने अभी तक कई महीनों के लिए हिंदुस्तान,जनसत्ता,दैनिक जागरण(राष्ट्रीय),द हिन्दू,इंडियन एक्सप्रेस,इंडिया टूडे,आउटलुक,चौथी दुनिया,पांचजन्य,जनमत आदि जैसे पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ा है जो कहीं-न-कहीं कई मामलों में लेफ्ट,राईट,लिबरल या प्रोग्रेसिव सेंट्रिक लगती रही है। कभी-कभी नेताओं के बयानों को तवज्जो देकर भाषा का स्तर गली के टपोरी जैसा कर दिया जाता है।

और दूसरा है,शब्दों के अर्थ को लेकर उभरी गलतफहमियाँ।

जैसे धर्मनिरपेक्ष,जातिवादी गोलबंदी,जातीय गोलबंदी,द्विज,गैर-द्विज,सवर्ण आदि जैसे शब्दों का वास्तविक अर्थ को हम समझना ही नहीं चाहते। अभी हाल में 'फ्री सेक्स' शब्द भी विवादों का विषय रहा,कई लोग गूगल सर्च कर अपने तरीके से इसके मतलब को परिभाषित करते रहे।

आज हिंदी में भी अंग्रेजी के शब्द इतने प्रचलित हो गए हैं कि उसके मूल अर्थ को हिंदी में लिखा जाए तो अधिकांश के समझ के बाहर रहता है। तुलनात्मक राजनीति पढ़ते समय ऐसे ही मुझे कई शब्द मिले जैसे रूपावाली,सरूपात्मक,अनुकरणात्मक,अधोगति विश्लेषण,प्रतिमान,अनुसंधान अभिकल्प आदि को समझने में काफी वक्त लग गए;वहीं इसके अंग्रेजी आसानी से समझ आ सका।

इस समस्या से निपटान के लिए हिंदी भाषा के जानकारों को राजनीतिशास्त्र,समाजशास्त्र,दर्शनशास्त्र और मानवशास्त्र आदि के विद्वानों के साथ मिलकर सरल और समझने योग्य 'शब्दावली' का विकास कर जनमानस तक पहुंचाने का प्रयास करना चाहिये।

प्रसंगवश मुझे याद आता है - जब मैं राजनीतिक समाजीकरण,सामाजिक राजनीतिकरण,अभिजात्य वर्ग(elite) का सिद्धांत,अल्पसंख्यक लौह नियम(iron law of oligarchy) को पढ़ रहा था तो शशि सिंह द्वारा लिखित किताब 'राजनीतिक समाजशास्त्र' और एस पी वर्मा का 'आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत' में कोई अंतर नहीं दिखा। मैं यह नहीं समझ पाया कि कौन किसका नक़ल है या दोनों किसी विदेशी लेखक का नक़ल या अनुवाद है ?
हालांकि एस पी वर्मा के लिए मेरे मन में काफी श्रद्धा है और मैं इनकी विद्वता पर सवाल नहीं उठा रहा।

दूसरे और स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो हिंदी में शोध कार्य और आगे का भविष्य काफी चुनौतीपूर्ण है। इसकारण अंग्रेजी को अछूत समझने का भूल नहीं करना चाहिए बल्कि आज के दौर को देखते हुए थोड़ा दूरदर्शी बनकर अंग्रेजी का समझदारी विकसित करने का प्रयास हर हिंदीभाषी को करना चाहिए,इसी में भलाई है।