Monday, 24 October 2016

नारी-शक्ति-2? आई एम अ बीच(I AM A BITCH) -

         ( समाज का एक विचित्र चरित्र देखने को मिलता है - अधिकाँश गालियाँ केवल महिला केंद्रित है,आखिर क्यों? पुरुष केंद्रित क्यों नहीं?)
         (इन चार शब्दों को कोई भी व्यक्तिगत नहीं लें,यह 'नारी-शक्ति -2' का एक हिस्सा भर है,इसके पहले के आलेख को आप पढ़ ही चुके हैं।)

         विवेक अग्निहोत्री का फिल्म 'बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम' जो खासा विवादों में रहा और विश्वविद्यालयों में इसके मंचन को लेकर लेफ्ट संगठनों द्वारा काफी विरोध भी झेलना पड़ा था।

         इस फिल्म की शुरुआत इसी वाक्य 'आई एम अ बीच' से होती है जो धीरे-धीरे गाने का शक्ल ले लेता है जिसमें बहुत से छात्र-छात्राएं देर रात पार्टी में जश्न मनाते रहते हैं। सिगरेट और शराब के नशे से इनका होश खो जाता है और लड़कियाँ ब्रा में ही डांस करने लगती है। कुछ ही समय बाद एक ऐसा संगठन आ जाता है जो इनसभी का विरोध करता है और लड़कियों की तस्वीरों को खींच लेता है। परंतु इनके लिए यह सब शर्म की बात नहीं और लोक-लज्जा को छोड़कर 'पिंक ब्रा कैम्पेन' की शुरुआत सोशल मीडिया पर कर देते हैं जिसकी लोकप्रियता कुछ ही समय में बढ़ जाती है।

         इतना लिखने का मकसद केवल यह बताना था कि 'नारी-शक्ति' के नाम पर न जाने किस हद तक महिलायें उतर आयी हैं। वास्तव में यह फिल्म एक ख़ास विचारधारा को लेकर फिल्माया गया है कि किसतरह का प्रोपेगैंडा इनके द्वारा अपनाया जाता है,कुल मिलाकर जिसका सार है कि नक्सली और माओवादी कहीं भी हो सकते हैं जिनका एक नेटवर्क काम कर रहा है,वह आपका प्रोफ़ेसर,फ्रेंड,नौकर,चपरासी और यहाँ तक की आपकी मासूका भी हो सकती है। ऐसी फिल्म बार-बार नहीं आती इसलिए सभी को देखना चाहिए।

         आज तेजी से यह धारणा भी फैलती जा रही है कि 'नारी-सशक्तिकरण' का मतलब 'अंग-प्रदर्शन' भी है। ऐसी ही धारण का परिणाम है कि भारत में एक विदेशी पोर्न स्टार को महिलाओं के सशक्तिकरण पर बोलने के लिए आमंत्रित किया जाता है जिसके पेशे को देखते हुए मुंबई में किराए का मकान भी नहीं मिला था।(नाम तो समझ ही गए होंगे? ताज्जूब तब होता है जब फिल्मों में इन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है,ये महिला भारतीय समाज को क्या संदेश देगी?)

         कल्पना कीजिये - अगर कोई दूसरे ग्रह का कोई जीव धरती पर आता है और देखता है कि अश्लील साहित्यों,अश्लील वीडियो और नग्न तस्वीरों में यहाँ के लोग इतने मशगूल हैं तो क्या सोचेगा?
ओशो लिखते हैं,"एक समय था जब हम किसी स्त्री का पैर का अंगूठा भर देख लेते थे तो हमारी कामवासना तेजी से बढ़ने लगती थी लेकिन आज ऐसा समय आ गया कि पूरा बदन देख लेने के बाद भी अपने पर अंकुश लगा लेते हैं।"
फिर आगे सवाल उठाते हैं - अगर किसी चौराहे पर किसी नग्न महिला का तस्वीर लगा दिया जाए तो कौन देखने जाएगा ?(इसका जवाब तो आप भी खोज लेंगे)

          समाज का एक विचित्र चरित्र देखने को मिलता है - अधिकाँश गालियाँ केवल महिला केंद्रित है,आखिर क्यों? पुरुष केंद्रित क्यों नहीं?

          कभी सोचा है आपने?
          कहीं इसका कारण पितृसत्तात्मक समाज तो नहीं रहा है?
          या जिस तरह समाज में कुछ अवधारणाएं स्वतः पनप जाती है ये गालियाँ भी इसी का परिणाम तो नहीं?(इससे आपसभी महिलाएं मुझे पुरुषवादी सोच का समर्थक नहीं समझ लें)

           कल के आलेख में मैंने एक वाक्य लिखा था - ''महिलाएं सेक्सुअली किसी पर आक्रमण नहीं कर सकती,ये आक्रमण होने वाली होती है,यह प्राकृतिक व्यवस्था है कि पुरुष ही सेक्सुअली आक्रमणकारी होता है अगर अपवाद को छोड़ दिया जाए तो।''
(एक विदेशी लेखक ने महिलाओं की तुलना सेक्स के समय कष्ट सहने के संदर्भ में किया है और पुरुष का कष्ट देने वाला,हालांकि भारत में इस किताब को मनमोहन सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया। क्या भारतीय संस्कृति ऐसी है? - बेशक नहीं! तो क्या हम उस व्यवस्था में जाना चाहते हैं जिसमें सेक्स को कष्ट देने वाला और सहने वाला के रूप में वर्णित किया जाए? - सभी का जवाब नहीं ही होगा। पर यह भारत का दुर्भाग्य ही है कि कुछ वामपंथी संगठनों और समाचार पत्रों ने इसे भी 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन' और 'बौद्धिक असहिष्णुता' से जोड़ा।)

           अगर हम इसे सत्य मानें तो महिला केंद्रित गालियाँ पितृसत्तात्मक समाज का परिणाम नहीं हो सकती।(आपमें से किसी के पास इससे जुदा विचार है तो जरूर बताएं।) यह उस मनोदशा का परिणाम है जो सदियों से विकसित होता रहा है,ठीक उसीतरह जिस तरह कई अनकही मान्यताएं स्वतः ही समाज में अपना जड़ जमा लेती है।(आजकल लोग कुतर्क करके आप पर कुछ भी लांछन लगा देते हैं,इसलिए मैं इस बात से अवगत करा दूँ कि मैं पितृसत्तात्मक समाज का समर्थन नहीं कर रहा हूँ।)

           एक बार फिर कल्पना कीजिये - जब मनुष्य अपना सामाजिक जीवन शुरू नहीं किया होगा। उससमय व्यक्ति की क्या हालात रही होगी,न समाज का फिक्र और न ही परिवार का। इस दशा का वर्णन अलग-अलग तरीकों से कई दार्शनिकों ने किया है। व्यक्तिवाद का जनक हॉब्स इसे अपने किताब लेवियाथान में अलग रूप की कल्पना करते हैं जिनके विचारों को लॉक और रूसो द्वारा आगे बढ़ाकर सभ्य समाज और संवैधानिक समाज के रूप में संकल्पना प्रस्तुत किये गए हैं। वहीं रॉल्स इस तरह की समाज की कल्पना एक ऐसे 'अज्ञानता के परदा' के रूप में किये हैं जहाँ व्यक्ति की संवेदना शून्य होती है और इसी के माध्यम से अपनी न्याय का सिद्धांत देकर 'न्याय की संकल्पना' को नयी ऊंचाई पर पहुँचा दिए।(1971 में अपनी किताब 'द थ्योरी ऑफ़ जस्टिस' में)

          अब तक आप कल्पना कर लिए होंगे - मैंने विश्लेषण करते हुए पाया कि आज के समाज का जो रूप हम देख रहे हैं,आज जो परिवार,घर,शादी और समाज का संस्थानीकरण हो गया है,कभी ऐसा भी वक्त होगा जब इनसभी की सचेतना व्यक्ति के पास नहीं होगी।

          चाहे वह पुरुष हो या कोई महिला। एक महिला के लिए पुरुष का महत्व उतना ही रहा होगा जितना कि एक पुरुष के लिए महिला को। उससमय सेक्सुअली आक्रमणकारी वाली छवि का विकास पुरुष में नहीं हुआ होगा और एक स्त्री भी अपने को पुरुषों के बराबर समझती होगी।

          पर कलांतर में स्थितियाँ तेजी से बदली होगी। प्रत्येक स्त्री के दिल और दिमाग में वर्तमान समाज की मनोदशा जैसी विचारें घर करने लगी होगी कि हमारी सृष्टि ही इस दुनिया में एक विशेष कार्य(मातृत्व संबंधी और अन्य) को संपन्न करने के लिए हुयी है। यह विचार जो स्वतः महिलाओं के अंदर उत्पन्न हुई है,जिसने पूरे सामाजिक व्यवस्था को स्थायित्व प्रदान किया और एक ऐसी शक्ल दी जिससे पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं को भी और यहाँ तक की पूरे समाज को आंतरिक खुशी से भर दिया।

          पर आज स्थिति बहुत ही विचित्र हो चली है। नारीवादियों का एक अवधारणा जिसे रेडिकल(आमूल-परिवर्तनवादी) कहा जाता है इस पूरी बनी-बनायी व्यवस्था को तोड़ देने पर उतारू है और कई तरह के हथकंडे अपना रहा है। यह रेडिकल ग्रुप सशक्तिकरण का बात सच्चे अर्थों में न करके महिलाओं में विकृत मानसिकता पैदा कर सामाजिक बनावट को ही तोड़ने को लालायित है। जिसमें एक 'अंग-प्रदर्शन' को खासा तवज्जो दिया जा रहा है। बॉलीवुड की एक फिल्म 'की एंड का' को आदर्श मानकर चल रहा है जिसमें एक पुरुष सारे घरेलू काम को करता है। यहीं वह वजह है जिसके चलते एक पोर्न स्टार को नारी-सशक्तिकरण पर बोलने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है। जो बहुत ही खतरनाक साजिस की ओर इशारा कर रहा है।

           इसलिए 'आई एम अ बीच' की जो अवधारणा अभी कुछेक महिलाओं के मन में विकसित हो गयी है,उससे दूर हटने की जरुरत है। वास्तविक रूप से सशक्त होने की जरुरत है और साथ ही किसी से गुमराह होने की भी जरुरत नहीं है।

         "ध्यान रहे आप इस पूरे विश्व की वर्तमान,भूत और भविष्य तीनों हैं क्योंकि आपसब महिलाओं(माताओं) से ही सृष्टि अपना कदम आगे की ओर बढ़ाता है।"