Saturday, 29 October 2016

संवैधानिक हिन्दू राष्ट्र

प्रारंभ में पूरे पोस्ट का सार दिया गया है,व्याख्या के लिए नीचे 'व्याख्या और विश्लेषण" से पढ़े।
         "एक ऐसा व्यक्ति जो नास्तिक है,वह धर्म के मर्म को कैसे समझ सकता है? आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वह नैतिकता के सारे उसूलों को तिलांजलि दे देता है।
         अगर समाज के पूरे लोग नास्तिक हो जाएं,उनके मन में किसी धर्म के लिए कोई इज्जत नहीं हो तो निश्चित रूप से एक नैतिकताविहीन समाज का निर्माण हो जाएगा और ऐसे समाज का भविष्य क्या होगा,इससे हमसभी अवगत हैं।
           यहीं अवधारणा राज्य के संबंध में सेकुलर संकल्पना को लेकर लागू होती है। एक धर्म-निरपेक्ष राज्य व्यापक अर्थों में एक नास्तिक व्यक्ति के तुल्य हो जाता है।
           जब कोई राज्य केवल सेकुलर बनकर रह जाता है तो उसके आधार में किसी किस्म का आध्यात्मिक आवेश नहीं रहता,इस स्थिति में उसकी(राज्य) अमानवीय प्रवृतियाँ उभरने लगती है। आजादी के बाद भारतीय राज्य अधिकाँश वर्षों तक इसी अंदेशे से गुजरा है,लेकिन शताब्दी के वर्षों में एक विशिष्ट धार्मिक पहचान लिए दल सत्ता में आयी तो इस अमानवीय प्रवृति के बढ़ोतरी को कुछ हद तक अंकुश लगा और 2014 के बाद तो पूर्ण रूप से।
           आपसभी को याद होगा कि कितने दंगे राज्य प्रायोजित रहे हैं,यह सब जानते हैं कि राज्य झूठ बोलने में उस्ताद होता है,इसलिए दंगों के साजिश को छुपा लिया जाता है। सिख दंगों के संदर्भ में अगर समझने का प्रयास करेंगे तो आसानी होगी।
           "रजनी कोठारी के शब्दों में भारतीय राज्य न समाज को मुक्ति देने की दिशा में ले जा पाया और न ही सेकुलर रह पाया। कुल मिलाकर गंभीर संकट का शिकार हो गया है।"
            इनसब प्रवृतियों को देखते हुए मेरा मानना है कि राज्य का एक धार्मिक चरित्र होना ही चाहिए। विश्व में इस्लामिक राज्यों की स्थिति को  देखते हुए भारत इस्लामिक राज्य कभी नहीं बनेगा,जिसके दुष्परिणाम हम नित्यदिन देखते रहते हैं।
             इसलिए भारत के लिए एक 'संवैधानिक हिन्दू राष्ट्र' का चरित्र ही उचित लगता है। हिंदुओं की सहिष्णुता और क्षमाशीलता को देखते हुए तथा इनकी एक ख़ास विशेषता कि केवल हिन्दू ही अपने दुश्मनों के साथ सामंजस्य बनाकर रहे हैं,इसकारण हिन्दू चरित्र देना ही उपयुक्त होगा।
             तब भारत में राज्य प्रायोजित दंगे होने की संभावना काफी कम हो जायेगी क्योंकि जब राज्य का एक हिन्दू आध्यात्मिक चरित्र होगा तो दंगे होने के बाद ये सवाल जरूर उपजेंगे कि क्या आपका धर्म यहीं सिखाता है,यहीं आपके राज्य का चरित्र है जो दमनकारी है?
              ऐसे तीखे सवाल को देखकर कोई भी हिचकेगा लेकिन सेकुलर चरित्र में ऐसा नहीं है क्योंकि राज्य के लिए कोई जवाबदेही है - धर्म को लेकर,नैतिकता को लेकर और मानवीय मूल्यों को लेकर।"
व्याख्या और विश्लेषण -
         भारतीय संस्कृति में नास्तिकता भी एक व्यापक अवधारणा है,इसी को आधार बनाकर कई दर्शन फले-फूले हैं,लेकिन अंततः वे आस्तिकता की ओर अग्रसर हो गए।
          जिस 'संवैधानिक हिन्दू राष्ट्र' के सिद्धांत का विकास करने का प्रयास मैं कर रहा हूँ,इसमें नास्तिकता का संदर्भ व्यापक अर्थों में लिया गया है।
          मैं इसबात पर सहमति जताता हूँ कि नास्तिक व्यक्ति तर्क को ज्यादा तवज्जो देता है और आस्तिकता के आधारों(धार्मिक साहित्य,ईश्वर,धर्म) को नकार देता है।
          यहीं वह मर्म है जिसे समझने की जरुरत है।
         "ईमानदारी एक अच्छी नीति है।"
          एक तार्किक व्यक्ति इसपर सवाल उठाएगा - "कैसे?"
          "झूठ बोलना पाप है।"
           फिर वहीं सवाल - "क्यों?"
          "बड़ों का आदर करना चाहिए।"
          "नहीं करूँगा तो क्या हो जाएगा।"
          "असहायों का सेवा करना चाहिए।"
          "पर क्यों?"
           उपर्युक्त बातें ऐसी है जिसका कैसे और क्यों के संदर्भ में कोई भी जवाब नहीं दिया जा सकता।
           यह वास्तव में एक कल्पित और भविष्य में मिलने वाली परिणामों पर आधारित है,जो एक ईश्वरीय सत्ता की ओर इशारा करता है,काल्पनिक ही सही,लेकिन लोगों के मन में यह भाव बना रहता है कि हमारे बुरे और अच्छे कर्मों का कोई अवलोकन कर रहा है।
           यहीं भाव विश्वास का जन्म देता है,एक अदृश्य शक्ति में;जिससे ही आस्तिकता के गुणों का विकास होता है और समाज में धार्मिक चरित्र स्थापित होता है।
           एक आस्तिक व्यक्ति ही ऊपर दिए गए सार्वभौमिक कथनों पर अदृश्य शक्ति से अवलोकित होने के कारण,आँख मूँदकर विश्वास करता है।
           जो एक नास्तिक व्यक्ति नहीं कर सकता क्योंकि सार्वभौमिक मान्यता पर उसका तर्क हावी हो जाता है और नैतिकता के सारे उसूलों का धज्जियाँ उड़ा देता है। इसे अवलोकित(observed) होने का कोई डर नहीं होता।
           यहीं वह कारण है कि एक नास्तिक व्यक्ति नैतिकताविहीन हो जाता है,जब समाज में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ने लगती है तो समाज का हश्र भी वहीं हो जाता है।
           "तो क्या तर्क करना गलत है?"
           "नहीं।"
           पर इसकी सीमा है,तर्क सार्वभौमिक बातों पर नहीं की जाती,नैतिकता के माध्यम से प्राप्त सारे उसूल सार्वभौमिक हैं। तर्क केवल स्थापित होने वाले सिद्धांतों पर ही किया जाना चाहिए क्योंकि उसे स्थापित होने में कई बुनियादी बदलाव होने बाकी है। अब इसपर क्या तर्क किया जा सकता है कि 'ईमानदारी एक अच्छी नीति है',फिर अगर कोई तर्क के नाम पर बुरी नीति बताएगा तो कुतर्क ही कहा जाएगा। जिसका कोई मतलब नहीं।
          "क्या आस्तिक व्यक्ति तार्किक नहीं होता?"
          "ऐसा किसने कह दिया? होता है।"
           पर इसके तर्क के मायने अलग होते हैं,यहीं तर्क के मूल नियमों को समझता है,यह तर्क करते समय दूसरे की भावनाओं को समझता है और सार्वभौमिक बातों पर अंगुली नहीं उठाता।
           "ये सार्वभौमिक बातें क्या है?"
           "यहीं तो नैतिकता द्वारा मंथन(गहन विमर्श) से प्राप्त होता है।"
          
           "अब ये नैतिकता क्या है भला।"
           "यह एक ऐसी सिद्धांत है जिसके आधार पर अच्छे और बुरे तथा सही और गलत में फर्क किया जाता है।"
           "जैसे?"
           "ईमानदारी और बेईमानी;आदर और अनादर;सत्य और झूठ आदि में से एक बेहतरीन को नैतिकता के सिद्धांतों पर ही अपनाया जाता है।"
           जाहिर सी बात है,एक आस्तिक व्यक्ति पहले शब्द को ज्यादा तवज्जो देगा और वहीं नास्तिक पहले शब्द पर सवाल उठाएगा और यहाँ तक कि दूसरे पर भी,लेकिन उसे जहाँ ज्यादा लाभ की प्राप्ति होगी उसे स्वीकार कर लेगा। यह माना हुआ तथ्य है कि गलत रास्ते ज्यादा लाभ अर्जित कराने वाले होते हैं,इसलिए एक नास्तिक व्यक्ति दूसरे शब्दों को अपनाएगा,जिससे नैतिकता के गलत आदर्श स्थापित होंगे और 'सार्वभौमिक बातें' दुनिया से कोसों दूर चली जायेगी।
          
            अब तक का व्याख्या यह प्रमाणित करने के लिए काफी हो गया है कि
            "एक व्यक्ति जो नास्तिक है,तर्क को ज्यादा तवज्जो देगा,जिसकारण धर्म के मर्म को समझ नहीं पाएगा और नैतिकता के सारे उसूलों(सार्वभौमिक बातों) को तिलांजलि दे देगा।"
            "धर्म और अध्यात्म"
            धार्मिक मत का स्थापना कैसे होता है? इसका वर्णन तो मैं ऊपर कर चुका हूँ,लेकिन एक सवाल कि क्या केवल धार्मिक व्यक्ति ही अध्यात्म का अनुभव कर सकता है? अगर हाँ,तो नास्तिक क्यों नहीं?
            "बिल्कुल।"
             एक धार्मिक व्यक्ति ही अध्यात्म का अनुभव कर सकता है। कइयों द्वारा इसपर सवाल उठाया जा सकता है,लेकिन आपको ध्यान रखना होगा कि मैंने इसे निरपेक्ष(absolute) नहीं माना है,बल्कि सापेक्षता(relativity, comperativly) की दृष्टि से देख रहा हूँ। आत्मा,मन,हृदय,मष्तिष्क आदि पर नियंत्रण का प्रयास कुल मिलाकर एक धार्मिक और आस्तिक अवधारणा है।
             एक आस्तिक व्यक्ति जिसका पहले से ही रुझान एक अदृश्य शक्ति में रहता है,वह 'अपने को' आसानी से थोड़े ही प्रयासों में जान लेगा। आखिर अपने को जानना ही तो अध्यात्म है। अपनी आत्मा,मष्तिष्क आदि पर नियंत्रण करना ही तो अध्यात्म है।
             इसलिए एक नास्तिक व्यक्ति बिना आत्मा(अदृश्य शक्ति,कल्पना) पर विश्वास किये अध्यात्म का अनुभव कर ही नहीं सकता,इसलिए नास्तिकता और अध्यात्मिकता का कोई संबंध नहीं हो सकता,हालाँकि कुछ अपवाद हो सकते हैं,लेकिन ये अपवाद भी बेबुनियाद हैं क्योंकि अध्यात्म का अनुभव करते हुए उसमें आस्तिक मतों का विकास हो चुके होते हैं।
             "क्या सेकुलर नास्तिक-तुल्य हैं?"
             "बिल्कुल।"
             क्योंकि सेकुलर मत किसी भी धर्म के मर्म और उसके सिद्धांतों को बढ़ावा नहीं देता,उसके लिए नैतिकता और सार्वभौमिक बातों का कोई मतलब नहीं रह जाता क्योंकि इसके केंद्र में धार्मिक मत न रहने के कारण आध्यात्मिक आवेश नहीं पनप पाता इसमें भी नास्तिकों की तरह अमानवीय प्रवृतियाँ उभरने लगती है।
             "हिंदू।"
             यह एक व्यापक अवधारणा है,यह एक जाति, प्रजाति,राष्ट्रीयता,धर्म आदि सबकुछ है।"
             यह हिंदुत्व के माध्यम से एक ऐसा व्यवस्था स्थापित करेगा जिसमें कोई भेदभाव और किसी भी तरह की असामानता नहीं होगी,कोई जाति नहीं कोई ऊंचा या नीचा नहीं।
             अगर एक 'हिन्दू राष्ट्र' स्थापित हो गया तो उसका रूप किसी के पूछने से इसप्रकार उजागर होगा।
             "आपकी जाति क्या है?"
             "हिंदू।"
             "आपकी प्रजाति क्या है?"
             "हिन्दू।"
             "आपकी राष्ट्रीयता क्या है?"
             "हिन्दू।''
             "आपका धर्म क्या है?"
             "हिन्दू।"
              इसलिए राष्ट्रीयता के अर्थों में एक नास्तिक भी हिन्दू है और धर्म के दृष्टि से मुसलमान और ईसाई भी हिन्दू है।
बशर्ते उसे 'हिंदुत्व' के सिद्धांतों को मानना होगा और इसमें अपना विश्वास जताना होगा। यहीं हिंदुत्व तो नैतिकता के उसूलों पर कसा हुआ 'सार्वभौमिक बातों' के माध्यम से हमें जीवन का रास्ता सिखाता है।
             यहीं हिन्दू लोग हैं जिसकी सहिष्णुता और क्षमाशीलता विश्व-विख्यात है,पूरी दुनिया में इकलौता यहीं वे लोग हैं जो अपने दुश्मनों के साथ भी रहे हैं/रहते हैं,इसीकारण भारत को सेकुलर चरित्र छोड़कर एक 'हिन्दू राष्ट्र' की छवि को अपनाना चाहिए। भारत राष्ट्र-राज्य को अपनी अमानवीय चरित्र से निपटारा दिलाने का 'हिन्दू राष्ट्र' का विकल्प ही अच्छा है। तभी आध्यात्मिक आवेश विकसित होगा और समरसता आयेगी।
              इस 'हिन्दू राष्ट्र' की संकल्पना को संवैधानिक बनाना जरूरी है ताकि वैधता प्राप्त हो सके,यह वैधता यहाँ के हिंदुओं(राष्ट्रीयता) से प्राप्त होगी जो अपने सहभागिता के जरिये स्थापित करेंगे।

Wednesday, 26 October 2016

आरक्षण को लेकर मराठा आंदोलन - कहीं अधोगति को न पा जाए!

आरक्षण को लेकर सबसे ज्यादा नुकसान किसानों और ब्राह्मणों को हुआ है। 1990 के दशक के प्रारंभिक चरण में लगभग एक ही साथ दो हैरतअंगेज कर देने वाले फैसले लिए गए थे - पहला,आर्थिक उदारीकरण और दूसरा,ओबीसी आरक्षण।

एक ओर जहाँ आर्थिक उदारीकरण ने वैश्वीकरण को बढ़ावा दिया,जिससे भारतीय समाज की कई बुनियादी चीजें बदल गयी। आधुनिकता के नाम पर हमारा पश्चिमीकरण होने लगा,फलस्वरूप ब्राह्मणों के आय का मुख्य स्त्रोत 'कर्मकांड' जो मोक्ष प्राप्ति का एक माध्यम था,इसके जगह मोक्ष प्राप्ति के एक अन्य माध्यम 'ज्ञान-अर्जन' को ज्यादा तवज्जो दिया जाने लगा।

ब्राह्मणों पर इस कठिन विपदा पर आजतक उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना ध्यान देने की जरूरत थी। इसलिए इस बात को पक्के तरह से समझ लेना है कि अगर आप अपनी आवाज नहीं उठाएंगे तो कोई नहीं उठाएगा।

आज गहरी साजिश की जा रही है - आलम यह है कि एक ओर सफाई कर्मी में नौकरी के लिए फॉर्म जब सवर्ण द्वारा भरे जाते हैं तो दलित संगठन कोर्ट में केस कर देता है कि इसपर केवल हमारा अधिकार है,हम ही सदियों से करते आये हैं। वहीं दूसरी ओर कर्मकांड पर सुनियोजित तरीके से हमले किये जाते हैं कि यह शोषण का एक जरिया है। सवर्णों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है।

इससे नुकसान किसे हुआ?
एक ओर आरक्षण-प्राप्त जातियाँ दिन-प्रतिदिन तरक्की की सीढियां चढ़ते जा रहे हैं तो दुसरी ओर गैर-आरक्षण प्राप्त वर्ग हासिये पर तेजी से जा रहे हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो सवर्णों को तेजी से वंचित करने पर कार्य किया जा रहा है।

उदारीकरण के फलस्वरूप सेवा क्षेत्रक का जितना तेजी से विकास हुआ और प्राथमिक क्षेत्र का ह्रास,उस तेजी से समाज का किसान अपने को ढाल नहीं पाया और इनकी विकास अवरोधित होती गयी। कटे पर नमक छिड़कने जैसा यह तब हो जाता है जब समान आर्थिक स्थिति और सामाजिक स्थिति वाले व्यक्ति को सरकारी नौकरी तथा अन्य सरकारी लाभों में तवज्जो दे दी जाती है।

इसलिए सरकार को किसानी सुधारने और ब्राह्मण स्थिति सुधार के लिए व्यापक काम किये जाने जानिये,जो संभव नहीं दिखता।
इसलिए एक ही रास्ता बचता है कि आरक्षण की पद्धति का समीक्षा किया जाए और जल्द से जल्द आधार को आर्थिक बनाकर अन्य समुदाय और जातियों को शामिल करने का साहसी कदम उठाया जाए।

मराठा आंदोलन भी अपने को अपनी जाति या समुदाय तक सीमित कर लिया है,अगर यह अपनी संकीर्णता से बाहर न निकल पाया तो शायद इसका हश्र भी पटेल और जाटों के आंदोलन जैसा ही होगा।

मराठा आंदोलन को लेकर मैंने पहले दो आलेख लिखें हैं,चाहे तो दोबारा पढ़ सकते हैं।

Tuesday, 25 October 2016

लोकतंत्र का कोई विकल्प है क्या ?

ये सवाल अगर कोई मुझसे पूछे तो मैं कहूँगा - हमने अभी तक इसपर काम ही नहीं किया कि लोकतंत्र के विकल्प के रूप में किसी आधार को तैयार किया जाये।

कहने को तो भारत एक लोकतांत्रिक देश है लेकिन पॉलिटिकल साइंस की भाषा में "भारत लोकतांत्रिक देश नहीं बल्कि बनने की प्रक्रिया में है।"

कई विद्वान कहते नजर आते हैं कि लाख बुराईयों के बाद भी लोकतंत्र अन्य व्यवस्था से बेहतर है। इसमें मैं भी इत्तेफाक रखता हूँ लेकिन,किस लोकतंत्र में - उदारवादी लोकतंत्र,समाजवादी लोकतंत्र या बहुलवादी लोकतंत्र ?
सभी एक-दूसरे से बेहतर होने का दावा करते हैं।

भारत,जहाँ उदारवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था है। इसे मैं पश्चिम का नक़ल भर मानता हूँ। जिस तरह पश्चिम के देशों में यह आत्मसंदेह बलवती होता जा रहा है कि इतनी सफलता और तजुर्बा  के बाद लोकतंत्र भी कहीं भीड़तंत्र में न बदल जाये।

तो भारतीय लोकतंत्र को हम किस नजरिये से देखेंगे ? जिसे अभी तो लोकतंत्र का शैशव अवस्था ही पार करना है। जिस तरह अपराधिकरण और जातिकरण जैसे विकृत आयाम अपनी दायरा बढ़ा रहे हैं वो इसी बात की ओर ईशारा करते हैं कि संकट कहीं हावी न हो जाये।

अब इन सब प्रवृतियों को देखते हुए मेरा मानना है कि लोकतंत्र के किसी अन्य विकल्प के रूप में काम करना शुरू कर देना चाहिए जब यह अपने अधोगति को प्राप्त करे तो नए रूप से व्यवस्था को बनाये रखा जा सके।
नहीं तो हम इस सवाल का जवाब ढूंढें कि लोकतंत्र के प्रति हम इतने लापरवाह और अनभिज्ञ क्यों हैं ?

नहीं तो आने वाले दिनों में भारतीय समाज को हॉब्स के लेवियाथन में वर्णित समाज में परिवर्तित होते देर नहीं लगेगी,जब ऐसा हो गया तो हम एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाएंगे तब तो जीवन का कल्पना भी बेमानी होगी।

इससे निजात पाने का सबसे आसान और सुविधायुक्त रास्ता है - "भारतीय संविधान और भारतीय इतिहास का लेखन फिर से समकालीन और दूरदर्शी परिप्रेक्ष्य में किया जाये तभी जाकर काश्मीर,मणिपुर,वामपंथी उग्रवाद जैसे समस्याओं और आतंकवाद तथा तमाम प्रकार के शोषणों से मुक्ति लोगों को मिल पायेगी।"

Monday, 24 October 2016

भागवत के विजयादशमी भाषण का समीक्षा -

1925 में नागपुर में विजयादशमी के दिन ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा किये जाने बाद यह कई मुकाम हासिल कर चुका है और अन्य कई हासिल किया जाना बाकी है।
विजयादशमी का इसीकारण संघ के लिए एक ख़ास महत्व है और प्रत्येक साल संघ द्वारा इस दिन एक विशेष कार्यक्रमों का आयोजन नागपुर में किया जाता रहा है। जाहिर है विजयादशमी का दिन संघ के उस चुनिंदा उत्सवों में भी शुमार है जो नियमित रूप से आयोजित होते रहे हैं।
इसी उपलक्ष्य में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आज के अपने भाषण में कई महत्वपूर्ण बात कहे जो काफी रोचक और ज्वलंत है। अबतक लोगों को समझ आ ही गया होगा कि हिंदुत्व ऊंचाई पर है और सामाजिक समरसता अपना पाँव तेजी से फैला रहा है जो केवल संघ के बदौलत ही संभव हो पाया है।
मोहन भागवत ने कहा, " कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है। मीरपुर, मुजफ्फ़राबाद, गिलगित और बल्तिस्तान सहित सारा कश्मीर भारत का है। ये बात जो वक्तव्यों में कही जा रही है वो क्रियान्वयन में भी वैसी ही उतरनी चाहिए।"
(अर्थात संघ आज भी अपने अखंड भारत की कल्पना पर कायम है जो आज के भाषण में उपर्युक्त कथन से झलक रहा है।)
इन्होंने आगे कहा,"कश्मीर में उपद्रवियों को उकसाने का काम सीमा पार से होता है। हमारे शासन ने उनको अच्छा जवाब दिया है। इससे उपद्रवी को संकेत मिला कि सहन करने की भी एक मर्यादा होती है।"
(इससे स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान भाजपा-नीत केंद्र सरकार के कार्य पर मुहर लग चुका है,मोदी को पूरे जोश और उत्साह के साथ अपने कामों को पूरा करने में लग जाना चाहिये।)
भागवत ने कहा कि, "भारत में संघ-राज्य व्यवस्था है. प्रांतीय दल अपने हित के लिए काम करें, लेकिन देश की एकता और विकास के काम में योगदान करें। विवादों के चलते जनता एक दूसरे के विरोध में खड़ी नहीं होनी चाहिए। देश हित को सबसे आगे रखकर राजनीतिक दलों को काम करना चाहिए। हमें ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे समाज में विभाजन पैदा हो।"
(सामाजिक समरसता लाने का इससे उम्दा सोच क्या हो सकता है ? अगर आपके पास है तो जरूर बताएं नहीं तो संघ का साथ देने में ही भलाई है।)
मोहन भागवत ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि, "शिक्षा ठीक करने की ज़रूरत है। शिक्षा का स्वरूप, उसका प्रयोजन स्पष्ट होना चाहिए। उन्होंने ये भी कहा कि समाज जागरुक हो, प्रबुद्ध हो तो शासन की नीतियां सफल होती हैं।"
(शिक्षा किसी भी समाज का मार्गदर्शक होता है अगर इसे सुदृढ़ नहीं किया गया तो भविष्य का समाज गर्त में गिर सकता है जिसतरह इतिहास लेखन का नमूना आज हमारे सामने है उसे नए सिरे से लिखकर एक समावेशी इतिहास को पेश किये जाने की जरुरत है।)
"हमारा समाज विविध प्रकार का है. युगों से भारत विविधता में एकता का संकल्प लेकर चल रहा है। विदेशी कुप्रभावों से मुक्त होते हुए अपने विचारों के आधार पर युगानुकूल नीति का निर्माण करना चाहिए। अगर हम ऐसा कर सके तो सारी दुनिया को मार्ग दिखा सकेंगे।"
(जाहिर है यह बात वामपंथियों को सदबुद्धि देने के उद्देश्य से बतायी गयी होगी।)
मोहन भागवत ने कहा कि लेह और लद्दाख जैसे कश्मीर के कई हिस्से उपद्रवों से पूरी तरह मुक्त है। उपद्रव क्षेत्र में अशांति को खत्म करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर काम करना होगा। राज्य और केंद्र की नीति में समन्वय की ज़रूरत है।
(कुछ लोग इसका मतलब यह भी निकाल सकते हैं कि भागवत का कहना है कि जहाँ मुस्लिम आबादी ज्यादा है वहाँ अशांति है,अगर ऐसा सोच भी रहे होंगे तो बुराई क्या है ? यह मुमकीन है और लगभग कई जगहों पर ऐसा ही होता है।)
कश्मीर में सेना के काम की तारीफ़ करते हुए उन्होंने कहा, "हमारी सेना ने जो काम किया है उससे भारत देश की प्रतिष्ठा ऊंची हुई है। हमारे सामरिक बल, सीमा रक्षक और सूचना तंत्र मज़बूत होने चाहिए। कोई ठिलाई नहीं होनी चाहिए। उपद्रवियों से सख्ती से निपटना चाहिए। सीमा की चौकसी मज़बूती से होनी चाहिए।"
(सेना का हमेशा ढाढस बढाकर मनोबल ऊंचा रखने का प्रयास भी किया गया है जो राष्ट्रवादी सोच का मुख्य पहचान है।)
भागवत ने कहा कि प्रजातंत्र में जो सत्ता में नहीं रहते वो विरोधी रहते हैं। उनके विरोध का एक तरीका होता है। शासन की नीतियों की एक निगरानी होती है। प्रजातांत्रिक प्रक्रिया है।
(संघ का यहीं विचार इसे महान बनाता है कि संघ किस प्रकार सलीके से किये गए विरोध का भी आदर करता है।)

हर मोर्चे पर हिंदी में पिछड़ापन -

जब हम गहन विमर्श विषयों जैसे - समाजशास्त्र,राजनीतिशास्त्र आदि के क्षेत्र में उतरते हैं तो हिंदी भाषियों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हमें मालूम पड़ता है कि हिंदी में भाषा और ज्ञान-परंपरा के लिहाज से हम उतने वैभवशाली नहीं है,मसलन इनमें पर्युक्त होने वाले सैद्धांतिक और मानकीय शब्दावली हमारे पास है ही नहीं।

CSDS जैसी संस्था हिंदी में भी समाजशास्त्रीय विकास के कई गंभीर प्रयास किये हैं,इसके द्वारा अन्य बाधाओं की ओर ध्यान जो आकृष्ट कराया गया है,वह है -

इसमें पहला है,समाजशास्त्र की रचनाएँ पढ़ने के पाठकीय अभ्यास की कमी।

अखबारी लेखन पढ़ते रहने के कारण पाठक सीधे-सरल और छोटे वाक्य पढ़ने का इस कदर अभ्यस्त हो चुका है कि लंबे और जटिल वाक्य सामने आते ही उसकी शिकायत होती है कि भारी लेखन है।

यह मुझे सही भी लगता है क्योंकि हमने अभी तक कई महीनों के लिए हिंदुस्तान,जनसत्ता,दैनिक जागरण(राष्ट्रीय),द हिन्दू,इंडियन एक्सप्रेस,इंडिया टूडे,आउटलुक,चौथी दुनिया,पांचजन्य,जनमत आदि जैसे पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ा है जो कहीं-न-कहीं कई मामलों में लेफ्ट,राईट,लिबरल या प्रोग्रेसिव सेंट्रिक लगती रही है। कभी-कभी नेताओं के बयानों को तवज्जो देकर भाषा का स्तर गली के टपोरी जैसा कर दिया जाता है।

और दूसरा है,शब्दों के अर्थ को लेकर उभरी गलतफहमियाँ।

जैसे धर्मनिरपेक्ष,जातिवादी गोलबंदी,जातीय गोलबंदी,द्विज,गैर-द्विज,सवर्ण आदि जैसे शब्दों का वास्तविक अर्थ को हम समझना ही नहीं चाहते। अभी हाल में 'फ्री सेक्स' शब्द भी विवादों का विषय रहा,कई लोग गूगल सर्च कर अपने तरीके से इसके मतलब को परिभाषित करते रहे।

आज हिंदी में भी अंग्रेजी के शब्द इतने प्रचलित हो गए हैं कि उसके मूल अर्थ को हिंदी में लिखा जाए तो अधिकांश के समझ के बाहर रहता है। तुलनात्मक राजनीति पढ़ते समय ऐसे ही मुझे कई शब्द मिले जैसे रूपावाली,सरूपात्मक,अनुकरणात्मक,अधोगति विश्लेषण,प्रतिमान,अनुसंधान अभिकल्प आदि को समझने में काफी वक्त लग गए;वहीं इसके अंग्रेजी आसानी से समझ आ सका।

इस समस्या से निपटान के लिए हिंदी भाषा के जानकारों को राजनीतिशास्त्र,समाजशास्त्र,दर्शनशास्त्र और मानवशास्त्र आदि के विद्वानों के साथ मिलकर सरल और समझने योग्य 'शब्दावली' का विकास कर जनमानस तक पहुंचाने का प्रयास करना चाहिये।

प्रसंगवश मुझे याद आता है - जब मैं राजनीतिक समाजीकरण,सामाजिक राजनीतिकरण,अभिजात्य वर्ग(elite) का सिद्धांत,अल्पसंख्यक लौह नियम(iron law of oligarchy) को पढ़ रहा था तो शशि सिंह द्वारा लिखित किताब 'राजनीतिक समाजशास्त्र' और एस पी वर्मा का 'आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत' में कोई अंतर नहीं दिखा। मैं यह नहीं समझ पाया कि कौन किसका नक़ल है या दोनों किसी विदेशी लेखक का नक़ल या अनुवाद है ?
हालांकि एस पी वर्मा के लिए मेरे मन में काफी श्रद्धा है और मैं इनकी विद्वता पर सवाल नहीं उठा रहा।

दूसरे और स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो हिंदी में शोध कार्य और आगे का भविष्य काफी चुनौतीपूर्ण है। इसकारण अंग्रेजी को अछूत समझने का भूल नहीं करना चाहिए बल्कि आज के दौर को देखते हुए थोड़ा दूरदर्शी बनकर अंग्रेजी का समझदारी विकसित करने का प्रयास हर हिंदीभाषी को करना चाहिए,इसी में भलाई है।

मराठा आंदोलन से बदलाव की उम्मीद की जा सकती है ?

कोपर्डी कांड - जब तीन दलितों ने एक 14 वर्षीय लड़की का बलात्कार और हत्या कर दिया -

यह घटना इन दिनों 'कोपर्डी कांड' के नाम से विख्यात हो गया है,ऐसे तो इसे हुए दो महीने से ज्यादा हो गए लेकिन इनदिनों महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में 'पूना मराठा मोर्चा' के तहत मराठा वर्चस्व के लिए आंदोलन खड़ा कर दिया गया है। जाहिर है,क्योंकि लड़की मराठा समुदाय की थी।

जैसे ही आंदोलन उठा, उसी दिन यानी 23 सितंबर को दलितों ने भी आंदोलन का मंसूबा बांध लिया, इसे कहते हैं चोरी और फिर ऊपर से धौंस। यह सरासर गलती निकम्मे राजनेताओं की है जो वोट बैंक के लालच में सर पर चढ़ाकर बैठे हैं। यहाँ मैं अवगत करा दूँ कि मेरी मंशा दलित विरोध की नहीं बल्कि गलती करने वाले को सजा दिलाने के संबंध में है,जब मामला नारी सम्मान की हो तो पक्ष में आंदोलन क्यों ? हालांकि खबर है कि इसे रद्द कर दिया गया है,वजह जो भी हो एक कुलबुलाहट तो है ही।

इस मराठा मोर्चा में 3 लाख से अधिक लोग जमा हुए और प्रदर्शन किए और कई मांगें रखी। उनमें से एक है - अनुसूचित जाति और जनजाति क़ानून अधिनियम,1989 का दुरुपयोग रोका जाए क्योंकि पीड़िता के परिवार के खिलाफ इस क़ानून के तहत मुकदमा करने की धमकी दी गयी थी।(इण्डिया टूडे,5 अक्टूबर,2016 के अंक में पेज 44 पर लिखे गए किरण तारे के आलेख के अनुसार)

इस क़ानून को लेकर मनसे प्रमुख राज ठाकरे का भी बयान आया कि इसे पूरी तरह निकाल फेकने की जरुरत है और मराठा नेता शरद पवार भी संशोधन का बात कह चुके हैं,जिसे देखते हुए यह लाजिमी हो गया है कि यह लड़ाई आगे तक जायेगी। इस क़ानून के दुरुपयोग के कई उदाहरण देखने-सुनने को मिलते रहे हैं,कुछ दिन पहले हरियाणा में आग वाली घटना का मामला आया था कि दबंगों ने झोपड़ी में आग लगाई है लेकिन जांच में मालूम चला कि उसने तो खुद लगाई थी, मीडिया में यह मामला इतना उछाला गया कि मुख्यमंत्री खट्टर को जाकर उस झूठे व्यक्ति को भी बिस्कुट खिलाना पड़ गया।

इन सब मामलात को देखते हुए मेरा मानना है कि इस क़ानून की प्रासंगिकता का समीक्षा करने का वक्त आ गया है,लेकिन अजीब विडंबना है कि मोदी इस क़ानून में हाल में ही संशोधन कर और कठिन बना दिए हैं।

अब वक्त आ गया है,इस जालिम क़ानून के खिलाफ मुहिम चलाने का, निर्णय आपके ऊपर है।

इस आंदोलन को लेकर बीबीसी हिंदी लिखता है,"इसमें कहीं-न-कहीं दलित विरोधी सुर है।'' अब कितना दोगलापन किया जाएगा,इन समाचार संस्थाओं द्वारा।(27 सितंबर,2016 को छपी खबर)

खैर,आपसभी अपने विवेक से निर्णय लें।

मराठा आंदोलन से बदलाव की उम्मीद की जा सकती है ?

अगर इस आंदोलन के तह में जाएं तो इसका जड़ कोपर्डी कांड में खोजा जा सकता है जो एक दुर्दांत घटना के लिए जाना जाता है - तीन दलितों द्वारा एक मराठा युवती का बलात्कार कर हत्या कर दिया गया था जिसकी उम्र मात्र चौदह साल थी।

धीरे-धीरे इस आंदोलन की मांगें बढ़ती गयी जिसमें कई जायज भी है - अनुसूचित जाति और जनजाति क़ानून में संशोधन करना,मराठा आरक्षण और बलात्कार कांड के दोषियों को सजा दिया जाए।

ऐसे तो मेरा रुख ओबीसी को मिलने वाली आरक्षण के विरोधी ही रहा है और कई मामलों में दलित आरक्षण विरोधी भी हो जाता है,कारण स्पष्ट है एक ओर समाज के कुछ वर्ग और जाति मामूली मेहनत कर सफलता की सीढ़ी चढ़ते जा रहे हैं तो दूसरी ओर अन्य समुदाय का विकास अवरोधित हो रहा है।
जिसे लेकर सामाजिक तनाव चरम पर पहुँच गया है और समाज तेजी से  बटता चला जा रहा है जिसे देखते हुए इस आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि आने वाला समय काफी चुनौतीपूर्ण रहने वाला है और हिंसा अवश्यंभावी होने वाला है ठीक उसी तरह जिसतरह हॉब्स ने लेवियाथम में बखूबी वर्णन किया है।

मराठा आंदोलन की ख़ास बात रही है कि इसका संबंध किसी सियासी दल से नहीं है और कहा जा रहा है कि यह नेतृत्वविहीन है। हालांकि वेबदुनिया अपने एक खबर में लिखा है,"  इसके लिए दो नाम सामने आ रहे हैं, एक धार्मिक नेता भय्यू महाराज और दूसरे राकांपा नेता शरद पवार।"

आरक्षण की वैशाखी के बदौलत जब ये लोग अपनी सफलता की नींव रखते हैं और गैर-आरक्षण प्राप्त समुदायों का एहसानमंद न होकर धौंस जमाने लगते हैं तो विरोध के स्वर गूंजेंगे ही।

अभी अन्य समुदाय ब्राह्मण,राजपूत,भूमिहार,लाला आदि शांत हैं,जब ये अपनी गौरवमयी आवाज को बुलंद करेंगे तो आरक्षण के पैरोकारी करने वाले किस तरह बचाव में तर्क देते हैं,देखने लायक होगा।

मराठा आंदोलन को एक शुरुआत के रूप में  देखा जाना चाहिए क्योंकि भारत में काफी अर्से बाद इसतरह के आंदोलन गरिमा को बनाये रखने तथा अपने भविष्य की चिंता को लेकर उपजा है।

अभी तो यह महाराष्ट्र में ही पैर पसार रहा है,लेकिन अब इसे अपना नाम बदलकर पूरे भारत के लोगों और संगठनो को अपने समर्थन में करने का प्रयास करना चाहिए जिसके हित एक जैसे हों,तभी हरकिस्म के बदलाव को धरातल पर उतारा जा सकेगा।

बीबीसी हिंदी के लिए जुबैर अहमद अंग्रेजी के मशहूर कवि विलियम वर्ड्सवर्थ का हवाला देकर लिखते हैं," फ्रांस की क्रांति के दौरान ज़िंदा रहना ही काफी था लेकिन यदि आप युवा हैं तो ये बहुत खुशी की बात थी।"

क्या कोई ऐसा विचार नहीं हो सकता जो भारत भूमि के अनुकूल हो ?

आपको याद है कि अभी हाल में कोई ऐसा विचारधारा पूरी दुनिया में कहीं भी आया है जो तहालका मचा दिया हो ? शायद नहीं ! एक दौर था औद्योगिक क्रांति के बाद का। एक के बाद एक कई विचारधारायें और आदर्श नियमित अंतराल पर आते रहे। उदारवाद अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच ही पाया था कि इसकी कई खामियाँ उजागर हो गयी जिसकी भरपाई की पूर्ति करने की कोशिश मार्क्स ने मार्क्सवाद का सिद्धांत देकर की। लेकिन बहुत जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि समानता का जोरदार वकालत करने वाला मार्क्सवाद व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा को ही मटियामेट कर दिया। उदारवाद के साथ भी हम कुछ ऐसा ही देख चुके हैं कि कैसे स्वतंत्रता के आदर्श को लेकर चलते समय समानता बाधित होती रही।

फिर इन सब को दूर करने के पश्चिम में कई उपाय किये गये लेकिन नतीजा ज्यों का त्यों रहा चाहे वो फासीवाद हो या संघवाद या श्रेणी समाजवाद। एक समय तो संशोधनवाद काफी लोकप्रिय होने लगा था पर परिणाम बिल्कुल ही वैसा रहा।

पर भारत के लिए यह दुर्भाग्य का काल रहा कि कोई भी विचारक ऐसा न कर पाया। पूरी दुनिया तो दूर भारत के परिप्रेक्ष्य में भी किसी को सफलता न मिल पायी।

आखिर क्यों ?

एक समय में लग रहा था कि गांधीवाद इस रिक्त स्थान को भरने का कोशिश करेगा लेकिन व्यावाहारिकता में तो गांधीजी के आदर्शों को गांधी जैसा संत ही निभा सकता है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अनशन पर बैठने के दो-तीन दिन के दौरान ही लोग सोचने लगते हैं कि कोई आकार गिलास में भरे जूस को पिलाकर अनशन तोड़वाये। पर गांधीवाद के सफलता को नजरअंदाज तो नहीं कर सकते क्योंकि आज भी यह कई अच्छे परिणाम लेकर आता है।

क्यों का जवाब आप सोचिये कि कमी कहाँ है ?
हम 'समाज और व्यक्ति' तथा 'समाज और राज्य' के संबंधों जैसे गूढ़ प्रश्नों को सोचने के काबिल ही नहीं हैं या बने बनाये सिद्धांतों को ही मानकर नक़ल करने की हमारी आदत हो गयी है ?

पर अंत में एक बात जरूर कहना चाहूँगा कि भारत में एक जमात पूरे जोर-शोर से कार्लमार्क्स के सिद्धांतों को लागू करने का बात करता है लेकिन इतना जरूर सोचना चाहिए कि देश और काल दोनों ही दृष्टियों से यह इतना बदल गया है कि इन विश्लेषणों को तोते की तरह रटकर,आँख मूँदकर भारत पर लागू करें तो यह साईंटिफिक अथवा विवेकपूर्ण दृष्टि नहीं कहा जाएगा। यह रूढ़िवादिता होगी। जो अपने देश की रूढ़ियों को मिटाकर सुधार का दावा करें,वे विदेश के रूढ़ियों का गुलाम बन जाये, यह तो आश्चर्य की विषय होगी।

इसलिए हमसभी भारतवासियों को एक ऐसी विचारधारा के खोज में लग जाना चाहिए जो भारत के माहौल के अनुरूप हो और यहाँ के लोगों पर सटीक बैठे ताकि अपनी स्वतंत्रता,समानता,गरिमा आदि को बनाये रख सकें तथा अपने पारंपरिक आदर्श पर भी कायम रहे।

नारी-शक्ति-2? आई एम अ बीच(I AM A BITCH) -

         ( समाज का एक विचित्र चरित्र देखने को मिलता है - अधिकाँश गालियाँ केवल महिला केंद्रित है,आखिर क्यों? पुरुष केंद्रित क्यों नहीं?)
         (इन चार शब्दों को कोई भी व्यक्तिगत नहीं लें,यह 'नारी-शक्ति -2' का एक हिस्सा भर है,इसके पहले के आलेख को आप पढ़ ही चुके हैं।)

         विवेक अग्निहोत्री का फिल्म 'बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम' जो खासा विवादों में रहा और विश्वविद्यालयों में इसके मंचन को लेकर लेफ्ट संगठनों द्वारा काफी विरोध भी झेलना पड़ा था।

         इस फिल्म की शुरुआत इसी वाक्य 'आई एम अ बीच' से होती है जो धीरे-धीरे गाने का शक्ल ले लेता है जिसमें बहुत से छात्र-छात्राएं देर रात पार्टी में जश्न मनाते रहते हैं। सिगरेट और शराब के नशे से इनका होश खो जाता है और लड़कियाँ ब्रा में ही डांस करने लगती है। कुछ ही समय बाद एक ऐसा संगठन आ जाता है जो इनसभी का विरोध करता है और लड़कियों की तस्वीरों को खींच लेता है। परंतु इनके लिए यह सब शर्म की बात नहीं और लोक-लज्जा को छोड़कर 'पिंक ब्रा कैम्पेन' की शुरुआत सोशल मीडिया पर कर देते हैं जिसकी लोकप्रियता कुछ ही समय में बढ़ जाती है।

         इतना लिखने का मकसद केवल यह बताना था कि 'नारी-शक्ति' के नाम पर न जाने किस हद तक महिलायें उतर आयी हैं। वास्तव में यह फिल्म एक ख़ास विचारधारा को लेकर फिल्माया गया है कि किसतरह का प्रोपेगैंडा इनके द्वारा अपनाया जाता है,कुल मिलाकर जिसका सार है कि नक्सली और माओवादी कहीं भी हो सकते हैं जिनका एक नेटवर्क काम कर रहा है,वह आपका प्रोफ़ेसर,फ्रेंड,नौकर,चपरासी और यहाँ तक की आपकी मासूका भी हो सकती है। ऐसी फिल्म बार-बार नहीं आती इसलिए सभी को देखना चाहिए।

         आज तेजी से यह धारणा भी फैलती जा रही है कि 'नारी-सशक्तिकरण' का मतलब 'अंग-प्रदर्शन' भी है। ऐसी ही धारण का परिणाम है कि भारत में एक विदेशी पोर्न स्टार को महिलाओं के सशक्तिकरण पर बोलने के लिए आमंत्रित किया जाता है जिसके पेशे को देखते हुए मुंबई में किराए का मकान भी नहीं मिला था।(नाम तो समझ ही गए होंगे? ताज्जूब तब होता है जब फिल्मों में इन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है,ये महिला भारतीय समाज को क्या संदेश देगी?)

         कल्पना कीजिये - अगर कोई दूसरे ग्रह का कोई जीव धरती पर आता है और देखता है कि अश्लील साहित्यों,अश्लील वीडियो और नग्न तस्वीरों में यहाँ के लोग इतने मशगूल हैं तो क्या सोचेगा?
ओशो लिखते हैं,"एक समय था जब हम किसी स्त्री का पैर का अंगूठा भर देख लेते थे तो हमारी कामवासना तेजी से बढ़ने लगती थी लेकिन आज ऐसा समय आ गया कि पूरा बदन देख लेने के बाद भी अपने पर अंकुश लगा लेते हैं।"
फिर आगे सवाल उठाते हैं - अगर किसी चौराहे पर किसी नग्न महिला का तस्वीर लगा दिया जाए तो कौन देखने जाएगा ?(इसका जवाब तो आप भी खोज लेंगे)

          समाज का एक विचित्र चरित्र देखने को मिलता है - अधिकाँश गालियाँ केवल महिला केंद्रित है,आखिर क्यों? पुरुष केंद्रित क्यों नहीं?

          कभी सोचा है आपने?
          कहीं इसका कारण पितृसत्तात्मक समाज तो नहीं रहा है?
          या जिस तरह समाज में कुछ अवधारणाएं स्वतः पनप जाती है ये गालियाँ भी इसी का परिणाम तो नहीं?(इससे आपसभी महिलाएं मुझे पुरुषवादी सोच का समर्थक नहीं समझ लें)

           कल के आलेख में मैंने एक वाक्य लिखा था - ''महिलाएं सेक्सुअली किसी पर आक्रमण नहीं कर सकती,ये आक्रमण होने वाली होती है,यह प्राकृतिक व्यवस्था है कि पुरुष ही सेक्सुअली आक्रमणकारी होता है अगर अपवाद को छोड़ दिया जाए तो।''
(एक विदेशी लेखक ने महिलाओं की तुलना सेक्स के समय कष्ट सहने के संदर्भ में किया है और पुरुष का कष्ट देने वाला,हालांकि भारत में इस किताब को मनमोहन सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया। क्या भारतीय संस्कृति ऐसी है? - बेशक नहीं! तो क्या हम उस व्यवस्था में जाना चाहते हैं जिसमें सेक्स को कष्ट देने वाला और सहने वाला के रूप में वर्णित किया जाए? - सभी का जवाब नहीं ही होगा। पर यह भारत का दुर्भाग्य ही है कि कुछ वामपंथी संगठनों और समाचार पत्रों ने इसे भी 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन' और 'बौद्धिक असहिष्णुता' से जोड़ा।)

           अगर हम इसे सत्य मानें तो महिला केंद्रित गालियाँ पितृसत्तात्मक समाज का परिणाम नहीं हो सकती।(आपमें से किसी के पास इससे जुदा विचार है तो जरूर बताएं।) यह उस मनोदशा का परिणाम है जो सदियों से विकसित होता रहा है,ठीक उसीतरह जिस तरह कई अनकही मान्यताएं स्वतः ही समाज में अपना जड़ जमा लेती है।(आजकल लोग कुतर्क करके आप पर कुछ भी लांछन लगा देते हैं,इसलिए मैं इस बात से अवगत करा दूँ कि मैं पितृसत्तात्मक समाज का समर्थन नहीं कर रहा हूँ।)

           एक बार फिर कल्पना कीजिये - जब मनुष्य अपना सामाजिक जीवन शुरू नहीं किया होगा। उससमय व्यक्ति की क्या हालात रही होगी,न समाज का फिक्र और न ही परिवार का। इस दशा का वर्णन अलग-अलग तरीकों से कई दार्शनिकों ने किया है। व्यक्तिवाद का जनक हॉब्स इसे अपने किताब लेवियाथान में अलग रूप की कल्पना करते हैं जिनके विचारों को लॉक और रूसो द्वारा आगे बढ़ाकर सभ्य समाज और संवैधानिक समाज के रूप में संकल्पना प्रस्तुत किये गए हैं। वहीं रॉल्स इस तरह की समाज की कल्पना एक ऐसे 'अज्ञानता के परदा' के रूप में किये हैं जहाँ व्यक्ति की संवेदना शून्य होती है और इसी के माध्यम से अपनी न्याय का सिद्धांत देकर 'न्याय की संकल्पना' को नयी ऊंचाई पर पहुँचा दिए।(1971 में अपनी किताब 'द थ्योरी ऑफ़ जस्टिस' में)

          अब तक आप कल्पना कर लिए होंगे - मैंने विश्लेषण करते हुए पाया कि आज के समाज का जो रूप हम देख रहे हैं,आज जो परिवार,घर,शादी और समाज का संस्थानीकरण हो गया है,कभी ऐसा भी वक्त होगा जब इनसभी की सचेतना व्यक्ति के पास नहीं होगी।

          चाहे वह पुरुष हो या कोई महिला। एक महिला के लिए पुरुष का महत्व उतना ही रहा होगा जितना कि एक पुरुष के लिए महिला को। उससमय सेक्सुअली आक्रमणकारी वाली छवि का विकास पुरुष में नहीं हुआ होगा और एक स्त्री भी अपने को पुरुषों के बराबर समझती होगी।

          पर कलांतर में स्थितियाँ तेजी से बदली होगी। प्रत्येक स्त्री के दिल और दिमाग में वर्तमान समाज की मनोदशा जैसी विचारें घर करने लगी होगी कि हमारी सृष्टि ही इस दुनिया में एक विशेष कार्य(मातृत्व संबंधी और अन्य) को संपन्न करने के लिए हुयी है। यह विचार जो स्वतः महिलाओं के अंदर उत्पन्न हुई है,जिसने पूरे सामाजिक व्यवस्था को स्थायित्व प्रदान किया और एक ऐसी शक्ल दी जिससे पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं को भी और यहाँ तक की पूरे समाज को आंतरिक खुशी से भर दिया।

          पर आज स्थिति बहुत ही विचित्र हो चली है। नारीवादियों का एक अवधारणा जिसे रेडिकल(आमूल-परिवर्तनवादी) कहा जाता है इस पूरी बनी-बनायी व्यवस्था को तोड़ देने पर उतारू है और कई तरह के हथकंडे अपना रहा है। यह रेडिकल ग्रुप सशक्तिकरण का बात सच्चे अर्थों में न करके महिलाओं में विकृत मानसिकता पैदा कर सामाजिक बनावट को ही तोड़ने को लालायित है। जिसमें एक 'अंग-प्रदर्शन' को खासा तवज्जो दिया जा रहा है। बॉलीवुड की एक फिल्म 'की एंड का' को आदर्श मानकर चल रहा है जिसमें एक पुरुष सारे घरेलू काम को करता है। यहीं वह वजह है जिसके चलते एक पोर्न स्टार को नारी-सशक्तिकरण पर बोलने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है। जो बहुत ही खतरनाक साजिस की ओर इशारा कर रहा है।

           इसलिए 'आई एम अ बीच' की जो अवधारणा अभी कुछेक महिलाओं के मन में विकसित हो गयी है,उससे दूर हटने की जरुरत है। वास्तविक रूप से सशक्त होने की जरुरत है और साथ ही किसी से गुमराह होने की भी जरुरत नहीं है।

         "ध्यान रहे आप इस पूरे विश्व की वर्तमान,भूत और भविष्य तीनों हैं क्योंकि आपसब महिलाओं(माताओं) से ही सृष्टि अपना कदम आगे की ओर बढ़ाता है।"