Tuesday, 27 September 2016

जिस्म के बाजार में बेच चुके - 2

         (ध्यान रहे,वेश्या भी अपने जिस्म का व्यापार डंके के चोट पर करती है)

         इस सीरीज की तीन अलेखें पूरी हो गयी है। इस आलेख में जिस वामपंथी इतिहासकार के काले करतूत की चर्चा की जाएगी,उनका नाम है - सतीश चंद्र। 


         सतीश चंद्र का मेरे पास दो किताबें है जिनका नाम आप नीचे संदर्भ सूची में देख सकते हैं। जब आप इन किताबों को पढ़ेंगे तो पाएंगे कि किस तरह इस्लामी शासकों द्वारा किये जाने वाले आक्रमणों और हत्याकांडों को कुतर्क करके पाक-साफ़ कर दिया गया है। इनका कुतर्क पत्रकार अरुण शौरी के अनुसार तीन चरणों में चलता है -
        1. बरबादी,आक्रमण,हत्याकांड आदि के लिए मुसलमान(व्यक्ति) को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है,लेकिन इस्लाम(धर्म) को नहीं। 
        2. व्यक्तियों के मामले में भी यह बताया जाता है कि कुछेक व्यक्तियों ने-जो कि अपवाद थे-ऐसी हरकत की। 
        3. उन्होंने जो आक्रमण किये,मंदिरों को नष्ट किया और मूर्तियां तोड़ी,वह किसी धार्मिक विश्वास के कारण नहीं,बल्कि शासक होने के नाते अपने विरोधियों को दबाना था। जो कि हिन्दू थे,और इसलिए भी,कि इन आक्रामक कार्रवाइयों के पीछे कुछ ऐतिहासिक थे,जैसे मंदिरों के धन-माल का लालच और विजित क्षेत्र पर राजनीतिक दबदबा कायम करना आदि।

       धर्म-परिवर्तन के बारे में चंद्रा लिखते हैं,"इस्लाम में धर्म-परिवर्तन राजनीतिक लाभों या आर्थिक फायदों के लिए कराया जाता था या व्यक्ति अपनी सामाजिक स्थिति को सुधारने के लिए धर्म परिवर्तन करता था।"

       एक ऐसे धर्म से ताल्लुकात रखने वाला व्यक्ति जिसमें गैर-मुसलमान को काफीर कहा गया हो और उन्हें इस्लाम में लाना सच्चे मुसलमान का फर्ज बताया गया हो,क्या ऐसे शासक के यह तर्क आपको संतुष्टिदायक लगता है या गुमराह करने वाला ? जाहिर सी बात है कि गुमराह करने वाला ही है। 

       अब महत्वपूर्ण सवाल है कि "इस्लामी आक्रमण धर्म से प्रेरित था या नहीं ?"

       इस संबंध में हमारे सामने कई ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं - गजनवी द्वारा लगातार भारत पर किया गया आक्रमण धर्म से प्रेरित था,क्योंकि इसने खलीफा के सामने ऐसा करने का कसम खाया था। लेकिन फिर भी इतिहासकार इरफ़ान हबीब ने कारण को आर्थिक बताये है। 

        खानवा के युद्ध के समय तो जब बाबर की सेना ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया तो आश्चर्यजनक रूप से इसने मदिरा की बरतनें तोड़ दी और इस्लाम खतरे में है का नारा बुलंद किया। धर्म से प्रभावित उन्मादी सेना ने खानवा की ओर कुच किया और दुर्भाग्यवश राणा सांगा का हार हो गया,जिसका भारत के इतिहास पर दूरगामी प्रभाव पड़ा। जिसकी पुष्टि एक अन्य इतिहासकार सतीश चंद्र मित्तल द्वारा किया गया है। 

       वहीं  हिन्दू जनता पर शासकों के बर्बरता पर सतीश चंद्र लिखते हैं कि यह मात्र कुछेक ने किया,वो भी अपवादस्वरूप।(पाक-साफ़ करने का दूसरा चरण)

       लेकिन ध्यान दें - सल्तनत काल में हिन्दू मंदिरों को तोड़कर इसके अवशेष पर ही कई मस्जिद बनाया जाना,जिसका क्रम मुग़ल काल तक जारी रहा। धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए जजिया जैसा कुख्यात कर लगाया जाना,जिसका उल्लेख मुग़ल शासन के दौरान भी मिलता है तो ये इतिहासकार किस नजरिये से कह सकते हैं कि यह तो केवल अपवाद था ?

      इस सभी आक्रमणकारियों के प्रति इन इतिहासकारों की पक्षधरता इससे ही स्पष्ट हो जाता है कि इनके कुख्यात करनामों को प्रशासन के नाम पर सही ठहराने का प्रयास किया गया है और किया जाता रहा है। 

       "क्या कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो अपने ही देश पर हुए आक्रमण और बर्बरता को सही ठहरा दे ?"
        एक अपढ़ व्यक्ति का भी जवाब होगा - "नहीं।"

        लेकिन फिर भी ये पढ़े-लिखे इतिहासकार कपटजाल फैलाकर फरेब करते हैं  भारतीय आवाम के खिलाफ षड्यंत्र रचते हैं। 

         जब अपनी ही ईमान को झूठ के नाम पर  बाजार में बेच आएँ तो कैसे समझायेंगे इन्हें ?
         इनलोगों को बस यहीं कहना है - 'वेश्या भी अपने जिस्म का व्यापार डंके के चोट पर करती है।'

       - सुरेश कुमार पाण्डेय 

सन्दर्भ सूची -
1. मध्यकालीन भारत - सतीश चंद्र(NCERT,1996)। 
2. मध्यकालीन भारत : राजनीति,समाज और संस्कृति(8वीं से 17वीं शताब्दी)। 
3. मध्यकालीन भारत - सतीश चंद्र मित्तल। 
4. एमिनेंट हिस्टोरियन - अरुण शौरी।
5. फोटो - गूगल।