Tuesday, 20 September 2016

वामपंथी इतिहासकारों का घिनौना करतूत और कपटजाल -

है न अजीब ?
      यदि संघ से संबंध रखने वाला कोई व्यक्ति है तो उसे सांप्रदायिकता का प्रमाण पत्र दे दिया जाता है,लेकिन जब कई विद्वानों और इतिहासकारों का संबंध किसी वामपंथी संगठन से हो तो इनका कौमार्य भंग नहीं होता। अजीब विडंबना है देश का।

      मैं अपनी बात का शुरुआत 'भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद्' के साथ शुरू करता हूँ।

      बात जून-जूलाई 1998 की है,जब अपने आप को प्रगतिशील कहने वाले वामपंथी लेखकों और इतिहासकारों ने शोर मचाना शुरू कर दिया था कि भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् में राम मंदिर समर्थक इतिहासकार भर दिए गए हैं। उनकी जैसी आदत है,उन्होंने कपटजाल फैलाकर हलचल पैदा कर दी।


         मैंने कई इतिहासकारों के लिखे हुए किताब पढ़े ताकि तफ्तीश किया जा सके कि उसमें नया क्या है ? विपिन चंद्र,रोमिला थापर,इरफान हबीब,रामशरण शर्मा,सतीश चंद्रा,सुमित सरकार,डी. एन. झा आदि;ये मामूली बात आप भी जानते होंगे कि ये सभी-के-सभी प्रगतिशीलता के नाम पर एक ख़ास विचारधारा के झंडाबरदार रहे हैं। विपिन चंद्रा के किताब तो लगभग वे सभी पढ़ लेते हैं जो सिविल सेवा जैसे परीक्षा का तैयारी करना शुरू करते हैं,न जाने कैसे कपटजाल फैला दिया गया है कि इतिहास की किताब मतलब विपिन चंद्रा। ये वहीं चंद्रा हैं जो भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के लिए 'क्रांतिकारी आतंकवादी' शब्द का प्रयोग गर्व से किये हैं। सांप्रदायिकता पर इनके विचार तो एक ख़ास विचारधारा के लिए तो विद्वेष से भरा हुआ है,जबकि एक अन्य ख़ास समुदाय के लिए सहानूभूतिपूर्ण है।

        सुमित सरकार का कहना ही क्या ? आजादी के समय फैले दंगों में तो किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि ये स्वस्फूर्त थे,लेकिन इस तथ्य को जानते हुए भी इन्होंने खुलकर लिखा है,"कलकत्ता के दंगों में मरने वाले हिंदुओं के अपेक्षा मुसलमानों के संख्या अधिक थे।"

       सवाल स्पष्ट है - जब किसी उद्देश्य को लेकर इतिहास लेखन का कार्य किया जाए तो वह समरसता कैसे लाएगी ? उनकी इतिहास की किताबों,लेख-मालाओं में ही सबसे ज्यादा सांप्रदायिकता के आग को भड़काया। जब आप एक बहुसंख्यक समाज का तौहीन,गलती न रहते हुए भी करेंगे तो वह गरिमा के लिए कुछ भी करने को व्याकुल होगा ही। 'THE MYTH OF THE HOLY COW' में डी. एन. झा ने लिखा कि 'वैदिक जमाने में हिन्दू गाय का मांस खाते थे।' यह किस तरह का शोध है ? जब समाज आज गाय को पवित्र मान रहा है तो आप एक ख़ास तबके(अल्पसंख्यक) को संतुष्ट करने के लिए इसतरह का गलत और विवादित शोध कार्य कर रहे हैं और आस्था पर हमला भी कर रहे हैं। अब ऐसी घटनाएं सांप्रदायिकता को बढ़ाएगी नहीं तो क्या करेगी ?

       यह एक विश्वव्यापी सत्य है कि कल का प्रगतिशील आज अविचारशील रूढ़िवादी बन जाता है। इसलिए घबड़ाने की बात नहीं है;आज का समाज जो कभी इनके रचनाओं से इतना नफ़रत करता था,वो अब इनसभी का नाम लेना भी पसंद नहीं करता।

       अब आते हैं - भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् पर,जिसके वर्तमान में अध्यक्ष वाई सुदर्शन राव हैं जिनपर संघ समर्थक होने का धब्बा लगा दिया गया है। 1999-2001 तक इसके अध्यक्ष बी. आर. ग्रोवर थे जिनका परिचय मध्यकालीन भारत के प्रोफ़ेसर के रूप में था और जामिया मिलिया इस्लामिया में प्रोफ़ेसर थे।

       इस सवाल पर गौर किया जाना चाहिए कि रोमिला थापर परिषद् में चार बार कैसे नियुक्त हो गयी ? इरफान हबीब पांच बार,सतीश चंद्रा चार बार और एस.एन. गोपाल तीन बार......? ये सब कैसे हुआ ? जवाब है किसी के पास ?

      1998 जैसा ही हो-हल्ला,2014 में भी शुरू किया गया। न जाने क्यों ऐसा भाजपा का सरकार आने के बाद ही होता है ? 'द हिन्दू' नामक एक समाचार पत्र ने 'Choice of ICHR chief reignites saffronisation debate' नाम से एक रिपोर्ट छापा,जिसे आप नीचे लिंक में पढ़ सकते हैं कि किस तरह सुदर्शन राव पर आरोप लगाये गए। इसके बाद तो सिलसिला चल पड़ा। कई फालतू के क्षेत्रीय मुद्दों को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया गया और असहिष्णुता जैसा एक भयंकर शब्द को रचा गया,जबकि वास्तविकता ठीक इसके उलट थी।

अरुण शौरी लिखते हैं,'भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् जैसे प्रतिष्ठित संस्था पर इनलोगों का कब्ज़ा निश्चित ही बहुत बुरी बात थी। इन इतिहासकारों का बड़ा अपराध रहा कि ये सच को दबाने और झूठ को उजागर करने में हमेशा आपसी साझेदारी निभाई। ये केवल पक्षपाती इतिहासकार ही नहीं है,ये अव्वल दर्जे के भाई-भतीजावादी भी हैं। ये सभी आपस में एक-दूसरे के किताबों का प्रशंसा कर महान बन गए और ढोंग रचाते रहे।"
         जैसे कि 1998 में पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा एक मार्गनिर्देश जारी किया गया था कि इस बात का हवा बनाया जाए कि आर्यों के हमले से बौद्ध विहार नष्ट हो गए,जबकि वास्तविकता यह है कि आर्यों ने कोई हमला ही नहीं किया था। ऐसा ही एक और झूठ डी.एन. झा ने भी फैलाया कि प्राचीन भारत में हिन्दू गाय का मांस खाते थे,जिसका कमोवेश सभी वामपंथी इतिहासकारों ने समर्थन किया। वर्तमान में इसी तरह का एक झूठ और फैलाया गया कि असहिष्णुता तेजी से बढ़ रही है,पर न जाने क्यों बिहार चुनाव के बाद ये अचानक गायब हो गयी।

राम मंदिर का मुद्दा -

      1767 में जोसेफ टीफेनथेलर ने अपने शोध में कहा कि बाबरी मस्जिद राम का जन्मस्थान है,हिन्दू रामनवमी के दिन वहाँ पूजा करने जाते थे,लेकिन औरंगजेब ने इस प्रथा को तोड़ दिया और एक अलग स्थान दिया। ब्रिटिश स्त्रोतों के अनुसार भी हिन्दू और मुस्लिम दोनों बाबरी मस्जिद परिसर में पूजा करने जाते थे। यह 1870 में लिखा गया था।

      ऐसे ही कई किताबों में यह दावा किया गया है कि बाबरी मस्जिद पहले राम मंदिर था। के.के. मोहम्मद,जिन्होंने वर्षों तक 'Archaeological Survey Of India' में काम करने के बाद अपनी किताब 'njan enna bhartiyan'(I AM INDIAN) में लिखे कि बाबरी मस्जिद राम मंदिर के अवशेष पर ही खड़ा है। लेकिन वामपंथी इतिहासकार इसे झुठलाते रहे। खासतौर पर इन्होंने इरफान हबीब और रोमिला थापर पर निशाना साधा। वह तो मात्र एक कोरा क्षेत्रीय झूठ था जिसे राष्ट्रीय झूठ बना दिया गया है।

      आखिर सच ही कहा गया है कि एक झूठ को बार-बार बोलने से वह सच हो जाता है। नाजीवादी नेता गोयबल्स की उक्ति को इन वामपंथियों ने बखूबी अपने जेहन में उतारा है। 'राष्ट्रवाद का अयोध्याकांड' नामक किताब में आशिस नंदी,जिसका अनुवाद अभय कुमार दूबे द्वारा किया गया है,ये वहीं दूबे जी हैं जो आजकल खबरिया चैनलों पर आम आदमी पार्टी का समर्थन करते रहते हैं;जैसा लिखते हैं,"अवध की संस्कृति में राम की मान्यता एक राष्ट्र-नायक के रूप में थी।" वाह-जी-वाह,बहुत खूब। ये अगले पन्ना 26 पर लिखते हैं तीस अक्टूबर 1990 को अयोध्या में एक सभा हुयी जिसमें RSS से जुड़े विभिन्न उग्र हिन्दू संगठनों(विश्व हिन्दू परिषद्,अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्,बजरंग दल) के सदस्य शामिल हुए। इन्होंने रामजन्मभूमि को मुक्त कराने की बात कही,जिसका मतलब था बाबरी मस्जिद के मौजूदा ढाँचे को गिराकर ठीक उसी जगह मंदिर बनाने के लिए कारसेवा करना,ताकि अतीत में हिंदुओं के साथ हुए अन्याय का बदला लिया जा सके।"

       यह निहायत ही सत्य है,इसे मानने में भी कोई गुरेज नहीं,लेकिन किताब में जिस उद्देश्य को बताया गया है वह शंका पैदा कर ही देता है। खैर.......

       अब एक मुख्य सवाल जो सोचने पर मजबूर करती है,वह कि संघ जिसका सरोकार कभी भी किसी मंदिर से नहीं रहा,इसने न कभी कोई मंदिर बनाया और न ही कभी प्रयास किया तो फिर कब,कैसे और क्या हो गया ?

       अयोध्या में पिछले कुछ दिनों से कारसेवकों का नारा 'रामलला हम आएँगे,मंदिर यहीं बनाएँगे' गूंजने लगा था। पुलिस का प्रतिरोध बढ़ने लगा था जिसे कम करने के लिए युवा कारसेवकों ने नया नारा लगाना शुरू कर दिया था कि 'हिन्दू-हिन्दू भाई-भाई,बीच में वर्दी कहाँ से आयी।'

      'बच्चा-बच्चा राम का,जन्मभूमि के काम का' का नारा ज्यादा खतरा प्रतीत करता नजर नहीं आ रहा था,लेकिन जब विवादित ढाँचे पर एक बंदर को देखा गया तो ऐलान कर दिया गया कि रामजी के सेवक अमर हनुमान हमारे साथ हैं। कारसेवक जो त्रिशुल और डंडे लिए हुए थे उनके पास गर्व से भर देने वाला एक संकल्प था कि हर हालात में 'राष्ट्रीय शर्म के प्रतीक' को ध्वस्त करना ही है। तब क्या था ? ओज और तेजस्वी भाषणों ने शौर्य भर दिया,न चाहते हुए भी हिन्दू एकता का प्रतीक दल कदमताल मिलाकर ढाँचे की और बढ़ने लगा। कारसेवकों के मस्जिद की तरफ उमड़ने से पूरा ट्रैफिक जाम हो गया। गिरफ्तार कारसेवकों से भरी सरकारी बसें रुक गयी। इसी समय एक पुजारी ने एक बस को हाईजैक कर लिया जिसमें कारसेवक भरे थे। यह साहसपूर्ण कार्य ने आगे का रास्ता साफ़ कर दिया। तुरंत ही खबर फ़ैल गयी कि अशोक सिंहल घायल हो गये हैं। जिस कारण आंदोलन उग्रता को धारण कर लिया।

       'पुलिस हमारा भाई है,उससे नहीं लड़ाई है' की नारा ने रास्ता को आसान कर दिया। बाद में पुलिस वालों को कहना था कि निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने का कोई तुक नहीं थी,अगर ऐसा होता तो पूरी संभावना थी कि यह एक भयंकर हत्याकांड में बदल सकता था। उसके बाद जो हुआ वो सब तो हम जानते ही हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय तो इस मामले को और पेचीदा कर दिया है अभी यह सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

      लेकिन अब उस सवाल का जवाब देने का वक्त आ गया है कि यह आंदोलन ऐसा उग्र रूप कैसे धारण कर लिया ?

      आऊटलुक नामक पत्रिका जो आजकल अपने को सेकुलर और प्रगतिशीलता का प्रवक्ता समझ रहा है,ने यह आरोप दोहराया कि जिन इतिहासकारों को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् में नियुक्त किया गया था,उन सभी ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया कि बाबरी मस्जिद बनने से पहले वहाँ राम मंदिर था। कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि यह आरोप सही था,तो इनसभी को दोबारा भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् में नियुक्त क्यों नहीं किया गया ?

      केंद्र में चंद्रशेखर की सरकार ने प्रमाणों के आधार पर मामला सुलझाने के लिए बैठकें आयोजित की थी। इन वामपंथी इतिहासकारों ने शुरू-शुरू में भाग लिया,उन्होंने दस्तावेज पेश किये। और यह जल्द ही जाहिर हो गया कि विश्व हिन्दू परिषद् ने जो ढेर सारे पुरातात्विक,ऐतिहासिक और साहित्यिक प्रमाण प्रस्तुत किये हैं,उनसे उन वामपंथी दस्तावेजों का कोई विरोध नहीं था। जिसकारण विहिप के केस की और अधिक पुष्टि हो गयी।(चंद्रशेखर जून 1991 तक प्रधानमंत्री रहे थे और ध्यान रहे बाबरी मस्जिद ध्वंस 6 दिसंबर 1992 को हुआ था)

      जब इसपर विचार करने के लिए प्रधानमंत्री ने दोबारा से बैठको को बुलाया तो ये सभी वामपंथी इतिहासकार उपस्थित ही नहीं हुए और दुम दबाकर भाग गए। इनके पीछे हटते ही सरकार की पहलकदमी नाकाम हो गयी।

       यह घटना,इस बात को प्रमाणित करने के लिए काफी है कि मस्जिद के गिराए जाने का मार्ग जितना इन इतिहासकारों के भाग खड़े होने के कारण प्रशस्त हुए उतना और किसी कारण से नहीँ। संघ परिवार के कार्यों से भी नहीं क्योंकि यह शुरू से ही शांतिपूर्ण समाधान चाहता था।

इति सिद्धम् ।

 - सुरेश कुमार पाण्डेय

स्त्रोत -

1. Indian Council of Historical Research
2. भारत का स्वतंत्रता संघर्ष - विपिन चंद्रा(पेज-228)
3. आधुनिक भारत - सुमित सरकार(पेज-454)
4. THE MYTH OF THE HOLY COW - DN JHA.
5.  Beef eating in ancient India
6. wikipedia.org/chairperson of ichr
7. wikipedia.org/ram mandir
8. EMINENT HISTORIANS - अरुण शौरी
9. गूगल फॉर कॉमन मैटेरियल
10. THE HINDU/Choice of ICHR chief reignites saffronisation debate
11. आउटलुक
12. राष्ट्रवाद का अयोध्याकांड - आशिस नंदी
13. फ़ोटो- गूगल