Friday, 23 September 2016

जिस्म के बाजार में बेच चुके -

        पिछले दो आलेखों में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद्,राम मंदिर मुद्दा और प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था का सच उजागर किया जा चुका है। अब तक इनके करतूत और फरेब सब जान गए होंगे। इस आलेख में चर्चा कुछ और पहलू पर।
       अब आगे........

        वामपंथी इतिहासकारों द्वारा यह बात बार-बार कहा गया है -
       1. हिन्दू धर्म जैसा कोई चीज नहीं,यह ब्राह्मणवाद है,ब्राह्मणवाद का मतलब है असहिष्णुता और उत्पीड़न-उत्पीड़न बौद्धों का,जैनियों का और शूद्रों का;
       2. इस्लाम का अर्थ है शान्ति,समानता,भाईचारा और एकेश्वरवाद की ओर उत्थान तथा
       3. वामपंथ का अर्थ है - समानता,स्वतंत्रता और हर चीज ठीक-ठीक;क्रान्ति का मतलब है किसानों और मजदूरों का शासन।

       इन इतिहासकारों में एक महत्वपूर्ण नाम है - रामशरण शर्मा का। जिनका किताब ग्यारहवीं की कक्षा के छात्रों को NCERT की पाठ्य पुस्तक के रूप में प्राचीन भारत के नाम से पढ़ाई जाती थी। इस किताब का पहली बार प्रकाशन 1996 में हुआ था।

       अब सीधे आते हैं मुद्दे पर.........
       रामशरण शर्मा 'मौर्य शासन के महत्त्व' वाले अध्याय में लिखते हैं,"ब्राह्मणों की ओर से प्रतिक्रिया की शुरुआत अशोक की नीति के परिणामस्वरुप हुई।"
       यहाँ इन सारी पंक्तियों को लिखना तो संभव नहीं,लेकिन इसका सार है -ब्राह्मणों का अशोक के प्रति विद्वेष हो गया क्योंकि इन्होंने बलि पर रोक लगा दी,स्पष्ट है कि ब्राह्मणों की आमदनी पर असर पड़ा होगा और गुजर-बसर प्रभावित हुआ होगा।

       पर सवाल यह है कि
        "बालियों का कितना हिस्सा ब्राह्मणों को दक्षिणा स्वरूप प्राप्त होता होगा ?" इस पर कुछ नहीं कहा गया है।
       अगर वास्तव में सभी लोग बालियाँ चढ़ाया करते थे तो अशोक के समय(2300 वर्ष पूर्व) संचार व्यवस्था इतनी मजबूत तो नहीं थी कि अचानक सब बंद करा दिया गया होगा। लोग आसानी से अपनी परंपराओं को छोड़ा नहीं करते जबतक कि उसका स्थान लेने कोई आधुनिकता का प्रतीक या दूसरा न आ जाए। उस समय इस तरह का कोई संकेत नहीं मिलता। अगर दबाव डालकर ऐसा कराया गया होता तो विद्रोह के संकेत जरूर मिलते जो स्पष्ट करने के लिए काफी है कि ब्राह्मणों में कोई विद्वेष नहीं हुआ था।

         खैर..... ये बात तो आपको भी मालूम होगा कि इतिहास अटकलबाजियों पर नहीं चलती,कुछ भी कहने से पहले प्रमाण पेश करना होता है,लेकिन शर्मा जी द्वारा किताब में कोई भी साक्ष्य इस मामले में दिया ही नहीं गया है।

         प्रमाण की बात तो अलग रही,लेकिन ज़रा गौर कीजिये कि किन-किन जुमलों को जोड़कर दोषारोपण किया गया है -
        "हिन्दू धर्म का अर्थ है - ब्राह्मणवाद।"
        "ब्राह्मण का लक्ष्य है - आमदनी कमाना।"
        जो कि सरासर गलत है,ऐतिहासिक स्त्रोत तो कभी इस तरह का वर्णन नहीं करते।

        एक और प्रयोजन पर ध्यान देते हैं -

       "तुर्की हमलावार मठों का धनमाल हासिल करने के लिए लालायित हो उठे। तुर्कों ने नालंदा में बहुत से बौद्ध भिक्षुओं को मार डाला,हालांकि कुछ भिक्षु नेपाल और तिब्बत बच निकलने में कामयाब रहे।"

       उन्होंने तुर्की आक्रमण का कारण धर्म नहीं बल्कि 'आर्थिक उद्देश्य' माना है।
       और तुर्कों के आक्रमण के पक्ष में कई तर्क दिए हैं -
       - तुर्क लालच में आकर वहीं कर रहा था,जो पहले ब्राह्मण कर चुके थे। हमेशा से संतुलन बनाने का प्रयास।
       - बौद्ध केंद्र भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया था,इनकी भाषा बदल गयी थी,भिक्षु मिलने वाले दक्षिणा और अनुदानों से आरामदेह जीवन बिताने लगे थे। इस धर्म का ह्रास हो गया था।
       यह इनकी कार्यान्वयन की एक दुर्भाग्यपूर्ण कमी थी।

      पर सवाल यह है कि इस ह्रास का दोषी कौन है और किस किस्म का है ? तो शर्माजी जवाब देते हैं - "बौद्ध धर्म भी ब्राह्मणवाद के उन्हीं बुराइयों का शिकार हो गया जिसके खिलाफ उसने मुहीम चलाई थी। इसलिए बुराई की असली बीज ब्राह्मणवाद है। वाह-जी-वाह,शर्माजी वाह।
      लेकिन सभी जानते हैं कि ब्राह्मणवाद नाम का कोई चीज ही नहीं।

      ईसाई धर्म को लेकर कई तर्क देते हुए ये कहते हैं कि इसमें जाति नामक भेदभाव का कोई निशान नहीं,लेकिन जब यह दृष्टिगोचर हो गया कि चर्चों में 'दलित ईसाईयों' को अलग बैठने की व्यवस्था की जा रही है तो इतिहासकार महोदय को 'दलित ईसाईयों' के लिए भी आरक्षण की मांग कर देना चाहिए,लेकिन फिर भी ये आजतक यह बात दोहराने में लगे हुए हैं कि परिभाषा के अनुसार इस वर्ग(दलित) का ईसाई धर्म में कोई अस्तित्व नहीं है।

      इनकी सड़ी हुई मिथ्या सोच और षड्यंत्र तो हमसभी जान चुके हैं कि इनका उद्देश्य झूठ का प्रोपोगैंडा,गोयबल्स जैसा फैलाकर हिन्दू धर्म के प्रति षड्यंत्र करके एक ख़ास विचारधारा(वामपंथ) के लिए मैदान तैयार करना है। यह वहीं विचारधारा है जिसमें स्तालिन के जमाने में हजारों बेगुनाहों का क़त्ल कर दिया गया था।

क्या आप वैसा भारत चाहते हैं ?

इति सिद्धम्।
(आगे कुछ और)
- सुरेश कुमार पाण्डेय

सन्दर्भ -
1. प्राचीन भारत - रामशरण शर्मा(NCERT)
2. फोटो - गूगल।