Wednesday, 21 September 2016

प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था,अगर कुछ देर के लिए सही भी मान लिया जाए, तो क्या हो गया ?

         डी.एन. झा अपनी किताब 'ANCIENT INDIA : AN INTRODUCTORY OUTLINE',मनोहर,नई दिल्ली,1977 में लिखते हैं -"प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था।" इस किताब में ऐसे ही कई दावे किये गए हैं लेकिन सवाल यह है कि प्रमाण कहाँ है ?

        यह बात उन्होंने बड़ी चालाकी से लिख डाली है कि अभी तक उसे(गाय को) पूज्य नहीं माना जाने लगा था। गायों और बैलों को आहार के लिए ह्त्या को जाती थी,और मेहमानों को खाद्य के लिए पेश किया जाता था।

        फिर यहीं लेखक आगे स्वीकार करते हैं कि ऋग्वेद में एक-दो स्थानों पर गाय के बारे में उल्लेख मिलता है कि वह 'अघन्या' है अर्थात उसकी ह्त्या नहीं की जा सकती। पर यह बात उनके लिए मायने नहीं रखी है। वे आगे घोषित करते हैं -'गाय का अपना एक आर्थिक महत्त्व जरूर रहा होगा।' (पेज - 9)

        ऐसे वामपंथी इतिहासकारों को आप मूर्ख शिरोमणी के कतार में नहीं रखेंगे तो कहाँ रखेंगे ? ओह्ह्ह,सॉरी । कुछ ज्यादा ही कठोर शब्द हो गया,दूसरे शब्दों में कहें तो क्या ये किसी विचारधारा पोषक नहीं लगते ?

        इस किताब में ऐसे ही कई व्याख्यायें की गयी है,जैसे कि भगवान कृष्ण का 'व्यक्तिगत इतिवृत संदेहास्पद' है।;प्रभु शिव मात्र 'लिंग उपासना पद्धति' के उपज हैं। ऐसे व्याख्याओं का प्रमाण केवल दावें और अटकलवाजियाँ ही हैं।

        इसकी पुष्टि के लिए जाने-माने पत्रकार अरुण शौरी ज़ी टीवी के एक कार्यक्रम 'आपकी अदालत,आपका फैसला' का जिक्र करते हैं,जिसका संचालन मनोज रघुवंशी द्वारा किया गया था। इस चर्चा में मशहूर इतिहासकार श्री के.एम. श्रीमाली और वे खुद मौजूद रहे थे। जब श्रीमाली से रघुवंशी ने पूछा कि आपके पास क्या प्रमाण है या कहाँ लिखा है कि प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था ?(श्रीमाली,डी.एन. झा के प्रबल समर्थक थे।)

       श्रीमाली जी ने गर्व से कहा - "इस बारे में सैकड़ों लिखित प्रमाण मौजूद है।"
       "किस वेद में,किस ग्रन्थ के किस श्लोक में यह लिखा है ?" - रघुवंशी ने पूछा।
       इसपर श्रीमाली जी बोले - "मैं पुस्तकें तो नहीं लाया हूँ लेकिन हर कहीं प्रमाण मिल जाता है।"
       "लेकिन आप एक श्लोक तो बता दीजिये।" - रघुवंशी ने दोबारा पूछा।

       श्रीमाली जी एक श्लोक भी नहीं बता पाए,ग्रन्थ तो दूर।

       इसी बीच दर्शक दीर्घा से एक व्यक्ति बोला कि ये हैं,चारों वेद,इसमें कहाँ लिखा है,आप पढ़ के दिखाइये।
श्रीमाली जी ने उसे पढने से इनकार कर दिया और वे ठिठक गए।

       जाहिर सी बात थी कि ऐसी कोई प्रमाण ही नहीं है कि प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था। यह सब इन वामपंथी इतिहासकारों का अटकलवाजी और षडयंत्र था/है - हिंदुओं के खिलाफ। लेकिन यह तो स्पष्ट था कि श्रीमाली अच्छा प्रभाव नहीं छोड़ पाए।

       लेकिन आप कुछ देर के लिए मान लीजिये कि 5000 वर्ष पूर्व गोमांस खाया जाता था। लेकिन इस तथ्य को कोई दबाना क्यों चाहेगा ? जब द्रोणाचार्य-एकलव्य की घटना को इतिहास में अंकित कर दिया गया,जो सामाजिक सरोकार के कदम से कतई मेल नहीं खाता है,जबकि यह तो मामूली बात थी।

       अगर प्राचीन भारत में गोमांस खाया भी जाता था तो भी उससे इस सच्चाई में कौन सी कमीं आ जाती है कि आज हिन्दू गाय के प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं।

       विश्व में कई आदिम जातियां नरभक्षी थीं। लेकिन आज वे नहीं है,मानव का खोपड़ी नहीं खाते हैं। अगर आज वे नहीं हैं तो सच्चाई में कमी आ गयी क्या ? क्या इन्हें खाने की अनुमति दी जानी चाहिए ?

      रीति-रिवाज बदलते हैं,विश्वास बदलते हैं और धर्म-विधियां बदलती हैं। लोकनीति के लिए प्रचलित विश्वास को ही ध्यान में रखा जाता है।

        पैगम्बर(इस्लाम के प्रवर्तक) ने पहले अपने अनुयायियों को जिस किबला की तरफ मुंह करके सजदा करने को कहा था वह जेरुसलम था,न कि मक्का में स्थित काबा। क्या उसका यह अर्थ है कि अब मुसलामानों के दिल में जो श्रद्धा काबा के प्रति है,वह दिखावटी है ?

        यह स्पष्ट हो गया कि इन वामपंथी इतिहासकारों का मंशा क्या था और है ? ये केवल दावे करते हैं,शोर मचाते हैं और प्रमाण मांगे जाने पर इनकी घिघ्घी बंध जाती है।

       स्थिति और प्रमाण सबके सामने है कि ऋग्वेद समेत किसी भी वेद में नहीं लिखा है कि गोमांस खाया जाता था,जबकि गाय के लिए 'अघन्या' शब्द का प्रयोग किया गया है कि मारा नहीं जा सकता।

        इसलिए हमेशा से गाय पवित्र और पूजनीय रही है।

        इति सिद्धम ।
 - सुरेश कुमार पाण्डेय

स्त्रोत -
1. ANCIENT INDIA : AN INTRODUCTORY OUTLINE - DN JHA (PAGE -9)
2. EMINENT HISTORIANS : THEIR TECHNOLOGY,THEIR LINE,THEIR FRAUD - ARUN SHOURIE (PAGE - 50.51,52)
3. फोटो - गूगल।