Tuesday, 27 September 2016

जिस्म के बाजार में बेच चुके - 2

         (ध्यान रहे,वेश्या भी अपने जिस्म का व्यापार डंके के चोट पर करती है)

         इस सीरीज की तीन अलेखें पूरी हो गयी है। इस आलेख में जिस वामपंथी इतिहासकार के काले करतूत की चर्चा की जाएगी,उनका नाम है - सतीश चंद्र। 


         सतीश चंद्र का मेरे पास दो किताबें है जिनका नाम आप नीचे संदर्भ सूची में देख सकते हैं। जब आप इन किताबों को पढ़ेंगे तो पाएंगे कि किस तरह इस्लामी शासकों द्वारा किये जाने वाले आक्रमणों और हत्याकांडों को कुतर्क करके पाक-साफ़ कर दिया गया है। इनका कुतर्क पत्रकार अरुण शौरी के अनुसार तीन चरणों में चलता है -
        1. बरबादी,आक्रमण,हत्याकांड आदि के लिए मुसलमान(व्यक्ति) को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है,लेकिन इस्लाम(धर्म) को नहीं। 
        2. व्यक्तियों के मामले में भी यह बताया जाता है कि कुछेक व्यक्तियों ने-जो कि अपवाद थे-ऐसी हरकत की। 
        3. उन्होंने जो आक्रमण किये,मंदिरों को नष्ट किया और मूर्तियां तोड़ी,वह किसी धार्मिक विश्वास के कारण नहीं,बल्कि शासक होने के नाते अपने विरोधियों को दबाना था। जो कि हिन्दू थे,और इसलिए भी,कि इन आक्रामक कार्रवाइयों के पीछे कुछ ऐतिहासिक थे,जैसे मंदिरों के धन-माल का लालच और विजित क्षेत्र पर राजनीतिक दबदबा कायम करना आदि।

       धर्म-परिवर्तन के बारे में चंद्रा लिखते हैं,"इस्लाम में धर्म-परिवर्तन राजनीतिक लाभों या आर्थिक फायदों के लिए कराया जाता था या व्यक्ति अपनी सामाजिक स्थिति को सुधारने के लिए धर्म परिवर्तन करता था।"

       एक ऐसे धर्म से ताल्लुकात रखने वाला व्यक्ति जिसमें गैर-मुसलमान को काफीर कहा गया हो और उन्हें इस्लाम में लाना सच्चे मुसलमान का फर्ज बताया गया हो,क्या ऐसे शासक के यह तर्क आपको संतुष्टिदायक लगता है या गुमराह करने वाला ? जाहिर सी बात है कि गुमराह करने वाला ही है। 

       अब महत्वपूर्ण सवाल है कि "इस्लामी आक्रमण धर्म से प्रेरित था या नहीं ?"

       इस संबंध में हमारे सामने कई ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं - गजनवी द्वारा लगातार भारत पर किया गया आक्रमण धर्म से प्रेरित था,क्योंकि इसने खलीफा के सामने ऐसा करने का कसम खाया था। लेकिन फिर भी इतिहासकार इरफ़ान हबीब ने कारण को आर्थिक बताये है। 

        खानवा के युद्ध के समय तो जब बाबर की सेना ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया तो आश्चर्यजनक रूप से इसने मदिरा की बरतनें तोड़ दी और इस्लाम खतरे में है का नारा बुलंद किया। धर्म से प्रभावित उन्मादी सेना ने खानवा की ओर कुच किया और दुर्भाग्यवश राणा सांगा का हार हो गया,जिसका भारत के इतिहास पर दूरगामी प्रभाव पड़ा। जिसकी पुष्टि एक अन्य इतिहासकार सतीश चंद्र मित्तल द्वारा किया गया है। 

       वहीं  हिन्दू जनता पर शासकों के बर्बरता पर सतीश चंद्र लिखते हैं कि यह मात्र कुछेक ने किया,वो भी अपवादस्वरूप।(पाक-साफ़ करने का दूसरा चरण)

       लेकिन ध्यान दें - सल्तनत काल में हिन्दू मंदिरों को तोड़कर इसके अवशेष पर ही कई मस्जिद बनाया जाना,जिसका क्रम मुग़ल काल तक जारी रहा। धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए जजिया जैसा कुख्यात कर लगाया जाना,जिसका उल्लेख मुग़ल शासन के दौरान भी मिलता है तो ये इतिहासकार किस नजरिये से कह सकते हैं कि यह तो केवल अपवाद था ?

      इस सभी आक्रमणकारियों के प्रति इन इतिहासकारों की पक्षधरता इससे ही स्पष्ट हो जाता है कि इनके कुख्यात करनामों को प्रशासन के नाम पर सही ठहराने का प्रयास किया गया है और किया जाता रहा है। 

       "क्या कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो अपने ही देश पर हुए आक्रमण और बर्बरता को सही ठहरा दे ?"
        एक अपढ़ व्यक्ति का भी जवाब होगा - "नहीं।"

        लेकिन फिर भी ये पढ़े-लिखे इतिहासकार कपटजाल फैलाकर फरेब करते हैं  भारतीय आवाम के खिलाफ षड्यंत्र रचते हैं। 

         जब अपनी ही ईमान को झूठ के नाम पर  बाजार में बेच आएँ तो कैसे समझायेंगे इन्हें ?
         इनलोगों को बस यहीं कहना है - 'वेश्या भी अपने जिस्म का व्यापार डंके के चोट पर करती है।'

       - सुरेश कुमार पाण्डेय 

सन्दर्भ सूची -
1. मध्यकालीन भारत - सतीश चंद्र(NCERT,1996)। 
2. मध्यकालीन भारत : राजनीति,समाज और संस्कृति(8वीं से 17वीं शताब्दी)। 
3. मध्यकालीन भारत - सतीश चंद्र मित्तल। 
4. एमिनेंट हिस्टोरियन - अरुण शौरी।
5. फोटो - गूगल। 

Friday, 23 September 2016

जिस्म के बाजार में बेच चुके -

        पिछले दो आलेखों में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद्,राम मंदिर मुद्दा और प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था का सच उजागर किया जा चुका है। अब तक इनके करतूत और फरेब सब जान गए होंगे। इस आलेख में चर्चा कुछ और पहलू पर।
       अब आगे........

        वामपंथी इतिहासकारों द्वारा यह बात बार-बार कहा गया है -
       1. हिन्दू धर्म जैसा कोई चीज नहीं,यह ब्राह्मणवाद है,ब्राह्मणवाद का मतलब है असहिष्णुता और उत्पीड़न-उत्पीड़न बौद्धों का,जैनियों का और शूद्रों का;
       2. इस्लाम का अर्थ है शान्ति,समानता,भाईचारा और एकेश्वरवाद की ओर उत्थान तथा
       3. वामपंथ का अर्थ है - समानता,स्वतंत्रता और हर चीज ठीक-ठीक;क्रान्ति का मतलब है किसानों और मजदूरों का शासन।

       इन इतिहासकारों में एक महत्वपूर्ण नाम है - रामशरण शर्मा का। जिनका किताब ग्यारहवीं की कक्षा के छात्रों को NCERT की पाठ्य पुस्तक के रूप में प्राचीन भारत के नाम से पढ़ाई जाती थी। इस किताब का पहली बार प्रकाशन 1996 में हुआ था।

       अब सीधे आते हैं मुद्दे पर.........
       रामशरण शर्मा 'मौर्य शासन के महत्त्व' वाले अध्याय में लिखते हैं,"ब्राह्मणों की ओर से प्रतिक्रिया की शुरुआत अशोक की नीति के परिणामस्वरुप हुई।"
       यहाँ इन सारी पंक्तियों को लिखना तो संभव नहीं,लेकिन इसका सार है -ब्राह्मणों का अशोक के प्रति विद्वेष हो गया क्योंकि इन्होंने बलि पर रोक लगा दी,स्पष्ट है कि ब्राह्मणों की आमदनी पर असर पड़ा होगा और गुजर-बसर प्रभावित हुआ होगा।

       पर सवाल यह है कि
        "बालियों का कितना हिस्सा ब्राह्मणों को दक्षिणा स्वरूप प्राप्त होता होगा ?" इस पर कुछ नहीं कहा गया है।
       अगर वास्तव में सभी लोग बालियाँ चढ़ाया करते थे तो अशोक के समय(2300 वर्ष पूर्व) संचार व्यवस्था इतनी मजबूत तो नहीं थी कि अचानक सब बंद करा दिया गया होगा। लोग आसानी से अपनी परंपराओं को छोड़ा नहीं करते जबतक कि उसका स्थान लेने कोई आधुनिकता का प्रतीक या दूसरा न आ जाए। उस समय इस तरह का कोई संकेत नहीं मिलता। अगर दबाव डालकर ऐसा कराया गया होता तो विद्रोह के संकेत जरूर मिलते जो स्पष्ट करने के लिए काफी है कि ब्राह्मणों में कोई विद्वेष नहीं हुआ था।

         खैर..... ये बात तो आपको भी मालूम होगा कि इतिहास अटकलबाजियों पर नहीं चलती,कुछ भी कहने से पहले प्रमाण पेश करना होता है,लेकिन शर्मा जी द्वारा किताब में कोई भी साक्ष्य इस मामले में दिया ही नहीं गया है।

         प्रमाण की बात तो अलग रही,लेकिन ज़रा गौर कीजिये कि किन-किन जुमलों को जोड़कर दोषारोपण किया गया है -
        "हिन्दू धर्म का अर्थ है - ब्राह्मणवाद।"
        "ब्राह्मण का लक्ष्य है - आमदनी कमाना।"
        जो कि सरासर गलत है,ऐतिहासिक स्त्रोत तो कभी इस तरह का वर्णन नहीं करते।

        एक और प्रयोजन पर ध्यान देते हैं -

       "तुर्की हमलावार मठों का धनमाल हासिल करने के लिए लालायित हो उठे। तुर्कों ने नालंदा में बहुत से बौद्ध भिक्षुओं को मार डाला,हालांकि कुछ भिक्षु नेपाल और तिब्बत बच निकलने में कामयाब रहे।"

       उन्होंने तुर्की आक्रमण का कारण धर्म नहीं बल्कि 'आर्थिक उद्देश्य' माना है।
       और तुर्कों के आक्रमण के पक्ष में कई तर्क दिए हैं -
       - तुर्क लालच में आकर वहीं कर रहा था,जो पहले ब्राह्मण कर चुके थे। हमेशा से संतुलन बनाने का प्रयास।
       - बौद्ध केंद्र भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया था,इनकी भाषा बदल गयी थी,भिक्षु मिलने वाले दक्षिणा और अनुदानों से आरामदेह जीवन बिताने लगे थे। इस धर्म का ह्रास हो गया था।
       यह इनकी कार्यान्वयन की एक दुर्भाग्यपूर्ण कमी थी।

      पर सवाल यह है कि इस ह्रास का दोषी कौन है और किस किस्म का है ? तो शर्माजी जवाब देते हैं - "बौद्ध धर्म भी ब्राह्मणवाद के उन्हीं बुराइयों का शिकार हो गया जिसके खिलाफ उसने मुहीम चलाई थी। इसलिए बुराई की असली बीज ब्राह्मणवाद है। वाह-जी-वाह,शर्माजी वाह।
      लेकिन सभी जानते हैं कि ब्राह्मणवाद नाम का कोई चीज ही नहीं।

      ईसाई धर्म को लेकर कई तर्क देते हुए ये कहते हैं कि इसमें जाति नामक भेदभाव का कोई निशान नहीं,लेकिन जब यह दृष्टिगोचर हो गया कि चर्चों में 'दलित ईसाईयों' को अलग बैठने की व्यवस्था की जा रही है तो इतिहासकार महोदय को 'दलित ईसाईयों' के लिए भी आरक्षण की मांग कर देना चाहिए,लेकिन फिर भी ये आजतक यह बात दोहराने में लगे हुए हैं कि परिभाषा के अनुसार इस वर्ग(दलित) का ईसाई धर्म में कोई अस्तित्व नहीं है।

      इनकी सड़ी हुई मिथ्या सोच और षड्यंत्र तो हमसभी जान चुके हैं कि इनका उद्देश्य झूठ का प्रोपोगैंडा,गोयबल्स जैसा फैलाकर हिन्दू धर्म के प्रति षड्यंत्र करके एक ख़ास विचारधारा(वामपंथ) के लिए मैदान तैयार करना है। यह वहीं विचारधारा है जिसमें स्तालिन के जमाने में हजारों बेगुनाहों का क़त्ल कर दिया गया था।

क्या आप वैसा भारत चाहते हैं ?

इति सिद्धम्।
(आगे कुछ और)
- सुरेश कुमार पाण्डेय

सन्दर्भ -
1. प्राचीन भारत - रामशरण शर्मा(NCERT)
2. फोटो - गूगल। 

Wednesday, 21 September 2016

प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था,अगर कुछ देर के लिए सही भी मान लिया जाए, तो क्या हो गया ?

         डी.एन. झा अपनी किताब 'ANCIENT INDIA : AN INTRODUCTORY OUTLINE',मनोहर,नई दिल्ली,1977 में लिखते हैं -"प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था।" इस किताब में ऐसे ही कई दावे किये गए हैं लेकिन सवाल यह है कि प्रमाण कहाँ है ?

        यह बात उन्होंने बड़ी चालाकी से लिख डाली है कि अभी तक उसे(गाय को) पूज्य नहीं माना जाने लगा था। गायों और बैलों को आहार के लिए ह्त्या को जाती थी,और मेहमानों को खाद्य के लिए पेश किया जाता था।

        फिर यहीं लेखक आगे स्वीकार करते हैं कि ऋग्वेद में एक-दो स्थानों पर गाय के बारे में उल्लेख मिलता है कि वह 'अघन्या' है अर्थात उसकी ह्त्या नहीं की जा सकती। पर यह बात उनके लिए मायने नहीं रखी है। वे आगे घोषित करते हैं -'गाय का अपना एक आर्थिक महत्त्व जरूर रहा होगा।' (पेज - 9)

        ऐसे वामपंथी इतिहासकारों को आप मूर्ख शिरोमणी के कतार में नहीं रखेंगे तो कहाँ रखेंगे ? ओह्ह्ह,सॉरी । कुछ ज्यादा ही कठोर शब्द हो गया,दूसरे शब्दों में कहें तो क्या ये किसी विचारधारा पोषक नहीं लगते ?

        इस किताब में ऐसे ही कई व्याख्यायें की गयी है,जैसे कि भगवान कृष्ण का 'व्यक्तिगत इतिवृत संदेहास्पद' है।;प्रभु शिव मात्र 'लिंग उपासना पद्धति' के उपज हैं। ऐसे व्याख्याओं का प्रमाण केवल दावें और अटकलवाजियाँ ही हैं।

        इसकी पुष्टि के लिए जाने-माने पत्रकार अरुण शौरी ज़ी टीवी के एक कार्यक्रम 'आपकी अदालत,आपका फैसला' का जिक्र करते हैं,जिसका संचालन मनोज रघुवंशी द्वारा किया गया था। इस चर्चा में मशहूर इतिहासकार श्री के.एम. श्रीमाली और वे खुद मौजूद रहे थे। जब श्रीमाली से रघुवंशी ने पूछा कि आपके पास क्या प्रमाण है या कहाँ लिखा है कि प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था ?(श्रीमाली,डी.एन. झा के प्रबल समर्थक थे।)

       श्रीमाली जी ने गर्व से कहा - "इस बारे में सैकड़ों लिखित प्रमाण मौजूद है।"
       "किस वेद में,किस ग्रन्थ के किस श्लोक में यह लिखा है ?" - रघुवंशी ने पूछा।
       इसपर श्रीमाली जी बोले - "मैं पुस्तकें तो नहीं लाया हूँ लेकिन हर कहीं प्रमाण मिल जाता है।"
       "लेकिन आप एक श्लोक तो बता दीजिये।" - रघुवंशी ने दोबारा पूछा।

       श्रीमाली जी एक श्लोक भी नहीं बता पाए,ग्रन्थ तो दूर।

       इसी बीच दर्शक दीर्घा से एक व्यक्ति बोला कि ये हैं,चारों वेद,इसमें कहाँ लिखा है,आप पढ़ के दिखाइये।
श्रीमाली जी ने उसे पढने से इनकार कर दिया और वे ठिठक गए।

       जाहिर सी बात थी कि ऐसी कोई प्रमाण ही नहीं है कि प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था। यह सब इन वामपंथी इतिहासकारों का अटकलवाजी और षडयंत्र था/है - हिंदुओं के खिलाफ। लेकिन यह तो स्पष्ट था कि श्रीमाली अच्छा प्रभाव नहीं छोड़ पाए।

       लेकिन आप कुछ देर के लिए मान लीजिये कि 5000 वर्ष पूर्व गोमांस खाया जाता था। लेकिन इस तथ्य को कोई दबाना क्यों चाहेगा ? जब द्रोणाचार्य-एकलव्य की घटना को इतिहास में अंकित कर दिया गया,जो सामाजिक सरोकार के कदम से कतई मेल नहीं खाता है,जबकि यह तो मामूली बात थी।

       अगर प्राचीन भारत में गोमांस खाया भी जाता था तो भी उससे इस सच्चाई में कौन सी कमीं आ जाती है कि आज हिन्दू गाय के प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं।

       विश्व में कई आदिम जातियां नरभक्षी थीं। लेकिन आज वे नहीं है,मानव का खोपड़ी नहीं खाते हैं। अगर आज वे नहीं हैं तो सच्चाई में कमी आ गयी क्या ? क्या इन्हें खाने की अनुमति दी जानी चाहिए ?

      रीति-रिवाज बदलते हैं,विश्वास बदलते हैं और धर्म-विधियां बदलती हैं। लोकनीति के लिए प्रचलित विश्वास को ही ध्यान में रखा जाता है।

        पैगम्बर(इस्लाम के प्रवर्तक) ने पहले अपने अनुयायियों को जिस किबला की तरफ मुंह करके सजदा करने को कहा था वह जेरुसलम था,न कि मक्का में स्थित काबा। क्या उसका यह अर्थ है कि अब मुसलामानों के दिल में जो श्रद्धा काबा के प्रति है,वह दिखावटी है ?

        यह स्पष्ट हो गया कि इन वामपंथी इतिहासकारों का मंशा क्या था और है ? ये केवल दावे करते हैं,शोर मचाते हैं और प्रमाण मांगे जाने पर इनकी घिघ्घी बंध जाती है।

       स्थिति और प्रमाण सबके सामने है कि ऋग्वेद समेत किसी भी वेद में नहीं लिखा है कि गोमांस खाया जाता था,जबकि गाय के लिए 'अघन्या' शब्द का प्रयोग किया गया है कि मारा नहीं जा सकता।

        इसलिए हमेशा से गाय पवित्र और पूजनीय रही है।

        इति सिद्धम ।
 - सुरेश कुमार पाण्डेय

स्त्रोत -
1. ANCIENT INDIA : AN INTRODUCTORY OUTLINE - DN JHA (PAGE -9)
2. EMINENT HISTORIANS : THEIR TECHNOLOGY,THEIR LINE,THEIR FRAUD - ARUN SHOURIE (PAGE - 50.51,52)
3. फोटो - गूगल।  

Tuesday, 20 September 2016

वामपंथी इतिहासकारों का घिनौना करतूत और कपटजाल -

है न अजीब ?
      यदि संघ से संबंध रखने वाला कोई व्यक्ति है तो उसे सांप्रदायिकता का प्रमाण पत्र दे दिया जाता है,लेकिन जब कई विद्वानों और इतिहासकारों का संबंध किसी वामपंथी संगठन से हो तो इनका कौमार्य भंग नहीं होता। अजीब विडंबना है देश का।

      मैं अपनी बात का शुरुआत 'भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद्' के साथ शुरू करता हूँ।

      बात जून-जूलाई 1998 की है,जब अपने आप को प्रगतिशील कहने वाले वामपंथी लेखकों और इतिहासकारों ने शोर मचाना शुरू कर दिया था कि भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् में राम मंदिर समर्थक इतिहासकार भर दिए गए हैं। उनकी जैसी आदत है,उन्होंने कपटजाल फैलाकर हलचल पैदा कर दी।


         मैंने कई इतिहासकारों के लिखे हुए किताब पढ़े ताकि तफ्तीश किया जा सके कि उसमें नया क्या है ? विपिन चंद्र,रोमिला थापर,इरफान हबीब,रामशरण शर्मा,सतीश चंद्रा,सुमित सरकार,डी. एन. झा आदि;ये मामूली बात आप भी जानते होंगे कि ये सभी-के-सभी प्रगतिशीलता के नाम पर एक ख़ास विचारधारा के झंडाबरदार रहे हैं। विपिन चंद्रा के किताब तो लगभग वे सभी पढ़ लेते हैं जो सिविल सेवा जैसे परीक्षा का तैयारी करना शुरू करते हैं,न जाने कैसे कपटजाल फैला दिया गया है कि इतिहास की किताब मतलब विपिन चंद्रा। ये वहीं चंद्रा हैं जो भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के लिए 'क्रांतिकारी आतंकवादी' शब्द का प्रयोग गर्व से किये हैं। सांप्रदायिकता पर इनके विचार तो एक ख़ास विचारधारा के लिए तो विद्वेष से भरा हुआ है,जबकि एक अन्य ख़ास समुदाय के लिए सहानूभूतिपूर्ण है।

        सुमित सरकार का कहना ही क्या ? आजादी के समय फैले दंगों में तो किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि ये स्वस्फूर्त थे,लेकिन इस तथ्य को जानते हुए भी इन्होंने खुलकर लिखा है,"कलकत्ता के दंगों में मरने वाले हिंदुओं के अपेक्षा मुसलमानों के संख्या अधिक थे।"

       सवाल स्पष्ट है - जब किसी उद्देश्य को लेकर इतिहास लेखन का कार्य किया जाए तो वह समरसता कैसे लाएगी ? उनकी इतिहास की किताबों,लेख-मालाओं में ही सबसे ज्यादा सांप्रदायिकता के आग को भड़काया। जब आप एक बहुसंख्यक समाज का तौहीन,गलती न रहते हुए भी करेंगे तो वह गरिमा के लिए कुछ भी करने को व्याकुल होगा ही। 'THE MYTH OF THE HOLY COW' में डी. एन. झा ने लिखा कि 'वैदिक जमाने में हिन्दू गाय का मांस खाते थे।' यह किस तरह का शोध है ? जब समाज आज गाय को पवित्र मान रहा है तो आप एक ख़ास तबके(अल्पसंख्यक) को संतुष्ट करने के लिए इसतरह का गलत और विवादित शोध कार्य कर रहे हैं और आस्था पर हमला भी कर रहे हैं। अब ऐसी घटनाएं सांप्रदायिकता को बढ़ाएगी नहीं तो क्या करेगी ?

       यह एक विश्वव्यापी सत्य है कि कल का प्रगतिशील आज अविचारशील रूढ़िवादी बन जाता है। इसलिए घबड़ाने की बात नहीं है;आज का समाज जो कभी इनके रचनाओं से इतना नफ़रत करता था,वो अब इनसभी का नाम लेना भी पसंद नहीं करता।

       अब आते हैं - भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् पर,जिसके वर्तमान में अध्यक्ष वाई सुदर्शन राव हैं जिनपर संघ समर्थक होने का धब्बा लगा दिया गया है। 1999-2001 तक इसके अध्यक्ष बी. आर. ग्रोवर थे जिनका परिचय मध्यकालीन भारत के प्रोफ़ेसर के रूप में था और जामिया मिलिया इस्लामिया में प्रोफ़ेसर थे।

       इस सवाल पर गौर किया जाना चाहिए कि रोमिला थापर परिषद् में चार बार कैसे नियुक्त हो गयी ? इरफान हबीब पांच बार,सतीश चंद्रा चार बार और एस.एन. गोपाल तीन बार......? ये सब कैसे हुआ ? जवाब है किसी के पास ?

      1998 जैसा ही हो-हल्ला,2014 में भी शुरू किया गया। न जाने क्यों ऐसा भाजपा का सरकार आने के बाद ही होता है ? 'द हिन्दू' नामक एक समाचार पत्र ने 'Choice of ICHR chief reignites saffronisation debate' नाम से एक रिपोर्ट छापा,जिसे आप नीचे लिंक में पढ़ सकते हैं कि किस तरह सुदर्शन राव पर आरोप लगाये गए। इसके बाद तो सिलसिला चल पड़ा। कई फालतू के क्षेत्रीय मुद्दों को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया गया और असहिष्णुता जैसा एक भयंकर शब्द को रचा गया,जबकि वास्तविकता ठीक इसके उलट थी।

अरुण शौरी लिखते हैं,'भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् जैसे प्रतिष्ठित संस्था पर इनलोगों का कब्ज़ा निश्चित ही बहुत बुरी बात थी। इन इतिहासकारों का बड़ा अपराध रहा कि ये सच को दबाने और झूठ को उजागर करने में हमेशा आपसी साझेदारी निभाई। ये केवल पक्षपाती इतिहासकार ही नहीं है,ये अव्वल दर्जे के भाई-भतीजावादी भी हैं। ये सभी आपस में एक-दूसरे के किताबों का प्रशंसा कर महान बन गए और ढोंग रचाते रहे।"
         जैसे कि 1998 में पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा एक मार्गनिर्देश जारी किया गया था कि इस बात का हवा बनाया जाए कि आर्यों के हमले से बौद्ध विहार नष्ट हो गए,जबकि वास्तविकता यह है कि आर्यों ने कोई हमला ही नहीं किया था। ऐसा ही एक और झूठ डी.एन. झा ने भी फैलाया कि प्राचीन भारत में हिन्दू गाय का मांस खाते थे,जिसका कमोवेश सभी वामपंथी इतिहासकारों ने समर्थन किया। वर्तमान में इसी तरह का एक झूठ और फैलाया गया कि असहिष्णुता तेजी से बढ़ रही है,पर न जाने क्यों बिहार चुनाव के बाद ये अचानक गायब हो गयी।

राम मंदिर का मुद्दा -

      1767 में जोसेफ टीफेनथेलर ने अपने शोध में कहा कि बाबरी मस्जिद राम का जन्मस्थान है,हिन्दू रामनवमी के दिन वहाँ पूजा करने जाते थे,लेकिन औरंगजेब ने इस प्रथा को तोड़ दिया और एक अलग स्थान दिया। ब्रिटिश स्त्रोतों के अनुसार भी हिन्दू और मुस्लिम दोनों बाबरी मस्जिद परिसर में पूजा करने जाते थे। यह 1870 में लिखा गया था।

      ऐसे ही कई किताबों में यह दावा किया गया है कि बाबरी मस्जिद पहले राम मंदिर था। के.के. मोहम्मद,जिन्होंने वर्षों तक 'Archaeological Survey Of India' में काम करने के बाद अपनी किताब 'njan enna bhartiyan'(I AM INDIAN) में लिखे कि बाबरी मस्जिद राम मंदिर के अवशेष पर ही खड़ा है। लेकिन वामपंथी इतिहासकार इसे झुठलाते रहे। खासतौर पर इन्होंने इरफान हबीब और रोमिला थापर पर निशाना साधा। वह तो मात्र एक कोरा क्षेत्रीय झूठ था जिसे राष्ट्रीय झूठ बना दिया गया है।

      आखिर सच ही कहा गया है कि एक झूठ को बार-बार बोलने से वह सच हो जाता है। नाजीवादी नेता गोयबल्स की उक्ति को इन वामपंथियों ने बखूबी अपने जेहन में उतारा है। 'राष्ट्रवाद का अयोध्याकांड' नामक किताब में आशिस नंदी,जिसका अनुवाद अभय कुमार दूबे द्वारा किया गया है,ये वहीं दूबे जी हैं जो आजकल खबरिया चैनलों पर आम आदमी पार्टी का समर्थन करते रहते हैं;जैसा लिखते हैं,"अवध की संस्कृति में राम की मान्यता एक राष्ट्र-नायक के रूप में थी।" वाह-जी-वाह,बहुत खूब। ये अगले पन्ना 26 पर लिखते हैं तीस अक्टूबर 1990 को अयोध्या में एक सभा हुयी जिसमें RSS से जुड़े विभिन्न उग्र हिन्दू संगठनों(विश्व हिन्दू परिषद्,अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्,बजरंग दल) के सदस्य शामिल हुए। इन्होंने रामजन्मभूमि को मुक्त कराने की बात कही,जिसका मतलब था बाबरी मस्जिद के मौजूदा ढाँचे को गिराकर ठीक उसी जगह मंदिर बनाने के लिए कारसेवा करना,ताकि अतीत में हिंदुओं के साथ हुए अन्याय का बदला लिया जा सके।"

       यह निहायत ही सत्य है,इसे मानने में भी कोई गुरेज नहीं,लेकिन किताब में जिस उद्देश्य को बताया गया है वह शंका पैदा कर ही देता है। खैर.......

       अब एक मुख्य सवाल जो सोचने पर मजबूर करती है,वह कि संघ जिसका सरोकार कभी भी किसी मंदिर से नहीं रहा,इसने न कभी कोई मंदिर बनाया और न ही कभी प्रयास किया तो फिर कब,कैसे और क्या हो गया ?

       अयोध्या में पिछले कुछ दिनों से कारसेवकों का नारा 'रामलला हम आएँगे,मंदिर यहीं बनाएँगे' गूंजने लगा था। पुलिस का प्रतिरोध बढ़ने लगा था जिसे कम करने के लिए युवा कारसेवकों ने नया नारा लगाना शुरू कर दिया था कि 'हिन्दू-हिन्दू भाई-भाई,बीच में वर्दी कहाँ से आयी।'

      'बच्चा-बच्चा राम का,जन्मभूमि के काम का' का नारा ज्यादा खतरा प्रतीत करता नजर नहीं आ रहा था,लेकिन जब विवादित ढाँचे पर एक बंदर को देखा गया तो ऐलान कर दिया गया कि रामजी के सेवक अमर हनुमान हमारे साथ हैं। कारसेवक जो त्रिशुल और डंडे लिए हुए थे उनके पास गर्व से भर देने वाला एक संकल्प था कि हर हालात में 'राष्ट्रीय शर्म के प्रतीक' को ध्वस्त करना ही है। तब क्या था ? ओज और तेजस्वी भाषणों ने शौर्य भर दिया,न चाहते हुए भी हिन्दू एकता का प्रतीक दल कदमताल मिलाकर ढाँचे की और बढ़ने लगा। कारसेवकों के मस्जिद की तरफ उमड़ने से पूरा ट्रैफिक जाम हो गया। गिरफ्तार कारसेवकों से भरी सरकारी बसें रुक गयी। इसी समय एक पुजारी ने एक बस को हाईजैक कर लिया जिसमें कारसेवक भरे थे। यह साहसपूर्ण कार्य ने आगे का रास्ता साफ़ कर दिया। तुरंत ही खबर फ़ैल गयी कि अशोक सिंहल घायल हो गये हैं। जिस कारण आंदोलन उग्रता को धारण कर लिया।

       'पुलिस हमारा भाई है,उससे नहीं लड़ाई है' की नारा ने रास्ता को आसान कर दिया। बाद में पुलिस वालों को कहना था कि निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने का कोई तुक नहीं थी,अगर ऐसा होता तो पूरी संभावना थी कि यह एक भयंकर हत्याकांड में बदल सकता था। उसके बाद जो हुआ वो सब तो हम जानते ही हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय तो इस मामले को और पेचीदा कर दिया है अभी यह सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

      लेकिन अब उस सवाल का जवाब देने का वक्त आ गया है कि यह आंदोलन ऐसा उग्र रूप कैसे धारण कर लिया ?

      आऊटलुक नामक पत्रिका जो आजकल अपने को सेकुलर और प्रगतिशीलता का प्रवक्ता समझ रहा है,ने यह आरोप दोहराया कि जिन इतिहासकारों को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् में नियुक्त किया गया था,उन सभी ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया कि बाबरी मस्जिद बनने से पहले वहाँ राम मंदिर था। कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि यह आरोप सही था,तो इनसभी को दोबारा भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् में नियुक्त क्यों नहीं किया गया ?

      केंद्र में चंद्रशेखर की सरकार ने प्रमाणों के आधार पर मामला सुलझाने के लिए बैठकें आयोजित की थी। इन वामपंथी इतिहासकारों ने शुरू-शुरू में भाग लिया,उन्होंने दस्तावेज पेश किये। और यह जल्द ही जाहिर हो गया कि विश्व हिन्दू परिषद् ने जो ढेर सारे पुरातात्विक,ऐतिहासिक और साहित्यिक प्रमाण प्रस्तुत किये हैं,उनसे उन वामपंथी दस्तावेजों का कोई विरोध नहीं था। जिसकारण विहिप के केस की और अधिक पुष्टि हो गयी।(चंद्रशेखर जून 1991 तक प्रधानमंत्री रहे थे और ध्यान रहे बाबरी मस्जिद ध्वंस 6 दिसंबर 1992 को हुआ था)

      जब इसपर विचार करने के लिए प्रधानमंत्री ने दोबारा से बैठको को बुलाया तो ये सभी वामपंथी इतिहासकार उपस्थित ही नहीं हुए और दुम दबाकर भाग गए। इनके पीछे हटते ही सरकार की पहलकदमी नाकाम हो गयी।

       यह घटना,इस बात को प्रमाणित करने के लिए काफी है कि मस्जिद के गिराए जाने का मार्ग जितना इन इतिहासकारों के भाग खड़े होने के कारण प्रशस्त हुए उतना और किसी कारण से नहीँ। संघ परिवार के कार्यों से भी नहीं क्योंकि यह शुरू से ही शांतिपूर्ण समाधान चाहता था।

इति सिद्धम् ।

 - सुरेश कुमार पाण्डेय

स्त्रोत -

1. Indian Council of Historical Research
2. भारत का स्वतंत्रता संघर्ष - विपिन चंद्रा(पेज-228)
3. आधुनिक भारत - सुमित सरकार(पेज-454)
4. THE MYTH OF THE HOLY COW - DN JHA.
5.  Beef eating in ancient India
6. wikipedia.org/chairperson of ichr
7. wikipedia.org/ram mandir
8. EMINENT HISTORIANS - अरुण शौरी
9. गूगल फॉर कॉमन मैटेरियल
10. THE HINDU/Choice of ICHR chief reignites saffronisation debate
11. आउटलुक
12. राष्ट्रवाद का अयोध्याकांड - आशिस नंदी
13. फ़ोटो- गूगल