Saturday, 20 August 2016

'सामाजिक प्रक्रिया' गलत दिशा में :सुधार की जरुरत -

         इन दिनों ऐसी घटनायें घटित हो रही है,जिससे लग रहा है कि समाज में असहिष्णुता और अनुदारता का ज्वार अपना सिर तेजी से उठाने लगी है,ऐसा कहना है कुछ वामपंथियों और छद्म सेकुलरजनों का। लेकिन सवाल कि क्या इन घटनाओं को असहिष्णुता से जोड़ा जा सकता है/था ?

         पुराने समय का कुछ उदाहरण से समझा जा सकता है जैसे कि वेन्दि डॉनिगर की किताब पर पाबन्दी और लेस्ली उडविन की डॉक्यूमेंट्री ''भारत की बेटी' के प्रसारण पर रोक। कुछ और जैसे - महाराष्ट्र में गोमांस पर पाबन्दी,तमिलनाडु में पुलुवर मुरुगेषन नामक लेखक पर हमला,नागालैन्ड में बलात्कार की आरोपी की हत्या,पानसरे नामक तर्कवादी का कत्ल जो टॉल के खिलाफ़ आंदोलन चला रहे थे,अपने पुरखों के धर्म में वापसी के लिये 'घर वापसी ' कार्यक्रम,दिल्ली में चर्च में तोड़फोड़,हरियाणा में पाठ्यक्रम में गीता को जगह आदि। 

          सबसे बढाकर दादरी की घटना,जहाँ गोमांस के नाम पर एक व्यक्ति को मार दिया गया,लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि हत्या गोमांस के नाम पर नहीं हुयी है,पर अब यह मामला कई करवटें ले चुका है। इन सब मामलों को लेकर जिस तरह से अवार्ड वापसी कार्यक्रम चला और भारत का नकारात्मक छवि पूरे दुनिया में पेश करने की कोशिश की गयी उसे किसी भी मायने से क्षम्य नहीं माना जा सकता।

         बहस को जारी करने से पहले कुछ बुनियादी बातों को समझ लें तो,आसानी होगी। 

         सामाजिक प्रक्रिया,समाज के उन तीन आधारों(अन्य दो है सामाजिक संरचना और सामाजिक स्तरीकरण) में से एक है जिसके बदौलत हम किसी भी समाज को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं,प्रकियाओं के द्वारा सामाजिक व्यवस्था को बनाने में मदद मिलती है,इसके तहत आते हैं -

-नये सदस्यों का सामाजिकरण,
-संचार की साझा प्रक्रिया,
-व्यक्ति की भूमिका निर्धारण के तरीके।
         वहीं सामाजिक संरचना,ईस तथ्य को दर्शाता है कि समाज विशिष्ट रुप में क्रमवार और नियमित है,यह केवल घटनाओं का अनियमित मिश्रण नहीं है। परंतु इसका इस्तेमाल अगर सख्ती के साथ किया गया तो समाज में विरोधाभास और गलतफाहमी पैदा होती है।

        महान समाजशास्त्री एमील दुर्खाइम (1858-1917) का कहना है, "समाज अपनी सदस्यों की क्रियाओं पर सामाजिक प्रतिबंध लगाते हैं।"और इसने तर्क दिया कि व्यक्ति पर समाज का प्रभुत्व होता है।

        कार्ल मार्क्स भी सामाजिक संरचना की बाध्यता पर बल देते हैं लेकिन सृजनात्मकता(creativity) को भी महत्वपूर्ण मानते हैं,जो सामाजिक संरचना को परिवर्तित भी करती है और उत्पादित भी। मार्क्स ने कहा कि " मनुष्य इतिहास बनाता है लेकिन वह इतिहास निर्माण न तो उसकी इच्छा पर और न ही उसकी मनपसंद शर्तों पर आधारित होता है।"

         कई लोगों से  यह कहते हुए सुना जा सकता है कि बुद्ध और महावीर ने अकेले समाज को परिवर्तित कर दिये,लेकिन वे अकसर ईस बात को भूल जाते हैं कि उनको सामाजिक मान्यता प्राप्त थी इसलिए समाज की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 

         अब बात आती है - उन मुद्दों की जिसकी चर्चा उपर्युक्त की गयी है,आपसभी उन मुद्दों की तह में जा सकते हैं जिससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि जिस तरह से एक सरकार विरोधी अजेंडा चलाया गया था और आज भी JNU  देशद्रोह प्रकरण के बाद चलाया जा रहा है ये सभी 'सामाजिक प्रक्रिया' के तहत किस प्रकार के समाज का निर्माण और लोगों का सामाजीकरण करेगे।

        यह इतना खतरनाक और घातक हो गया है कि जो देशद्रोही नारे काश्मीर की वादी में लगा करते थे वह आज देश के अन्य शांत इलाकों में भी लग रहे हैं। जादवपुर विश्वविद्यालय,बंगलौर और अन्य जगह तो इसके उदाहरण भर हैं,लेकिन जब इसके समर्थन में कुछेक लोग आकर बचाव कर रहे हैं तो स्थिति और विस्फोटक होती जा रही है।

        वर्तमान की देशविरोधी घटनाओं को देखते हुए इस आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि देश के खिलाफ एक अलग गैर-राष्ट्रवादी खेमा मजबूत हो जाएगा। ध्यान रहे कि राष्ट्रवाद देश को जोड़ने के साथ-साथ तोड़ने का भी काम करती है।

        इनसभी पर गौर फरमाने की जरुरत है ताकि भावी संकटों का सामना किया जा सके,नहीं तो काश्मीर जैसे हालात बाकी हिस्सों में बनते देर नहीं लगेगी।

         इसे रोकने का सबसे आसान और सस्ता तरीका है -
1. जनता में राष्ट्रवादी भावना का विकास करना और इनको राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाना ताकि जो भी जहाँ भी देशविरोधी बात करें उसको वहीं पर रोक सके,सबक सीखा सके।
2. देशद्रोह के क़ानून को और मजबूत करना और इसके परिभाषा को स्पष्ट करना।
3. मेरा मानना है कि इस देशद्रोह के क़ानून को कोर्ट ने कमजोर कर दिया है इसके आयाम को और बढ़ाने के लिए सन्सद द्वारा एक विस्तृत क़ानून लाने की जरुरत है।
4. राष्ट्रवादी प्रवृति के विकास के लिए स्वयंसेवी संस्था,सांस्कृतिक संगठन आदि का सहयोग लिया जाना चाहिए जैसे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(RSS) आदि जो समाज निर्माण में बखूबी योगदान दे रहा है।

                                             - सुरेश कुमार पाण्डेय