Sunday, 28 August 2016

यह गरीब आदिवासी अपनी पत्नी का लाश नहीं बल्कि भारतीय समाज और लोकतंत्र का जनाजा अपने कंधे पर ले जा रहा है -

तस्वीरें बहुत कुछ कहती है। अगर एक कदम आगे बढ़कर कहा जाए तो तस्वीरें कभी झूठ नहीं बोला करती। मीडिया के माध्यम से इस व्यक्ति की पहचान ओडिशा के एक गरीब आदिवासी दाना मांझी के रूप में हुयी है। टीबी के कारण इनकी पत्नी की मौत हो जाती है लेकिन पर्याप्त पैसा न होने के कारण अस्पताल एंबुलेंस देने से मना कर देता है,अपनी प्यारी पत्नी की लाश को अपने गाँव तक ले जाने का कोई रास्ता न देख खुद ही अपने कन्धों पर उठाकर अकेले ही लगभग बारह किलोमीटर तक ये यात्रा करने को मजबूर होते हैं।

इनपर तो बहुत कुछ लिखा जा चुका होगा और लिखा जाएगा और लिखा जा रहा है और हो सकता है इस कतार में मैं भी हूँ लेकिन क्या हम इस गरीब आदिवासी के चेहरे के शिकन को महसूस कर रहे हैं ? इनके साथ चल रही इनकी बेटी के चेहरे को उस दर्द को अपना दर्द समझ रहे हैं जो इनके आंसूओं में स्पष्ट दिखाई दे रहा है ? अगर नहीं तो हमसभी को समझ लेना चाहिए कि हमारे अंदर की मानवीयता अपना दम तोड़ रही है और हम जीता जगता लाश बनने के बहुत ही करीब हैं। यहीं वो वक्त है जब हम अपने में सुधार करके एक नयी मिसाल बनने का प्रयास करें।

इन तस्वीरों की दर्दनाकता का बयान तो खुले लफ्जों में नहीं किया जा सकता लेकिन यह लंबे समय तक हमारे सोच और बुध्दि को झकझोरती रहेगी।

हमारी इंसानियत तो कब का अंतिम सांस ले रही है और उस अवस्था में है जहां गंगाजल-तुलसी का सेवन एक ख़ास समुदाय के लोगों द्वारा किया जाता है। आपसभी को याद होगा कि लावारिश लाशें भारतीय रेलवे स्टेशनों के शौचालयों में यूं ही पड़ी रहती है,बोरे में बांधकर वो भी एक बांस से लटका हुआ लेकिन न प्रशासन का ध्यान उस ओर जाता है और न ही हम आम भारतीयों का। जाए भी कैसे हम मौकापरस्त जो हो गए हैं,हम उन लाशों के पास पेशाब करते हैं और अपना काम निपटाकर चलते बनते हैं।

आखिर कमी कहाँ हैं ? हमारी परवरिश में तो नहीं जो हमारे अंदर नैतिकता,सदाचारिता,मानवीयता और हमदर्दी के विकास में नाकाम रह रही है या उस समाज में जो परिवार द्वारा दिए हुए अच्छे शिक्षा को अपने महत्वाकांक्षा के आगे नेस्तानबूद कर दे रहा है ?
दो बातें जिस पर गौर करना बहुत ही जरूरी है,न कि केवल मुझे बल्कि आपसभी को,समाज को,प्रशासन को और समाज सुधारक संगठन आदि को भी।
पहला,क्या ये सभी समुदाय नाकामयाब रहे ? जब इस सवाल के बारे में मैंने सोचा तो मेरा पहला ध्यान सांस्कृतिक संगठन संघ की ओर गया जो समाज को लेकर लंबी-लंबी डींगे मारा करता है और सुधार तथा निर्माण का बात करता है। मैं मानता हूँ कि संघ द्वारा सरोकार के कई कार्य किये गये होंगे और किया जा भी रहा है लेकिन लाशों पर लोगों की चेतना को बदलने के लिए कोई कारगार उपाय क्यों नहीं कर सका और किया भी तो कोई सफलता हाथ क्यों न लगी ? यहीं सवाल उन तमाम संगठनों से भी करना चाहिए जो समाज निर्माण की बात करते हैं ? यह एक सामाजिक मसला है जिसका सामाधान हमारे पास है,हमारे ही समाज के अंदर है न कि प्रशासन के पास इसलिए क़ानून की कमी बताकर अपनी गलती छुपाने का कोई तुक नहीं।

दूसरा,क्या सुधार व्यक्तिगत स्तर पर संभव है ? मेरा मानना है कई मामलों में तो संभव है लेकिन कई दूसरे में नहीं। यहीं 'कई दूसरे' अपने में सुधार को लेकर एक व्यापक सामजिक विमर्श और सहयोग की मांग करते हैं। जो संभव है केवल और केवल सामाजिक आंदोलन से जिसका प्रारूप हमें आज देखने को मिल रहा है दलित आन्दोलनों(यह अपनी संकीर्णता के कारण उद्देश्य पाने में नाकामयाब रहता है) में और योगेंद्र यादव द्वारा संचालित स्वराज अभियान में जो कई अच्छे परिणाम लाये हैं।

आखिर क्या कारण रहा कि यह मजबूर व्यक्ति अपने कन्धों पर लाशों को उठाकर अपने गाँव लाने का प्रयास करता रहा ? इसके उत्तर के कई आयाम हो सकते हैं - धार्मिक,सामजिक और गरीबी आदि।

कुछ लोगों द्वारा कहा जाता है यह धार्मिक बनावट ही है जिसके फलस्वरूप अधिकाँश संसाधन पर सवर्णों का अधिकार बना हुआ है और ये क़ानून और नियम का निर्माण इस प्रकार करते हैं ताकि अनुसूचित जातियों और जनजातियों को वर्तमान न्याय व्यवस्था और नियम निर्मात्री संस्था से दूर किया जा सके। लेकिन मुझे यह संकीर्ण सोच का संकीर्ण व्याख्या लगता है क्योंकि समाज में कई ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी पहुँच इन संस्थाओं तक नहीं है और ये तथाकथित सवर्ण बिरादरी से ताल्लुकात भी रखते हैं।

सामाजिक स्तर पर व्याख्या का सार है - समाज लगभग संवेदनहीन होता जा रहा है न जाने किस डर से,जब ऐसी स्थिति है तो कैसे उम्मीद की जा सकती है कि यह अपने सदस्यों में संवेदनशीलता का विकास करेगा ?

इस प्रश्न या यों कहे कि ऐसे प्रश्नों का सबसे उपयुक्त उत्तर होगा - गरीबी। यहीं वह मुख्य कारण है जिसके कारण कोई भी व्यक्ति मजबूरी के किसी भी हद तक गिर सकता है,अपनी संवेदना खो सकता है और नैतिकता के विकास में नाकामयाब रह सकता है।

योजना आयोग द्वारा जून,2014 में प्रकाशित एक रिपोर्ट(REPORT OF THE EXPERT GROUP TO REVIEW THE METHODOLOGY FOR MEASUREMENT OF POVERTY) के अनुसार,भारत में 30.9% ग्रामीण जनसंख्या और 26.4% शहरी जनसंख्या 2011-12 में गरीबी रेखा से नीचे थी। अखिल भारतीय अनुपात 29.5% था। अगर संख्या में देखें तो ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबो का तादात 260.5 मिलियन था वहीं शहरी क्षेत्रों में 102.5 मिलियन। यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र पर काला धब्बा जी तरह है।

आजादी के इतने वर्षों बाद आलम यह है कि एक शख्स गरीबी के कारण अपनी पत्नी का लाश अकेले कंधे पर उठाकर ले जा रहा जिसे उठाने के लिए भी परंपरा के अनुसार चार लोगों की जरुरत होती है तो हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि वह अपनी पत्नी का लाश नहीं बल्कि भारतीय हिन्दू समाज और लोकतंत्र का जनाजा अपने कंधों पर ले जा रहा है जो भारतीय जनमत के लिए शर्मनाक और चुल्लूभर पानी में मर जाने जैसा है।

आखिर हमारा खून ऐसे मामलों को देखकर क्यों नहीं खौलता,शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली को देखकर क्यों नहीं खौलता ? कहीं हम भी तो उस बेबस नामर्द जैसे नहीं हो गए हैं जो अपनी सुविधा के अनुसार आवाज उठाते हैं बिलकुल उसी तरह जिस तरह कोई राजनीतिज्ञ,जिन्हें कोई अफसोस नहीं होता। हम गृहणी,छात्र और एक साधारण जन की आत्महत्या का खबर तो सून लेते हैं क्योंकि इनके पास अफसोस होता है,संवेदना होता है और दर्द है लेकिन एक राजनीतिज्ञ का नहीं। कारण भी स्पष्ट है ये भावात्मक रूप से सारी संवेदना को मार देते हैं इन्हें कुछ महसूस नहीं होता। इसलिए आपको तय करना है कि आप सिविल सोसाइटी का एक जिम्मेदार सदस्य बनना चाहते हैं या कुछ और ?

अगर हमारी सिविल सोसाइटी भी इसी अवस्था में है तो गंभीर संकट में है हम।

- सुरेश कुमार पाण्डेय