Wednesday, 17 August 2016

वर्तमान दलित आंदोलन के मायने और दिशा -

          यह निर्विवाद तथ्य है कि 'दलित आंदोलन' पनपने का मुख्य आधार भारतीय समाज का 'जाति-व्यवस्था' ही है। जाति-व्यवस्था या यों कहे कि वर्ण-व्यवस्था अपने आप में एक सामाजिक आदर्श है जो भारतीयता का प्रतीक और भारतीय समाज का मुख्य पहचान है,जिसमें उत्पन्न बुराइयों को सामाजिक स्तर पर ही दूर किये जाने का प्रयास करना चाहिए,पर दुर्भाग्य से इसे आज एक 'राजनीतिक आदर्श' बनाने की कोशिश की जा रही है। कई क्षेत्रों में कुछेक सफलता भी मिल चुकी है जो घातक साबित हो सकती है।



          प्रारंभिक दलित आंदोलन उन बुराइयों को दूर करने पर केंद्रित था जो समाज में उनकी दयनीय स्थिति के लिए उत्तरदायी थी। आंबेडकर,फूले और गुरु द्वारा चलाये गए आंदोलन एक मिसाल हैं लेकिन आज स्थिति यह हो गयी है कि सीधे-सीधे भारतीय सामाजिक व्यवस्था और बिना सोचे समझे तथाकथित सवर्ण समुदाय को निशाना बनाकर इनसभी को नेस्तानबूद करने का प्रयास किया जा रहा है जिसमें वामपंथियों का भी भरपूर सहयोग रह रहा है। रहे भी क्यों नहीं इन वामपंथियों का तो भारतीय लोकतंत्र में कभी आस्था रहा नहीं,देश विरोधी नारे लगाना और देश तोड़ने की बात करना तो इनकी पहचान है।

           यहां मैं ध्यान दिला दूं कि मेरा मानना यह नहीं है कि आंदोलन नहीं होना चाहिए और यथास्थिति को बनाये रखा जाना चाहिए,मैं कहना चाहता हूँ कि कोई भी आंदोलन तभी सफल होता है जब वो एक व्यापक आदर्श और उद्देश्य अपने साथ लिए हुए होता है,संकीर्णता आंदोलन के आत्मा को मारने के साथ-साथ भविष्य के लिए भी रास्ता बंद कर देता है।

          अगर आप बीते दो-तीन सालों के आंदोलन पर ध्यान देंगे तो उपर्युक्त बतायी गयी बातें ही दृष्टिगोचर होती है। चाहे रोहित वेमुला के आत्महत्या का मामला हो या अभी ऊना(गुजरात) में चल रहा आंदोलन,सभी के सभी संकीर्णता को धारण किये हुए है। यहीं वो कारण है कि वेमुला आत्महत्या के बाद उपजे आंदोलन से कुछ पाया नहीं जा सका और मुझे लगता है ऊना का अंत भी ऐसा ही होगा।

         अगर हम इतिहास पर निगाह डाले तो हमें पता चलता है कि भारतीय समाज की जाति-व्यवस्था में हमेशा ही गतिशीलता रही है। वैदिक काल के दौरान एक समय राजा सुदास शक्तिशाली थे जो आर्य थे लेकिन कुछ वर्षों के पश्चात ही की अनार्य राजा भी शक्ति प्राप्त करके शासन किये। यह प्रक्रिया हमेशा चलती रही जो कि एक सर्वव्यापी सत्य है। महाजनपद जिनकी संख्या अलग-अलग बतायी जाती रही है लेकिन अंगुत्तर निकाय में सोलह बताया गया है इनकी शक्तियों का भी ह्रास हुआ और इनका स्थान इनके द्वारा शासित किसी व्यक्ति द्वारा लिया गया।

         मौर्य काल के बाद जिस शुंग साम्राज्य का उदय हुआ उसका संस्थापक मौर्य राजा का सेनापति ही था। यहीं ट्रेंड हमें गुप्त काल में भी देखने को मिलता है। सल्तनत और मुग़लकाल के दौरान उत्पन कई साम्राज्य भी ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

         चालुक्य,चोल,गुर्जर-प्रतिहार,चौहान आदि ये सभी किसी-न-किसी के सामंत थे उनके अंदर रहकर काम किया करते थे लेकिन बाद में राजा बने। हमें ब्राह्मणों,यादवों,शूद्रों आदि के शक्तिशाली होने के और राजा बनने के प्रमाण मिलते हैं। एक इतिहासकार(माखन लाल) लिखते हैं - राजपूत कोई जातिगत पहचान नहीं था यह एक विशिष्ट ओहदा था जो लड़ाकू हैं और हथियार अपने पास रखते हैं वे राजपूत हैं। ये आपस में वैवाहिक संबंध भी बनाये हुए थे।

         कुल मिलाकर कहा जाए तो भारत में जाति स्थायी नहीं है बल्कि इसमें गतिशीलता है। आज का कोई वंचित और दलित समुदाय कल का संपन्न और शक्तिशाली बन जाता है और वहीं आज का शक्तिशाली पहचान आने वाले दिनों में धूमिल हो जाता है।
जिस तरह सामाजिक परिदृश्य तेजी से बदल रही है और ब्राह्मणों और अन्य संपन्न वर्ग का दशा दयनीय हो गयी है इसे देखते हुए यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि आने वाले 50-100 वर्षों में इनकी सामाजिक स्थिति दलितों जैसी हो जाएगी। यहीं सच्चाई है। जिसपर काबू तो पाया जा सकता है लेकिन बदला नहीं जा सकता।

        इस तरह यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि वर्तमान दलित आंदोलन जिस संकीर्ण उद्देश्य के साथ चल रहा है उसका कोई भविष्य नहीं है कोई दिशा नहीं है।
कारण स्पष्ट है - आरक्षण आंदोलन(पाटीदार,कोल और जाट) का अंत किस तरह हुआ सब जानते हैं ऐसे आंदोलन तो तात्कालीन प्रभाव छोड़ते हैं लेकिन दूरगामी नहीं।

- सुरेश कुमार पाण्डेय