Sunday, 21 August 2016

न्याय का तकाजा है आप अपनी छड़ी वहीं तक घुमा सकते हैं जहां से दूसरे की नाक शुरू हो जाती है -

        आकार पटेल,जिनका नाम आपमें से कईयों ने सुना होगा जो एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया कार्यकारी संचालक हैं। 
      
        कुछ दिनों से इनका नाम मीडिया में छाया हुआ है वो भी तब से जब से इस NGO के एक कार्यक्रम में देशविरोधी नारे लगाए गए। 


        इनके कई लेख और आर्टिकल तो मैं काफी दिनों से पढता आ रहा हूँ। इनके द्वारा लिखे गए कई लेखों में ये संघ का कई मोर्चों पर समर्थन करते रहे हैं। 

       लेकिन इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि आपके संगठन द्वारा किसी कार्यक्रम का आयोजन किया जाए और वहाँ देशविरोधी नारे लगे और आपके लोग इसे जस्टिफाई करने में लग जाए। 
यह सीधा-सीधा देश के खिलाफ द्रोह है,प्रत्यक्ष सन्देश है या तो आप ऐसे घटना रोकने में सहयोग करें या अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहें। 

        आज इनका एक आलेख बीबीसी हिंदी द्वारा छापा गया है,इसमें कई बातें ऐसी है जो काबिलेतारीफ है लेकिन कई तो काफी आपत्तिजनक है,जिसे आप दिए गए लिंक में पढ़ सकते हैं।
कुछ का चर्चा मैं यहां कर रहा हूँ,जैसे कि ये "क्या आपको भारत से प्यार है ?" में लिखते हैं - 

1. ये लिखते हैं - दूसरे की आस्था का भी इज्जत करना चाहिए,अब इनको कौन समझाये कि दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है जहां समस्त धर्मों और आस्थाओं का इज्जत सलीके से बहुसंख्यक हिंदुओं द्वारा किया जाता है। 
लेकिन जब आप भारत की विरासत संस्कृति पर अंगुली उठाएंगे तो और इसका अवहेलना करेंगे तो विरोध होगा ही,इसी का नमूना आज देश में देखने को मिल रहा है। इसे हम अपनी आस्था का इज्जत और धर्म को बचाने का व्यक्तिगत कर्तव्य कह सकते हैं न कि किसी दूसरे के खिलाफ विद्रोह। गाय को बचाने को लेकर चलाया जा रहा मुहीम,घर वापसी आदि इसी कर्तव्य का उदाहरण है। 

2. अपने आलेख में ये एक जगह लिखते हैं - जो सभी के भोजन को प्यार करता है,उसे वास्तव में भारत से प्यार है। अप्रत्यक्ष रूप से ये उन लोगों का समर्थन कर रहे हैं जो गाय का मांस खाते हैं,ऐसा करके ये एक की आस्था पर दूसरे के बुरी प्रवृति को तवज्जो दे रहे हैं। 
आप खुले विचार से सोच सकते हैं कि इनका कहना कहाँ तक उचित है ?

3. इस आलेख में लिखी गयी अन्य बातें काफी काबिलेतारीफ है - सभी को संविधान आत्मसात कर लेना चाहिए,खिलाड़ी राष्ट्रनिर्माण में विशेष योगदान नहीं देते,भाषा को प्यार आदि। 

        हालाँकि भारत का संविधान अभिव्यक्ति की आजादी तो सभी को देता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि वे दूसरे के अभिव्यक्ति को नजरअंदाज कर दें। इसलिए न्याय का तकाजा है आप अपनी छड़ी वहीं तक घुमा सकते हैं जहां से दूसरे की नाक शुरू हो जाती है।