Sunday, 28 August 2016

यह गरीब आदिवासी अपनी पत्नी का लाश नहीं बल्कि भारतीय समाज और लोकतंत्र का जनाजा अपने कंधे पर ले जा रहा है -

तस्वीरें बहुत कुछ कहती है। अगर एक कदम आगे बढ़कर कहा जाए तो तस्वीरें कभी झूठ नहीं बोला करती। मीडिया के माध्यम से इस व्यक्ति की पहचान ओडिशा के एक गरीब आदिवासी दाना मांझी के रूप में हुयी है। टीबी के कारण इनकी पत्नी की मौत हो जाती है लेकिन पर्याप्त पैसा न होने के कारण अस्पताल एंबुलेंस देने से मना कर देता है,अपनी प्यारी पत्नी की लाश को अपने गाँव तक ले जाने का कोई रास्ता न देख खुद ही अपने कन्धों पर उठाकर अकेले ही लगभग बारह किलोमीटर तक ये यात्रा करने को मजबूर होते हैं।

इनपर तो बहुत कुछ लिखा जा चुका होगा और लिखा जाएगा और लिखा जा रहा है और हो सकता है इस कतार में मैं भी हूँ लेकिन क्या हम इस गरीब आदिवासी के चेहरे के शिकन को महसूस कर रहे हैं ? इनके साथ चल रही इनकी बेटी के चेहरे को उस दर्द को अपना दर्द समझ रहे हैं जो इनके आंसूओं में स्पष्ट दिखाई दे रहा है ? अगर नहीं तो हमसभी को समझ लेना चाहिए कि हमारे अंदर की मानवीयता अपना दम तोड़ रही है और हम जीता जगता लाश बनने के बहुत ही करीब हैं। यहीं वो वक्त है जब हम अपने में सुधार करके एक नयी मिसाल बनने का प्रयास करें।

इन तस्वीरों की दर्दनाकता का बयान तो खुले लफ्जों में नहीं किया जा सकता लेकिन यह लंबे समय तक हमारे सोच और बुध्दि को झकझोरती रहेगी।

हमारी इंसानियत तो कब का अंतिम सांस ले रही है और उस अवस्था में है जहां गंगाजल-तुलसी का सेवन एक ख़ास समुदाय के लोगों द्वारा किया जाता है। आपसभी को याद होगा कि लावारिश लाशें भारतीय रेलवे स्टेशनों के शौचालयों में यूं ही पड़ी रहती है,बोरे में बांधकर वो भी एक बांस से लटका हुआ लेकिन न प्रशासन का ध्यान उस ओर जाता है और न ही हम आम भारतीयों का। जाए भी कैसे हम मौकापरस्त जो हो गए हैं,हम उन लाशों के पास पेशाब करते हैं और अपना काम निपटाकर चलते बनते हैं।

आखिर कमी कहाँ हैं ? हमारी परवरिश में तो नहीं जो हमारे अंदर नैतिकता,सदाचारिता,मानवीयता और हमदर्दी के विकास में नाकाम रह रही है या उस समाज में जो परिवार द्वारा दिए हुए अच्छे शिक्षा को अपने महत्वाकांक्षा के आगे नेस्तानबूद कर दे रहा है ?
दो बातें जिस पर गौर करना बहुत ही जरूरी है,न कि केवल मुझे बल्कि आपसभी को,समाज को,प्रशासन को और समाज सुधारक संगठन आदि को भी।
पहला,क्या ये सभी समुदाय नाकामयाब रहे ? जब इस सवाल के बारे में मैंने सोचा तो मेरा पहला ध्यान सांस्कृतिक संगठन संघ की ओर गया जो समाज को लेकर लंबी-लंबी डींगे मारा करता है और सुधार तथा निर्माण का बात करता है। मैं मानता हूँ कि संघ द्वारा सरोकार के कई कार्य किये गये होंगे और किया जा भी रहा है लेकिन लाशों पर लोगों की चेतना को बदलने के लिए कोई कारगार उपाय क्यों नहीं कर सका और किया भी तो कोई सफलता हाथ क्यों न लगी ? यहीं सवाल उन तमाम संगठनों से भी करना चाहिए जो समाज निर्माण की बात करते हैं ? यह एक सामाजिक मसला है जिसका सामाधान हमारे पास है,हमारे ही समाज के अंदर है न कि प्रशासन के पास इसलिए क़ानून की कमी बताकर अपनी गलती छुपाने का कोई तुक नहीं।

दूसरा,क्या सुधार व्यक्तिगत स्तर पर संभव है ? मेरा मानना है कई मामलों में तो संभव है लेकिन कई दूसरे में नहीं। यहीं 'कई दूसरे' अपने में सुधार को लेकर एक व्यापक सामजिक विमर्श और सहयोग की मांग करते हैं। जो संभव है केवल और केवल सामाजिक आंदोलन से जिसका प्रारूप हमें आज देखने को मिल रहा है दलित आन्दोलनों(यह अपनी संकीर्णता के कारण उद्देश्य पाने में नाकामयाब रहता है) में और योगेंद्र यादव द्वारा संचालित स्वराज अभियान में जो कई अच्छे परिणाम लाये हैं।

आखिर क्या कारण रहा कि यह मजबूर व्यक्ति अपने कन्धों पर लाशों को उठाकर अपने गाँव लाने का प्रयास करता रहा ? इसके उत्तर के कई आयाम हो सकते हैं - धार्मिक,सामजिक और गरीबी आदि।

कुछ लोगों द्वारा कहा जाता है यह धार्मिक बनावट ही है जिसके फलस्वरूप अधिकाँश संसाधन पर सवर्णों का अधिकार बना हुआ है और ये क़ानून और नियम का निर्माण इस प्रकार करते हैं ताकि अनुसूचित जातियों और जनजातियों को वर्तमान न्याय व्यवस्था और नियम निर्मात्री संस्था से दूर किया जा सके। लेकिन मुझे यह संकीर्ण सोच का संकीर्ण व्याख्या लगता है क्योंकि समाज में कई ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी पहुँच इन संस्थाओं तक नहीं है और ये तथाकथित सवर्ण बिरादरी से ताल्लुकात भी रखते हैं।

सामाजिक स्तर पर व्याख्या का सार है - समाज लगभग संवेदनहीन होता जा रहा है न जाने किस डर से,जब ऐसी स्थिति है तो कैसे उम्मीद की जा सकती है कि यह अपने सदस्यों में संवेदनशीलता का विकास करेगा ?

इस प्रश्न या यों कहे कि ऐसे प्रश्नों का सबसे उपयुक्त उत्तर होगा - गरीबी। यहीं वह मुख्य कारण है जिसके कारण कोई भी व्यक्ति मजबूरी के किसी भी हद तक गिर सकता है,अपनी संवेदना खो सकता है और नैतिकता के विकास में नाकामयाब रह सकता है।

योजना आयोग द्वारा जून,2014 में प्रकाशित एक रिपोर्ट(REPORT OF THE EXPERT GROUP TO REVIEW THE METHODOLOGY FOR MEASUREMENT OF POVERTY) के अनुसार,भारत में 30.9% ग्रामीण जनसंख्या और 26.4% शहरी जनसंख्या 2011-12 में गरीबी रेखा से नीचे थी। अखिल भारतीय अनुपात 29.5% था। अगर संख्या में देखें तो ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबो का तादात 260.5 मिलियन था वहीं शहरी क्षेत्रों में 102.5 मिलियन। यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र पर काला धब्बा जी तरह है।

आजादी के इतने वर्षों बाद आलम यह है कि एक शख्स गरीबी के कारण अपनी पत्नी का लाश अकेले कंधे पर उठाकर ले जा रहा जिसे उठाने के लिए भी परंपरा के अनुसार चार लोगों की जरुरत होती है तो हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि वह अपनी पत्नी का लाश नहीं बल्कि भारतीय हिन्दू समाज और लोकतंत्र का जनाजा अपने कंधों पर ले जा रहा है जो भारतीय जनमत के लिए शर्मनाक और चुल्लूभर पानी में मर जाने जैसा है।

आखिर हमारा खून ऐसे मामलों को देखकर क्यों नहीं खौलता,शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली को देखकर क्यों नहीं खौलता ? कहीं हम भी तो उस बेबस नामर्द जैसे नहीं हो गए हैं जो अपनी सुविधा के अनुसार आवाज उठाते हैं बिलकुल उसी तरह जिस तरह कोई राजनीतिज्ञ,जिन्हें कोई अफसोस नहीं होता। हम गृहणी,छात्र और एक साधारण जन की आत्महत्या का खबर तो सून लेते हैं क्योंकि इनके पास अफसोस होता है,संवेदना होता है और दर्द है लेकिन एक राजनीतिज्ञ का नहीं। कारण भी स्पष्ट है ये भावात्मक रूप से सारी संवेदना को मार देते हैं इन्हें कुछ महसूस नहीं होता। इसलिए आपको तय करना है कि आप सिविल सोसाइटी का एक जिम्मेदार सदस्य बनना चाहते हैं या कुछ और ?

अगर हमारी सिविल सोसाइटी भी इसी अवस्था में है तो गंभीर संकट में है हम।

- सुरेश कुमार पाण्डेय

Sunday, 21 August 2016

न्याय का तकाजा है आप अपनी छड़ी वहीं तक घुमा सकते हैं जहां से दूसरे की नाक शुरू हो जाती है -

        आकार पटेल,जिनका नाम आपमें से कईयों ने सुना होगा जो एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया कार्यकारी संचालक हैं। 
      
        कुछ दिनों से इनका नाम मीडिया में छाया हुआ है वो भी तब से जब से इस NGO के एक कार्यक्रम में देशविरोधी नारे लगाए गए। 


        इनके कई लेख और आर्टिकल तो मैं काफी दिनों से पढता आ रहा हूँ। इनके द्वारा लिखे गए कई लेखों में ये संघ का कई मोर्चों पर समर्थन करते रहे हैं। 

       लेकिन इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि आपके संगठन द्वारा किसी कार्यक्रम का आयोजन किया जाए और वहाँ देशविरोधी नारे लगे और आपके लोग इसे जस्टिफाई करने में लग जाए। 
यह सीधा-सीधा देश के खिलाफ द्रोह है,प्रत्यक्ष सन्देश है या तो आप ऐसे घटना रोकने में सहयोग करें या अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहें। 

        आज इनका एक आलेख बीबीसी हिंदी द्वारा छापा गया है,इसमें कई बातें ऐसी है जो काबिलेतारीफ है लेकिन कई तो काफी आपत्तिजनक है,जिसे आप दिए गए लिंक में पढ़ सकते हैं।
कुछ का चर्चा मैं यहां कर रहा हूँ,जैसे कि ये "क्या आपको भारत से प्यार है ?" में लिखते हैं - 

1. ये लिखते हैं - दूसरे की आस्था का भी इज्जत करना चाहिए,अब इनको कौन समझाये कि दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है जहां समस्त धर्मों और आस्थाओं का इज्जत सलीके से बहुसंख्यक हिंदुओं द्वारा किया जाता है। 
लेकिन जब आप भारत की विरासत संस्कृति पर अंगुली उठाएंगे तो और इसका अवहेलना करेंगे तो विरोध होगा ही,इसी का नमूना आज देश में देखने को मिल रहा है। इसे हम अपनी आस्था का इज्जत और धर्म को बचाने का व्यक्तिगत कर्तव्य कह सकते हैं न कि किसी दूसरे के खिलाफ विद्रोह। गाय को बचाने को लेकर चलाया जा रहा मुहीम,घर वापसी आदि इसी कर्तव्य का उदाहरण है। 

2. अपने आलेख में ये एक जगह लिखते हैं - जो सभी के भोजन को प्यार करता है,उसे वास्तव में भारत से प्यार है। अप्रत्यक्ष रूप से ये उन लोगों का समर्थन कर रहे हैं जो गाय का मांस खाते हैं,ऐसा करके ये एक की आस्था पर दूसरे के बुरी प्रवृति को तवज्जो दे रहे हैं। 
आप खुले विचार से सोच सकते हैं कि इनका कहना कहाँ तक उचित है ?

3. इस आलेख में लिखी गयी अन्य बातें काफी काबिलेतारीफ है - सभी को संविधान आत्मसात कर लेना चाहिए,खिलाड़ी राष्ट्रनिर्माण में विशेष योगदान नहीं देते,भाषा को प्यार आदि। 

        हालाँकि भारत का संविधान अभिव्यक्ति की आजादी तो सभी को देता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि वे दूसरे के अभिव्यक्ति को नजरअंदाज कर दें। इसलिए न्याय का तकाजा है आप अपनी छड़ी वहीं तक घुमा सकते हैं जहां से दूसरे की नाक शुरू हो जाती है।    

Saturday, 20 August 2016

'सामाजिक प्रक्रिया' गलत दिशा में :सुधार की जरुरत -

         इन दिनों ऐसी घटनायें घटित हो रही है,जिससे लग रहा है कि समाज में असहिष्णुता और अनुदारता का ज्वार अपना सिर तेजी से उठाने लगी है,ऐसा कहना है कुछ वामपंथियों और छद्म सेकुलरजनों का। लेकिन सवाल कि क्या इन घटनाओं को असहिष्णुता से जोड़ा जा सकता है/था ?

         पुराने समय का कुछ उदाहरण से समझा जा सकता है जैसे कि वेन्दि डॉनिगर की किताब पर पाबन्दी और लेस्ली उडविन की डॉक्यूमेंट्री ''भारत की बेटी' के प्रसारण पर रोक। कुछ और जैसे - महाराष्ट्र में गोमांस पर पाबन्दी,तमिलनाडु में पुलुवर मुरुगेषन नामक लेखक पर हमला,नागालैन्ड में बलात्कार की आरोपी की हत्या,पानसरे नामक तर्कवादी का कत्ल जो टॉल के खिलाफ़ आंदोलन चला रहे थे,अपने पुरखों के धर्म में वापसी के लिये 'घर वापसी ' कार्यक्रम,दिल्ली में चर्च में तोड़फोड़,हरियाणा में पाठ्यक्रम में गीता को जगह आदि। 

          सबसे बढाकर दादरी की घटना,जहाँ गोमांस के नाम पर एक व्यक्ति को मार दिया गया,लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि हत्या गोमांस के नाम पर नहीं हुयी है,पर अब यह मामला कई करवटें ले चुका है। इन सब मामलों को लेकर जिस तरह से अवार्ड वापसी कार्यक्रम चला और भारत का नकारात्मक छवि पूरे दुनिया में पेश करने की कोशिश की गयी उसे किसी भी मायने से क्षम्य नहीं माना जा सकता।

         बहस को जारी करने से पहले कुछ बुनियादी बातों को समझ लें तो,आसानी होगी। 

         सामाजिक प्रक्रिया,समाज के उन तीन आधारों(अन्य दो है सामाजिक संरचना और सामाजिक स्तरीकरण) में से एक है जिसके बदौलत हम किसी भी समाज को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं,प्रकियाओं के द्वारा सामाजिक व्यवस्था को बनाने में मदद मिलती है,इसके तहत आते हैं -

-नये सदस्यों का सामाजिकरण,
-संचार की साझा प्रक्रिया,
-व्यक्ति की भूमिका निर्धारण के तरीके।
         वहीं सामाजिक संरचना,ईस तथ्य को दर्शाता है कि समाज विशिष्ट रुप में क्रमवार और नियमित है,यह केवल घटनाओं का अनियमित मिश्रण नहीं है। परंतु इसका इस्तेमाल अगर सख्ती के साथ किया गया तो समाज में विरोधाभास और गलतफाहमी पैदा होती है।

        महान समाजशास्त्री एमील दुर्खाइम (1858-1917) का कहना है, "समाज अपनी सदस्यों की क्रियाओं पर सामाजिक प्रतिबंध लगाते हैं।"और इसने तर्क दिया कि व्यक्ति पर समाज का प्रभुत्व होता है।

        कार्ल मार्क्स भी सामाजिक संरचना की बाध्यता पर बल देते हैं लेकिन सृजनात्मकता(creativity) को भी महत्वपूर्ण मानते हैं,जो सामाजिक संरचना को परिवर्तित भी करती है और उत्पादित भी। मार्क्स ने कहा कि " मनुष्य इतिहास बनाता है लेकिन वह इतिहास निर्माण न तो उसकी इच्छा पर और न ही उसकी मनपसंद शर्तों पर आधारित होता है।"

         कई लोगों से  यह कहते हुए सुना जा सकता है कि बुद्ध और महावीर ने अकेले समाज को परिवर्तित कर दिये,लेकिन वे अकसर ईस बात को भूल जाते हैं कि उनको सामाजिक मान्यता प्राप्त थी इसलिए समाज की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 

         अब बात आती है - उन मुद्दों की जिसकी चर्चा उपर्युक्त की गयी है,आपसभी उन मुद्दों की तह में जा सकते हैं जिससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि जिस तरह से एक सरकार विरोधी अजेंडा चलाया गया था और आज भी JNU  देशद्रोह प्रकरण के बाद चलाया जा रहा है ये सभी 'सामाजिक प्रक्रिया' के तहत किस प्रकार के समाज का निर्माण और लोगों का सामाजीकरण करेगे।

        यह इतना खतरनाक और घातक हो गया है कि जो देशद्रोही नारे काश्मीर की वादी में लगा करते थे वह आज देश के अन्य शांत इलाकों में भी लग रहे हैं। जादवपुर विश्वविद्यालय,बंगलौर और अन्य जगह तो इसके उदाहरण भर हैं,लेकिन जब इसके समर्थन में कुछेक लोग आकर बचाव कर रहे हैं तो स्थिति और विस्फोटक होती जा रही है।

        वर्तमान की देशविरोधी घटनाओं को देखते हुए इस आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि देश के खिलाफ एक अलग गैर-राष्ट्रवादी खेमा मजबूत हो जाएगा। ध्यान रहे कि राष्ट्रवाद देश को जोड़ने के साथ-साथ तोड़ने का भी काम करती है।

        इनसभी पर गौर फरमाने की जरुरत है ताकि भावी संकटों का सामना किया जा सके,नहीं तो काश्मीर जैसे हालात बाकी हिस्सों में बनते देर नहीं लगेगी।

         इसे रोकने का सबसे आसान और सस्ता तरीका है -
1. जनता में राष्ट्रवादी भावना का विकास करना और इनको राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाना ताकि जो भी जहाँ भी देशविरोधी बात करें उसको वहीं पर रोक सके,सबक सीखा सके।
2. देशद्रोह के क़ानून को और मजबूत करना और इसके परिभाषा को स्पष्ट करना।
3. मेरा मानना है कि इस देशद्रोह के क़ानून को कोर्ट ने कमजोर कर दिया है इसके आयाम को और बढ़ाने के लिए सन्सद द्वारा एक विस्तृत क़ानून लाने की जरुरत है।
4. राष्ट्रवादी प्रवृति के विकास के लिए स्वयंसेवी संस्था,सांस्कृतिक संगठन आदि का सहयोग लिया जाना चाहिए जैसे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(RSS) आदि जो समाज निर्माण में बखूबी योगदान दे रहा है।

                                             - सुरेश कुमार पाण्डेय 

पटना के 'इको पार्क' का एक रूप यह भी -

        इसकी कलात्मक खुबसूरती आपको मोह सकती है। पुनाई चौक,पटना से वाकिंग डिस्टेंस पर स्थित इस पार्क  का शुभारंभ 2011 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा किया गया था। इसकी देखरेख बिहार के पर्यावरण और जंगल विभाग के अंतर्गत है। इस पार्क का दूसरा नाम 'राजधानी वाटिका' भी है।

इस पार्क के मायने अलग-अलग व्यक्तियों के लिए भिन्न है पर अधिकांश का उद्देश्य एक ही है जो कभी वहाँ गए होंगे वे अच्छी तरह इस उद्देश्य से वाकिफ होंगे,ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है।

यहां मौजूद वह कलाकृति जो यहां की आकर्षणमकता को बढा देता है,इसे देखकर प्रयास को सराहनीय कहा जा सकता है।

इसी में मौजूद एक कलाकृति है - ऊपर अनंत में विराजमान किसी देवों,मनुष्यों और कोई अन्य से कुछ मांगती हुयी महिला का यह तस्वीर(बनाने वाले ने आपके ऊपर छोर दिया है कि आप कैसा कयास लगाते हैं)।




कुछ ही दूरी पर स्थित डायना हेगन का कलाकृति तो अपने आप में आदर्श को छिपाए रखा है -


रजत घोष की उपस्थिति तो वाटिका की कलाकृति में चार चाँद लगा देता है-

 


सबसे आकर्षक जो लगभग सभी को लुभाता है,वह है - पार्क के दो भागों को जोड़ने वाला अंदरवे जिसमें लोगों जिनमें अधिकांश टीनऐजर हैं की किलकारियां और मजे में चिल्लाने की आवाज गूंजती रहती है।


नालंदा में मौजूद खंडहर के एक छोटे रूप का भी दर्शन हम इस वाटिका में करते हैं,जिसके तहत बिहार की विरासत को दिखाने का प्रयास किया गया है।


कई अन्य कलाकृतियां जो मन को मोह लेती है जिसे बड़े ही अदब से बनाया गया है।
 


पार्क के दोनों भागों में स्थित सरोवर और नाव की सवारी पूरे वाटिका को नए आयाम देने का प्रयास करते हैं।
 

रजत घोष के पास एक हमारी तस्वीर -


सभी फोटो - सुरेश कुमार पाण्डेय
लिखा गया - सुरेश कुमार पाण्डेय(20 अगस्त ,2016)
फोटो का समय - मार्च,2016   

Wednesday, 17 August 2016

वर्तमान दलित आंदोलन के मायने और दिशा -

          यह निर्विवाद तथ्य है कि 'दलित आंदोलन' पनपने का मुख्य आधार भारतीय समाज का 'जाति-व्यवस्था' ही है। जाति-व्यवस्था या यों कहे कि वर्ण-व्यवस्था अपने आप में एक सामाजिक आदर्श है जो भारतीयता का प्रतीक और भारतीय समाज का मुख्य पहचान है,जिसमें उत्पन्न बुराइयों को सामाजिक स्तर पर ही दूर किये जाने का प्रयास करना चाहिए,पर दुर्भाग्य से इसे आज एक 'राजनीतिक आदर्श' बनाने की कोशिश की जा रही है। कई क्षेत्रों में कुछेक सफलता भी मिल चुकी है जो घातक साबित हो सकती है।



          प्रारंभिक दलित आंदोलन उन बुराइयों को दूर करने पर केंद्रित था जो समाज में उनकी दयनीय स्थिति के लिए उत्तरदायी थी। आंबेडकर,फूले और गुरु द्वारा चलाये गए आंदोलन एक मिसाल हैं लेकिन आज स्थिति यह हो गयी है कि सीधे-सीधे भारतीय सामाजिक व्यवस्था और बिना सोचे समझे तथाकथित सवर्ण समुदाय को निशाना बनाकर इनसभी को नेस्तानबूद करने का प्रयास किया जा रहा है जिसमें वामपंथियों का भी भरपूर सहयोग रह रहा है। रहे भी क्यों नहीं इन वामपंथियों का तो भारतीय लोकतंत्र में कभी आस्था रहा नहीं,देश विरोधी नारे लगाना और देश तोड़ने की बात करना तो इनकी पहचान है।

           यहां मैं ध्यान दिला दूं कि मेरा मानना यह नहीं है कि आंदोलन नहीं होना चाहिए और यथास्थिति को बनाये रखा जाना चाहिए,मैं कहना चाहता हूँ कि कोई भी आंदोलन तभी सफल होता है जब वो एक व्यापक आदर्श और उद्देश्य अपने साथ लिए हुए होता है,संकीर्णता आंदोलन के आत्मा को मारने के साथ-साथ भविष्य के लिए भी रास्ता बंद कर देता है।

          अगर आप बीते दो-तीन सालों के आंदोलन पर ध्यान देंगे तो उपर्युक्त बतायी गयी बातें ही दृष्टिगोचर होती है। चाहे रोहित वेमुला के आत्महत्या का मामला हो या अभी ऊना(गुजरात) में चल रहा आंदोलन,सभी के सभी संकीर्णता को धारण किये हुए है। यहीं वो कारण है कि वेमुला आत्महत्या के बाद उपजे आंदोलन से कुछ पाया नहीं जा सका और मुझे लगता है ऊना का अंत भी ऐसा ही होगा।

         अगर हम इतिहास पर निगाह डाले तो हमें पता चलता है कि भारतीय समाज की जाति-व्यवस्था में हमेशा ही गतिशीलता रही है। वैदिक काल के दौरान एक समय राजा सुदास शक्तिशाली थे जो आर्य थे लेकिन कुछ वर्षों के पश्चात ही की अनार्य राजा भी शक्ति प्राप्त करके शासन किये। यह प्रक्रिया हमेशा चलती रही जो कि एक सर्वव्यापी सत्य है। महाजनपद जिनकी संख्या अलग-अलग बतायी जाती रही है लेकिन अंगुत्तर निकाय में सोलह बताया गया है इनकी शक्तियों का भी ह्रास हुआ और इनका स्थान इनके द्वारा शासित किसी व्यक्ति द्वारा लिया गया।

         मौर्य काल के बाद जिस शुंग साम्राज्य का उदय हुआ उसका संस्थापक मौर्य राजा का सेनापति ही था। यहीं ट्रेंड हमें गुप्त काल में भी देखने को मिलता है। सल्तनत और मुग़लकाल के दौरान उत्पन कई साम्राज्य भी ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

         चालुक्य,चोल,गुर्जर-प्रतिहार,चौहान आदि ये सभी किसी-न-किसी के सामंत थे उनके अंदर रहकर काम किया करते थे लेकिन बाद में राजा बने। हमें ब्राह्मणों,यादवों,शूद्रों आदि के शक्तिशाली होने के और राजा बनने के प्रमाण मिलते हैं। एक इतिहासकार(माखन लाल) लिखते हैं - राजपूत कोई जातिगत पहचान नहीं था यह एक विशिष्ट ओहदा था जो लड़ाकू हैं और हथियार अपने पास रखते हैं वे राजपूत हैं। ये आपस में वैवाहिक संबंध भी बनाये हुए थे।

         कुल मिलाकर कहा जाए तो भारत में जाति स्थायी नहीं है बल्कि इसमें गतिशीलता है। आज का कोई वंचित और दलित समुदाय कल का संपन्न और शक्तिशाली बन जाता है और वहीं आज का शक्तिशाली पहचान आने वाले दिनों में धूमिल हो जाता है।
जिस तरह सामाजिक परिदृश्य तेजी से बदल रही है और ब्राह्मणों और अन्य संपन्न वर्ग का दशा दयनीय हो गयी है इसे देखते हुए यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि आने वाले 50-100 वर्षों में इनकी सामाजिक स्थिति दलितों जैसी हो जाएगी। यहीं सच्चाई है। जिसपर काबू तो पाया जा सकता है लेकिन बदला नहीं जा सकता।

        इस तरह यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि वर्तमान दलित आंदोलन जिस संकीर्ण उद्देश्य के साथ चल रहा है उसका कोई भविष्य नहीं है कोई दिशा नहीं है।
कारण स्पष्ट है - आरक्षण आंदोलन(पाटीदार,कोल और जाट) का अंत किस तरह हुआ सब जानते हैं ऐसे आंदोलन तो तात्कालीन प्रभाव छोड़ते हैं लेकिन दूरगामी नहीं।

- सुरेश कुमार पाण्डेय