Thursday, 5 May 2016

क्रांतिकारियों का अपने मौत मर जाना

          मार्क्सवाद एक ऐसा दर्शन है,जो प्रारंभ में सब्जबाग दिखाकर तो एक कट्टर व्यक्तित्व का निर्माण करता है,लेकिंन बहुत जल्द ही इस दर्शन के आधार पर बने क्रांतिकारियों का दिल और दिमाग बदल जाता है। शेर की तरह दहाड़ने वाले ये क्रांतिकारी कुत्तों की मौत मरने लगते हैं,जिनकी दुर्दशा इतनी घटिया हो जाती है कि अकसर लोगों द्वारा सुनने में आता है कि 'वामपंथी क्रांतिकारी न घर का न घाट का।'


           अभी हाल में क्रांतिकारी के रूप में एक नया चेहरा सामने आया है जिसका पहचान जेएनयू के छात्रसंघ के वर्तमान अध्यक्ष के रूप में है। नौ फरवरी की घटना के बाद निःसंदेह इसका कद बढ़ा है। इसमें कोई शक नहीं कि इसे हीरो बनाने वाले भारत के कर्णधार और मसीहा के रूप में पेश करने लगे हैं। देशद्रोह जैसे संगीन अपराध के इस आरोपी का जब जमानत मंजूर कर लिया गया तो जेएनयू परिसर में कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले छात्रों ने इसकी तुलना भगवान कृष्ण से कर डाली। बस क्या था ? यहीं से वामपंथ का घिनौना चेहरा सामने आने लगा।

           एक ऐसा दर्शन जो धर्म,जाति,परंपरा आदि जैसे शब्दों को नहीं मानता,वह इसे तथ्य कहकर नकार देता है और कहता है कि हम सच्चाई के लिए लड़ते हैं। आर्थिक समानता की बात करते हैं। भूखमरी की बात करते हैं। गरीबी की बात करते हैं।

           हो सकता है,ये सही हो,परन्तु यह क्यों छिपा लेते हो कि तुम देश-तोड़ने की बात करते हो,राष्ट्रवाद को नहीं मानते हो,केवल हिन्दू परंपरा को फासीवादी कहते हो,सड़ी विचारधारा पर लोगों को छलते हो,मूर्ख बनाते हो ?

          अगर ऐसा नहीं करते तो शुरुआत अपने घर से क्यों नहीं करते ? किसी भी वामपंथी नेता का नाम बता सकते हो जो अपनी जाति और धर्म के इतर शादी किया है,रिश्तेदारी बनाया है और अपने रीति-रिवाजों को नकारा है। जवाब है - नहीं । क्योंकि ऊपर से तुम सब वामपंथ का जो केंचुल ओढ़े क्रांतिकारी होने का जो बात करते हो,वह झूठ का पुलिंदा है,मक्कारी है,धोखा है और लोगों को विदेशी हाथों में गिरवी रखने जैसा है।

         जिस दिन जरुरत पड़ती है उसी दिन यह केंचुल धीरे-धीरे उतारने लगते हो। हज की यात्रा करते हो,शादी अपने कुल में ही करते हो,दलितों के उत्थान के लिए केवल नारेबाजी करते हो। केरल और बंगाल स्पष्ट उदाहरण है।

         धर्म,जाति और परंपरा के नाम पर तो वामपंथी क्रांतिकारियों का दक्षिणपंथी चेहरा सामने आ ही जाता है।

          तब काहे का विरोध करते हो कॉमरेड ? दक्षिणपंथी संगठन संघ और भाजपा का समर्थन क्यों नहीं करते ?

अगर ऐसा नहीं करते तो इसी कारण तिल तिलकर मर रहे हो,ये मौत अपने आप ही हो जाएगी। जैसा कि हाल का लालू मिलन एक उदाहरण मात्र है। अब एक 'चारा चोर' और 'देशद्रोह का आरोपी' देश का कर्णधार बनेंगे।

अजीब विडंबना है।