Sunday, 22 May 2016

आरक्षण हमें कब तक दर्द देगा ?

         जिस उद्देश्य के लिए आरक्षण का प्रावधान भारत में लागू किया गया था,उसे आज तक पाया न जा सका है,इसकारण यह तर्क जोर पकड़ रहा है कि इस नीति को और आगे न बढ़ाया जाए।

        पर यहां पर जो मुख्य सवाल उभरकर सामने आ जाता है,वह कि हमारी समाजिक-आर्थिक व्यवस्था वाली अगर कोई नीति अपने लक्ष्य को नहीं पा पाती है तो उसे बंद करना वाजिब है ?


        इस प्रश्न का उत्तर तब तक संतुष्टिदायक नहीं हो सकता,जब तक कि जाति पर आधारित असमानता और आधिपत्य की संरचना जारी रहेगी। इस नीति की प्रभावकारिता तब तक दृष्टिगोचर नहीं होगी,जब तक कि विद्यमान अवसरों और परिस्थितियों को सच्चे अर्थों में सामान बना दिया जाए।

       इस प्रश्न की उत्तर की शुरुआत अनुच्छेद-15 और 16 से किया जाना चाहिए,जो हमें इस तथ्य की ओर इशारा करते हैं कि किसी व्यक्ति को इसलिए अपवर्जित नहीं किया जा सकता कि वह ब्राह्मण है और दूसरा निम्न जाति का है। इसी आधार पर एड्स रोगियों को भी सरकारी नौकरी से मना नहीं किया किया जा सकता।
       और इसी समता को बढ़ावा देने के लिए अनुच्छेद-17 के तहत अस्पृश्यता की कुरीति को समाप्त करने का प्रावधान किया गया है।

       मतलब स्पष्ट है - संवैधानिक प्रावधान यह है कि जब तक समाज में विभेदता है,जातिगत वर्चस्व है,तब तक आरक्षण लागू रहेगा।

परन्तु आज जो विवाद हमें देखने को मिल रहा है,उसके दो कारक हैं -
1. पिछड़ेपन का निर्धारण वर्ग के आधार पर हो,न कि जाति या संप्रदाय के आधार पर। वर्ग का तात्पर्य आर्थिक संपन्नता या गरीबी से है।
2. कई ऐसी पिछड़ी जातियाँ हैं जिनका आरक्षण से पहले भी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व था,उन्हें आरक्षण नहीं लेना चाहिए। जैसे - राजस्थान की मीणा जनजाति।

       अगर उपर्युक्त दोनों कारकों का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं - 'भारत में सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन में आसानी से भेद नहीं किया जा सकता।'

वहीं दूसरी ओर 'जाति के आधार पर जो मौलिक अधिकारों का हनन प्राचीन काल में किया गया था,उसकी भरपाई आज आरक्षण के जरिये क्षतिपूर्ति देकर ही किया जा सकता है।'

        निःसंदेह दोनों तर्कों में वजन है,लेकिन क्या प्राचीन काल में किसी के द्वारा किये गए मौलिक अधिकारों के हनन की पूर्ति आज के समकालीन समय में उसके वंशजों से किया जाए तो,इनके मौलिक अधिकारों और प्राकृतिक अधिकारों का हनन नहीं होगा ?

       जाति आधारित आरक्षण का प्रावधान निश्चित रूप से बकवास है क्योंकि यह 'धारणीय विकास' के उस सिद्धांत का उल्लंघन करता है जिसमें संपदा को अपने आने वाली पीढ़ी के लिए बचाकर रखने की अपील की जाती है।

       क्या भारत के नीति-निर्माता,कुछ दिनों की सत्ता भोग के लिए समाज के एक तबके को जो आरक्षण से वंचित हैं,उसके आने वाली पीढ़ी का हालत प्राचीन शोषित वर्गों जैसा करना चाहते हैं ?
अगर इनका सोच ऐसा है तो यह गांधीजी के मूल भावना के खिलाफ है जो 'जैसा को तैसा' नीति के खिलाफ थे।

       कुल मिलाकर हम कह सकते हैं - जो नीति हमें 50-60 सालों तक अपने मुकाम पर न पहुँचा पायी हो,उसके आधार और लागू करने के तरीके को बदल देना ही उचित होगा।

       जातिगत आरक्षण,सामाजिक समरसता के लिए बहुत ही खतरनाक है,जिसका विकराल रूप हमें आंध्र प्रदेश,हरियाणा और गुजरात में देखने को मिल चुका है।

       आज परिस्थितियाँ बदल चुकी है। समाज टूट चुका है। कठोर जातिगत नियम ख़त्म हो चुका है। एक ओर कुछ बुद्धिजीवी जाति को नकार चुके है तो दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ 'संघ समाज' का निर्माण कर वर्तमान जाति-व्यवस्था की समाप्ति की ओर अग्रसर है। जब पूरा का पूरा प्राचीन दृश्य बदल गया है तो हम जाति को पिछड़ापन और सामाजिक भेदभाव का आधार क्यों मान रहे हैं ?

       नयी उपभोक्तावादी संस्कृति का उदय ने आर्थिक आधार पर भी विभेदता को जन्म दे दिया है,जो आये दिनों पार्टियों,शादी-विवाह आदि में देखने को मिल जाता है।

       इसकारण आरक्षण का आधार आर्थिक बना दिया जाएगा तो समाज में जो रोष घर कर गया है वह धूमिल हो जाएगी,समरसता बढ़ेगा और भारत का एक नए रूप का जन्म होगा। 

       हमें इस सिद्धांत को छोड़ना होगा कि जाति आधारित आरक्षण ही क्षतिपूर्ति कर पाएगी। इसके लिए तत्काल संविधान संशोधन करके आधार को आर्थिक बनाना चाहिए।

तब हम उस लक्ष्य को पा पाएंगे जिसके बदौलत समाज में समरसता आएगी और हम सशक्त होंगे।
                                                  - सुरेश कुमार पाण्डेय

Saturday, 7 May 2016

देश के गलत नक़्शे पर सौ करोड़ का जुर्माना और जेल -

        'द जियोस्पाशियल इंफॉर्मेशन रेगुलेशन बिल-2016' का मसौदा सरकार द्वारा जारी किया गया है। बिल के मसौदे के अनुसार सात साल की सजा का प्रावधान और एक से सौ करोड़ जुर्माना लगाने की बात कही गयी है।

अन्य जो महत्वपूर्ण बात ध्यान देने वाली है वह कि
- नक़्शे के लिए जानकारी हासिल करने और उसे साइट या ऐप के जरिये दिखाने के वास्ते सरकार से लाइसेंस लेना अनिवार्य होगा।
- कोई भी व्यक्ति इंटरनेट या दूसरी ऑनलाइन सेवाओं पर भारत का गलत नक्शा नहीं दिखाएगा।
- कोई भी व्यक्ति उपग्रह,विमान,बैलून,ड्रोन या मानव रहित विमान(UAV) आदि के जरिये देश के किसी हिस्से की भौगोलिक तस्वीर नहीं ले पायेगा।
- अगर गूगल मैप्स,गूगल अर्थ या अन्य कोई भी एजेंसी काश्मीर या अरुणाचल को लेकर गलत नक़्शे दिखाती है तो उन पर बड़ा जुर्माना लगाया जाएगा।


नजर रखने के तरीके  -

- एक सुरक्षा प्राधिकरण बनाया जाएगा,जो इस तरह की जानकारी को नियमित कर सकेगा।
- इस प्राधिकरण का प्रमुख केंद्र में संयुक्त सचिव स्तर का अधिकारी होगा। इसके अन्य सदस्यों में एक राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ और एक तकनीकी विशेषज्ञ शामिल होगा।

व्याख्या -

       सबसे बड़ी बात यह है कि विधेयक राष्ट्रवाद की बुनियाद को मजबूत करेगा। इन दिनों भारत में भी कुछ वामपंथी संगठनों का भारत से कोई निष्ठा नहीं रही है। ये देश तोड़ने तक की बात कर डालते हैं। नौ फरवरी के दिन जेएनयू में हुयी घटना से यह स्पष्ट हो जाता है। तदुपरांत यादवपुर यूनिवर्सिटी और कुछ अन्य जगह ऐसे ही नारों की उद्घोष प्रमाणित कर देता है। एक प्रोफ़ेसर तो बकायदा काश्मीर और अरुणाचल पर जबरजस्ती कब्जे की बात कह चुकी है। इसे देखते हुए इस आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि भारत के नक़्शे को गलत तरीके से पेश किया जाएगा।

         अपने नागरिकों से इस तरह की उम्मीदें नहीं की जा सकती कि वे राष्ट्र-विरोधी हरकत करें। इसी कारण अब तक मूल कर्तव्य को कानूनी नहीं बनाया गया है,केवल इच्छा रखी गयी है कि सभी नागरिक भारत के एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रखेंगे और राष्ट्रीय प्रतीकों का आदर करेंगे।

          लेकिन वर्तमान में उत्पन्न चुनौतियों को देखते हुए 'द जियोस्पाशियल इंफॉर्मेशन रेगुलेशन बिल-2016' जैसे विधेयकों की सख्त जरुरत है। जहां समाज ऐसे देश-विरोधी तत्वों पर नैतिक जिम्मेवारी डालने में असफल रहता है,वहाँ क़ानून ही रास्ता दिखाता है और नियंत्रण रखता है खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में।

         विदेशी ताकतों की तो हमेशा से मंशा रही है कि वह भारत को अपनी पुराणी विश्वगुरु वाली शक्ति पाने से रोके। आर्थिक विकास के लक्ष्य को न पाने दे। इसीकारण किसी न किसी मुद्दे में उलझाए रखने का प्रयास करते हैं। शरारत भरा कार्य हाल में ही सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर द्वारा किया गया था जिसने भारत के नक़्शे में कुछ भाग चीन और पाकिस्तान में दिखाया था। एक तरह से यह संविधान के साथ-साथ संसद और जनता का भी अपमान है जो भारतीय सीमा का निर्धारण करता है।

        कुल मिलाकर कहा जाए तो यह विधेयक भारतीय एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने और राष्ट्रवाद की बुनियाद को मजबूत करने में कारगर सिद्ध होगा।   

Thursday, 5 May 2016

क्रांतिकारियों का अपने मौत मर जाना

          मार्क्सवाद एक ऐसा दर्शन है,जो प्रारंभ में सब्जबाग दिखाकर तो एक कट्टर व्यक्तित्व का निर्माण करता है,लेकिंन बहुत जल्द ही इस दर्शन के आधार पर बने क्रांतिकारियों का दिल और दिमाग बदल जाता है। शेर की तरह दहाड़ने वाले ये क्रांतिकारी कुत्तों की मौत मरने लगते हैं,जिनकी दुर्दशा इतनी घटिया हो जाती है कि अकसर लोगों द्वारा सुनने में आता है कि 'वामपंथी क्रांतिकारी न घर का न घाट का।'


           अभी हाल में क्रांतिकारी के रूप में एक नया चेहरा सामने आया है जिसका पहचान जेएनयू के छात्रसंघ के वर्तमान अध्यक्ष के रूप में है। नौ फरवरी की घटना के बाद निःसंदेह इसका कद बढ़ा है। इसमें कोई शक नहीं कि इसे हीरो बनाने वाले भारत के कर्णधार और मसीहा के रूप में पेश करने लगे हैं। देशद्रोह जैसे संगीन अपराध के इस आरोपी का जब जमानत मंजूर कर लिया गया तो जेएनयू परिसर में कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले छात्रों ने इसकी तुलना भगवान कृष्ण से कर डाली। बस क्या था ? यहीं से वामपंथ का घिनौना चेहरा सामने आने लगा।

           एक ऐसा दर्शन जो धर्म,जाति,परंपरा आदि जैसे शब्दों को नहीं मानता,वह इसे तथ्य कहकर नकार देता है और कहता है कि हम सच्चाई के लिए लड़ते हैं। आर्थिक समानता की बात करते हैं। भूखमरी की बात करते हैं। गरीबी की बात करते हैं।

           हो सकता है,ये सही हो,परन्तु यह क्यों छिपा लेते हो कि तुम देश-तोड़ने की बात करते हो,राष्ट्रवाद को नहीं मानते हो,केवल हिन्दू परंपरा को फासीवादी कहते हो,सड़ी विचारधारा पर लोगों को छलते हो,मूर्ख बनाते हो ?

          अगर ऐसा नहीं करते तो शुरुआत अपने घर से क्यों नहीं करते ? किसी भी वामपंथी नेता का नाम बता सकते हो जो अपनी जाति और धर्म के इतर शादी किया है,रिश्तेदारी बनाया है और अपने रीति-रिवाजों को नकारा है। जवाब है - नहीं । क्योंकि ऊपर से तुम सब वामपंथ का जो केंचुल ओढ़े क्रांतिकारी होने का जो बात करते हो,वह झूठ का पुलिंदा है,मक्कारी है,धोखा है और लोगों को विदेशी हाथों में गिरवी रखने जैसा है।

         जिस दिन जरुरत पड़ती है उसी दिन यह केंचुल धीरे-धीरे उतारने लगते हो। हज की यात्रा करते हो,शादी अपने कुल में ही करते हो,दलितों के उत्थान के लिए केवल नारेबाजी करते हो। केरल और बंगाल स्पष्ट उदाहरण है।

         धर्म,जाति और परंपरा के नाम पर तो वामपंथी क्रांतिकारियों का दक्षिणपंथी चेहरा सामने आ ही जाता है।

          तब काहे का विरोध करते हो कॉमरेड ? दक्षिणपंथी संगठन संघ और भाजपा का समर्थन क्यों नहीं करते ?

अगर ऐसा नहीं करते तो इसी कारण तिल तिलकर मर रहे हो,ये मौत अपने आप ही हो जाएगी। जैसा कि हाल का लालू मिलन एक उदाहरण मात्र है। अब एक 'चारा चोर' और 'देशद्रोह का आरोपी' देश का कर्णधार बनेंगे।

अजीब विडंबना है।