Thursday, 7 April 2016

विश्वविद्यालयों में हो रहे विवाद का मुख्य वजह आरक्षण तो नहीं

         इन दिनों विश्वविद्यालय वैचारिक टकराव का मैदान बन गए हैं। छात्र संगठन अपने-अपने संगठनों के विचारों का प्रसार कर रहें हैं,फलस्वरूप इतने सालों से दबाये गए एक विशेष विचारधारा को अवसर मिल रहा है,वहीं दूसरी ओर अपनी साख बना चुका अन्य विचारधारा अपनी आधार खोता देख उग्र भी हो रहा है,यहीं वह कारण है संघर्ष का। यह पैमाना अलग-अलग विश्वविद्यालयों में भिन्नता पाये हुए है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इसका दूसरा दृष्टिकोण है तो दिल्ली विश्वविद्यालय में तीसरा। श्रीनगर के एनआईटी कैंपस में एक नया आयाम उभरकर सामने आया है,वह कि वहाँ मामला सुरक्षा और 'देश-हित तथा देश-विरोधी' बहसों का है। जेएनयू में भी कुछ ऐसा ही मुद्दा बना हुआ है।

        1990 के दशक का शुरुआत समकालीन भारतीय राजनीति के लिए मुख्य आधार माना जाता है। मंडलवादी राजनीति अपना पैर पसारना शुरू कर देता है। मंडल का जवाब कमंडल से देकर भाजपा राजनीतिक पाँव को मजबूत करती है और उदारीकरण का दौर भारतीय समाज में नए आर्थिक वर्गों का उदय करता है। वैश्वीकरण का प्रभाव भारतीय समाज पर पड़ता है।

        1990 से पहले आरक्षण का प्रावधान शैक्षणिक संस्थाओं में मात्र 22.5 फीासदी था,जिसका संबंध अनुसूचित जाति और जनजातियों से है,जो आज भी बना हुआ है। एक ऐतिहासिक बदलाव जिसके तहत प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने ओबीसी को आरक्षण का प्रावधान कर दिए। तदुपरांत शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण का दायरा बढ़कर लगभग 50 फीासदी के करीब हो गया। समाज के हर तबके के लोग विश्वविदयालयों में प्रवेश पाने लगे और बौद्धिक टकराव का जमीन तैयार होने लगा,जो आज चरम पर पहुँच गया है। यह टकराव योग्यता की भिन्नता की है जो बड़े शोध के लिए भी हतोत्साहित कर रहा है।

       'आरक्षण का वैसाखी' समाज में अब तक के बराबर वर्गों,जातियों में से कुछ को लंगड़ा बना दिया और चलने के लिए आज व्हीलचेयर का प्रावधान कर दिया। बाकी उसी अवस्था में तड़प महसूस कर रहे हैं। यह व्यवस्था विश्वविद्यालयों के छात्रों को मोटे तौर पर दो भागों में स्पष्ट विभाजन कर दिया है,एक ओर आधा फीसदी आरक्षण के समर्थक हैं तो दूसरी ओर इतना ही लगभग विरोधी।

       मुफ्त में लगभग पिछले 25 सालों से सेवा और लाभ पाने वाले ये लोग,ऐसी पार्टी की सारी नीतियों का समर्थन करते हैं,जो आरक्षण के पक्षधर हैं,बस क्या;यहीं वह दूसरा वजह है,जो संघर्ष को जन्म देती है और बाहरी दुनिया की राजनीति विश्वविद्यालयों में दस्तक देती है।

       इस तरह के संघर्ष से निपटारा पाने का सबसे अच्छा तरीका है कि आरक्षण प्राप्त लोगों में इस भावना का विकास कराने का प्रयास किया जाए कि
 "व्यक्तिगत गरिमा और आत्मसम्मान की भावनाएं समानता के दर्शन के मूल मंत्र हैं। यदि किसी व्यक्ति को यह मालूम होगा कि उसे अपनी पद-प्रतिष्ठा वंचित समूहों के लिए निर्धारित वरीयता के आधार पर मिली है-अपनी योग्यता के आधार पर नहीं,तो इससे उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचेगी,और उसके मन में हीन भावना(INFERIORITY FEELING) घर कर जाएगी। ऐसी स्थिति में ये देश,समाज आदि के उन्नति के लिए निरर्थक हो जाएंगे।"
                                             
                                                                                            -सुरेश कुमार पाण्डेय