Sunday, 10 April 2016

जूता

        सदियों से जूता का महत्व बरकरार रहा,बस मायने बदलते रहे। कभी राज्य का शासन संभालकर तो कभी विरोध के प्रतीक के रूप में। बदलता रहा तो इसके उपयोग करने वालों का तरीका।
 

       जूता,मनुष्य का एक बुनियादी आवश्यता हमेशा से रहा है। आज उपभोक्तावाद एक ऐसा खतरनाक रूप ले चुका है कि अकसर लोगों से कहते सुना जाता है,'हम व्यक्ति के आर्थिक स्थिति का पता उसके जूते को देखकर लगा सकते है।' सच्चाई जो भी हो,लेकिन मैंने ऐसे भी लोगों को देखा है,जो फटा हुआ अंडरगार्मेंट तो पहनते हैं और अपनी मासूका तथा समाज में दिखावा करने के लिए 'वुडलैंड' का जूता पहनना नहीं भूलते। इससे अलग एक और रूप देखने को मिलता है,उन गरीब और वंचित तबकों के लोगों में,जिन्हें कड़ाके की ठंड और दिल दहलाने वाले गर्मीं में एक जूता(चप्पल) भी नसीब नहीं होता। पैरों में पॉलीथिन बाँधकर घूमने को मजबूर होते हैं। खैर.....

        दिसंबर,2008 में मैं नौवीं का छात्र था। इसी साल एक प्रेस वार्ता में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर जूता फेंका गया। एक नहीं बल्कि दोनों।  उसके बाद मानों पूरी दुनिया में एक चलन सा चल पड़ा। ये जूता फेंकने वाले मुंतजर अल जैदी अरब देशों के हीरो बन गए थे। लेकिन उस समय खबर आयी थी कि पुलिस उनका हाथ-पैर तोड़ दी थी।

       अगले ही साल लन्दन में चीनी राष्ट्रपति वेन जियाबाओ पर जूता फेंका गया। उसके बाद भारत में भी ऐसी घटनाएं लगातार देखने को मिली। 2009 में ही नवीन जिंदल और लाल कृष्ण आडवाणी पर भी जूता-चप्पल उछाले गए। इसी साल इस फेहरिस्त में पी चिदंबरम और मनमोहन सिंह भी जुड़ गए जिनपर जूते उछाले गए।

       बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी पर पाँच जनवरी,2015 को जूता फेंका गया। इसके बाद बिहार में 'जीतन और जूता' का मुहावरा काफी प्रचलित हुआ।

      यह वहीं जूता है,जो अयोध्या में चौदह सालों तक शासन किया। दशरथ के पुत्र भरत इसी जूता(खड़ाऊ) को शासन का प्रतीक बना दिए। महाभारत काल में जूता ही वो चिह्न होता था कि इस समय द्रौपदी के साथ कौन आराम कर रहा है। सदियों से जूता का महत्व बरकरार है। आज तो विरोध जताने का एक मुख्य हथियार बनता जा रहा है। 
                         - सुरेश कुमार पाण्डेय