Saturday, 2 April 2016

आलोचना की प्रवृति कहीं ले न डूबे

       भारतीय समाज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है,जहाँ आलोचक को तहे-दिल से स्वागत किया जा रहा है,इससे भी बढ़कर एक विध्वंसकारी आलोचक को। सुर्ख़ियों में बने रहने के लिए इस तरह के हथकंडों का इस्तेमाल जोर-शोर से चल रहा है। असहिष्णुता को लेकर आलोचना के नाम पर कई लेखकों द्वारा पुरस्कार लौटा दिया गया। एक दलित की आत्महत्या पर ऐसा ही कुछ हुआ। जेएनयू में देश-विरोधी नारों को असहमति का अधिकार कहकर आलोचना की सारी सीमाओं को तोड़ दिया गया। यह मामला यहीं नहीं रुका और रातों-रात कुछ छात्र नेता के पंख उग आये,साथ ही अपने को देश में परिवर्तन के कर्णधार समझने लगे। इन दिनों 'भारत माता की जय' के नाम पर आलोचना का नया दौर चला है।

      हम मानते हैं,समाज में यह जरूरी है,आलोचना होना चाहिए,लेकिन इस बनावटी आलोचना से क्या मिला ? इस बात पर हम कभी सोचे की इस तरह की आलोचना का कितना कीमत हमने चुकाया ?

      जितने भी आलोचक थे,समाज ने उन्हें हाथों-हाथ लिया,यूँ कहूँ कि समाज का एक छोटा सा तबका। इनके इस हरकत से इनकी व्यक्तिगत तरक्की तो हुयी,पर समाज जस-का-तस अपनी पुरानी अवस्था में ही जड़ है। लेकिन ऐसा नहीं है,बदलाव की बयार तो आयी है,समाज का नैतिक उत्थान हुआ है। एक समृद्ध परिवार अपनी सब्सिडी छोड़ रहा है,जनता कदमताल मिलाकर राष्ट्रवाद की नींव को मजबूत कर रही है,बदलाव का नया जोश और उमंग सांतवे असमान पर पहुँच चुका है। ऐसा संभव हुआ है,केवल और केवल सरकार की 'रचनात्मक कार्यों' के बदौलत।

       एक समाज तभी बदल सकता है,जब आलोचना के साथ-साथ रचनात्मकता का भी पर्याप्त स्थान हो। एक सवाल जो सभी आलोचकों से पूछना चाहिए कि आपके विरोध ने समाज को किस प्रकार प्रभावित किया ? आपने कौन सा रचनात्मक कार्य किया ? तो इनको जवाब देते नहीं बनेगा क्योंकि इस बात का आभास इन्हें भी है कि सरकार जिस दृढ़ता से विपरीत परिस्थिति पर काबू पायी और समाज में नैतिक उत्थान की,अगर न कर पाती तो समाज को गर्त में गिरना निश्चित था।

      आज भारतीय समाज जो स्थायित्व की ओर बढ़ रही है,राष्ट्रवादी पुट को संजोकर मजबूत कर रही है,वह केवल रचनात्मक कार्यों से हुआ है,न कि आलोचनात्मक रवैये से।
                                          - सुरेश कुमार पाण्डेय