Wednesday, 20 April 2016

संघ के संबंध में कुछ सवालों का जवाब

      भारतीय सभ्यता और संस्कृति हमेशा जीवित तथा गतिमान रही है परन्तु हमारा इतिहास लगभग दो हजार वर्षों तक विदेशी आक्रांताओं से प्रभावित होता रहा। अंग्रेजों ने योजनाबद्ध ढंग से इतिहास का स्वरूप विकृत किया।

         इसकारण एक कहावत काफी उपयुक्त लगती है,"जब तक सिंह स्वयं अपना इतिहास नहीं लिखेंगे,तब तक इतिहास शिकारियों का दृष्टिकोण ही प्रदर्शित करेगा।" यह एक निर्विवाद तथ्य है।

        इतिहास हमेशा से विवाद का विषय रहा है खासकर इसे समझने को लेकर,कई विद्वान और छात्र खासकर आम लोग शब्दों के अर्थ को न समझ पाने के कारण अपने जीवन में उल्टी सीधी निर्णय लेने लगते हैं।

         इतिहास का इतिहास,यह अजीब लगे लेकिन "प्रत्येक का अपना एक इतिहास होता है।"
फ्रीमैन के विचारों को देखा जाये तो,'हमें राजनीति और इतिहास का एक दूसरे से स्पष्ट संबंध मिलता है।इतिहास अतीत की राजनीति है;राजनीति वर्तमान का इतिहास है।"
        भारतीय बुद्धिजीवियों के मस्तिष्क में विकृत राष्ट्रीयता का बीजारोपण अंग्रेजों की सबसे बड़ी सफलता थी। इस बीज ने 'हिन्दू-मुस्लिम एकता' के पौधे को जन्म दिया,जिसका परिणाम हुआ पाकिस्तान अर्थात भारत-विभाजन।

        1905 का बंगाल विभाजन लोगों के विरोध के कारण 1911 के दिल्ली दरबार में अंग्रेजों को रद्द करना पड़ा,लेकिन जब से वन्दे  मातरम,हिंदुत्व और भारतीय संस्कार को सांप्रदायिकता के नजरिये से देखा जाने लगा,40 वर्ष भी नहीं गुजरा कि 'बंगाल-विभाजन' को मान लिया गया। अपने देश का कितना दुर्भाग्य ?

        आज भी यह परंपरा चल रही है 'वन्दे मातरम और भारत माता का जय' के नाम पर राजनीति हो रहा है। देश-विरोधी नारों का समर्थन किया जा रहा है,यह उसी विकृत मानसिकता का परिणाम है। 

        कांग्रेस और अन्य दल इसी विकृत मानसिकता को आगे बढ़ा रहे हैं,आजादी मिलने के बाद उसी 'हिन्दू-मुस्लिम एकता' का नाम बदलकर सेकुलरिज्म अर्थात धर्मनिरपेक्षता रख दिया गया। काश्मीर,पंजाब और असम आदि की समस्याएं इसी का परिणाम है।

        लेकिन ऐसा नहीं था,शुद्ध राष्ट्रीयता का प्रवाह समानांतर रूप से चलता रहा। जिसके वाहक स्वामी दयानन्द,स्वामी विवेकानन्द,सावरकर,तिलक,लाला लाजपत राय,अरविन्द,हेडगेवार,डॉ. मुखर्जी,दीनदयाल उपाध्याय आदि थे।

        विभिन्न प्रकार की समस्याओं से घिरे भारत राष्ट्र की एकता को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए इस प्रवाह को प्रभावी बनाना अत्यन्त आवश्यक है।

         श्रीमती एनी बेसेंट कहती है,"हिन्दू धर्म के बिना भारत का कोई भविष्य नहीं। यदि आप हिन्दू धर्म छोड़ देते हैं तो आप अपनी भारत माता के ह्रदय में छुरा भोंकते हैं। हिन्दू धर्म के अतिरिक्त अन्य किसी धर्म की रक्त वाहिनियाँ ऐसी शुद्ध स्वर्ण की,ऐसी अमूल्य नहीं हैं,जिनमें आध्यात्मिक जीवन का रक्त प्रवाहित किया जा सके।"

यह स्पष्ट है कि जब ये हिन्दू धर्म की बात कर रही हैं तो भारतीय संस्कारों की बात कर रही है,भारतीय जीवन पद्धति की बात कर रही है।


मेरा इतना लिखने का मूल मकसद है एक जिज्ञासू के कुछ प्रश्नों का जवाब सलीके से दे सकूं -
1. हिंदुत्व ही राष्ट्रीत्व है।
2. हिंदुत्व व राष्ट्रीत्व - भारतीय के समान ही परस्पर पर्यायवाची।
3. हिन्दू शब्द राष्ट्रवाचक है,पंथ या संप्रदायवाचक नहीं।

       एक बात की ओर मैं ध्यान दिलाना चाहूँगा कि हिंदुत्व को संकीर्ण अर्थों में नहीं समझा जा सकता,इसका विस्तृत आयाम है। मैं बार-बार कह रहा हूँ कि इसे किसी मजहब के समानार्थी न माना जाए,यह कई मजहबों का संघ है लेकिन ये सभी मजहब इसके आदर्शों को मानते हैं,इसके लक्षणों को मानते हैं। और जो इन आदर्शों को नहीं मानता वह इसके परिधि में नहीं आता।

       मतलब स्पष्ट है कि एक नास्तिक और दूसरा आस्तिक भी हिंदुत्व की परिधि में आ सकता है। यहीं हिंदुत्व राष्ट्र निर्माण की पहली सीढी है,राष्ट्रीयता का प्रतीक है,एक सूत्र में बाँधने का जरिया है,मातृभूमि से प्रेम और इसके लिए मर मिट जाना इसका पराकाष्ठा है। यह ऐसा पद्धति है जो राजनीतिक,समाजिक,धार्मिक,सांस्कृतिक और भौगोलिक सभी को अपने अंदर समेटा हुआ है।

4. देश-भौगोलिक इकाई और राज्य-राजनैतिक इकाई है। यह बिल्कुल सही है।
कुछ लोगों का कहना है कि देश और राष्ट्र में कोई अंतर नही है, दोनों राजनैतिक इकाई ही हैं। बिल्कुल ही गलत बात है।

       यहाँ 'राष्ट्र','राष्ट्र-राज्य' और 'राज्य' तीनों में अंतर को समझना बहुत ही जरूरी है। राष्ट्र अपने आप में बहुत हद तक एक काल्पनिक समुदाय होता है,जो अपने सदस्यों के सामूहिक विश्वास,आकांक्षाओं और कल्पनाओं के सहारे एक सूत्र में बंधा होता है। इन मान्यताओं और विश्वास को अगर पहचानने का प्रयास करें तो,इस प्रकार दृष्टिगोचर होंगे - साझा विश्वास(इसे केवल महशूश किया जाता है,यह नदी पहाड़ आदि जैसा नहीं होते);इतिहास अर्थात ऐतिहासिक पहचान की भावना;भूक्षेत्र इससे जुड़ी साझे अतीत की याद लोगों में एक सामूहिक पहचान का बोध कराती है;साझे राजनीतिक आदर्श और साझे राजनीतिक पहचान आदि।

       इस प्रकार की राष्ट्र की भावना ही राष्ट्रवाद को जन्म देती है। ऐसा नहीं कि राष्ट्रवाद केवल जोड़ने का ही बात करता है बल्कि यह साम्राज्य के लिए घातक भी साबित हुआ है। एक तरफ यह जर्मनी और इटली का एकीकरण करता है तो दूसरी तरफ आस्ट्रेलियाई-हंगेरियन और रूसी साम्राज्य तथा ब्रिटिश,फ्रांसीसी आदि के विघटन और पतन का कारण भी बनता है।

       भारतीय राष्ट्रवाद 'राष्ट्रीय आत्म निर्णय' के सिद्धांत को नकारता है,जिसका मतलब कि भारत से अलग होने का नारा कोई नहीं लगा सकता।

       किसी राष्ट्र की भौगोलिकता अतीत की यादों को लोगों में एक सामूहिक पहचान का बोध कराती है। यहीं कारण है कि राष्ट्र के सदस्य के रूप में हम अपने राष्ट्र के अधिकतर सदस्यों को कभी नहीं जान पाते,लेकिन फिर भी हम उनका आदर करते हैं,संकट के समय सहायता करते हैं। कश्मीरी पंडितों को हम नहीं जानते,पाकिस्तानी हिन्दुओं को नहीं जानते लेकिन उनके लिए हमारे मन में दर्द होता है।

राष्ट्र किसी सीमा की मोहताज नहीं,इसका कोई परिधि नहीं होता,परिधि होता है राज्य का,जो निहायत ही राजनितिक इकाई है,मानव निर्मित है। 

इसी राज्य को राष्ट्र के साथ मिलाकर 'राष्ट्र-राज्य' का नया संकल्पना अस्तित्व में आया जिसे हम देश के पर्यायवाची मानते हैं। इसमें राष्ट्र की भावना के साथ-साथ राज्य की परिधि भी होती है। 

5.  आज के भारत की राष्ट्रीयता पूर्वज, इतिहास, परंपरा, संस्कृति, श्रद्धा केंद्र से उत्पन्न नही हुयी, बल्कि औपनिवेशिक शासन के खिलाफ स्वतन्त्रता संग्राम से हुयी है,यह लोगों का अधूरा ज्ञान है। इसके लिए मैं केवल कुछ उद्दाहरण मात्र देना पसंद करूँगा। महाराष्ट्र में राष्ट्रवाद शिवाजी जयंती और गणेश उत्सव से परवान चढ़ा। इस क्षेत्र के जितने भी क्रांतिकारी थे वे सभी भारतीय परंपरा से प्रभावित थे। 

        वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट,आर्म्स एक्ट,आईसीएस परीक्षा का उम्र मुद्दा,द्वितीय आंग्ल अफगान युद्ध,बंगाल विभाजन और दिल्ली दरबार आदि आजादी के आंदोलन के समय राष्ट्रवाद के उदय के तत्कालीन कारण माने जाते हैं। स्वदेशी आंदोलन जिस रूप में परवान चढ़ा,इस बात को सभी जानते हैं कि वहाँ वन्दे मातरम और परंपरा का क्या योगदान था। गंगा में स्नान करके और माँ काली के नारों से सडकों पर अंग्रेजों के खिलाफ नारे लगाए जाते थे। यह सब इतिहास और संस्कृति का ही उपज था। 

       कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि सावरकर ने द्वीराष्ट्र का सिद्धांत दिया। लेकिन कब दे दिया ? कुछ दिन पहले दिग्विजय सिंह ने ऐसा ही बात कहा था कि जिन्ना ने सावरकर के बातों को आगे बढ़ाया है। जिस हिन्दू महासभा से ये जुड़े थे उसका मकसद एक एकत्रित भारतीय राज्य का गठन करना था न कि उसे तोड़ना। विस्तृत जानकारी के लिए www.savarkar.org पर पढ सकते हैं। इसलिए इस तरह की बातें करना बकवास के अलावा कुछ नहीं है। 

6. इसकी पुष्टि के लिए मैं एक ही बात कहूंगा कि लोगों का एक इतिहास होता है। इतिहास की घटनाएं जैसे आनंद देने वाली होती हैं, वैसे ही दु:खदायी भी होती हैं। ये घटनाएं विजय की होती हैं, तो पराजय की भी होती हैं। जिनको ये अपने इतिहास की घटनाएं लगती है, उनका राष्ट्र बनता है। अर्थात अच्छे और बुरे सभी घटनाओं का हमें आदर करना सीखना चाहिए।

       बाकी सभी पॉइंट में हिन्दू शब्द का इस्तेमाल किया गया है और कुछ में कहा गया है कि हिन्दुस्तान हिन्दुओं का देश है तो इसमें संशय क्या है ? 

       पहले इस प्रशंग पर गौर करते हैं - पंडित जवाहरलाल नेहरु जीवन के प्रश्नों को भौतिक आधार पर ही देखा करते थे। ईश्वर,धर्म,आत्मा आदि का उनके लिए कोई अर्थ नहीं था। दुर्भाग्य से उनकी पत्नी,जो चिकित्सा के लिए विदेश ले जाई गयी थी,का देहांत हो गया। अपनी रीति के अनुसार उनके शरीर का अग्नि संस्कार किया गया। उस मुट्ठी भर राख का क्या करना चाहिए ? यह प्रश्न था। भौतिकवाद के अनुसार उस राख का कोई महत्त्व नहीं जो कि नेहरूजी थे। 

        पंडित नेहरु के मस्तिष्क में एक संघर्ष उत्पन्न हो गया। उनका भौतिक विचार उनसे कहता कि फेंक दो इस राख को इसका कोई मूल्य नहीं। पर उनके पुरातन हिन्दू रक्त की पुकार थी कि अपनी प्यारी पत्नी के अवशेषों को गंगा माता की गोद में समर्पित करो। अंत में पुरातन संस्कारों की विजय हुयी। राख अपने देश में लाई गयी और प्रयाग में गंगा,यमुना और सरस्वती के संगम में विसजिंत की गयी। 

       बाद में पंडित नेहरु ने कहा कि "उनकी आधुनिक शिक्षा तथा प्रशिक्षण सभी विद्रोह कर रहे थे,किन्तु उनके भीतर की किसी चीज ने,किसी ऐसी चीज ने,जिसका स्पष्टीकरण नहीं सकता,उन्हें राख को संगम में विसर्जित करने को बाध्य किया।"

हमारी संस्कृति,हिंदुत्व जो जीवन पद्धति तथा राष्ट्रीयता दोनों का प्रतीक है वो किसी परिभाषा की परिधि में नहीं आती। यह एक मूल्य है,आदर्श है जिसे परिभाषित नहीं किया जा सकता बल्कि इसे एहसास किया जा सकता है,मह्शूश किया जा सकता है। बिल्कुल उसी उसी तरह जिस तरह हम माँ-पुत्र के प्यार को करते हैं। 

अगर कोई पूछे कि ईमानदारी क्या है ? जीवन क्या है ? समानता और स्वतंत्रता क्या है ? तो इसका उत्तर संतोषजनक नहीं हो सकता लेकिन इसके आयाम इसके लक्षण को बताकर इसके तात्पर्य को बता सकते हैं। 

ठीक उसी प्रकार हिंदुत्व है जिसके तात्विक आयाम है,जो विस्तृत है,जिसकी गणना असंभव है। 

जहां तक हिन्दू का सवाल है यह कोई मजहब नहीं है। हिन्दू वहीं है जो हिंदुत्व को मानता है।   
                                                                    
                                                        - सुरेश कुमार पाण्डेय