Thursday, 14 April 2016

आंबेडकर को सबसे ज्यादा धोखा किसने दिया ?

       आज देश आंबेडकर की 125वीं जयंती मना रहा है। असमानता के खिलाफ इनके संघर्ष को याद करते हुए 13 अप्रैल को संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी जयंती मनाई,यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि डॉ. आंबेडकर के विचारों का प्रसार हो रहा है।

        लेकिन क्या आंबेडकर द्वारा कही गयी बातों को केवल दोहरा भर देने से हम आंबेडकरवादी हो सकते हैं या आंबेडकर आदर्श हो सकते हैं ? जवाब होगा - नहीं। कोई किसी विचारधारा का जानकार हो सकता है,लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर जानकार उस विचारधारा के मूल्यों और सिद्धांतों को मानने वाला भी हो। जैसे - एक सूफी विद्वान सूफी मामलों का जानकार हो सकता है,लेकिन सूफीवादी नहीं क्योंकि उनमें से अधिकांश शायद थप्पड़ का जवाब,थप्पड़ से दें,जो सूफी मत के खिलाफ है।

        आज ऐसा ही भारत के किसी-न-किसी कोने में देखने को मिल रहा है। देश-विरोधी नारों का समर्थन कर,लोग अपने बचाव में आंबेडकर के किसी उक्ति को बता दे रहे हैं। परन्तु उन्हें याद करना चाहिए कि
"जिस देश में आपने जन्म लिया है,उसके प्रति कर्तव्य पालन करने से बढ़कर संसार में कोई दूसरा काम है ही नहीं।"                                                                                                     - महात्मा गांधी 
        सवर्ण से शादी का इच्छा रखने वाले दलित,खुद अपने से निचली जातियों में शादी करने से मना कर दे रहे हैं। गौरतलब है कि आज दलित समुदाय भी कई जातियों में विभक्त हो गया है,वे इसकी समाप्ति का बात न करके,जो समाज की संपूर्ण जाति-व्यवस्था है उसे समाप्त करने की बात करते हैं। यह निश्चित रूप से दोहरा चरित्र का नमूना है क्योंकि कहा गया है,'उदारता का काम अपने घरों से आरंभ होता है।'

        यह सर्वविदित है कि बाबा साहब का अंतिम उद्देश्य जातिविहीन समाज की स्थापना करने का था। इसे तब तक नहीं पाया जा सकता,जब तक कि सैकड़ों जातियों में बंटे दलित में भी रोटी-बेटी का संबंध न हो जाए। आज दलित का बौद्धिक तबका इस तरह का भेदभाव करता नजर आ रहा है।

        डॉ. आंबेडकर जिस दलित समाज के उत्थान के लिए आंदोलन चलाये,आज वहीं दलित समाज खुद जातियों में विभक्त होकर उन्हें धोखा देने का पहला काम किया।

        बौद्धिक वर्ग,एक ऐसा तबका होता है,जिसे समाज में सबसे ज्यादा इज्जत मिला करती है,लेकिन आज का अधिकांश दलित बौद्धिक या कहें कि सवर्ण बौद्धिक दोनों ने पेट पूजन को पहली प्राथमिकता दी। अप्रैल,1956 में आंबेडकर ने खुद कहा था कि
"पढ़े-लिखे लोगों ने धोखा दिया और वे खुद पेट-पूजन में लग गये।" - डॉ. आंबेडकर 
         जहां तक मैंने अनुभव किया है,आज का बौद्धिक वर्ग आलोचक बनकर रह गया है,उनमें रचनात्मकता दिखायी ही नहीं देता।

 लोकसभा सदस्य डॉ. उदितराज लिखते हैं,
"बौद्धिक वर्ग अहंकार की संकट से गुजर रहा है। दलित बौद्धिक वर्ग,जो संगठित होने का बार-बार नारा लगाता है,सबसे ज्यादा असंगठित वही है।" - उदितराज 
         अगर इसका विस्तार देखा जाए तो कोई अपने को आंबेडकरवादी कहता है तो कोई पेरियारवादी;ठीक उसी तरह जैसे समाजवाद के कई रूप हैं - लोहियावादी,जेपी वादी आदि।

         लेकिन आज के मौजूदा समय में अगर केवल कोई आंबेडकर को गंभीरता से लिया है तो वह है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अर्थात संघ। वह आंबेडकर गांधी आदि को युगपुरुष का उपमा देता है।

          संघ ही एक ऐसा संगठन है,जो समग्र हिन्दू एकता की बात करता है। इस एकता की बुनियाद को मजबूत करने के लिए इसके द्वारा किया गया प्रयास सराहनीय है। जो पार्टियां और संगठन इन दलितों का इस्तेमाल केवल वोट बैंक के लिए किया करती थी,वो आज परेशान है,क्योंकि भाजपा ने इनको साथ लेकर चलने का ब्लूप्रिंट जारी कर दिया है। मौजूदा सरकार मुद्रा बैंक,स्टैंड अप इंडिया के तहत इनके तरक्की को तवज्जो देना शुरू कर दिया है। फ्री गैस कनेक्शन गरीबों को देने की बात कही गयी है,जाहिर है इसका लाभ दलितों और वंचितों को ही मिलेगा। 

समाजिक बदलाव कोई रॉकेट साइंस तो है नहीं। इसलिए निष्कर्षतः

समरसता बढ़ रही है। माहौल में अंतर आ रहा है। आहिस्ता..... आहिस्ता.......।
   
                                                                    - सुरेश कुमार पाण्डेय