Wednesday, 20 April 2016

संघ के संबंध में कुछ सवालों का जवाब

      भारतीय सभ्यता और संस्कृति हमेशा जीवित तथा गतिमान रही है परन्तु हमारा इतिहास लगभग दो हजार वर्षों तक विदेशी आक्रांताओं से प्रभावित होता रहा। अंग्रेजों ने योजनाबद्ध ढंग से इतिहास का स्वरूप विकृत किया।

         इसकारण एक कहावत काफी उपयुक्त लगती है,"जब तक सिंह स्वयं अपना इतिहास नहीं लिखेंगे,तब तक इतिहास शिकारियों का दृष्टिकोण ही प्रदर्शित करेगा।" यह एक निर्विवाद तथ्य है।

        इतिहास हमेशा से विवाद का विषय रहा है खासकर इसे समझने को लेकर,कई विद्वान और छात्र खासकर आम लोग शब्दों के अर्थ को न समझ पाने के कारण अपने जीवन में उल्टी सीधी निर्णय लेने लगते हैं।

         इतिहास का इतिहास,यह अजीब लगे लेकिन "प्रत्येक का अपना एक इतिहास होता है।"
फ्रीमैन के विचारों को देखा जाये तो,'हमें राजनीति और इतिहास का एक दूसरे से स्पष्ट संबंध मिलता है।इतिहास अतीत की राजनीति है;राजनीति वर्तमान का इतिहास है।"
        भारतीय बुद्धिजीवियों के मस्तिष्क में विकृत राष्ट्रीयता का बीजारोपण अंग्रेजों की सबसे बड़ी सफलता थी। इस बीज ने 'हिन्दू-मुस्लिम एकता' के पौधे को जन्म दिया,जिसका परिणाम हुआ पाकिस्तान अर्थात भारत-विभाजन।

        1905 का बंगाल विभाजन लोगों के विरोध के कारण 1911 के दिल्ली दरबार में अंग्रेजों को रद्द करना पड़ा,लेकिन जब से वन्दे  मातरम,हिंदुत्व और भारतीय संस्कार को सांप्रदायिकता के नजरिये से देखा जाने लगा,40 वर्ष भी नहीं गुजरा कि 'बंगाल-विभाजन' को मान लिया गया। अपने देश का कितना दुर्भाग्य ?

        आज भी यह परंपरा चल रही है 'वन्दे मातरम और भारत माता का जय' के नाम पर राजनीति हो रहा है। देश-विरोधी नारों का समर्थन किया जा रहा है,यह उसी विकृत मानसिकता का परिणाम है। 

        कांग्रेस और अन्य दल इसी विकृत मानसिकता को आगे बढ़ा रहे हैं,आजादी मिलने के बाद उसी 'हिन्दू-मुस्लिम एकता' का नाम बदलकर सेकुलरिज्म अर्थात धर्मनिरपेक्षता रख दिया गया। काश्मीर,पंजाब और असम आदि की समस्याएं इसी का परिणाम है।

        लेकिन ऐसा नहीं था,शुद्ध राष्ट्रीयता का प्रवाह समानांतर रूप से चलता रहा। जिसके वाहक स्वामी दयानन्द,स्वामी विवेकानन्द,सावरकर,तिलक,लाला लाजपत राय,अरविन्द,हेडगेवार,डॉ. मुखर्जी,दीनदयाल उपाध्याय आदि थे।

        विभिन्न प्रकार की समस्याओं से घिरे भारत राष्ट्र की एकता को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए इस प्रवाह को प्रभावी बनाना अत्यन्त आवश्यक है।

         श्रीमती एनी बेसेंट कहती है,"हिन्दू धर्म के बिना भारत का कोई भविष्य नहीं। यदि आप हिन्दू धर्म छोड़ देते हैं तो आप अपनी भारत माता के ह्रदय में छुरा भोंकते हैं। हिन्दू धर्म के अतिरिक्त अन्य किसी धर्म की रक्त वाहिनियाँ ऐसी शुद्ध स्वर्ण की,ऐसी अमूल्य नहीं हैं,जिनमें आध्यात्मिक जीवन का रक्त प्रवाहित किया जा सके।"

यह स्पष्ट है कि जब ये हिन्दू धर्म की बात कर रही हैं तो भारतीय संस्कारों की बात कर रही है,भारतीय जीवन पद्धति की बात कर रही है।


मेरा इतना लिखने का मूल मकसद है एक जिज्ञासू के कुछ प्रश्नों का जवाब सलीके से दे सकूं -
1. हिंदुत्व ही राष्ट्रीत्व है।
2. हिंदुत्व व राष्ट्रीत्व - भारतीय के समान ही परस्पर पर्यायवाची।
3. हिन्दू शब्द राष्ट्रवाचक है,पंथ या संप्रदायवाचक नहीं।

       एक बात की ओर मैं ध्यान दिलाना चाहूँगा कि हिंदुत्व को संकीर्ण अर्थों में नहीं समझा जा सकता,इसका विस्तृत आयाम है। मैं बार-बार कह रहा हूँ कि इसे किसी मजहब के समानार्थी न माना जाए,यह कई मजहबों का संघ है लेकिन ये सभी मजहब इसके आदर्शों को मानते हैं,इसके लक्षणों को मानते हैं। और जो इन आदर्शों को नहीं मानता वह इसके परिधि में नहीं आता।

       मतलब स्पष्ट है कि एक नास्तिक और दूसरा आस्तिक भी हिंदुत्व की परिधि में आ सकता है। यहीं हिंदुत्व राष्ट्र निर्माण की पहली सीढी है,राष्ट्रीयता का प्रतीक है,एक सूत्र में बाँधने का जरिया है,मातृभूमि से प्रेम और इसके लिए मर मिट जाना इसका पराकाष्ठा है। यह ऐसा पद्धति है जो राजनीतिक,समाजिक,धार्मिक,सांस्कृतिक और भौगोलिक सभी को अपने अंदर समेटा हुआ है।

4. देश-भौगोलिक इकाई और राज्य-राजनैतिक इकाई है। यह बिल्कुल सही है।
कुछ लोगों का कहना है कि देश और राष्ट्र में कोई अंतर नही है, दोनों राजनैतिक इकाई ही हैं। बिल्कुल ही गलत बात है।

       यहाँ 'राष्ट्र','राष्ट्र-राज्य' और 'राज्य' तीनों में अंतर को समझना बहुत ही जरूरी है। राष्ट्र अपने आप में बहुत हद तक एक काल्पनिक समुदाय होता है,जो अपने सदस्यों के सामूहिक विश्वास,आकांक्षाओं और कल्पनाओं के सहारे एक सूत्र में बंधा होता है। इन मान्यताओं और विश्वास को अगर पहचानने का प्रयास करें तो,इस प्रकार दृष्टिगोचर होंगे - साझा विश्वास(इसे केवल महशूश किया जाता है,यह नदी पहाड़ आदि जैसा नहीं होते);इतिहास अर्थात ऐतिहासिक पहचान की भावना;भूक्षेत्र इससे जुड़ी साझे अतीत की याद लोगों में एक सामूहिक पहचान का बोध कराती है;साझे राजनीतिक आदर्श और साझे राजनीतिक पहचान आदि।

       इस प्रकार की राष्ट्र की भावना ही राष्ट्रवाद को जन्म देती है। ऐसा नहीं कि राष्ट्रवाद केवल जोड़ने का ही बात करता है बल्कि यह साम्राज्य के लिए घातक भी साबित हुआ है। एक तरफ यह जर्मनी और इटली का एकीकरण करता है तो दूसरी तरफ आस्ट्रेलियाई-हंगेरियन और रूसी साम्राज्य तथा ब्रिटिश,फ्रांसीसी आदि के विघटन और पतन का कारण भी बनता है।

       भारतीय राष्ट्रवाद 'राष्ट्रीय आत्म निर्णय' के सिद्धांत को नकारता है,जिसका मतलब कि भारत से अलग होने का नारा कोई नहीं लगा सकता।

       किसी राष्ट्र की भौगोलिकता अतीत की यादों को लोगों में एक सामूहिक पहचान का बोध कराती है। यहीं कारण है कि राष्ट्र के सदस्य के रूप में हम अपने राष्ट्र के अधिकतर सदस्यों को कभी नहीं जान पाते,लेकिन फिर भी हम उनका आदर करते हैं,संकट के समय सहायता करते हैं। कश्मीरी पंडितों को हम नहीं जानते,पाकिस्तानी हिन्दुओं को नहीं जानते लेकिन उनके लिए हमारे मन में दर्द होता है।

राष्ट्र किसी सीमा की मोहताज नहीं,इसका कोई परिधि नहीं होता,परिधि होता है राज्य का,जो निहायत ही राजनितिक इकाई है,मानव निर्मित है। 

इसी राज्य को राष्ट्र के साथ मिलाकर 'राष्ट्र-राज्य' का नया संकल्पना अस्तित्व में आया जिसे हम देश के पर्यायवाची मानते हैं। इसमें राष्ट्र की भावना के साथ-साथ राज्य की परिधि भी होती है। 

5.  आज के भारत की राष्ट्रीयता पूर्वज, इतिहास, परंपरा, संस्कृति, श्रद्धा केंद्र से उत्पन्न नही हुयी, बल्कि औपनिवेशिक शासन के खिलाफ स्वतन्त्रता संग्राम से हुयी है,यह लोगों का अधूरा ज्ञान है। इसके लिए मैं केवल कुछ उद्दाहरण मात्र देना पसंद करूँगा। महाराष्ट्र में राष्ट्रवाद शिवाजी जयंती और गणेश उत्सव से परवान चढ़ा। इस क्षेत्र के जितने भी क्रांतिकारी थे वे सभी भारतीय परंपरा से प्रभावित थे। 

        वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट,आर्म्स एक्ट,आईसीएस परीक्षा का उम्र मुद्दा,द्वितीय आंग्ल अफगान युद्ध,बंगाल विभाजन और दिल्ली दरबार आदि आजादी के आंदोलन के समय राष्ट्रवाद के उदय के तत्कालीन कारण माने जाते हैं। स्वदेशी आंदोलन जिस रूप में परवान चढ़ा,इस बात को सभी जानते हैं कि वहाँ वन्दे मातरम और परंपरा का क्या योगदान था। गंगा में स्नान करके और माँ काली के नारों से सडकों पर अंग्रेजों के खिलाफ नारे लगाए जाते थे। यह सब इतिहास और संस्कृति का ही उपज था। 

       कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि सावरकर ने द्वीराष्ट्र का सिद्धांत दिया। लेकिन कब दे दिया ? कुछ दिन पहले दिग्विजय सिंह ने ऐसा ही बात कहा था कि जिन्ना ने सावरकर के बातों को आगे बढ़ाया है। जिस हिन्दू महासभा से ये जुड़े थे उसका मकसद एक एकत्रित भारतीय राज्य का गठन करना था न कि उसे तोड़ना। विस्तृत जानकारी के लिए www.savarkar.org पर पढ सकते हैं। इसलिए इस तरह की बातें करना बकवास के अलावा कुछ नहीं है। 

6. इसकी पुष्टि के लिए मैं एक ही बात कहूंगा कि लोगों का एक इतिहास होता है। इतिहास की घटनाएं जैसे आनंद देने वाली होती हैं, वैसे ही दु:खदायी भी होती हैं। ये घटनाएं विजय की होती हैं, तो पराजय की भी होती हैं। जिनको ये अपने इतिहास की घटनाएं लगती है, उनका राष्ट्र बनता है। अर्थात अच्छे और बुरे सभी घटनाओं का हमें आदर करना सीखना चाहिए।

       बाकी सभी पॉइंट में हिन्दू शब्द का इस्तेमाल किया गया है और कुछ में कहा गया है कि हिन्दुस्तान हिन्दुओं का देश है तो इसमें संशय क्या है ? 

       पहले इस प्रशंग पर गौर करते हैं - पंडित जवाहरलाल नेहरु जीवन के प्रश्नों को भौतिक आधार पर ही देखा करते थे। ईश्वर,धर्म,आत्मा आदि का उनके लिए कोई अर्थ नहीं था। दुर्भाग्य से उनकी पत्नी,जो चिकित्सा के लिए विदेश ले जाई गयी थी,का देहांत हो गया। अपनी रीति के अनुसार उनके शरीर का अग्नि संस्कार किया गया। उस मुट्ठी भर राख का क्या करना चाहिए ? यह प्रश्न था। भौतिकवाद के अनुसार उस राख का कोई महत्त्व नहीं जो कि नेहरूजी थे। 

        पंडित नेहरु के मस्तिष्क में एक संघर्ष उत्पन्न हो गया। उनका भौतिक विचार उनसे कहता कि फेंक दो इस राख को इसका कोई मूल्य नहीं। पर उनके पुरातन हिन्दू रक्त की पुकार थी कि अपनी प्यारी पत्नी के अवशेषों को गंगा माता की गोद में समर्पित करो। अंत में पुरातन संस्कारों की विजय हुयी। राख अपने देश में लाई गयी और प्रयाग में गंगा,यमुना और सरस्वती के संगम में विसजिंत की गयी। 

       बाद में पंडित नेहरु ने कहा कि "उनकी आधुनिक शिक्षा तथा प्रशिक्षण सभी विद्रोह कर रहे थे,किन्तु उनके भीतर की किसी चीज ने,किसी ऐसी चीज ने,जिसका स्पष्टीकरण नहीं सकता,उन्हें राख को संगम में विसर्जित करने को बाध्य किया।"

हमारी संस्कृति,हिंदुत्व जो जीवन पद्धति तथा राष्ट्रीयता दोनों का प्रतीक है वो किसी परिभाषा की परिधि में नहीं आती। यह एक मूल्य है,आदर्श है जिसे परिभाषित नहीं किया जा सकता बल्कि इसे एहसास किया जा सकता है,मह्शूश किया जा सकता है। बिल्कुल उसी उसी तरह जिस तरह हम माँ-पुत्र के प्यार को करते हैं। 

अगर कोई पूछे कि ईमानदारी क्या है ? जीवन क्या है ? समानता और स्वतंत्रता क्या है ? तो इसका उत्तर संतोषजनक नहीं हो सकता लेकिन इसके आयाम इसके लक्षण को बताकर इसके तात्पर्य को बता सकते हैं। 

ठीक उसी प्रकार हिंदुत्व है जिसके तात्विक आयाम है,जो विस्तृत है,जिसकी गणना असंभव है। 

जहां तक हिन्दू का सवाल है यह कोई मजहब नहीं है। हिन्दू वहीं है जो हिंदुत्व को मानता है।   
                                                                    
                                                        - सुरेश कुमार पाण्डेय 

Thursday, 14 April 2016

आंबेडकर को सबसे ज्यादा धोखा किसने दिया ?

       आज देश आंबेडकर की 125वीं जयंती मना रहा है। असमानता के खिलाफ इनके संघर्ष को याद करते हुए 13 अप्रैल को संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी जयंती मनाई,यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि डॉ. आंबेडकर के विचारों का प्रसार हो रहा है।

        लेकिन क्या आंबेडकर द्वारा कही गयी बातों को केवल दोहरा भर देने से हम आंबेडकरवादी हो सकते हैं या आंबेडकर आदर्श हो सकते हैं ? जवाब होगा - नहीं। कोई किसी विचारधारा का जानकार हो सकता है,लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर जानकार उस विचारधारा के मूल्यों और सिद्धांतों को मानने वाला भी हो। जैसे - एक सूफी विद्वान सूफी मामलों का जानकार हो सकता है,लेकिन सूफीवादी नहीं क्योंकि उनमें से अधिकांश शायद थप्पड़ का जवाब,थप्पड़ से दें,जो सूफी मत के खिलाफ है।

        आज ऐसा ही भारत के किसी-न-किसी कोने में देखने को मिल रहा है। देश-विरोधी नारों का समर्थन कर,लोग अपने बचाव में आंबेडकर के किसी उक्ति को बता दे रहे हैं। परन्तु उन्हें याद करना चाहिए कि
"जिस देश में आपने जन्म लिया है,उसके प्रति कर्तव्य पालन करने से बढ़कर संसार में कोई दूसरा काम है ही नहीं।"                                                                                                     - महात्मा गांधी 
        सवर्ण से शादी का इच्छा रखने वाले दलित,खुद अपने से निचली जातियों में शादी करने से मना कर दे रहे हैं। गौरतलब है कि आज दलित समुदाय भी कई जातियों में विभक्त हो गया है,वे इसकी समाप्ति का बात न करके,जो समाज की संपूर्ण जाति-व्यवस्था है उसे समाप्त करने की बात करते हैं। यह निश्चित रूप से दोहरा चरित्र का नमूना है क्योंकि कहा गया है,'उदारता का काम अपने घरों से आरंभ होता है।'

        यह सर्वविदित है कि बाबा साहब का अंतिम उद्देश्य जातिविहीन समाज की स्थापना करने का था। इसे तब तक नहीं पाया जा सकता,जब तक कि सैकड़ों जातियों में बंटे दलित में भी रोटी-बेटी का संबंध न हो जाए। आज दलित का बौद्धिक तबका इस तरह का भेदभाव करता नजर आ रहा है।

        डॉ. आंबेडकर जिस दलित समाज के उत्थान के लिए आंदोलन चलाये,आज वहीं दलित समाज खुद जातियों में विभक्त होकर उन्हें धोखा देने का पहला काम किया।

        बौद्धिक वर्ग,एक ऐसा तबका होता है,जिसे समाज में सबसे ज्यादा इज्जत मिला करती है,लेकिन आज का अधिकांश दलित बौद्धिक या कहें कि सवर्ण बौद्धिक दोनों ने पेट पूजन को पहली प्राथमिकता दी। अप्रैल,1956 में आंबेडकर ने खुद कहा था कि
"पढ़े-लिखे लोगों ने धोखा दिया और वे खुद पेट-पूजन में लग गये।" - डॉ. आंबेडकर 
         जहां तक मैंने अनुभव किया है,आज का बौद्धिक वर्ग आलोचक बनकर रह गया है,उनमें रचनात्मकता दिखायी ही नहीं देता।

 लोकसभा सदस्य डॉ. उदितराज लिखते हैं,
"बौद्धिक वर्ग अहंकार की संकट से गुजर रहा है। दलित बौद्धिक वर्ग,जो संगठित होने का बार-बार नारा लगाता है,सबसे ज्यादा असंगठित वही है।" - उदितराज 
         अगर इसका विस्तार देखा जाए तो कोई अपने को आंबेडकरवादी कहता है तो कोई पेरियारवादी;ठीक उसी तरह जैसे समाजवाद के कई रूप हैं - लोहियावादी,जेपी वादी आदि।

         लेकिन आज के मौजूदा समय में अगर केवल कोई आंबेडकर को गंभीरता से लिया है तो वह है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अर्थात संघ। वह आंबेडकर गांधी आदि को युगपुरुष का उपमा देता है।

          संघ ही एक ऐसा संगठन है,जो समग्र हिन्दू एकता की बात करता है। इस एकता की बुनियाद को मजबूत करने के लिए इसके द्वारा किया गया प्रयास सराहनीय है। जो पार्टियां और संगठन इन दलितों का इस्तेमाल केवल वोट बैंक के लिए किया करती थी,वो आज परेशान है,क्योंकि भाजपा ने इनको साथ लेकर चलने का ब्लूप्रिंट जारी कर दिया है। मौजूदा सरकार मुद्रा बैंक,स्टैंड अप इंडिया के तहत इनके तरक्की को तवज्जो देना शुरू कर दिया है। फ्री गैस कनेक्शन गरीबों को देने की बात कही गयी है,जाहिर है इसका लाभ दलितों और वंचितों को ही मिलेगा। 

समाजिक बदलाव कोई रॉकेट साइंस तो है नहीं। इसलिए निष्कर्षतः

समरसता बढ़ रही है। माहौल में अंतर आ रहा है। आहिस्ता..... आहिस्ता.......।
   
                                                                    - सुरेश कुमार पाण्डेय  

Sunday, 10 April 2016

जूता

        सदियों से जूता का महत्व बरकरार रहा,बस मायने बदलते रहे। कभी राज्य का शासन संभालकर तो कभी विरोध के प्रतीक के रूप में। बदलता रहा तो इसके उपयोग करने वालों का तरीका।
 

       जूता,मनुष्य का एक बुनियादी आवश्यता हमेशा से रहा है। आज उपभोक्तावाद एक ऐसा खतरनाक रूप ले चुका है कि अकसर लोगों से कहते सुना जाता है,'हम व्यक्ति के आर्थिक स्थिति का पता उसके जूते को देखकर लगा सकते है।' सच्चाई जो भी हो,लेकिन मैंने ऐसे भी लोगों को देखा है,जो फटा हुआ अंडरगार्मेंट तो पहनते हैं और अपनी मासूका तथा समाज में दिखावा करने के लिए 'वुडलैंड' का जूता पहनना नहीं भूलते। इससे अलग एक और रूप देखने को मिलता है,उन गरीब और वंचित तबकों के लोगों में,जिन्हें कड़ाके की ठंड और दिल दहलाने वाले गर्मीं में एक जूता(चप्पल) भी नसीब नहीं होता। पैरों में पॉलीथिन बाँधकर घूमने को मजबूर होते हैं। खैर.....

        दिसंबर,2008 में मैं नौवीं का छात्र था। इसी साल एक प्रेस वार्ता में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर जूता फेंका गया। एक नहीं बल्कि दोनों।  उसके बाद मानों पूरी दुनिया में एक चलन सा चल पड़ा। ये जूता फेंकने वाले मुंतजर अल जैदी अरब देशों के हीरो बन गए थे। लेकिन उस समय खबर आयी थी कि पुलिस उनका हाथ-पैर तोड़ दी थी।

       अगले ही साल लन्दन में चीनी राष्ट्रपति वेन जियाबाओ पर जूता फेंका गया। उसके बाद भारत में भी ऐसी घटनाएं लगातार देखने को मिली। 2009 में ही नवीन जिंदल और लाल कृष्ण आडवाणी पर भी जूता-चप्पल उछाले गए। इसी साल इस फेहरिस्त में पी चिदंबरम और मनमोहन सिंह भी जुड़ गए जिनपर जूते उछाले गए।

       बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी पर पाँच जनवरी,2015 को जूता फेंका गया। इसके बाद बिहार में 'जीतन और जूता' का मुहावरा काफी प्रचलित हुआ।

      यह वहीं जूता है,जो अयोध्या में चौदह सालों तक शासन किया। दशरथ के पुत्र भरत इसी जूता(खड़ाऊ) को शासन का प्रतीक बना दिए। महाभारत काल में जूता ही वो चिह्न होता था कि इस समय द्रौपदी के साथ कौन आराम कर रहा है। सदियों से जूता का महत्व बरकरार है। आज तो विरोध जताने का एक मुख्य हथियार बनता जा रहा है। 
                         - सुरेश कुमार पाण्डेय 

Thursday, 7 April 2016

विश्वविद्यालयों में हो रहे विवाद का मुख्य वजह आरक्षण तो नहीं

         इन दिनों विश्वविद्यालय वैचारिक टकराव का मैदान बन गए हैं। छात्र संगठन अपने-अपने संगठनों के विचारों का प्रसार कर रहें हैं,फलस्वरूप इतने सालों से दबाये गए एक विशेष विचारधारा को अवसर मिल रहा है,वहीं दूसरी ओर अपनी साख बना चुका अन्य विचारधारा अपनी आधार खोता देख उग्र भी हो रहा है,यहीं वह कारण है संघर्ष का। यह पैमाना अलग-अलग विश्वविद्यालयों में भिन्नता पाये हुए है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इसका दूसरा दृष्टिकोण है तो दिल्ली विश्वविद्यालय में तीसरा। श्रीनगर के एनआईटी कैंपस में एक नया आयाम उभरकर सामने आया है,वह कि वहाँ मामला सुरक्षा और 'देश-हित तथा देश-विरोधी' बहसों का है। जेएनयू में भी कुछ ऐसा ही मुद्दा बना हुआ है।

        1990 के दशक का शुरुआत समकालीन भारतीय राजनीति के लिए मुख्य आधार माना जाता है। मंडलवादी राजनीति अपना पैर पसारना शुरू कर देता है। मंडल का जवाब कमंडल से देकर भाजपा राजनीतिक पाँव को मजबूत करती है और उदारीकरण का दौर भारतीय समाज में नए आर्थिक वर्गों का उदय करता है। वैश्वीकरण का प्रभाव भारतीय समाज पर पड़ता है।

        1990 से पहले आरक्षण का प्रावधान शैक्षणिक संस्थाओं में मात्र 22.5 फीासदी था,जिसका संबंध अनुसूचित जाति और जनजातियों से है,जो आज भी बना हुआ है। एक ऐतिहासिक बदलाव जिसके तहत प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने ओबीसी को आरक्षण का प्रावधान कर दिए। तदुपरांत शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण का दायरा बढ़कर लगभग 50 फीासदी के करीब हो गया। समाज के हर तबके के लोग विश्वविदयालयों में प्रवेश पाने लगे और बौद्धिक टकराव का जमीन तैयार होने लगा,जो आज चरम पर पहुँच गया है। यह टकराव योग्यता की भिन्नता की है जो बड़े शोध के लिए भी हतोत्साहित कर रहा है।

       'आरक्षण का वैसाखी' समाज में अब तक के बराबर वर्गों,जातियों में से कुछ को लंगड़ा बना दिया और चलने के लिए आज व्हीलचेयर का प्रावधान कर दिया। बाकी उसी अवस्था में तड़प महसूस कर रहे हैं। यह व्यवस्था विश्वविद्यालयों के छात्रों को मोटे तौर पर दो भागों में स्पष्ट विभाजन कर दिया है,एक ओर आधा फीसदी आरक्षण के समर्थक हैं तो दूसरी ओर इतना ही लगभग विरोधी।

       मुफ्त में लगभग पिछले 25 सालों से सेवा और लाभ पाने वाले ये लोग,ऐसी पार्टी की सारी नीतियों का समर्थन करते हैं,जो आरक्षण के पक्षधर हैं,बस क्या;यहीं वह दूसरा वजह है,जो संघर्ष को जन्म देती है और बाहरी दुनिया की राजनीति विश्वविद्यालयों में दस्तक देती है।

       इस तरह के संघर्ष से निपटारा पाने का सबसे अच्छा तरीका है कि आरक्षण प्राप्त लोगों में इस भावना का विकास कराने का प्रयास किया जाए कि
 "व्यक्तिगत गरिमा और आत्मसम्मान की भावनाएं समानता के दर्शन के मूल मंत्र हैं। यदि किसी व्यक्ति को यह मालूम होगा कि उसे अपनी पद-प्रतिष्ठा वंचित समूहों के लिए निर्धारित वरीयता के आधार पर मिली है-अपनी योग्यता के आधार पर नहीं,तो इससे उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचेगी,और उसके मन में हीन भावना(INFERIORITY FEELING) घर कर जाएगी। ऐसी स्थिति में ये देश,समाज आदि के उन्नति के लिए निरर्थक हो जाएंगे।"
                                             
                                                                                            -सुरेश कुमार पाण्डेय 

Monday, 4 April 2016

हिंदुत्व मजबूती की ओर और समाजिक समरसता उफान पर

        'सत्य मजबूती से अडिग रहता है,झूठ का बार-बार हमला इसमें और निखार लाता है।' ठीक ऐसा ही कुछ हिंदुत्व के साथ हो रहा है,यह सत्य है,विश्वव्यापी है,अमर है जिसपर झूठ के बदौलत बार-बार आघात और निखार ला रहा है,अपना परचम लहरा रहा है।

        'होली' एक ऐसा त्योहार है,जिसकी पहचान हिन्दू समाज से है,हिंदुत्व से है,इन दिनों इसका प्रसार समाज के हर उस समुदाय पर हो गया है,जो आज तक इससे अछूते थे,वो चाहे मुस्लिम समाज हो या ईसाई या कोई और। इसकी झलक मुझे तब देखने को मिली जब मैंने बिहार के कुछ शहरों का भ्रमण किया और रास्ते में कई प्रकार के लोगों से बात किया।

        यह होली और अन्य त्योहारों की भाईचारा का सन्देश तथा हिंदुत्व की शालीनता ही है कि हर समुदाय के लोगों को अपनी आवृत्ति में ले रहा है,जीवन का मार्ग बतला रहा है और प्रेम की विश्वव्यापी आयाम को आधार प्रदान कर रहा है।

       समय-समय पर दो आरोप हिंदुत्व पर लगाए जाते रहे हैं;पहला कि हिन्दू पद्धति भी अन्य कई धर्मों से प्रभावित हुआ है और पूरा हिन्दू समाज में एकता का भाव नहीं है-सवर्ण और अवर्ण में समाजिक तनाव बना रहता है।

        ऊपर से देखने पर यह भले ही सही प्रतीत हो,लेकिन विश्लेषण करने पर बेबुनियाद और आधारहीन लगते हैं। यह हिन्दू जीवन पद्धति की विशेषता है कि वह जड़ नहीं है,विकासशील है,समय के साथ उत्पन बुराइयों को दूर करता है जैसे कि सति-प्रथा की समाप्ति,बाल विवाह रोक आदि तथा अच्छे पहलूओं को अपनाता रहा है लेकिन अपना मूल भाव को धूमिल नहीं होने दिया है।

        वैश्वीकरण के कारण दुनिया का समस्त देश एक-दूसरे से इस कदर जुड़ गए हैं कि वहाँ के देश सांस्कृतिक स्तर पर प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। भारत में ईसाई उत्सवों को इतना तवज्जों देना इसी का नतीजा है।

       समाज हमेशा से गतिमान रहा है,परिवर्तन होते रहता है,आज परिस्थिति ऐसी बन गयी है कि आधुनिकता के बिना दुनिया में मनुष्य का अस्तित्व हीं खतरे में पड़ सकता है। आधुनिकता एक भौतिक पहलू है जो इंसान का चरित्र निर्माण नहीं कर सकता। इसी कारण हम संस्कृति की ओर लौटते हैं,जो हमारे जीवन को एक आयाम देता है। खुले तौर पर और प्रमाणित तरीके से कहा जा सकता है कि आज वहीं मनुष्य जीवित रह सकता है जिसमें आधुनिकता के साथ-साथ सांस्कृतिक पहचानों का भी पुट हो। यानि कि हम सूचना प्रौद्योगिकी,अंतरिक्ष विज्ञान,खान-पान के तरीकों में बदलाव करें लेकिन अपनी सांस्कृतिक विरासत जैसे योग,मूल्य,जीने के तरीके,संस्कार आदि का भी आदर करें और अपनाएं;नहीं तो नीरसता का भाव जल्द हावी हो जाएगा।

      अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के अनुसार,'नरेंद्र मोदी आधुनिकता और परंपरा के एक अच्छे मिश्रण हैन।' ऐसे कई उदाहरण हमें मिल जाएंगे।

       दूसरी सबसे बड़ी बात ध्यान देने वाली यह है कि हम एक अलग धर्म के उत्सवों का जश्न मनाते हैं,उसका आदर करते हैं तो वह हमारी पहचान है,न कि हम उससे प्रभावित हैं।

      'सवर्ण और अवर्ण के समाजिक तनाव का मसला' आज उतना चरम पर नहीं है,जितना इसे पेश किया जा रहा है। इसपर मैं काफी लिख चुका हूँ,इसकारण वर्णन करना उचित नहीं समझता।

       स्पष्ट संकेत है कि सत्य अडिग रहता है और हिंदुत्व भी अडिग है।
         - सुरेश कुमार पाण्डेय 

Saturday, 2 April 2016

आलोचना की प्रवृति कहीं ले न डूबे

       भारतीय समाज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है,जहाँ आलोचक को तहे-दिल से स्वागत किया जा रहा है,इससे भी बढ़कर एक विध्वंसकारी आलोचक को। सुर्ख़ियों में बने रहने के लिए इस तरह के हथकंडों का इस्तेमाल जोर-शोर से चल रहा है। असहिष्णुता को लेकर आलोचना के नाम पर कई लेखकों द्वारा पुरस्कार लौटा दिया गया। एक दलित की आत्महत्या पर ऐसा ही कुछ हुआ। जेएनयू में देश-विरोधी नारों को असहमति का अधिकार कहकर आलोचना की सारी सीमाओं को तोड़ दिया गया। यह मामला यहीं नहीं रुका और रातों-रात कुछ छात्र नेता के पंख उग आये,साथ ही अपने को देश में परिवर्तन के कर्णधार समझने लगे। इन दिनों 'भारत माता की जय' के नाम पर आलोचना का नया दौर चला है।

      हम मानते हैं,समाज में यह जरूरी है,आलोचना होना चाहिए,लेकिन इस बनावटी आलोचना से क्या मिला ? इस बात पर हम कभी सोचे की इस तरह की आलोचना का कितना कीमत हमने चुकाया ?

      जितने भी आलोचक थे,समाज ने उन्हें हाथों-हाथ लिया,यूँ कहूँ कि समाज का एक छोटा सा तबका। इनके इस हरकत से इनकी व्यक्तिगत तरक्की तो हुयी,पर समाज जस-का-तस अपनी पुरानी अवस्था में ही जड़ है। लेकिन ऐसा नहीं है,बदलाव की बयार तो आयी है,समाज का नैतिक उत्थान हुआ है। एक समृद्ध परिवार अपनी सब्सिडी छोड़ रहा है,जनता कदमताल मिलाकर राष्ट्रवाद की नींव को मजबूत कर रही है,बदलाव का नया जोश और उमंग सांतवे असमान पर पहुँच चुका है। ऐसा संभव हुआ है,केवल और केवल सरकार की 'रचनात्मक कार्यों' के बदौलत।

       एक समाज तभी बदल सकता है,जब आलोचना के साथ-साथ रचनात्मकता का भी पर्याप्त स्थान हो। एक सवाल जो सभी आलोचकों से पूछना चाहिए कि आपके विरोध ने समाज को किस प्रकार प्रभावित किया ? आपने कौन सा रचनात्मक कार्य किया ? तो इनको जवाब देते नहीं बनेगा क्योंकि इस बात का आभास इन्हें भी है कि सरकार जिस दृढ़ता से विपरीत परिस्थिति पर काबू पायी और समाज में नैतिक उत्थान की,अगर न कर पाती तो समाज को गर्त में गिरना निश्चित था।

      आज भारतीय समाज जो स्थायित्व की ओर बढ़ रही है,राष्ट्रवादी पुट को संजोकर मजबूत कर रही है,वह केवल रचनात्मक कार्यों से हुआ है,न कि आलोचनात्मक रवैये से।
                                          - सुरेश कुमार पाण्डेय