Thursday, 10 March 2016

भारत में वनवासी समस्या और समाधान के प्रयास

       भारत में आदिवासियों की जनसंख्या 2011 के जनगणना के अनुसार संपूर्ण जनसंख्या का 8.2 फीसदी है। हिन्दू समाज का यह हमेशा से ही अविभाज्य घटक रहा है।(1)

      हम जानते ही हैं कि भारत की संस्कृति का उत्स वनों-पर्वतों में रहा है। इसी क्षेत्र में ऋषि-मुनियों ने गहन चिंतन करके हमारे देश के व्यक्ति तथा समाज का सर्वांगीण विकास हो सके,ऐसा सामर्थ सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन प्रवाहित किया।(2)

       सहयोग और मुकाबला में वनवासियों का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। सुग्रीव और पुरुषोत्तम श्रीराम की दोस्ती का नमूना आज खोजे नहीं मिलता।(3) ऐसा नहीं है कि वनवासियों का योगदान केवल ऐतिहासिकता को ही धारण किये हुए हैं। आधुनिक काल में नागालैंड के जादो नांग और बिहार-झारखंड क्षेत्र में बिरसा मुंडा तथा मध्य भारत में तांतिया भील जैसे कर्मठ और जुझारू नेताओं का संघर्ष सभी को स्मरणीय होगा।(4)

     आजादी के पहले अंग्रेजों की नीति और ईसाई मिशनरियों के प्रभाव के चलते तथा हमारी राष्ट्रीय कमजोरी के चलते वनवासी क्षेत्र अलग-थलग पड़ गए थे। ऐसा नहीं है कि केवल अंग्रेज इसके लिए जिम्मेवार थे,बल्कि हिन्दू समाज ने भी वनवासी क्षेत्र की संपूर्ण उपेक्षा की है।(5)

आजादी मिलने के बाद -

     डॉ. प्रसन्न दामोदर सप्रे अपनी किताब में लिखते हैं,आजादी मिलने के बाद भी आदिवासियों के समस्याओं का निदान नहीं हो पाया है। प्रशासन का कार्य भी उसी अंग्रेजों की लीक पर ही चल रहा है। यह क्षेत्र आज भी कई समस्याओं के जंजाल में अटका पड़ा है।(6)

      इन वनवासियों की समस्या कई कारणों से बनी हुयी है,जिसे समझने के लिए आतंरिक और बाह्य में वर्गीकरण कर सकते हैं।
आतंरिक कारण -
      व्यापारी,ठेकेदार और सूदखोरों ने वनवासी समाज का बहुत शोषण किया है,इस बात को कई इतिहासकार मानते हैं,चाहे वो रोमिला थापर हों या विपिन चंद्रा। सुमित सरकार जैसे सरीखे वामपंथी इतिहासकारों का लेखन विशेषता तो 'नीचे से इतिहास लेखन' रहा है।

      वनवासी क्षेत्रों में जो भी शासकीय कर्मचारी आते हैं,उनमें से अधिकांश अपने कर्तव्य को नहीं निभाते। वहाँ जाने वाले अधिकांश बेमन और मजबूरी में ही जाते हैं। दूसरे कई वे लोग भी हैं जो उनके सरलता और अज्ञानता का लाभ उठाकर शोषण करते हैं।

      विकास के नाम पर लगाए गए कई उद्योगों ने इनके हितों को प्रभावित किया है,ये बेघर और जमीनहीन हो गए हैं। उद्योगों और प्लांट के लगाने से रांची,राउरकेला और कोरबा आदि क्षेत्रों में स्थिति बदतर हो गयी है।(7) जो मुवायजा दी जाती है वह बाजार भाव से काफी कम है।

      ध्यान देने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात है कि सरकार नए-नए क़ानून बनाती है,इनमें से एक जंगल क़ानून भी है। अधिकांश का ऐसा विश्वास है कि जंगलों का विनाश वनवासियों ने नहीं किया है। उनका विनाश आधुनिक सभ्यता एवं उपभोक्तावाद के वाहकों ने लोभ के कारण किया है।
(लेकिन समय बदल रहा है,उनके पुनर्वास का व्यवस्था कर,सरकार द्वारा विकास का एक ऐसा मॉडल लाया जाना चाहिए ताकि वे मुख्यधारा से जुड़ सके।)


बाह्य कारण -
       बाह्य कारणों में सबसे महत्वपूर्ण हैं,'व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण का अभाव'। साथ में विदेशी शक्तियों द्वारा इन आदिवासियों के भावनाओं को भड़काया जाना;इन बेरोजगार,गरीब व भोले युवकों के मन में सीधे ही अलगाववाद की भावनाएं जगाने में ये लोग लगे हैं। ईसाई मिशनरियों का धर्मांतरण कार्यक्रम तो और खतरनाक रूप ले चुका है,हिन्दू समाज को तोड़कर,भारत की एकता और अखंडता को नेस्तानबूद करने की खतरनाक साजिस भी हो रही है। वामपंथी उग्रवाद कई क्षेत्रों में अपना पाँव जमा चुका है। असम के बोडो जनजातियों का आंदोलन,उल्फा आंदोलन और झारखंड आंदोलन इन्हीं की देन है।

       एक तरह से कहा जाए तो वनवासी समाज,चर्चित भाषा में आदिवासी समाज कई समस्याओं से पीड़ित है,जो भारत की एकता और अखंडता के लिए गंभीर संकट बन सकते हैं। इनके समस्याओं का निदान किया जाना बहुत ही जरूरी है। जो है-(8)


एआरसी की सांतवी रिपोर्ट में इनसे संबंधित मुद्दों का स्पष्ट वर्णन किया गया है -
- भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों में सबसे ज्यादा अनुपात अनुसूचित जनजातियों का ही है जो उनके जनसंख्या का 45.9 फीसदी है।
- दूसरा मुद्दा 'सामाजिक न्याय' का है। एनसीआरबी के 2006 के आंकड़ों पर ध्यान दें तो SC/ST एक्ट के तहत कुल 5621 मामले दर्ज किये गए,जिसमें 255 को सजा हुयी जबकि 4565 मामले अभी पेंडिंग हैं,अर्थात न्यायिक जटिलता अभी मुख्य समस्या बना हुआ है।(9)
- विकास को बढ़ावा देने के लिए जनजातीय क्षेत्रों में कई उद्योगों को स्थाोित किया गया,सिंचाई के लिए बाँध बनाये गये,जिसके कारण इनका विस्थापन होता रहा। हालांकि सरकार द्वारा 2007 में पुनर्वास संबंधी नई नीति स्वीकार की गयी लेकिन संतोषजनक काम नहीं हो पाया।
- इस रिपोर्ट द्वारा जो अन्य मुद्दों की ओर इंगित किया गया,वह है-क़ानून और नीति को लागू करने की निष्ठा में कमी,प्रशासन में विश्वास का न होना,सार्थक विकास नीति और स्पष्ट जनजातीय नीति का न होना आदि।

आदिवासियों के समस्याओं के समाधान के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयास -

        1999 में जनजातीय विकास को ध्यान में रखकर जनजातीय मामलों से संबंधित एक मंत्रालय को बनाया गया,जिसका मुख्य उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास पर फोकस करना है।(10)

        केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा उन क्षेत्रों में बढ़ावा देने के लिए कई छात्रवृति कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। इसके बदौलत कई जनजातीय परिवारों में बदलाव देखने को भी मिला है,लेकिन फिर भी अभी बहुत कुछ किये जाने की जरुरत है।

        स्वास्थ्य और पोषक तत्वों की पूर्ति के लिए कई कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। पानी की शुद्धता और उपलब्धता के लिए अंतरिक्ष प्रोद्योगिकी पर जोर दिया जा रहा है।

       इनके विकास को ध्यान में रखकर वित्तीय आवंटन को बढ़ा दिया गया है,कई एनजीओ के साथ सरकार सहयोग कर रही है।

       वर्तमान भारत सरकार द्वारा 'स्टार्ट अप इण्डिया' और 'स्टैंड अप इंडिया' के तहत जनजातियों के स्वरोजगार का एक सुनहरा अवसर दिया गया है,अगर यह कार्यक्रम सफल हो जाता है तो इनकी दशा और दिशा दोनों सुधर जाएगी।

वनवासी कल्याण के लिए संघ का प्रयास - 

       राष्ट्रवादी संगठन 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' वनवासियों के कल्याण के लिए 'वनवासी कल्याण आश्रम' नाम के एक सामाजिक कार्यक्रम चलाता है।(11) जिसकी स्थापना 1952 में बालासाहेब देशपांडे द्वारा किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य वनवासी समाज की सर्वांगीण उन्नति कर राष्ट्रीय एकता की भाव को पुष्ट करना है।

      'वनवासी कल्याण आश्रम' कई विकल्प आदिवासियों को देता है,जिसमें सबसे महत्वपूर्ण छात्रावास सुविधा है,जो 'राष्ट्रीय सेवा भारती' द्वारा कार्यान्वित होता है। आज इसके 150 से ज्यादा छात्रावास प्रचलन में हैं।

      पाठशालाएं का आरंभ भी 1952 से कल्याण आश्रम का आरंभ के समय से ही हो रहा है। वनवासियों में शिक्षा का प्रसार बहुत काम है,अतः इसका महत्व काफी बढ़ जाता है। तीन से छः वर्ष के बच्चों के लिए 'बाल संस्कार केंद्र' चलाये जाते हैं।

      अन्य महत्वपूर्ण काम जो संघ अपने संगठनों के माध्यम से करता है ताकि आदिवासियों की स्थिति को सुधारा जा सके,उसे संक्षेप में इसप्रकार बताया जा सकता है-चिकित्सा केंद्र,कृषि और व्यावसायिक प्रक्षिक्षण केंद्र,खेलकूद केंद्र,सत्संग तथा श्रद्धा जागरण केंद्र,युवा समिति तथा महिला समिति,लोक कला मंच आदि के माध्यम से सर्वांगीण विकास का प्रयास करता है।

चूकि वनवासियों का आज का स्थिति सदियों से चले कुचक्र और शोषण का परिणाम है,अतः तत्काल इसका समाधान हो पाना संभव नहीं दिखता। इसके लिए अनवरत प्रयास करते रहने की जरुरत है,तब ही जाकर मूल लक्ष्य को पाया जा सकेगा। 

संदर्भ सूची -
1. www.censusindia.gov.in
2. हमारे वनवासी और कल्याण आश्रम,2004 - डॉ. प्रसन्न दामोदर सप्रे 
3. रामायण कथा पर आधारित 
4. स्वतंत्रता संग्राम - विपिन चंद्रा,आधुनिक भारत का इतिहास - सुमित सरकार और एनसीईअारटी 
5. आधुनिक भारत का इतिहास - विपिन चंद्रा 
6. हमारे वनवासी और कल्याण आश्रम,2004 - डॉ. प्रसन्न दामोदर सप्रे 
7. www.sociologyguide.com
8. ISSUE RELATED TO SCHEDULED TRIBE - ADMINISTRATIVE REFORM COMMITTEE -       7TH REPORT (ARC-7thReport-ch7.pdf)
9. www.ncrb.nic.in
10. www.tribal.nic.in
11. www.rss.org

फोटो सौजन्य - गूगल,संबंधित वेबसाइट

WRITTEN BY - SURESH KUMAR PANDEY