Friday, 11 March 2016

मनुस्मृति पर डॉ. आंबेडकर के विचार का कठोर आलोचना

      मनुस्मृति का मूल विषय वेदानुकूल वर्णाश्रम धर्म का विधि-विधान है। इसमें संपूर्ण मानव धर्म है। दूसरे शब्दों में मनुस्मृति एक कानूनी समाजशास्त्र है। इसमें एक ओर मनुष्य के आचरण को लेकर मर्यादा और नैतिक कर्तव्य दिए गए हैं,तो दूसरी ओर समाज व्यवस्था को चलाने के लिए क़ानून,दण्ड,प्रायश्चित आदि का भी समावेश है। एक तरह से कहा जाए तो आधुनिक समाज के संविधान के भाँती मनुस्मृति प्राचीन समाज में 'क़ानून का शासन' स्थापित करता था,जिसके बदौलत राजा और प्रजा दोनों को ही अनुशासित किया जाता था।


      आधुनिक भारत के एक दलित विचारक डॉ. आंबेडकर द्वारा इस किताब की तीखी आलोचना की गयी,गुस्से में आकर उनके द्वारा जला भी दिया गया,इन दिनों उसी का प्रचलन हो रहा है और जगह-जगह 'मनुस्मृति' को समझे बिना जलाने की ड्रामेवाजी चल रही है।

     डॉ. आंबेडकर ने मनुस्मृति पर जो भी विचार व्यक्त कियें हैं,उसमें उन्होंने 475 श्लोकों का बार-बार प्रयोग किया,जिनमें से अधिकांश मिलावटी है,अगर इसे निकाल दिया जाए तो मनु के चिंतन और आंबेडकर के चिंतन में कोई मतभेद नहीं रह जाता।

     अपने किताब 'शूद्रों की खोज' में आंबेडकर लिखते हैं,"मैं संस्कृत भाषा का पारंगत नहीं हूँ तो अपनी इस कमजोरी को मैं स्वीकार करता हूँ।"

     इसीकारण दुर्भाग्यवश डॉ. आंबेडकर ने मनुस्मृति के विषय में वेद विरोधी मैक्समूलर द्वारा संपादित और जॉर्ज बूहलर द्वारा अंगरेजी में अनुवादित मनुस्मृति के आधार पर अपना विचार लिख दिया,जिससे अनेक भ्रांतियाँ हुयी। मैक्समूलर और बूहलर के भारतीय संस्कृति विरोध के पूर्वाग्रह को कई वामपंथी इतिहासकार भी स्वीकार करते हैं।

     मनु के धर्मशास्त्र का मुख्य विषय वर्णाश्रम धर्म है,लेकिन डॉ. आंबेडकर द्वारा दुर्भाग्य से वर्ण-व्यवस्था को आज के जन्म आधारित जाति-व्यवस्था के रूप में समझ लिया जाता है। इसपर वे कहते हैं,'मनु ने चारों वर्णों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं क्यों दी ? एक समान क्यों नहीं दी ?"

     यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि मनुस्मृति में सभी मनुष्यों के लिए एक सामान्य धर्म,और प्रत्येक वर्ण के लिए उसका विशेष धर्म कहा गया है। जो स्वाभाविक है क्योंकि प्रत्येक मनुष्य के गुण,कर्म और स्वभाव में भिन्नता पायी जाती है। सभी मनोवैज्ञानिक इस बात को स्वीकार करते हैं और आधुनिक शोधों द्वारा इसे प्रमाणित भी किया जा चुका है कि सभी मनुष्य में भिन्नता पायी जाती है।

     अगर प्राचीन यूनानी विचारक प्लेटो और अरस्तु के विचारों को पढ़ा जाए तो प्लेटो का न्याय विषयक सिद्धांत मनुष्यों के तीन गुणों साहस,बुद्धि और वासना पर ही आधारित है। अरस्तु का भी ऐसा ही विचार है,अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य के गुण और स्वभाव में भिन्नता एक सार्वभौमिक सत्य है। ऐसा नहीं है कि इस तरह का वर्गीकरण केवल भारत में है बल्कि दुनिया के हर कोने में ऐसी प्रवृति पायी जाती है,हालाँकि वे हिन्दू नहीं हैं।

     डॉ. आंबेडकर अपने चिंतन में सबसे बड़ी भूल 'शूद्र की स्थिति' को लेकर करते हैं और आज उसी को आधार मानकर समाज में भ्रम फैलाया जा रहा है।

     दो वाक्यांशों में अंतर समझना बहुत ही जरूरी है,"मनुस्मृति 'कर्म पर आधारित वर्ण-व्यवस्था' का बात करता है जो आज प्रचलित नहीं है,आज 'जन्म पर आधारित जाति-व्यवस्था' है। दोनों में जमीन आसमां का अंतर में और दोनों को एक नहीं माना जा सकता।"

      राजनीतिक कारणों से विकसित की गई अनुसूचित जातियाँ,जनजातियाँ,दलितों को मनु की शूद्र वर्ण से कोई संबंध नहीं है। आज जब वर्ण-व्यवस्था है ही नहीं तो सहीं अर्थों में न कोई ब्राह्मण,न कोई शूद्र और न ही कोई दलित है। आज हिन्दू समाज में सब बराबर है,कोई उंच-नीच नहीं और कोई अगड़ा-पिछड़ा नहीं।

     अतः आज शूद्र के नाम पर किसी को भी मनुस्मृति के विरुद्ध आंदोलन करने का अधिकार नहीं। मनुस्मृति विरोध पूर्णतया अनुचित,असंगत और अन्यायपूर्ण है।

      मनु के वर्ण व्यवस्था के अनुसार सभी वर्ण एक-दूसरे के पूरक एवं सहयोगी है,न कि विरोधी। मनु का शूद्र उपेक्षित नहीं है। उसे ब्राह्मण बनने का पूर्ण अधिकार है।

     मनु का कर्म आधारित वर्ण-व्यवस्था को आज के जन्म आधारित जाति-व्यवस्था के अनुकूल मानना डॉ. आंबेडकर का सबसे बड़ी भूल है जो मंदिर में जाने से रोके जाने के तात्कालिक प्रभाव और उतावलेपन को दिखाता है। अगर वे हिन्दू समाज में समय के साथ उत्पन्न बुराइयों को दूर करके एक 'सशक्त समाज' का निर्माण करने के लिए आंदोलन करते तो उनके लिए एक अच्छा विकल्प होता। बौद्ध धर्म को अपनाकर उन्होंने अपनी संकीर्णता का ही परिचय दिया है।

     आज स्थिति यह हो गयी है कि बौद्ध धर्म स्वीकार किये दलित भी आरक्षण का लाभ उठा हैं,जब इनको बराबरी का अधिकार एक भिन्न धर्म में मिल गया है तो 'आरक्षण की वैशाखी' की जरुरत क्यों ? यहाँ दोहरी नीति स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।

सन्दर्भ सूची -
1. मनुस्मृति
2. मनुस्मृति और डॉ. आंबेडकर - डॉ. कृष्ण वल्लभ पालीवाल
3. भारतीय राजनीतिक विचारक - ओ. पी. गाबा
4. राजनीतिक विचारों का इतिहास(भाग-1) - जे. पी. सूद
5. आधुनिक भारत का इतिहास - विपिन चंद्रा
6. भारतीय संविधान - डी. डी. वसु
7. संस्कृति के चार अध्याय - रामधारी सिंह दिनकर