Saturday, 19 March 2016

वाम-दलित गठजोड़ की आहट : एक कोरी कल्पना

     हाल के दिनों में मीडिया में आये बयानों और एक छात्र नेता का भाषण इस ओर ईशारा कर रहा है कि वाम-दलित गठजोड़,बदलाव का एक मुख्य राजनीतिक मंच हो सकता है। उस छात्र नेता के बयानों को सस्ते में नहीं लिया जा सकता,खासकर तब,जब देश की वामपंथी पार्टियों के मुख्य नेता उसके समर्थन में खड़े हों और ये कहते नजर आ रहे हैं कि आने वाले दिनों में वह बंगाल और असम में चुनावी प्रचार कर सकता है।

      वामपंथ जिसका मूल आधार 'वर्ग-संघर्ष' की अवधारणा है। जिसे संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है कि समाज आर्थिक आधार पर निश्चित रूप से दो वर्गों में बंटा होता है और उनमें संघर्ष चलता रहता है। अंत में शोषित बहुसंख्यक वर्ग इस संघर्ष में क्रान्ति के माध्यम से विजय पाता है और एक समाजवादी राज्य का गठन करता है।

      दूसरी तरफ वामपंथ से जिस दलित गठजोड़ की बात कही गयी है,उसे आंबेडकरवादी कहकर पुकारा गया है,हाल में दिए अपने भाषण में उस छात्र नेता ने कहा कि कम्युनिस्टों और आंबेडकरवादियों को संघ-भाजपा के खिलाफ एक मंच पर आना होगा। इसे केवल भाषण के रूप में नहीं लिया जा सकता क्योंकि जहाँ यह भाषण चल रही थी वहाँ कई वामपंथी हस्तियाँ भी मौजूद थे। जो राजनीतिक महत्वाकांझा को भी प्रतिबिंबित करता है।

      यहाँ जिस आंबेडकरवादी विचारधारा का बात किया जा रहा है,उसका मूल मकसद आंबेडकर के विचारों को समाज में लागू करना और सवर्ण-दलित जो भेदभाव उत्पन्न हो गया है,उसे समाप्य करना है। ये आंबेडकरवादी इस बात का भी माँग करते हैं कि समाज के हर क्षेत्र और हर संस्था में दलितों का उचित प्रतिनिधित्व हो।

      अब जो सवाल उभरकर आता है कि क्या वामपंथी संगठन 'वर्ग' की जगह जाति को अहमियत देंगे ? अगर ऐसा करेंगे तो उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है,जैसे की पार्टी के पोलित ब्यूरो में शुरू से लेकर आजतक सवर्णों खासकर ब्राह्मणों का वर्चस्व रहा है,इसपर अंगूली कोई इसलिए नहीं उठाता क्योंकि वामपंथी संगठन 'वर्ग' को ज्यादा अहमियत देते हैं। वाम-दलित गठजोड़ होने की कीमत पर,दलितों से संबंधित संगठन,वामपंथी संगठनों में अपने प्रतिनिधत्व का माँग करेंगे,जो एक चिंता का विषय होगी। वामपंथी संगठन,अन्य संगठन से भिन्न होने के कारण जातिगत अर्थात दलित प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर हिचकेंगे,उनका मूल मकसद प्रतिभा पर आधारित प्रतिनिधित्व देने पर होगा।

आधुनिक मार्क्सवादी विचारकों जैसे कि कॉटस्की,विलियम लीबनैंक्ट,रोजा लक्जमवर्ग को पढ़ें तो वो वर्ग-संघर्ष को खासा अहमियत देते हैं। वर्ग-संघर्ष तो मार्क्सवाद का ह्रदय तथा आत्मा समझा जाता है। जैसा कि लीबनैंक्ट कहता है,"वर्ग-संघर्ष के आधार पर हम अजेय हैं;यदि हम इसे छोड़ देते हैं तो कहीं के नहीं रहेंगे।"

इसकारण यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत में वामपंथ 'वर्ग-संघर्ष' की अवधारणा को छोड़ेंगे नहीं और आदत से मजबूर तथा आरक्षण की वैशाखी लिए हर संस्था में बराबर का प्रतिनिधित्व माँगने वाले दलित इससे हटेंगे नहीं तो यह गठजोड़ अधर में ही रहेगा। पोलित ब्यूरो का पुनः संरचना एक मुख्य चुनौती होगी,जिसका जातिगत आधार वामपंथी संगठन कभी नहीं देंगे।

इस तरह से जो 'वाम-दलित गठजोड़' की संकल्पना की गयी है,वह कोरी कल्पना के अलावा कुछ नहीं है।