Tuesday, 8 March 2016

वैचारिक छलावा कब तक काम आएगा ?

       एक दौर था,कॉलेज के दिनों का जब मैं वामपंथी छात्र संगठन में सक्रिय हुआ करता था। कॉलेज के दिनों का याद आज भी मेरे जेहन में है। विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम को ऐसा बनाया गया है कि कार्ल मार्क्स एक सदाबहार विचारक के रूप में उभरते हैं,चाहे राजनीतिक विज्ञान हो या दर्शनशास्त्र या समाजशास्त्र,यहाँ तक कि इतिहास भी अछूता नहीं है,रहे भी कैसे ? क्योकि समकालीन विश्व इतिहास वैचारिक टकरावों से भरा पड़ा है,चाहे विश्वयुद्ध के दौरान की घटना हो या शीतयुद्ध।

       लेकिन मुझे इससे परेशानी नहीं है,परेशानी उस बात से है कि वामपंथ का वर्णन एक अति महत्वपूर्ण दर्शन के रूप में किया गया है वो भो बाकी पर तरजीह देकर,केवल इतना ही नहीं बल्कि अन्य को इसके तुलना में गौण ही रखा गया है,वह चाहे फासीवाद हो या उदारवाद,गाँधीवाद हो या बहुवाद,पश्च-उपनिवेशी हो या नारी अधिकारवाद। इसीकारण दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से मार्क्स के कुछ विचार को हटाने की माँग उठी थी।


       सोवियत संघ के पतन के बाद कई दबे हुए दस्तावेज निकलकर सामने आये,जिससे यह जगजाहिर हो गया कि फासीवाद की तरह साम्यवाद ने भी द्वितीय विश्वयुद्ध भड़काने में बराबर की भूमिका निभायी थी। जितना हिटलर जिम्मेवार था उतना ही स्टालिन। लेकिन एक की बुराई और आलोचनाओं की लंबी-लंबी व्याख्याएं लिख दी गयी जबकि दूसरे को एक विचारधारा का प्रचारक मान लिया गया। एक सच्चाई यह भी है कि अगर द्वितीय विश्वयुद्ध का परिणाम जर्मनी के पक्ष में रहता तो कल्पना किया जा सकता है कि आज का इतिहास कैसा होता ?

       कम्युनिस्टों का ही यह कार्यपद्धति है कि 'जनक्रांति' के नाम पर लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्त्या करें। तदुपरांत यह जनक्रांति का मुखौटा रूपी आवरण छोड़कर शीघ्र ही अधिनायकवाद का रूप ले लेता है।


       स्टालिन ने अपने राजनीतिक विरोधियों का जिस तरह सफाया किया,उसमें उसने हिटलर को भी पीछे छोड़ दिया,वहीं माओ ने भी सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर दमन करने में कोसों आगे निकल गया।

        दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि सभ्य समाज के प्रति युद्ध को वे जनयुद्ध की संज्ञा देते हैं। अफजल ने सभ्य समाज के प्रति ही तो हथियार उठाया था,याकूब मेमन का कारनामा भी ऐसा ही था,अगर आतंकवादियों से वामपंथियों की गठजोड़ बनता है,तो आश्चर्य कैसा ? यह स्पष्ट रूप से लोगों के साथ वैचारिक छलावा है।

       भारत को तोड़ने की इन वामपंथियों की षडयंत्र हमेशा से रही है। कम्युनिस्टों ने जिन्ना की पाकिस्तान की माँग का समर्थन कर देश के बँटवारे की बौद्धिक जमीन तैयार कर दी और आज जेएनयू को इसका प्रयोगशाला बनाकर एक बार फिर काश्मीर,मणिपुर,केरल और अन्य क्षेत्रों के बहाने घिनौना काम कर रहे हैं। जो हास्यास्पद ही है।

       आजादी के बाद 1975 में लगे आपातकाल को याद किया जाए तो वामपंथियों ने आपातकाल और प्रेस पर लगे प्रतिबंधों का समर्थन किया और आज अभिव्यक्ति की आजादी का माँग कर रहे हैं,साथ ही देश विरोधी नारों को असहमति का हक़ करार दे रहे हैं।

     वास्तविकता यह है कि इन कम्युनिस्टों का गरीबों और वंचितों से कोई मतलब नहीं,मतलब तो सिर्फ गरीबी से है ताकि वैचारिक छलावे से उन्हें मोहित कर अपनी दुकानदारी चलाते रहें। इसका जीता जागता प्रमाण यह है कि अगर सच में गरीबों,दलितों,पिछड़ों से इनका सरोकार रहता तो पश्चिम बंगाल और केरल की हालत आज बदल गयी होती।

       मार्क्स के शिष्य लेनिन को उनके ही देश में गहरे दफ़न कर दिया गया है,लेकिन भारत में कॉमरेड अभी भी उस सड़-गल गयी विचारधारा पर प्रयोग कर खुशहाली और उन्नति के मार्ग पर ले जाने का दावा करते हैं।


       शुक्र है आज राष्ट्रवादी मीडिया 'ज़ी न्यूज' का,जिसने उनके घिनौना काम का रिपोर्टिंग कर समाज में एक नयी चेतना पैदा की। अन्य मीडिया संस्थानों के सहायता के बदौलत भारत में राष्ट्रवाद की अलख को जगाया गया,जिससे भारत एक सशक्त 'राष्ट्र-राज्य' बनने की ओर अग्रसर हुआ।

शैम्पेन की चुस्की लेते हुए होटलों में बैठकर इस बात को उठाया गया कि भारत में असहिष्णुता बढ़ रही है,यह जाहिर करता है कि इस तरह का दुष्प्रचार किया गया। आज यह बुलबुला फुट चुका है। अनुपम खेर का भाषण काबिलेतारीफ है जिन्होंने बहस को एक नया मोड़ दिया है।


ऐसे दौर का शुरुआत आरंभ हो चुका है जब भारत में दो विचारधाराओं का सीधे-सीधे टकराव हो रहा है। वामपंथी ताकतें भी अपनी कमर कास चुकी है। केंद्र में सत्ता परिवर्तन के साथ 60 वर्षों से दबाते गए दक्षिणपंथियों का मनोबल काफी बढ़ गया है,एक तरह से कहा जाए तो यह संघर्ष एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। संभावना है कि दक्षिणपंथ का पताका भारत में जोश,साहस और ओजपूर्ण गुणों को समेटकर लहरेगा और सभी को दिखा देगा कि हम कितने महान हैं। 


(अगर किसी को कमेंट करना है या बहस में भाग लेना है तो तथ्य पर बात करें,साथ ही प्रणाम के साथ अन्यथा अपनी ऊर्जा बर्बाद न करें। बिना प्रमाण किसी बात का कोई आधार नहीं। इस पूरे आलेख के हर पहलू का प्रमाण नीचे संदर्भ सूची में दिया गया है चाहे तो देख सकते हैं,धन्यवाद।) 

संदर्भ सूची -

आजादी के बाद का भारत - विपिन चंद्रा
गांधी के बाद का भारत - रामचंद्र गुहा
विश्व इतिहास - 12वीं का एनसीईआरटी,इग्नू का समाग्री(अलग-अलग किताब है)
अंतर्राष्ट्रीय संबंध - वी.एन. खन्ना,तपन विश्वाल(अलग-अलग किताब है)
स्वतंत्रता संग्राम - विपिन चंद्रा
आधुनिक भारत का इतिहास - सुमित सरकार
राजनीतिक विचारों का इतिहास(भाग 4) - जे.पी. सूद
दैनिक जागरण में बलबीर पुंज का आलेख
टेलीग्राफ डिबेट,कलकत्ता(खासकर अनुपम खेर का भाषण)
ज़ी न्यूज का डीएनए प्रोग्राम
विभिन्न टीवी डिबेट(राज्यसभा टीवी का देश-देशान्तर,आठ बजे;डीडी न्यूज का चर्चा में)
बीबीसी हिन्दी न्यूज पोर्टल

फोटो सौजन्य - गूगल

WRITTEN BY - सुरेश कुमार पाण्डेय