Friday, 18 March 2016

हिंदुत्व और राष्ट्रवाद – संघ के नजरिये से

‘हिंदुत्व’ जो आजकल काफी चर्चा में है। दुर्भाग्य कि अधिकांश लोग इसके  महत्व को नहीं समझ पा रहे हैं। आशा है,पूरे आलेख को पढने के बाद आप सभी इसे समझ पायेंगे।
हिंदुत्व एक जीवन-दर्शन और जीवन पद्धति है जो मानव समाज में फ़ैली समस्याओं को सुलझाने में सहायक है। इसको हम मजहब के समानार्थी नहीं मान सकते हैं,लेकिन अभी तक इसे मजहब के अर्थ में ही गलत तरीके से समझा गया है।
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मजहब मात्र पूजा की एक पद्धति है जबकि हिंदुत्व एक दर्शन है जो मानव जीवन का समग्रता से विचार करता है।
समाजवाद और साम्यवाद भौतिकता पर आधारित राजनैतिक और आर्थिक दर्शन है जबकि हिंदुत्व एक ऐसा दर्शन है जो मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त उसकी मानसिक,बौद्धिक और भावनात्मक आवश्यकताओं की भी पूर्ति करता है।
हिंदुत्व धर्म का पर्यायवाची है,जो भारत वर्ष में प्रचलित उन सभी आचार-विचारों,व्यक्ति और समाज में पारस्परिक सामाजिक समरसता,संतुलन तथा मोक्ष प्राप्ति के सहायक तत्वों को स्पष्ट करता है।
धर्म और मजहब में अंतर है। धर्म जीवन का साक्षात्कार है। जबकि मजहब मात्र पूजा की एक पद्धति है।
अगर उच्चतम न्यायालय के टिप्पणी पर ध्यान से गौर करें,जिसमें कहना है,
‘हिन्दू धर्म को परिभाषित करने में कठिनाई होती है। विश्व के अन्य मजहबों के विपरीत हिन्दू धर्म किसी एक दूत या एक भगवान को नहीं मानता,बल्कि इसमें कई प्रकार हैं। वृहत तौर पर हम इसे जीवन पद्धति के रूप में ही परिभाषित कर सकते हैं। (शास्त्री यज्ञपुरुष दास मामला,1966(3) एससीआर 242)’
रमेश यशवंत प्रभु बनाम प्रभाकर कुंटे(AIR 1996 SC(1113)) मामले में भी शीर्ष अदालत कहता है,’हिन्दू,हिंदुत्व,हिन्दुइज्म को संक्षिप्त अर्थों में परिभाषित कर किन्हीं मजहबी संकीर्ण सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता है। इसे भारतीय संस्कृति और परंपरा से अलग नहीं किया जा सकता। यह दर्शाता है कि हिंदुत्व शब्द इस उपमहाद्वीप के लोगों की जीवन पद्धति से संबंधित है।’
अंगरेजी लेखक केरी ब्राउन अपनी पुस्तक ‘THE ESSENTIAL TEACHINGS OF HINDUISM’ में लिखती हैं,
‘आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धांत है जिस मजहब को पश्चिम के लोग समझते हैं। कोई किसी भगवान में विश्वास करे या नहीं करे फिर भी हिन्दू है। यह एक जीवन पद्धति है,यह मस्तिष्क की एक दशा है।’
राष्ट्र और राज्य की अवधारणा पर संघ प्रचारक एमजी वैद्य का विश्लेषण –
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राष्ट्र यानी लोग होते हैं, लोगों का ‘राष्ट्र’ बनने के लिए तीन प्रधान शर्तें हैं,
1) जिस भूमि पर लोग रहते हैं, उस भूमि के प्रति उनकी भावना. उनको अपनी भूमि माता के समान पवित्र और वंदनीय लगनी चाहिए. वह ‘मातृभूमि’ होनी चाहिए।
2) लोगों का एक इतिहास होता है। इतिहास की घटनाएं जैसे आनंद देने वाली होती हैं, वैसे ही दु:खदायी भी होती हैं। ये घटनाएं विजय की होती हैं, तो पराजय की भी होती हैं। जिनको ये अपने इतिहास की घटनाएं लगती है, उनका राष्ट्र बनता है।
3) तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण शर्त है जिनकी मूल्य-अवधारणा यानी वैल्यू सिस्टम समान होता है, और इस मूल्य-अवधारणा से, जिनके अच्छे या बुरे ठहराने के मापदंड समान होते हैं, उनका राष्ट्र बनता है. यह मूल्य-व्यवस्था ही संस्कृति होती है।
ये जो लोग हैं, उनका नाम हिंदू है। इसलिए यह हिंदू राष्ट्र है। संघ के नाम में ही ‘राष्ट्रीय’ शब्द है। वह केवल राष्ट्र की चिन्ता करता है।
एक राष्ट्र के लिए एक ही मज़हब होना अनिवार्य नहीं। एक ही भाषा होना आवश्यक नहीं। एक ही वंश या नस्ल का होने की आवश्यकता नहीं।
यहां यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि ‘हिंदू’ मज़हब नहीं। अनेक मज़हबों का संघ है। ‘धर्म’ का अंग्रेज़ी में ‘रिलिजन’ या ‘मज़हब’ ऐसा अनुवाद करने के कारण ही अनेक गलत धारणाएं बनी हैं।
अपनी भाषा के कुछ शब्द ही लीजिए, ‘धर्मशाला’ क्या यह धार्मिक स्कूल होता है?, ‘धर्मकांटा’ क्या इस पर मज़हबों का तौल होता है?, ‘राजधर्म’ क्या यह राजा का धर्म है जो प्रजा का नहीं है।
“हिन्दुस्तान एक ‘हिन्दू राष्ट्र’ है” का तात्पर्य –
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ये बात साफ़ है कि जब संघ ‘हिन्दू राष्ट्र’ की बात करता है तो इसका इरादा कुछ और कहने का होता है। इसे सीधे अर्थों में नहीं समझा जा सकता। इसकी कई तरह से व्याख्या दी गयी है।
एक अर्थ यह कि भारतीयों को हिंदू माना जाना चाहिए, क्योंकि उनकी पहचान हिंदू की है और इसकी जड़ें उनकी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति में हैं।
अगर भौगोलिक सन्दर्भ में देखें तो “भारत एक हिंदू देश है- हिंदुस्तान। हिंदुस्तान में रहने वाले सभी भारतीय हिंदू हैं. इसमें सभी शामिल हैं,कोई इसाई हिंदू है तो कोई बौद्ध हिन्दू,सभी हिन्दुस्तानी हैं।”
सामाजिक सन्दर्भ में इसे अच्छे तरीके से समझा जा सकता है। मशहूर गीत ‘सारे जहाँ से अच्छा’ इसकी अभिव्यक्ति है। इस गीत में इक़बाल भारतीयों को हिंदी कहते हैं, “हिंदी हैं हम, वतन है हिंदुस्तां हमारा।”
संघ का विचार सभी के सामने हैं। इसकी हिंदुत्व की अवधारणा,हिन्दू और राष्ट्रवाद का अवधारणा भी स्पष्ट है,अधिकांश लोग इत्तेफाक भी रखते हैं,कुछ राजनीतिक मजबूरी और सस्ती लोकप्रियता पाने की कोशिश विरोध का मुख्य वजह है।