Monday, 14 March 2016

जब हम सोचने को मजबूर होंगे

     'ये अंधेरा ही आज की टीवी की तस्वीर है' एक नकारात्मक छवि पेश करता है। 'उजाला' आज के समाज का वास्तविक तस्वीर है। यहीं उजाला लोगों के मन को उद्वेलित करेगा,हमें प्रोत्साहित करेगा कि एक नयी सोच और उम्मीद के साथ 'समाज-निर्माण' के पथ पर आगे बढे। इसकी शुरुआत 'राष्ट्रप्रेम' की व्यापक धारणा से भी हो सकती है और गरीबी से मजबूर और भूखमरी से मरने के कगार पर पहुंचे लोगों का उत्थान करके भी हो सकता है।

परन्तु सवाल जो सभी के जेहन में कौंध रहा है,विचरण कर रहा है कि आखिर उजाला क्या है ?

      सोचने से पहले इस बात का जरूर ध्यान रखें कि कहीं ऐसा न हो जाए कि हम 'उजाला' के बारे में सोचते रहें और कुछ करने की हमारी 'मन की तमन्ना' देश के बदले हालात में 'देशद्रोहियों के महिमामंडन के तेज' में हमारी रक्तों में ही धूमिल होकर प्रवाहित होता रह जाए।


      क्या द्वंद्ववाद(DIALECTICAL) आज के दिनों में नयी विचार ला रहा है ? अपने दिमाग पर जोर डालिये,दिल को धङकाइये,तब सोचिये,शायद आपको जवाब मिल जाए।

      आज पूरे विश्व में 'द्वंद्ववाद' पर दो विचार प्रचलन में है - हीगलवादी और मार्क्सवादी। ध्यान देने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि कार्ल मार्क्स द्वारा दी गयी 'द्वंद्ववाद' की अवधारणा हीगल के द्वंद्ववाद से उधार में ली गयी,लेकिन इसे उल्टा कर दिया गया और हीगल के 'विश्वात्मा'(जिसमें विचारों का संघर्ष चलता रहता है) की संकल्पना की जगह मार्क्स ने आर्थिक शक्ति को डाल दिया,फलस्वरूप नया सिद्धांत अस्तित्व में आया,जिसे 'द्वंद्ववाद भौतिकवाद' के नाम से जाना जाता है,जिसपर 'मार्क्सवादी सामाजवाद' आधारित है।

दोनों के द्वंद्ववाद को समझे बिना हम मूल प्रश्न का विश्लेषण नहीं कर सकते हैं।

       हीगल द्वंद्ववाद का तीन स्तंभ मानता है - वाद(THESIS),प्रतिवाद(ANTI-THESIS) और संश्लेषण(SYNTHESIS)। वह कहता है,'विकास का नियम नकारीकरण का नकारीकरण(NEGATION OF THE NEGATION) है। वाद,प्रतिवाद और संश्लेषण विकास की तीन अवस्थाएं हैं। अपने आंतरिक विरोधों के कारण वाद भंग हो जाता है और प्रतिवाद को जन्म देता है,चूकि प्रतिवाद वाद के विरोधों को दूर करने का प्रयास करता है,इसीकारण भंग हो जाता है। और इसके स्थान पर दोनों के मान्य संश्लेषण अस्तित्व में आता है। तदुपरांत संश्लेषण भी वाद बन जाता है और यह प्रक्रिया चलती रहती है। अर्थात संसार गतिशील और विकासशील है।

      लेकिन कार्ल मार्क्स इस प्रक्रिया को तो स्वीकार करता है,लेकिन संश्लेषण को अंतिम साध्य मान लेता है,उसके अनुसार द्वंद्ववाद की प्रक्रिया रुक जाती है। वह पदार्थ को अंतिम आवश्यता मानता है। अर्थात जब समाजवादी राज्य की स्थापना हो जाएगी तो संसार जड़ हो जाएगा। एक तरह से मार्क्स का 'द्वंद्वात्मक भौतिकवाद' एक संकीर्ण अवधारणा है,जिसका उद्देश्य केवल समाजवाद की अपरिहार्यता को सिद्ध करना है।

       इतिहास गवाह है,कई देशों में समाजवादी राज्य के स्थापना के बाद भी लोकतंत्र का मार्ग प्रशस्त हुआ है और आंदोलन के उपरान्त लोकतांत्रिक राज्य का गठन हुआ है। उदाहरण के तौर पर यूक्रेन और पूर्वी युरोग के राज्यों को ले सकते हैं। ताइवान में भी आजादी की मांग को लेकर आंदोलन सक्रिय है। हांग-कांग का उदाहरण तो ताजा है जहां पर लोकतांत्रिक चुनाव के लिए जबरजस्त आंदोलन हुआ था और आज भी प्रक्रिया में है। मतलब साफ़ है कि संसार में हीगल का द्वंद्ववाद के तहत घटनाएं हो रही है,संसार गतिशील है,प्रगतिशील है,न कि केवल समाजवादी राज्य की स्थापना तक गतिशील है।

      यह लोकतंत्र ही है,जहाँ देश-विरोधी नारे लगाने वालों का खुलेआम समर्थन किया जा रहा है,अर्थात गतिशीलता कायम है जो किसी समाजवादी राज्य में कतई संभव नहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ऐसी हरकत करने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं हो।

      क़ानून का मूल रूप से दो उद्देश्य है पहला,सुधारात्मक(REFORMATIVE) और दूसरा,निवारक(DETERRENCE)। हाल की घटनाओं पर जो कानूनी कार्रवाई हुयी,यह इसी का नतीजा है,ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।