Saturday, 19 March 2016

वाम-दलित गठजोड़ की आहट : एक कोरी कल्पना

     हाल के दिनों में मीडिया में आये बयानों और एक छात्र नेता का भाषण इस ओर ईशारा कर रहा है कि वाम-दलित गठजोड़,बदलाव का एक मुख्य राजनीतिक मंच हो सकता है। उस छात्र नेता के बयानों को सस्ते में नहीं लिया जा सकता,खासकर तब,जब देश की वामपंथी पार्टियों के मुख्य नेता उसके समर्थन में खड़े हों और ये कहते नजर आ रहे हैं कि आने वाले दिनों में वह बंगाल और असम में चुनावी प्रचार कर सकता है।

      वामपंथ जिसका मूल आधार 'वर्ग-संघर्ष' की अवधारणा है। जिसे संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है कि समाज आर्थिक आधार पर निश्चित रूप से दो वर्गों में बंटा होता है और उनमें संघर्ष चलता रहता है। अंत में शोषित बहुसंख्यक वर्ग इस संघर्ष में क्रान्ति के माध्यम से विजय पाता है और एक समाजवादी राज्य का गठन करता है।

      दूसरी तरफ वामपंथ से जिस दलित गठजोड़ की बात कही गयी है,उसे आंबेडकरवादी कहकर पुकारा गया है,हाल में दिए अपने भाषण में उस छात्र नेता ने कहा कि कम्युनिस्टों और आंबेडकरवादियों को संघ-भाजपा के खिलाफ एक मंच पर आना होगा। इसे केवल भाषण के रूप में नहीं लिया जा सकता क्योंकि जहाँ यह भाषण चल रही थी वहाँ कई वामपंथी हस्तियाँ भी मौजूद थे। जो राजनीतिक महत्वाकांझा को भी प्रतिबिंबित करता है।

      यहाँ जिस आंबेडकरवादी विचारधारा का बात किया जा रहा है,उसका मूल मकसद आंबेडकर के विचारों को समाज में लागू करना और सवर्ण-दलित जो भेदभाव उत्पन्न हो गया है,उसे समाप्य करना है। ये आंबेडकरवादी इस बात का भी माँग करते हैं कि समाज के हर क्षेत्र और हर संस्था में दलितों का उचित प्रतिनिधित्व हो।

      अब जो सवाल उभरकर आता है कि क्या वामपंथी संगठन 'वर्ग' की जगह जाति को अहमियत देंगे ? अगर ऐसा करेंगे तो उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है,जैसे की पार्टी के पोलित ब्यूरो में शुरू से लेकर आजतक सवर्णों खासकर ब्राह्मणों का वर्चस्व रहा है,इसपर अंगूली कोई इसलिए नहीं उठाता क्योंकि वामपंथी संगठन 'वर्ग' को ज्यादा अहमियत देते हैं। वाम-दलित गठजोड़ होने की कीमत पर,दलितों से संबंधित संगठन,वामपंथी संगठनों में अपने प्रतिनिधत्व का माँग करेंगे,जो एक चिंता का विषय होगी। वामपंथी संगठन,अन्य संगठन से भिन्न होने के कारण जातिगत अर्थात दलित प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर हिचकेंगे,उनका मूल मकसद प्रतिभा पर आधारित प्रतिनिधित्व देने पर होगा।

आधुनिक मार्क्सवादी विचारकों जैसे कि कॉटस्की,विलियम लीबनैंक्ट,रोजा लक्जमवर्ग को पढ़ें तो वो वर्ग-संघर्ष को खासा अहमियत देते हैं। वर्ग-संघर्ष तो मार्क्सवाद का ह्रदय तथा आत्मा समझा जाता है। जैसा कि लीबनैंक्ट कहता है,"वर्ग-संघर्ष के आधार पर हम अजेय हैं;यदि हम इसे छोड़ देते हैं तो कहीं के नहीं रहेंगे।"

इसकारण यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत में वामपंथ 'वर्ग-संघर्ष' की अवधारणा को छोड़ेंगे नहीं और आदत से मजबूर तथा आरक्षण की वैशाखी लिए हर संस्था में बराबर का प्रतिनिधित्व माँगने वाले दलित इससे हटेंगे नहीं तो यह गठजोड़ अधर में ही रहेगा। पोलित ब्यूरो का पुनः संरचना एक मुख्य चुनौती होगी,जिसका जातिगत आधार वामपंथी संगठन कभी नहीं देंगे।

इस तरह से जो 'वाम-दलित गठजोड़' की संकल्पना की गयी है,वह कोरी कल्पना के अलावा कुछ नहीं है।  

Friday, 18 March 2016

हिंदुत्व और राष्ट्रवाद – संघ के नजरिये से

‘हिंदुत्व’ जो आजकल काफी चर्चा में है। दुर्भाग्य कि अधिकांश लोग इसके  महत्व को नहीं समझ पा रहे हैं। आशा है,पूरे आलेख को पढने के बाद आप सभी इसे समझ पायेंगे।
हिंदुत्व एक जीवन-दर्शन और जीवन पद्धति है जो मानव समाज में फ़ैली समस्याओं को सुलझाने में सहायक है। इसको हम मजहब के समानार्थी नहीं मान सकते हैं,लेकिन अभी तक इसे मजहब के अर्थ में ही गलत तरीके से समझा गया है।
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मजहब मात्र पूजा की एक पद्धति है जबकि हिंदुत्व एक दर्शन है जो मानव जीवन का समग्रता से विचार करता है।
समाजवाद और साम्यवाद भौतिकता पर आधारित राजनैतिक और आर्थिक दर्शन है जबकि हिंदुत्व एक ऐसा दर्शन है जो मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त उसकी मानसिक,बौद्धिक और भावनात्मक आवश्यकताओं की भी पूर्ति करता है।
हिंदुत्व धर्म का पर्यायवाची है,जो भारत वर्ष में प्रचलित उन सभी आचार-विचारों,व्यक्ति और समाज में पारस्परिक सामाजिक समरसता,संतुलन तथा मोक्ष प्राप्ति के सहायक तत्वों को स्पष्ट करता है।
धर्म और मजहब में अंतर है। धर्म जीवन का साक्षात्कार है। जबकि मजहब मात्र पूजा की एक पद्धति है।
अगर उच्चतम न्यायालय के टिप्पणी पर ध्यान से गौर करें,जिसमें कहना है,
‘हिन्दू धर्म को परिभाषित करने में कठिनाई होती है। विश्व के अन्य मजहबों के विपरीत हिन्दू धर्म किसी एक दूत या एक भगवान को नहीं मानता,बल्कि इसमें कई प्रकार हैं। वृहत तौर पर हम इसे जीवन पद्धति के रूप में ही परिभाषित कर सकते हैं। (शास्त्री यज्ञपुरुष दास मामला,1966(3) एससीआर 242)’
रमेश यशवंत प्रभु बनाम प्रभाकर कुंटे(AIR 1996 SC(1113)) मामले में भी शीर्ष अदालत कहता है,’हिन्दू,हिंदुत्व,हिन्दुइज्म को संक्षिप्त अर्थों में परिभाषित कर किन्हीं मजहबी संकीर्ण सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता है। इसे भारतीय संस्कृति और परंपरा से अलग नहीं किया जा सकता। यह दर्शाता है कि हिंदुत्व शब्द इस उपमहाद्वीप के लोगों की जीवन पद्धति से संबंधित है।’
अंगरेजी लेखक केरी ब्राउन अपनी पुस्तक ‘THE ESSENTIAL TEACHINGS OF HINDUISM’ में लिखती हैं,
‘आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धांत है जिस मजहब को पश्चिम के लोग समझते हैं। कोई किसी भगवान में विश्वास करे या नहीं करे फिर भी हिन्दू है। यह एक जीवन पद्धति है,यह मस्तिष्क की एक दशा है।’
राष्ट्र और राज्य की अवधारणा पर संघ प्रचारक एमजी वैद्य का विश्लेषण –
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राष्ट्र यानी लोग होते हैं, लोगों का ‘राष्ट्र’ बनने के लिए तीन प्रधान शर्तें हैं,
1) जिस भूमि पर लोग रहते हैं, उस भूमि के प्रति उनकी भावना. उनको अपनी भूमि माता के समान पवित्र और वंदनीय लगनी चाहिए. वह ‘मातृभूमि’ होनी चाहिए।
2) लोगों का एक इतिहास होता है। इतिहास की घटनाएं जैसे आनंद देने वाली होती हैं, वैसे ही दु:खदायी भी होती हैं। ये घटनाएं विजय की होती हैं, तो पराजय की भी होती हैं। जिनको ये अपने इतिहास की घटनाएं लगती है, उनका राष्ट्र बनता है।
3) तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण शर्त है जिनकी मूल्य-अवधारणा यानी वैल्यू सिस्टम समान होता है, और इस मूल्य-अवधारणा से, जिनके अच्छे या बुरे ठहराने के मापदंड समान होते हैं, उनका राष्ट्र बनता है. यह मूल्य-व्यवस्था ही संस्कृति होती है।
ये जो लोग हैं, उनका नाम हिंदू है। इसलिए यह हिंदू राष्ट्र है। संघ के नाम में ही ‘राष्ट्रीय’ शब्द है। वह केवल राष्ट्र की चिन्ता करता है।
एक राष्ट्र के लिए एक ही मज़हब होना अनिवार्य नहीं। एक ही भाषा होना आवश्यक नहीं। एक ही वंश या नस्ल का होने की आवश्यकता नहीं।
यहां यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि ‘हिंदू’ मज़हब नहीं। अनेक मज़हबों का संघ है। ‘धर्म’ का अंग्रेज़ी में ‘रिलिजन’ या ‘मज़हब’ ऐसा अनुवाद करने के कारण ही अनेक गलत धारणाएं बनी हैं।
अपनी भाषा के कुछ शब्द ही लीजिए, ‘धर्मशाला’ क्या यह धार्मिक स्कूल होता है?, ‘धर्मकांटा’ क्या इस पर मज़हबों का तौल होता है?, ‘राजधर्म’ क्या यह राजा का धर्म है जो प्रजा का नहीं है।
“हिन्दुस्तान एक ‘हिन्दू राष्ट्र’ है” का तात्पर्य –
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ये बात साफ़ है कि जब संघ ‘हिन्दू राष्ट्र’ की बात करता है तो इसका इरादा कुछ और कहने का होता है। इसे सीधे अर्थों में नहीं समझा जा सकता। इसकी कई तरह से व्याख्या दी गयी है।
एक अर्थ यह कि भारतीयों को हिंदू माना जाना चाहिए, क्योंकि उनकी पहचान हिंदू की है और इसकी जड़ें उनकी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति में हैं।
अगर भौगोलिक सन्दर्भ में देखें तो “भारत एक हिंदू देश है- हिंदुस्तान। हिंदुस्तान में रहने वाले सभी भारतीय हिंदू हैं. इसमें सभी शामिल हैं,कोई इसाई हिंदू है तो कोई बौद्ध हिन्दू,सभी हिन्दुस्तानी हैं।”
सामाजिक सन्दर्भ में इसे अच्छे तरीके से समझा जा सकता है। मशहूर गीत ‘सारे जहाँ से अच्छा’ इसकी अभिव्यक्ति है। इस गीत में इक़बाल भारतीयों को हिंदी कहते हैं, “हिंदी हैं हम, वतन है हिंदुस्तां हमारा।”
संघ का विचार सभी के सामने हैं। इसकी हिंदुत्व की अवधारणा,हिन्दू और राष्ट्रवाद का अवधारणा भी स्पष्ट है,अधिकांश लोग इत्तेफाक भी रखते हैं,कुछ राजनीतिक मजबूरी और सस्ती लोकप्रियता पाने की कोशिश विरोध का मुख्य वजह है।

Monday, 14 March 2016

जब हम सोचने को मजबूर होंगे

     'ये अंधेरा ही आज की टीवी की तस्वीर है' एक नकारात्मक छवि पेश करता है। 'उजाला' आज के समाज का वास्तविक तस्वीर है। यहीं उजाला लोगों के मन को उद्वेलित करेगा,हमें प्रोत्साहित करेगा कि एक नयी सोच और उम्मीद के साथ 'समाज-निर्माण' के पथ पर आगे बढे। इसकी शुरुआत 'राष्ट्रप्रेम' की व्यापक धारणा से भी हो सकती है और गरीबी से मजबूर और भूखमरी से मरने के कगार पर पहुंचे लोगों का उत्थान करके भी हो सकता है।

परन्तु सवाल जो सभी के जेहन में कौंध रहा है,विचरण कर रहा है कि आखिर उजाला क्या है ?

      सोचने से पहले इस बात का जरूर ध्यान रखें कि कहीं ऐसा न हो जाए कि हम 'उजाला' के बारे में सोचते रहें और कुछ करने की हमारी 'मन की तमन्ना' देश के बदले हालात में 'देशद्रोहियों के महिमामंडन के तेज' में हमारी रक्तों में ही धूमिल होकर प्रवाहित होता रह जाए।


      क्या द्वंद्ववाद(DIALECTICAL) आज के दिनों में नयी विचार ला रहा है ? अपने दिमाग पर जोर डालिये,दिल को धङकाइये,तब सोचिये,शायद आपको जवाब मिल जाए।

      आज पूरे विश्व में 'द्वंद्ववाद' पर दो विचार प्रचलन में है - हीगलवादी और मार्क्सवादी। ध्यान देने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि कार्ल मार्क्स द्वारा दी गयी 'द्वंद्ववाद' की अवधारणा हीगल के द्वंद्ववाद से उधार में ली गयी,लेकिन इसे उल्टा कर दिया गया और हीगल के 'विश्वात्मा'(जिसमें विचारों का संघर्ष चलता रहता है) की संकल्पना की जगह मार्क्स ने आर्थिक शक्ति को डाल दिया,फलस्वरूप नया सिद्धांत अस्तित्व में आया,जिसे 'द्वंद्ववाद भौतिकवाद' के नाम से जाना जाता है,जिसपर 'मार्क्सवादी सामाजवाद' आधारित है।

दोनों के द्वंद्ववाद को समझे बिना हम मूल प्रश्न का विश्लेषण नहीं कर सकते हैं।

       हीगल द्वंद्ववाद का तीन स्तंभ मानता है - वाद(THESIS),प्रतिवाद(ANTI-THESIS) और संश्लेषण(SYNTHESIS)। वह कहता है,'विकास का नियम नकारीकरण का नकारीकरण(NEGATION OF THE NEGATION) है। वाद,प्रतिवाद और संश्लेषण विकास की तीन अवस्थाएं हैं। अपने आंतरिक विरोधों के कारण वाद भंग हो जाता है और प्रतिवाद को जन्म देता है,चूकि प्रतिवाद वाद के विरोधों को दूर करने का प्रयास करता है,इसीकारण भंग हो जाता है। और इसके स्थान पर दोनों के मान्य संश्लेषण अस्तित्व में आता है। तदुपरांत संश्लेषण भी वाद बन जाता है और यह प्रक्रिया चलती रहती है। अर्थात संसार गतिशील और विकासशील है।

      लेकिन कार्ल मार्क्स इस प्रक्रिया को तो स्वीकार करता है,लेकिन संश्लेषण को अंतिम साध्य मान लेता है,उसके अनुसार द्वंद्ववाद की प्रक्रिया रुक जाती है। वह पदार्थ को अंतिम आवश्यता मानता है। अर्थात जब समाजवादी राज्य की स्थापना हो जाएगी तो संसार जड़ हो जाएगा। एक तरह से मार्क्स का 'द्वंद्वात्मक भौतिकवाद' एक संकीर्ण अवधारणा है,जिसका उद्देश्य केवल समाजवाद की अपरिहार्यता को सिद्ध करना है।

       इतिहास गवाह है,कई देशों में समाजवादी राज्य के स्थापना के बाद भी लोकतंत्र का मार्ग प्रशस्त हुआ है और आंदोलन के उपरान्त लोकतांत्रिक राज्य का गठन हुआ है। उदाहरण के तौर पर यूक्रेन और पूर्वी युरोग के राज्यों को ले सकते हैं। ताइवान में भी आजादी की मांग को लेकर आंदोलन सक्रिय है। हांग-कांग का उदाहरण तो ताजा है जहां पर लोकतांत्रिक चुनाव के लिए जबरजस्त आंदोलन हुआ था और आज भी प्रक्रिया में है। मतलब साफ़ है कि संसार में हीगल का द्वंद्ववाद के तहत घटनाएं हो रही है,संसार गतिशील है,प्रगतिशील है,न कि केवल समाजवादी राज्य की स्थापना तक गतिशील है।

      यह लोकतंत्र ही है,जहाँ देश-विरोधी नारे लगाने वालों का खुलेआम समर्थन किया जा रहा है,अर्थात गतिशीलता कायम है जो किसी समाजवादी राज्य में कतई संभव नहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ऐसी हरकत करने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं हो।

      क़ानून का मूल रूप से दो उद्देश्य है पहला,सुधारात्मक(REFORMATIVE) और दूसरा,निवारक(DETERRENCE)। हाल की घटनाओं पर जो कानूनी कार्रवाई हुयी,यह इसी का नतीजा है,ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। 

Friday, 11 March 2016

मनुस्मृति पर डॉ. आंबेडकर के विचार का कठोर आलोचना

      मनुस्मृति का मूल विषय वेदानुकूल वर्णाश्रम धर्म का विधि-विधान है। इसमें संपूर्ण मानव धर्म है। दूसरे शब्दों में मनुस्मृति एक कानूनी समाजशास्त्र है। इसमें एक ओर मनुष्य के आचरण को लेकर मर्यादा और नैतिक कर्तव्य दिए गए हैं,तो दूसरी ओर समाज व्यवस्था को चलाने के लिए क़ानून,दण्ड,प्रायश्चित आदि का भी समावेश है। एक तरह से कहा जाए तो आधुनिक समाज के संविधान के भाँती मनुस्मृति प्राचीन समाज में 'क़ानून का शासन' स्थापित करता था,जिसके बदौलत राजा और प्रजा दोनों को ही अनुशासित किया जाता था।


      आधुनिक भारत के एक दलित विचारक डॉ. आंबेडकर द्वारा इस किताब की तीखी आलोचना की गयी,गुस्से में आकर उनके द्वारा जला भी दिया गया,इन दिनों उसी का प्रचलन हो रहा है और जगह-जगह 'मनुस्मृति' को समझे बिना जलाने की ड्रामेवाजी चल रही है।

     डॉ. आंबेडकर ने मनुस्मृति पर जो भी विचार व्यक्त कियें हैं,उसमें उन्होंने 475 श्लोकों का बार-बार प्रयोग किया,जिनमें से अधिकांश मिलावटी है,अगर इसे निकाल दिया जाए तो मनु के चिंतन और आंबेडकर के चिंतन में कोई मतभेद नहीं रह जाता।

     अपने किताब 'शूद्रों की खोज' में आंबेडकर लिखते हैं,"मैं संस्कृत भाषा का पारंगत नहीं हूँ तो अपनी इस कमजोरी को मैं स्वीकार करता हूँ।"

     इसीकारण दुर्भाग्यवश डॉ. आंबेडकर ने मनुस्मृति के विषय में वेद विरोधी मैक्समूलर द्वारा संपादित और जॉर्ज बूहलर द्वारा अंगरेजी में अनुवादित मनुस्मृति के आधार पर अपना विचार लिख दिया,जिससे अनेक भ्रांतियाँ हुयी। मैक्समूलर और बूहलर के भारतीय संस्कृति विरोध के पूर्वाग्रह को कई वामपंथी इतिहासकार भी स्वीकार करते हैं।

     मनु के धर्मशास्त्र का मुख्य विषय वर्णाश्रम धर्म है,लेकिन डॉ. आंबेडकर द्वारा दुर्भाग्य से वर्ण-व्यवस्था को आज के जन्म आधारित जाति-व्यवस्था के रूप में समझ लिया जाता है। इसपर वे कहते हैं,'मनु ने चारों वर्णों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं क्यों दी ? एक समान क्यों नहीं दी ?"

     यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि मनुस्मृति में सभी मनुष्यों के लिए एक सामान्य धर्म,और प्रत्येक वर्ण के लिए उसका विशेष धर्म कहा गया है। जो स्वाभाविक है क्योंकि प्रत्येक मनुष्य के गुण,कर्म और स्वभाव में भिन्नता पायी जाती है। सभी मनोवैज्ञानिक इस बात को स्वीकार करते हैं और आधुनिक शोधों द्वारा इसे प्रमाणित भी किया जा चुका है कि सभी मनुष्य में भिन्नता पायी जाती है।

     अगर प्राचीन यूनानी विचारक प्लेटो और अरस्तु के विचारों को पढ़ा जाए तो प्लेटो का न्याय विषयक सिद्धांत मनुष्यों के तीन गुणों साहस,बुद्धि और वासना पर ही आधारित है। अरस्तु का भी ऐसा ही विचार है,अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य के गुण और स्वभाव में भिन्नता एक सार्वभौमिक सत्य है। ऐसा नहीं है कि इस तरह का वर्गीकरण केवल भारत में है बल्कि दुनिया के हर कोने में ऐसी प्रवृति पायी जाती है,हालाँकि वे हिन्दू नहीं हैं।

     डॉ. आंबेडकर अपने चिंतन में सबसे बड़ी भूल 'शूद्र की स्थिति' को लेकर करते हैं और आज उसी को आधार मानकर समाज में भ्रम फैलाया जा रहा है।

     दो वाक्यांशों में अंतर समझना बहुत ही जरूरी है,"मनुस्मृति 'कर्म पर आधारित वर्ण-व्यवस्था' का बात करता है जो आज प्रचलित नहीं है,आज 'जन्म पर आधारित जाति-व्यवस्था' है। दोनों में जमीन आसमां का अंतर में और दोनों को एक नहीं माना जा सकता।"

      राजनीतिक कारणों से विकसित की गई अनुसूचित जातियाँ,जनजातियाँ,दलितों को मनु की शूद्र वर्ण से कोई संबंध नहीं है। आज जब वर्ण-व्यवस्था है ही नहीं तो सहीं अर्थों में न कोई ब्राह्मण,न कोई शूद्र और न ही कोई दलित है। आज हिन्दू समाज में सब बराबर है,कोई उंच-नीच नहीं और कोई अगड़ा-पिछड़ा नहीं।

     अतः आज शूद्र के नाम पर किसी को भी मनुस्मृति के विरुद्ध आंदोलन करने का अधिकार नहीं। मनुस्मृति विरोध पूर्णतया अनुचित,असंगत और अन्यायपूर्ण है।

      मनु के वर्ण व्यवस्था के अनुसार सभी वर्ण एक-दूसरे के पूरक एवं सहयोगी है,न कि विरोधी। मनु का शूद्र उपेक्षित नहीं है। उसे ब्राह्मण बनने का पूर्ण अधिकार है।

     मनु का कर्म आधारित वर्ण-व्यवस्था को आज के जन्म आधारित जाति-व्यवस्था के अनुकूल मानना डॉ. आंबेडकर का सबसे बड़ी भूल है जो मंदिर में जाने से रोके जाने के तात्कालिक प्रभाव और उतावलेपन को दिखाता है। अगर वे हिन्दू समाज में समय के साथ उत्पन्न बुराइयों को दूर करके एक 'सशक्त समाज' का निर्माण करने के लिए आंदोलन करते तो उनके लिए एक अच्छा विकल्प होता। बौद्ध धर्म को अपनाकर उन्होंने अपनी संकीर्णता का ही परिचय दिया है।

     आज स्थिति यह हो गयी है कि बौद्ध धर्म स्वीकार किये दलित भी आरक्षण का लाभ उठा हैं,जब इनको बराबरी का अधिकार एक भिन्न धर्म में मिल गया है तो 'आरक्षण की वैशाखी' की जरुरत क्यों ? यहाँ दोहरी नीति स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।

सन्दर्भ सूची -
1. मनुस्मृति
2. मनुस्मृति और डॉ. आंबेडकर - डॉ. कृष्ण वल्लभ पालीवाल
3. भारतीय राजनीतिक विचारक - ओ. पी. गाबा
4. राजनीतिक विचारों का इतिहास(भाग-1) - जे. पी. सूद
5. आधुनिक भारत का इतिहास - विपिन चंद्रा
6. भारतीय संविधान - डी. डी. वसु
7. संस्कृति के चार अध्याय - रामधारी सिंह दिनकर      

Thursday, 10 March 2016

भारत में वनवासी समस्या और समाधान के प्रयास

       भारत में आदिवासियों की जनसंख्या 2011 के जनगणना के अनुसार संपूर्ण जनसंख्या का 8.2 फीसदी है। हिन्दू समाज का यह हमेशा से ही अविभाज्य घटक रहा है।(1)

      हम जानते ही हैं कि भारत की संस्कृति का उत्स वनों-पर्वतों में रहा है। इसी क्षेत्र में ऋषि-मुनियों ने गहन चिंतन करके हमारे देश के व्यक्ति तथा समाज का सर्वांगीण विकास हो सके,ऐसा सामर्थ सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन प्रवाहित किया।(2)

       सहयोग और मुकाबला में वनवासियों का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। सुग्रीव और पुरुषोत्तम श्रीराम की दोस्ती का नमूना आज खोजे नहीं मिलता।(3) ऐसा नहीं है कि वनवासियों का योगदान केवल ऐतिहासिकता को ही धारण किये हुए हैं। आधुनिक काल में नागालैंड के जादो नांग और बिहार-झारखंड क्षेत्र में बिरसा मुंडा तथा मध्य भारत में तांतिया भील जैसे कर्मठ और जुझारू नेताओं का संघर्ष सभी को स्मरणीय होगा।(4)

     आजादी के पहले अंग्रेजों की नीति और ईसाई मिशनरियों के प्रभाव के चलते तथा हमारी राष्ट्रीय कमजोरी के चलते वनवासी क्षेत्र अलग-थलग पड़ गए थे। ऐसा नहीं है कि केवल अंग्रेज इसके लिए जिम्मेवार थे,बल्कि हिन्दू समाज ने भी वनवासी क्षेत्र की संपूर्ण उपेक्षा की है।(5)

आजादी मिलने के बाद -

     डॉ. प्रसन्न दामोदर सप्रे अपनी किताब में लिखते हैं,आजादी मिलने के बाद भी आदिवासियों के समस्याओं का निदान नहीं हो पाया है। प्रशासन का कार्य भी उसी अंग्रेजों की लीक पर ही चल रहा है। यह क्षेत्र आज भी कई समस्याओं के जंजाल में अटका पड़ा है।(6)

      इन वनवासियों की समस्या कई कारणों से बनी हुयी है,जिसे समझने के लिए आतंरिक और बाह्य में वर्गीकरण कर सकते हैं।
आतंरिक कारण -
      व्यापारी,ठेकेदार और सूदखोरों ने वनवासी समाज का बहुत शोषण किया है,इस बात को कई इतिहासकार मानते हैं,चाहे वो रोमिला थापर हों या विपिन चंद्रा। सुमित सरकार जैसे सरीखे वामपंथी इतिहासकारों का लेखन विशेषता तो 'नीचे से इतिहास लेखन' रहा है।

      वनवासी क्षेत्रों में जो भी शासकीय कर्मचारी आते हैं,उनमें से अधिकांश अपने कर्तव्य को नहीं निभाते। वहाँ जाने वाले अधिकांश बेमन और मजबूरी में ही जाते हैं। दूसरे कई वे लोग भी हैं जो उनके सरलता और अज्ञानता का लाभ उठाकर शोषण करते हैं।

      विकास के नाम पर लगाए गए कई उद्योगों ने इनके हितों को प्रभावित किया है,ये बेघर और जमीनहीन हो गए हैं। उद्योगों और प्लांट के लगाने से रांची,राउरकेला और कोरबा आदि क्षेत्रों में स्थिति बदतर हो गयी है।(7) जो मुवायजा दी जाती है वह बाजार भाव से काफी कम है।

      ध्यान देने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात है कि सरकार नए-नए क़ानून बनाती है,इनमें से एक जंगल क़ानून भी है। अधिकांश का ऐसा विश्वास है कि जंगलों का विनाश वनवासियों ने नहीं किया है। उनका विनाश आधुनिक सभ्यता एवं उपभोक्तावाद के वाहकों ने लोभ के कारण किया है।
(लेकिन समय बदल रहा है,उनके पुनर्वास का व्यवस्था कर,सरकार द्वारा विकास का एक ऐसा मॉडल लाया जाना चाहिए ताकि वे मुख्यधारा से जुड़ सके।)


बाह्य कारण -
       बाह्य कारणों में सबसे महत्वपूर्ण हैं,'व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण का अभाव'। साथ में विदेशी शक्तियों द्वारा इन आदिवासियों के भावनाओं को भड़काया जाना;इन बेरोजगार,गरीब व भोले युवकों के मन में सीधे ही अलगाववाद की भावनाएं जगाने में ये लोग लगे हैं। ईसाई मिशनरियों का धर्मांतरण कार्यक्रम तो और खतरनाक रूप ले चुका है,हिन्दू समाज को तोड़कर,भारत की एकता और अखंडता को नेस्तानबूद करने की खतरनाक साजिस भी हो रही है। वामपंथी उग्रवाद कई क्षेत्रों में अपना पाँव जमा चुका है। असम के बोडो जनजातियों का आंदोलन,उल्फा आंदोलन और झारखंड आंदोलन इन्हीं की देन है।

       एक तरह से कहा जाए तो वनवासी समाज,चर्चित भाषा में आदिवासी समाज कई समस्याओं से पीड़ित है,जो भारत की एकता और अखंडता के लिए गंभीर संकट बन सकते हैं। इनके समस्याओं का निदान किया जाना बहुत ही जरूरी है। जो है-(8)


एआरसी की सांतवी रिपोर्ट में इनसे संबंधित मुद्दों का स्पष्ट वर्णन किया गया है -
- भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों में सबसे ज्यादा अनुपात अनुसूचित जनजातियों का ही है जो उनके जनसंख्या का 45.9 फीसदी है।
- दूसरा मुद्दा 'सामाजिक न्याय' का है। एनसीआरबी के 2006 के आंकड़ों पर ध्यान दें तो SC/ST एक्ट के तहत कुल 5621 मामले दर्ज किये गए,जिसमें 255 को सजा हुयी जबकि 4565 मामले अभी पेंडिंग हैं,अर्थात न्यायिक जटिलता अभी मुख्य समस्या बना हुआ है।(9)
- विकास को बढ़ावा देने के लिए जनजातीय क्षेत्रों में कई उद्योगों को स्थाोित किया गया,सिंचाई के लिए बाँध बनाये गये,जिसके कारण इनका विस्थापन होता रहा। हालांकि सरकार द्वारा 2007 में पुनर्वास संबंधी नई नीति स्वीकार की गयी लेकिन संतोषजनक काम नहीं हो पाया।
- इस रिपोर्ट द्वारा जो अन्य मुद्दों की ओर इंगित किया गया,वह है-क़ानून और नीति को लागू करने की निष्ठा में कमी,प्रशासन में विश्वास का न होना,सार्थक विकास नीति और स्पष्ट जनजातीय नीति का न होना आदि।

आदिवासियों के समस्याओं के समाधान के लिए सरकार द्वारा किये गए प्रयास -

        1999 में जनजातीय विकास को ध्यान में रखकर जनजातीय मामलों से संबंधित एक मंत्रालय को बनाया गया,जिसका मुख्य उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास पर फोकस करना है।(10)

        केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा उन क्षेत्रों में बढ़ावा देने के लिए कई छात्रवृति कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। इसके बदौलत कई जनजातीय परिवारों में बदलाव देखने को भी मिला है,लेकिन फिर भी अभी बहुत कुछ किये जाने की जरुरत है।

        स्वास्थ्य और पोषक तत्वों की पूर्ति के लिए कई कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। पानी की शुद्धता और उपलब्धता के लिए अंतरिक्ष प्रोद्योगिकी पर जोर दिया जा रहा है।

       इनके विकास को ध्यान में रखकर वित्तीय आवंटन को बढ़ा दिया गया है,कई एनजीओ के साथ सरकार सहयोग कर रही है।

       वर्तमान भारत सरकार द्वारा 'स्टार्ट अप इण्डिया' और 'स्टैंड अप इंडिया' के तहत जनजातियों के स्वरोजगार का एक सुनहरा अवसर दिया गया है,अगर यह कार्यक्रम सफल हो जाता है तो इनकी दशा और दिशा दोनों सुधर जाएगी।

वनवासी कल्याण के लिए संघ का प्रयास - 

       राष्ट्रवादी संगठन 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' वनवासियों के कल्याण के लिए 'वनवासी कल्याण आश्रम' नाम के एक सामाजिक कार्यक्रम चलाता है।(11) जिसकी स्थापना 1952 में बालासाहेब देशपांडे द्वारा किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य वनवासी समाज की सर्वांगीण उन्नति कर राष्ट्रीय एकता की भाव को पुष्ट करना है।

      'वनवासी कल्याण आश्रम' कई विकल्प आदिवासियों को देता है,जिसमें सबसे महत्वपूर्ण छात्रावास सुविधा है,जो 'राष्ट्रीय सेवा भारती' द्वारा कार्यान्वित होता है। आज इसके 150 से ज्यादा छात्रावास प्रचलन में हैं।

      पाठशालाएं का आरंभ भी 1952 से कल्याण आश्रम का आरंभ के समय से ही हो रहा है। वनवासियों में शिक्षा का प्रसार बहुत काम है,अतः इसका महत्व काफी बढ़ जाता है। तीन से छः वर्ष के बच्चों के लिए 'बाल संस्कार केंद्र' चलाये जाते हैं।

      अन्य महत्वपूर्ण काम जो संघ अपने संगठनों के माध्यम से करता है ताकि आदिवासियों की स्थिति को सुधारा जा सके,उसे संक्षेप में इसप्रकार बताया जा सकता है-चिकित्सा केंद्र,कृषि और व्यावसायिक प्रक्षिक्षण केंद्र,खेलकूद केंद्र,सत्संग तथा श्रद्धा जागरण केंद्र,युवा समिति तथा महिला समिति,लोक कला मंच आदि के माध्यम से सर्वांगीण विकास का प्रयास करता है।

चूकि वनवासियों का आज का स्थिति सदियों से चले कुचक्र और शोषण का परिणाम है,अतः तत्काल इसका समाधान हो पाना संभव नहीं दिखता। इसके लिए अनवरत प्रयास करते रहने की जरुरत है,तब ही जाकर मूल लक्ष्य को पाया जा सकेगा। 

संदर्भ सूची -
1. www.censusindia.gov.in
2. हमारे वनवासी और कल्याण आश्रम,2004 - डॉ. प्रसन्न दामोदर सप्रे 
3. रामायण कथा पर आधारित 
4. स्वतंत्रता संग्राम - विपिन चंद्रा,आधुनिक भारत का इतिहास - सुमित सरकार और एनसीईअारटी 
5. आधुनिक भारत का इतिहास - विपिन चंद्रा 
6. हमारे वनवासी और कल्याण आश्रम,2004 - डॉ. प्रसन्न दामोदर सप्रे 
7. www.sociologyguide.com
8. ISSUE RELATED TO SCHEDULED TRIBE - ADMINISTRATIVE REFORM COMMITTEE -       7TH REPORT (ARC-7thReport-ch7.pdf)
9. www.ncrb.nic.in
10. www.tribal.nic.in
11. www.rss.org

फोटो सौजन्य - गूगल,संबंधित वेबसाइट

WRITTEN BY - SURESH KUMAR PANDEY

Tuesday, 8 March 2016

वैचारिक छलावा कब तक काम आएगा ?

       एक दौर था,कॉलेज के दिनों का जब मैं वामपंथी छात्र संगठन में सक्रिय हुआ करता था। कॉलेज के दिनों का याद आज भी मेरे जेहन में है। विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम को ऐसा बनाया गया है कि कार्ल मार्क्स एक सदाबहार विचारक के रूप में उभरते हैं,चाहे राजनीतिक विज्ञान हो या दर्शनशास्त्र या समाजशास्त्र,यहाँ तक कि इतिहास भी अछूता नहीं है,रहे भी कैसे ? क्योकि समकालीन विश्व इतिहास वैचारिक टकरावों से भरा पड़ा है,चाहे विश्वयुद्ध के दौरान की घटना हो या शीतयुद्ध।

       लेकिन मुझे इससे परेशानी नहीं है,परेशानी उस बात से है कि वामपंथ का वर्णन एक अति महत्वपूर्ण दर्शन के रूप में किया गया है वो भो बाकी पर तरजीह देकर,केवल इतना ही नहीं बल्कि अन्य को इसके तुलना में गौण ही रखा गया है,वह चाहे फासीवाद हो या उदारवाद,गाँधीवाद हो या बहुवाद,पश्च-उपनिवेशी हो या नारी अधिकारवाद। इसीकारण दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से मार्क्स के कुछ विचार को हटाने की माँग उठी थी।


       सोवियत संघ के पतन के बाद कई दबे हुए दस्तावेज निकलकर सामने आये,जिससे यह जगजाहिर हो गया कि फासीवाद की तरह साम्यवाद ने भी द्वितीय विश्वयुद्ध भड़काने में बराबर की भूमिका निभायी थी। जितना हिटलर जिम्मेवार था उतना ही स्टालिन। लेकिन एक की बुराई और आलोचनाओं की लंबी-लंबी व्याख्याएं लिख दी गयी जबकि दूसरे को एक विचारधारा का प्रचारक मान लिया गया। एक सच्चाई यह भी है कि अगर द्वितीय विश्वयुद्ध का परिणाम जर्मनी के पक्ष में रहता तो कल्पना किया जा सकता है कि आज का इतिहास कैसा होता ?

       कम्युनिस्टों का ही यह कार्यपद्धति है कि 'जनक्रांति' के नाम पर लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्त्या करें। तदुपरांत यह जनक्रांति का मुखौटा रूपी आवरण छोड़कर शीघ्र ही अधिनायकवाद का रूप ले लेता है।


       स्टालिन ने अपने राजनीतिक विरोधियों का जिस तरह सफाया किया,उसमें उसने हिटलर को भी पीछे छोड़ दिया,वहीं माओ ने भी सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर दमन करने में कोसों आगे निकल गया।

        दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि सभ्य समाज के प्रति युद्ध को वे जनयुद्ध की संज्ञा देते हैं। अफजल ने सभ्य समाज के प्रति ही तो हथियार उठाया था,याकूब मेमन का कारनामा भी ऐसा ही था,अगर आतंकवादियों से वामपंथियों की गठजोड़ बनता है,तो आश्चर्य कैसा ? यह स्पष्ट रूप से लोगों के साथ वैचारिक छलावा है।

       भारत को तोड़ने की इन वामपंथियों की षडयंत्र हमेशा से रही है। कम्युनिस्टों ने जिन्ना की पाकिस्तान की माँग का समर्थन कर देश के बँटवारे की बौद्धिक जमीन तैयार कर दी और आज जेएनयू को इसका प्रयोगशाला बनाकर एक बार फिर काश्मीर,मणिपुर,केरल और अन्य क्षेत्रों के बहाने घिनौना काम कर रहे हैं। जो हास्यास्पद ही है।

       आजादी के बाद 1975 में लगे आपातकाल को याद किया जाए तो वामपंथियों ने आपातकाल और प्रेस पर लगे प्रतिबंधों का समर्थन किया और आज अभिव्यक्ति की आजादी का माँग कर रहे हैं,साथ ही देश विरोधी नारों को असहमति का हक़ करार दे रहे हैं।

     वास्तविकता यह है कि इन कम्युनिस्टों का गरीबों और वंचितों से कोई मतलब नहीं,मतलब तो सिर्फ गरीबी से है ताकि वैचारिक छलावे से उन्हें मोहित कर अपनी दुकानदारी चलाते रहें। इसका जीता जागता प्रमाण यह है कि अगर सच में गरीबों,दलितों,पिछड़ों से इनका सरोकार रहता तो पश्चिम बंगाल और केरल की हालत आज बदल गयी होती।

       मार्क्स के शिष्य लेनिन को उनके ही देश में गहरे दफ़न कर दिया गया है,लेकिन भारत में कॉमरेड अभी भी उस सड़-गल गयी विचारधारा पर प्रयोग कर खुशहाली और उन्नति के मार्ग पर ले जाने का दावा करते हैं।


       शुक्र है आज राष्ट्रवादी मीडिया 'ज़ी न्यूज' का,जिसने उनके घिनौना काम का रिपोर्टिंग कर समाज में एक नयी चेतना पैदा की। अन्य मीडिया संस्थानों के सहायता के बदौलत भारत में राष्ट्रवाद की अलख को जगाया गया,जिससे भारत एक सशक्त 'राष्ट्र-राज्य' बनने की ओर अग्रसर हुआ।

शैम्पेन की चुस्की लेते हुए होटलों में बैठकर इस बात को उठाया गया कि भारत में असहिष्णुता बढ़ रही है,यह जाहिर करता है कि इस तरह का दुष्प्रचार किया गया। आज यह बुलबुला फुट चुका है। अनुपम खेर का भाषण काबिलेतारीफ है जिन्होंने बहस को एक नया मोड़ दिया है।


ऐसे दौर का शुरुआत आरंभ हो चुका है जब भारत में दो विचारधाराओं का सीधे-सीधे टकराव हो रहा है। वामपंथी ताकतें भी अपनी कमर कास चुकी है। केंद्र में सत्ता परिवर्तन के साथ 60 वर्षों से दबाते गए दक्षिणपंथियों का मनोबल काफी बढ़ गया है,एक तरह से कहा जाए तो यह संघर्ष एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। संभावना है कि दक्षिणपंथ का पताका भारत में जोश,साहस और ओजपूर्ण गुणों को समेटकर लहरेगा और सभी को दिखा देगा कि हम कितने महान हैं। 


(अगर किसी को कमेंट करना है या बहस में भाग लेना है तो तथ्य पर बात करें,साथ ही प्रणाम के साथ अन्यथा अपनी ऊर्जा बर्बाद न करें। बिना प्रमाण किसी बात का कोई आधार नहीं। इस पूरे आलेख के हर पहलू का प्रमाण नीचे संदर्भ सूची में दिया गया है चाहे तो देख सकते हैं,धन्यवाद।) 

संदर्भ सूची -

आजादी के बाद का भारत - विपिन चंद्रा
गांधी के बाद का भारत - रामचंद्र गुहा
विश्व इतिहास - 12वीं का एनसीईआरटी,इग्नू का समाग्री(अलग-अलग किताब है)
अंतर्राष्ट्रीय संबंध - वी.एन. खन्ना,तपन विश्वाल(अलग-अलग किताब है)
स्वतंत्रता संग्राम - विपिन चंद्रा
आधुनिक भारत का इतिहास - सुमित सरकार
राजनीतिक विचारों का इतिहास(भाग 4) - जे.पी. सूद
दैनिक जागरण में बलबीर पुंज का आलेख
टेलीग्राफ डिबेट,कलकत्ता(खासकर अनुपम खेर का भाषण)
ज़ी न्यूज का डीएनए प्रोग्राम
विभिन्न टीवी डिबेट(राज्यसभा टीवी का देश-देशान्तर,आठ बजे;डीडी न्यूज का चर्चा में)
बीबीसी हिन्दी न्यूज पोर्टल

फोटो सौजन्य - गूगल

WRITTEN BY - सुरेश कुमार पाण्डेय