Wednesday, 17 February 2016

124A - राजद्रोह : निहितार्थ

आईपीसी की धारा 124A क्या है ? 
अपनी सुनवाई के दौरान डॉ. विनायक सेन ने यहीं सवाल जज से पूछा था,जवाब में जज ने कहा,"राजद्रोह,संविधान द्वारा स्थापित सत्ता के विरुद्ध भड़काव,दूसरे शब्दों में देशद्रोह है।"हालांकि बाद में इन्हें बरी कर दिया गया। 

राजद्रोह को लेकर फिर से एक नया बहस देश में चल रहा है जिसके केंद्र में जेएनयू के छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार है जिनपर देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज किया गया है और फिलहाल ये न्यायिक हिरासत में हैं। 


इस हालिया वाकया ने यह प्रश्न फिर से उठा दिया है कि धारा 124A का आज के समय में क्या प्रासंगिकता रह गयी है,जो उपनिवेशवादी शासन द्वारा 1860 में लागू 'भारतीय दंड संहिता' में प्रावधानित है,जिसका उद्देश्य आजादी के लड़ रहे स्वतंत्रता सेनानियों को अंकुश करना था। 

ब्रिटिश शासन के समय महात्मा गांधी को भी 1922 में इस धारा के तहत दोषी ठहराया जा चुका है। इस क़ानून के बारे में उन्होंने कहा था,"यह नागरिक के आजादी को दबाने का एक यंत्र है।"

124A के मुखालफत करने वालों द्वारा जोरदार तरीके से यह आवाज उठाया जा रहा है कि जब संविधान में अनुच्छेद 19(1) के तहत मिली आजादी पर अंकुश लगाने के लिए अनुच्छेद 19(2) उपलब्ध है तो आईपीसी की धारा 124A का क्या जरुरत है ? इनके अनुसार यह धारा राज्य को एक शक्ति दे देता है ताकि विचारों को दबा सके। 


दो जुदा विचार -

वहीं मानवाधिकार कार्यकर्त्ता गौतम नवलाखा का मानना है कि हिंसा का वकालत करना नहीं बल्कि उसे भड़काना देशद्रोह है। इस संबंध में वे एक उदाहरण देते हैं - पंजाब प्रांत के बलवंत सिंह नाम के एक शख्स का जिसने 'खालिस्तान जिन्दावाद' का नारा लगाया था लेकिन कोर्ट ने उसे यह कहकर बरी कर दिया कि उसके खिलाफ देशद्रोह का मामला बनता ही नहीं है। 

उधर भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर रहे अमिताभ सिन्हा का कहना है,"जिसे अदालत के फैसले के बाद फांसी हुयी,उसकी बरसी पर भारत विरोधी नारे लगे हैं,सरकार के विरोध में नारे लगाना और यह कहना कि कश्मीर भारत से अलग होना चाहिए,यह सीधे राष्ट्रद्रोह का मामला है।"


क्या कहता है धारा 124 क ?

राजद्रोह - जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यप्रस्तुति द्वारा या अन्यथा भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करेगा, या पैदा करने का प्रयत्न करेगा, या असंतोष उत्तेजित करेगा या उत्तेजित करने का प्रयत्न करेगा वह आजीवन कारावास से, जिस में जुर्माना भी जोड़ा जा सकेगा या तीन वर्ष तक के कारावास से जिस में जुर्माना जोड़ा जा सकेगा, या जुर्माने से दंडित किया जा सकेगा।"

धारा में वर्णित शब्द 'अवमान'(DISAFFECTION) का संबंध 'वफादारी न होने' से है और द्वेष के सभी भावनाओं से है। सुप्रीम कोर्ट ने 'श्रेया सिंघल वर्सेज भारत सरकार मामला' में  66 A पर अपने फैसले के तहत ADVOCACY(किसी का समर्थन) और INCITEMENT(उकसाना) में भी अंतर किया है।

धारा '124 क' को बाद में आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बेहतर तरीके से समझा जा सकता है,इस संबंध सबसे पहला मामला जो ध्यान में आता है,वह है - 1962 का केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य का मामला,जिसमें शीर्ष अदालत के पांच जजों के पीठ ने कहा था,"देशद्रोह के तहत तभी सजा दिया जाएगा जब हिंसा के लिए भड़काया जा रहा हो या लोक अव्यवस्था हो गयी हो।" कुछ इसी तरह का 'इंद्रा दास बनाम असम राज्य मामला' में भी कहा।


निष्कर्ष -

अगर ताजा मामला को देखा जाए जिसका केंद्र जेएनयू में कुछ छात्रों द्वारा एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाना है और उसमें आपत्तिजनक नारे लगाए गए हैं जैसे - अफजल तेरे कातिल जिन्दा हैं,भारत के कई टुकड़े करेंगे आदि। इसे देखते हुए यहीं लगता है कि वहाँ उपस्थित भीड़ को उकसाने की कोशिश की जा रही है और यहां देशद्रोह का स्पष्ट मामला बनता है।