Monday, 22 February 2016

मोदी जी 56 इंची छाती दिखाने का वक्त आ गया है

       आरक्षण को लेकर गुजरात का पटेल आंदोलन एक संकेत था,अब हरियाणा में जब जाटों ने उग्र रुख अख्तियार किया तो खतरे की घंटी है कि नौजवान के अंदर वह क्रोध उबल रहा है,जो बर्षों से अपने अंदर पाल रहे थे कि रोजगार को लेकर हमारे समकक्ष के जातियों की तुलना में भेदभाव किया जा रहा है। मोदी जी जेएनयू में दस-बारह लड़कों की राजद्रोह वाली हरकत थी लेकिन हरियाणा में तो असंख्य नौजवान है,क्या हार्दिक पटेल जैसा इनपर पर राजद्रोह का मुकदमा करेंगे ?

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       आपने जो जाटों के आरक्षण देने संबंधी पांच सदस्ययीय कमेटी बनायी है,अगर इसका फैसला हाँ में आता है तो पटेलों को क्यों नहीं दिया जा सकता ? क्या वे इतने उग्र नहीं हैं ? अगर ऐसा हो जाता है तो कामा,गुर्जर,मराठा,रेड्डी,भूमिहार आदि क्या चुप बैठेंगे ? शायद इनको भी जेल में डालने के लिए बजट का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ेगा ताकि जेलों का आधारभूत ढांचा तैयार किया जा सके।

       परन्तु मुख्य सवाल है कि क्यों लोग आरक्षण को ताकत के बल पर लेना चाहते हैं,जो असहाय लोगों के उत्थान का एक जरिया है। तफ्तीश जरूरी है। ऐसे तो मैंने इसका व्याख्या कई आलेखों में किया है,लेकिन आज एक बार फिर करता हूँ।

      'आरक्षण' एक ऐसा शब्द है जो लेने वालों के लिए वरदान और नहीं लेने वालों के लिए अभिशाप जैसे विशेषणों के रूप में अपनी साख बना चुका है,जबकि संवैधानिक प्रावधान कुछ और ही कहता है,जो है - 'सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ेपन'। इस संबंध में संविधान यह भी स्पष्ट करता है है कि आरक्षण को 'अनुच्छेद 16(4)-अवसर की समानता' का उल्लंघन नहीं माना जाएगा। लेकिन स्थितियाँ उलट हो गयी है।

जाट आंदोलन का एक दृश्य

      किसानी पर आश्रित जाति भूमिहार,पटेल,जाट,गुर्जर और कर्मकांड कराने वाले ब्राह्मण समुदाय के लोगों से भी आवाज उठाने लगी है। उच्च वर्ग जिन्हें दोषी बनाया गया है,आरक्षण प्राप्त वर्गों के पिछड़ेपन का,जबकि सामाजिक व्यावहारिकता बतलाता है कि आज के तत्कालीन युग में इनकी भी स्थिति बदतर हो गई है क्योंकि किसानी फायदे का सौदा नहीं रहा और समाज के टूटने के कारण कर्मकांड से आय का ब्राह्मणों के लिए वह साख नहीं रहा। काशीनाथ सिंह का उपन्यास 'काशी का अस्सी' एक सारगर्भित विश्लेषण करता है।

       एक तरह से कहा जाए तो पटेलों का आंदोलन,जाटों का आंदोलन आरक्षण लेने को लेकर नहीं है,क्योंकि इन्हें भी पता है कि उन्हें ओबीसी कोटे में शामिल नहीं किया जा सकता है,सुप्रीम कोर्ट का आदेश है और सरकार भी असहाय है। इसलिए इनका मूल मुद्दा है - आरक्षण देने की व्यवस्था का पुनर्गठन करने का,उसका समीक्षा करने का तथा उन वर्गों को बाहर निकालने का जो इसके हकदार नहीं है।

       दूसरे शब्दों में इसे इस रूप में देखा जा सकता है - गाँव का 'जाट बनाम यादव';'पटेल बनाम कुर्मी';'मराठा बनाम वंजारा';'जाट बनाम गुर्जर' की न सामाजिक हैसियत में फर्क है और न ही आर्थिक हैसियत में। फिर भी एक को आरक्षण और दूसरे को नहीं तो गाँव का नौजवान भड़केगा ही।
जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान की गयी आगजनी

         अतः आरक्षण के पैरोकारों नीतीश कुमार,लालू यादव,मायावती,मुलायम सिंह यादव सभी से गुजारिश है कि कुछ अन्य नेताओं जैसे नरेंद्र मोदी,राहुल गांधी,अरविंद केजरीवाल से मिलकर आरक्षण से संबंधित एक व्यवस्था बनाइये जिससे बार-बार उठने वाली उबाल को रोका जा सके।

         मोदी जी अभी तो कमेटियां और आयोग बनाने से कुछ हद तक संकट कम हुआ है,लेकिन उबाल जल्द आएगा अन्य वर्गों में भी। जो आपकी और आपकी पार्टी की चुनावी मजबूरी है उसे कुछ देर के किये नजरअंदाज करें,समाज को टूटने से बचाएं,नहीं तो समाज का हर जाति एक-दूसरे का दुश्मन बन जाएगा और महान व्यक्तिवादी विचारक हॉब्स के प्राकृतिक अवस्था जैसी स्थिति बन जायेगी,लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाएंगे जैसे - हरियाणा में सैनी और जाट समुदायों के बीच हो रहा है;फिर मजबूरी में 'लेवियाथन' का कॉन्सेप्ट लागू करना पड़ेगा और दमन पर उतरना पड़ेगा जो टिकाऊ नहीं है।

हरियाणा का जाट आंदोलन का एक दृश्य

         मोदी जी यहीं वह समय है कि आप अपनी 56 इंची छाती का कमाल दिखाएँ,तात्कालिक लाभ के लिए सामाजिक एकता को तोड़ने से बचाएँ और जो उहापोह की स्थिति बनी हुयी है कि उत्तर-प्रदेश के 2017 में होने वाली विधान सभा चुनाव में पश्चिमी यू.पी. के जाट के वोट से स्थति सुधरेगी,लेकिन ये भी ध्यान रखें कि हरियाणा की सरकार गैर जाटों की वोटों से ही चल रही है और वहाँ 'जाट बनाम गैर-जाट' का मुद्दा भी बन गया है।

        आपसे गुजारिश है,जो ओबीसी वाली आरक्षण की व्यवस्था है उसका पुनर्गठन किया जाए क्योकि उसमें अन्य जातियों को ठूंसा नहीं जा सकता,इसकारण आपके पास सिर्फ यहीं रास्ता है -
- गैर-दलित के लिए पुरे आरक्षण में कसौटी सिर्फ गरीबी की हो,जो गरीब है उसी को आरक्षण। सिर्फ गरीब के आरक्षण का फॉर्मूला ही मनोवैज्ञानिक,भावनात्मक तौर पर सभी के लिए स्वीरोक्तिपूर्ण होगी। इससे जातियों में न तो दुश्मनी बनेगी और न ही भेदभाव की स्थिति।
जहाँ तक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान है उसे एक या दो पीढ़ी के लिए सीमित कर दिया जाए कि जो इसका फायदा उठा चुके हैं वो इसका अब लाभ पाने के हकदार नहीं हैं।
लेकिन इस सोच के लिए कलेजा चाहिए,राजनीतिक हिम्मत चाहिए। आखिर कब काम आएगी आपके 56 इंची छाती और उसमें धड़कता कलेजा ?