Tuesday, 2 February 2016

'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' कितना कारगर...?

यह बिज़नेस सन्देश मैगज़ीन के जनवरी एडिशन में प्रकाशित हो चूका है। 



           किसानों के कल्याण के लिए मोदी सरकार का यह एक महत्वाकांक्षी योजना है। सरकार द्वारा ऐसा दावा किया जा रहा है कि इस नए फसल बीमा में पुरानी सभी योजनाओं के अच्छे पहलू को शामिल किया गया है साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि उन योजनाओं में जो खामियां रह गयी थी उसे दूर करने का प्रयास किया गया है। इसके आने के साथ ही यह बहस का विषय बन गया है,और कई लोग इस योजना को राजनीति से प्रेरित मान रहे हैं लेकिन राजनीति से ऊपर उठकर देखा जाए तो जानकारों का मानना है,असल में यह एक कारगर योजना साबित होगी अगर इसके पहलुओं को उचित तरीके से लागू किया जाए।

         परन्तु सवाल जो उभरकर सामने आ रहे हैं,वह है कि मौजूदा समय में फसल बीमा की पहुँच मात्र 23% है,जिसे 50% किसानों तक पहुंचाया जा सकेगा? जो इस नए बीमा योजना का मुख्य लक्ष्य भी है। खासकर वैसी स्थिति में जब किसानों में से अधिकांस सीमान्त और काफी गरीब तबके से ताल्लुक रखते हैं,ये लगभग किसी भी फसल मौसम चाहे वह रबी हो,या खरीफ हो,या जायद,में समयानुसार बीज-उर्वरक आदि का खरीददारी नहीं कर पाते हैं और जो महाजनों से कर्ज लेकर ऐसा कर भी लेते हैं,तो उनके पास बीमा कराने के लिए पर्याप्त धन नहीं बचता,जो एक अनावश्यक बुराई है।

         इस योजना को खरीफ 2016 से लागू किया जाना है,इस समयावधि को देखते हुए हमलोगों और सरकार के पास अभी पर्याप्त समय है। इस समय का इस्तेमाल एक महत्वपूर्ण हथियार के रूप में किया जा सकता है। किसानो की पहुँच इस नयी फसल बीमा योजना तक पहुंचाने,इसपर विश्वास करने तथा किसानों के कल्याण के लिए उन्हें रास्ता दिखाने का जो चिर-परिचित माध्यम हमारे सामने है,वह है-एटीच्यूड चेंज अर्थात अभिवृत्ति बदलाव। यहीं वह माध्यम है,जिसके बदौलत 'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' से किसानों की दुर्दशा को ठीक स्तर पर लाया जा सकेगा। एटीच्यूड चेंज कोई नया माध्यम नहीं है बल्कि इसका इस्तेमाल पहले भी किया जा चुका है और समाज में कई तरह के बदलाव को लाया गया है और कई को लाने का प्रयास भी किया जा रहा है। इसे हम कई उदाहरणों से समझ सकते है। प्राचीन काल से हम सभी भारतीय खुले में शौच करते आ रहे हैं,जिसकारण हमारी अभिवृत्ति ऐसी हो गयी है कि शौचालय होते हुए भी हम उसका उपयोग नहीं करते। सीधे नज़रों से देखने से तो ऐसा लगता है कि इनलोगों की इसप्रकार की मानसिकता बदलेगी काफी मुश्किल है,लेकिन जब सरकार द्वारा कई सेलिब्रिटी जैसे-विद्या बालन,अमिताभ बच्चन,सचिन तेंदुलकर आदि के माध्यम से इसके होने वाले नुकसान और फायदे को उजागर कराया गया तो बाहर शौच जाने वाले लोगों में आश्चर्यजनक कमी देखने को मिली। एक दूसरा उदाहरण 'गिव इट अप' स्कीम का है,जो मार्च 2015 में लागू हुआ था। इस स्कीम का मुख्य मकसद स्वेक्षा से एलपीजी उपभोक्ताओं के सब्सिडी को छोड़वाना था,जो बिना सब्सिडी के बदौलत ही उपयोग करने में सक्षम हैं। टेलीविजन,रेडिओ,मन की बात आदि के माध्यम से सरकार द्वारा लोगों की अभिवृत्ति बदलने का जोरदार प्रयास किया गया। 'अगर आप सब्सिडी छोड़ देते हैं,तो सरकार इन पैसों का उपयोग उनलोगों के लिए करेगी जो आज भी धुँआ में खाना बनाने को मजबूर हैं।' यह वाक्य लोगों पर जादुई असर किया और आज 57 लाख एलपीजी उपभोक्ताओं ने अपनी सब्सिडी स्वेक्षा से छोड़ दी है,जिससे सरकार का 940 करोड़ रुपये का राजस्व बचा है। तीसरा उदाहरण मिड-डे-मिल का ले सकते हैं,इस योजना के तहत सभी समुदाय के बच्चे एक साथ खाना खाते हैं। कहीं दलित रसोइया खाना बनाकर ब्राह्मण,राजपूत जैसे सवर्ण जातियों के बच्चों को खाना खिलाती है। जब प्रारंभ से ही बच्चों में इस तरह के मूल्य का विकास करके अभिवृत्ति को बदला जा रहा है कि सभी बराबर है। जो सरकार का दूरदर्शिता है,जिससे आने वाले दिनों में समाज के अंदर के जाति-व्यवस्था का पतन होगा और एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण होगा।

      ठीक इसी प्रकार का अभियान सरकार द्वारा चलाने की जरुरत है। किसानों को इस बीमा योजना के फायदे को इंगित कराने की आवश्यकता है। इस स्कीम से होने वाले लाभों जैसे कि खरीफ फसलों पर प्रीमियम 2% और रबी पर प्रीमियम 1.5% है,जो पहले के अपेक्षा काफी कम है;प्राकृतिक आपदा हो या स्थानीय आपदा,सभी से हुए नुकसान पर दावा हासिल किया जा सकेगा;कटाई के 14 दिन तक हुए नुकसान का भी दावा हासिल किया जा सकेगा;इन सभी नुक्सान का आकलन तकनीक प्रयोग द्वारा किया जायेगा,स्मार्ट फोन के माध्यम से आंकड़ों को अपलोड किया जाएगा जिससे गलती होने की संभावना कम होगी आदि को कई विज्ञापनों के माध्यम से,सेलिब्रेटियों के माध्यम से,भारत सरकार अपने चैनल के माध्यम से ,अखबारों में इस्तेहार देकर और स्थानीय स्तर-ब्लॉक,गाँवों,जिला स्तर पर पोस्टर लगवाकर,जिलाधिकारियों को यह निर्देश देकर कि लाउडस्पीकर के माध्यम से हर किसान तक इसका जानकारी पहुंचाया जाए। अगर उपर्युक्त सभी उपायों का इस्तेमाल किया जाएगा तो निश्चित रूप से किसानों की अभिवृत्ति को सरकार बदल देगी। जो किसान कर्ज लेकर खेती करते होंगे वे ज्यादा कर्ज लेंगे ताकि बीमा कराकर फसल बर्बादी के बाद कर्ज की चंगुल में फंसने से बच सके। अंततः इस योजना को कारगर बनाया जा सकेगा और किसानों तक पहुंचाया जा सकेगा।
   
      'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' का पूरा विश्लेषण करने का प्रयास किया जाए तो,इससे कई पहलू निकलकर सामने आते हैं। यह योजना आत्महत्या को लेकर मजबूर किसानों को मदद पहुंचाएगी। कैपिंग जैसे विवादास्पद प्रावधान को इस योजना से पूरी तरह हटा दिया गया है, जिससे किसानों को फ़ायदा होगा जबकि पहले इसके चलते बीमित राशि कम हो जाती थी। 
      इस नयी योजना में फसलों की बुआई से लेकर खलिहान तक को समेट लिया गया है,जो इसे अपने आप में अनोखा बनाता है। अब लंबे समय तक क्लेम को लेकर इन्तेजार नहीं करना होगा,प्राकृतिक आपदा के बाद 25% क्लेम सीधे संबंधित किसानों के खाते में चला जाएगा। 
       इस पूरी योजना को लागू करने में केंद्र और राज्य दोनों को बराबर हिस्सेदार बनाया गया है। निष्पक्ष रूप से कहा जाए तो  'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' पूरी तरह किसानों के पक्ष में है,जो उनके कल्याण के लिए रामवाण साबित होगी। 

अगर सरकार फसल बीमा के क्षेत्र में दीपक मोहंती समिति के सिफारिश को मान लेती है,जो है-फसल बीमा को छोटे और माध्यम किसानों के लिए अनिवार्य बनाया जाए,तो किसानों की तकदीर और तस्वीर दोनों बदली जा सकेगी।