Sunday, 21 February 2016

अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन लगाना कितना उचित था ?

अरुणाचल प्रदेश में नई सरकार बन चुकी है और कालीखो पूल राज्य के नए मुख्यमंत्री का शपथ लिए हैं जिन्होंने कांग्रेस के बागी विधायकों का नेतृत्व किया था। वहाँ राष्ट्रपति शासन लगाए जाने को लेकर मामला अदालत में भी गया,हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने यथा स्थिति बनाये रखने के रुख में परिवर्तन करते हुए नए सरकार बनाने का आदेश दिया। 


परन्तु मुख्य सवाल जो उभर कर सामने आया है वह कि राष्ट्रपति शासन लगाना कितना उचित था ? सबसे पहले 1994 के बोम्मई केस का बात करते हैं जिसमें सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच अपने फैसले में केंद्र की ओर से अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग की बात का जिक्र किया था। उस केस में अदालत ने निम्न बातें कही थीं-
- पहला,राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 356 (1) के तहत किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की घोषणा की वैधता न्यायिक समीक्षा के दायरे में है।   
- दूसरा,अनुच्छेद 74 (2) उन तथ्यों की जांच परख करने की राह में बाधक नहीं है जिसके आधार पर राष्ट्रपति किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की घोषणा करने के लिए स्वयं संतुष्ट हुए थे।
- तीसरा,जब तक संसद के दोनों सदन राष्ट्रपति शासन की घोषणा को मंजूरी न दे दें तब तक अनुच्छेद 356 के खंड-1 के उपखंड (अ), (ब) और (स) के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार नहीं होगा कि वह अपनी शक्तियों का उपयोग कर कोई अपरिवर्तनीय कार्रवाई करें। इसी कारण से जब तक संसद के दोनों सदन राष्ट्रपति शासन की घोषणा को मंजूरी नहीं दे देते तब तक राष्ट्रपति राज्यपाल द्वारा विधानसभा भंग करने के कदम को वाजिब नहीं ठहरा सकते।
- चौथा,यदि राष्ट्रपति शासन लगाने की घोषणा को अवैध-अनुचित पाया जाता है तब संसद के दोनों सदनों की मंजूरी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। उसके बाद मामला कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में चला जाएगा। कोर्ट को अधिकार होगा कि वह राज्य में राष्ट्रपति शासन की घोषणा के पूर्व की स्थिति को बहाल करे। 
-पांचवा,अदालत के पास राष्ट्रपति शासन की घोषणा की वैधता को दी गई चुनौती के अप्रासंगिक होने और न्यायिक समीक्षा के व्यर्थ चले जाने से रोकने के लिए मामले की सुनवाई के दौरान राज्य में नए चुनाव पर रोक लगाने के लिए अंतरिम निषेधाज्ञा लागू करने का अधिकार होगा। 
- छठा,यथास्थिति बहाल करने के दौरान यह कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में होगा कि वह राहत की सीमा सुनिश्चित करे। 
-सातवां,सेक्युलरिज्म संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। यदि किसी राज्य सरकार के आचरण से संविधान में निहित सेक्युलरिज्म की भावना चोटिल होती है तो यह विधिवत रूप से माना जाएगा कि राज्य सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चल सकती है। 

अनुच्छेद 74 (2) जो कि राष्ट्रपति को दी गई सलाह की न्यायिक परीक्षण से रक्षा करता है, का अरुणाचल के मामले में आंशिक रूप से उल्लंघन किया गया।
क्या राजयपाल विधानसभा की बैठक बिना कैबिनेट की सलाह के बुला सकते थे? हमें कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए।